हमारे जीवन के दो मूल मंत्र सर्वविदित हैं, कि .. (१) परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है .. और (२) जीवन में जो भी घटित होता है, हमारी भावी अच्छाई के लिए ही होता है। मैं तो मेरे जीवन में इन दोनों ही मूल मंत्रों को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।
अब यदि इस परिवर्तनशील दुनिया एवं जीवन में हर दिन, हर पल खुशियों से भरा होना असम्भव है ; तो हमारे जीवनकाल में भी कष्टकारी क्षणों को कभी-ना-कभी आना तय है। ऐसे में मेरा मानना होता है, कि प्रकृति ने शायद उन कष्टकारी क्षणों में भी हमारी कोई भावी भलाई तय कर रखी होगी। इस तरह .. इस सोच से कुछ हो या ना हो, पर मन में सकारात्मकता कूट-कूट कर भरी रहती है।
हमारे दुःख-कष्ट भरे दिनों में भले ही हमें क्षणिक मानसिक, शारीरिक या आर्थिक उलझनों से गुजरना पड़े भी तो .. वो सारे के सारे क्षण हमें एक अनमोल पाठ अवश्य पढ़ा कर जाते हैं, कि हमारे आसपास के सगों की भीड़ में भी सच्चीमुच्ची कौन अपना व कौन पराया है या औपचारिक रिश्तों की भीड़ में भी एक-दो कौन सगा-सा है।
इस तरह हम अपने अच्छे दिनों में जिन रिश्तों को अपने मन से लगाए बैठे होते हैं, वही रिश्ते बुरे दिनों में केवल औपचारिकता की खानापूर्ति भर निकलते हैं। ऐसे में उन औपचारिक रिश्तों की छद्म अपनापन की पोल की धज्जी उड़ जाती है और औपचारिक रिश्तों के मकड़जाल से हमें छुटकारा मिल पाता है।
हमारे बुरे वक्त ही हमारे सम्बन्धों के 'लिटमस पेपर' होते हैं, जो सामने वाले की औपचारिक सहानुभूति के छलावे और सच्ची समानुभूति की सहायता व आत्मीयता वाले अन्तरों को पारदर्शी बना देते हैं .. शायद ...
आपको आपके अब तक के जीवनकाल में कभी उपरोक्त अनुभूति हुई है क्या ? मुझे तो अपने जीवनकाल में ऐसा मुख्यतः दो बार अनुभव हुआ है। एक बार जब 2021 के कोरोनाकाल में लगभग ढाई माह तक स्वयं-पृथकवास (Self-Isolation) में रहकर मौत का निवाला बनते-बनते रह गया था। दूसरी बार गत दिसम्बर माह 2025 में एक भीषण दुर्घटना के तहत गंभीर चोटिल होने के बाद अस्पताल और अस्पताल के शल्य चिकित्सा कक्ष (Operation Theatre) के बिस्तर से लेकर घर के बिस्तर तक के सफ़र को तय करते हुए पाँच माह बाद भी अभी तक पूर्णतः स्वस्थ होने के लिए प्रतीक्षारत रहते हुए .. बस यूँ ही ...
ख़ैर ! .. आगे .. आज की बतकही के तहत २१ मई २०२६, मंगलवार को प्रसार भारती के तहत आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित होने वाले साहित्यिकी कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग तेरह मिनट के काव्य पाठ में हमारी सात बतकहियों (कविताओं) को आप सुन सकते हैं। जिनमें स्नेह, प्रेम और श्रद्धा में लिपटे रिश्तों के कई स्वरूपों को चंद शब्द-चित्रों में सजाने का प्रयास भर किया है हमने। हमारी आज की बतकही का शीर्षक- "एहसासों की धूप ..." भी इन्हीं बतकहियों में से किसी एक का वाक्यांश है .. बस यूँ ही ...

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जी सुबोध जी, आपकी उपलब्धियों के विषय में जानकर अच्छा लगा!आपने बहुत अच्छी जानकारी दी! आपके साथ हुई दुर्घटना के बारे में जानकर बहुत दुःख हुआ! मुझे बहुत देर से पता चला आज! आशा है अब आप कुशलपूर्वक होंगे! आपने जो शुरू में लिखा, परिवर्तन संसार का नियम है, सुनते जीवन बीत गया पर अपने निजी जीवन में परिवर्तन को स्वीकार करने से बहुत डरती हूँ और जो होता है अच्छे के लिए होता को भी कभी खुले मन से स्वीकार नहीं पाई! पर जिस बात पर बस ना चले उसे स्वीकार करने के शिवाय कोई चारा भी तो नहीं! वर्षों पहले कुरुक्षेत्र आकाशवाणी सेमेरी भी एक कहानी प्रसारित हुई थी पर परिवार और पतिदेव ने कोई साथ ना दिया और वो सफर वहीं थम गया! हमारे यहाँ अपने शहर में आकाशवाणी केन्द्र नही है सो दुबारा कुरुक्षेत्र के लिए कोईरचना नहींभेजी!खैर, कोई बात नहीं एक सार्थक लेख केलिए आभार! और आपके उत्तम स्वास्थ्य के लिए शुभकामनायें और हाँ किसी गैर से किसी अपनेपन की उम्मीद कभी न रखिये यही जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाते हैँ 🙏
ReplyDeleteजी रेणु जी, आपकी शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार आपका। पूर्ण स्वास्थ्य लाभ में अभी भी डेढ़ माह का समय शेष है।
Deleteखैर , ये भी जीवन के रंगमंच का एक हिस्सा है, जिसे सहर्ष स्वीकार करना हमारी नीति और नियति भी है .. शायद ...
हम कभी किसी को पराया समझते ही नहीं।
"जो भी प्यार से मिला, हम उसी के हो लिए" वाले सिद्धांत पर चलने वाले हम जैसे लोग बस सामानुभूति की उम्मीद में औपचारिक सहानुभूति मिलने पर छला हुआ अनुभव करते हैं, बस इतना ही।
अच्छा छोड़िए इन बातों को .. ये तो जीवन का हिस्सा हैं। आप ये बतलाइए कि आपने फ़िल्म - गिन्नी वेड्स सन्नी 2 देखी या नहीं ? इसी वर्ष दो और भी फ़िल्म और वेब सीरीज भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ होने की सम्भावना है।