Showing posts with label जागरण. Show all posts
Showing posts with label जागरण. Show all posts

Sunday, January 11, 2026

जगराता ...


सुबह लगभग सवा पाँच बजे पटना के गाँधी मैदान में सुबह की सैर के लिए हर आयु वर्ग के लोगों के आने-जाने से पनपी चहल-पहल में से ही एक व्यक्ति .. लगभग पैंतीस वर्षीय पवन पर .. मोटा-मोटी साठ वर्षीय सिद्धार्थ जी की नज़र पड़ते ही ...

सिद्धार्थ जी - " सुप्रभातम् पवन बेटा "

पवन - " सुप्रभातम् 'अँकल' जी " 

वैसे तो पवन और सिद्धार्थ जी आपस में ना तो पड़ोसी हैं, ना सगे-सम्बन्धी हैं, ना ही स्वजातीय और ना ही एक ही नौकरी-पेशे में हैं। परन्तु .. दोनों ही लोगों का परिवार बिहार राज्य के अंगिका भाषी भागलपुर जिला के पीरपैंती गाँव का ही रहने वाला है। 

दरअसल .. कहीं पर भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से व्याप्त क्षेत्रवादिता के माहौल में जब एक ही स्थान के दो निवासी अन्य स्थानों पर प्रवास या पर्यटन के दौरान संयोगवश मिलते हैं तो .. उनकी आपस में घनिष्ठता प्रायः बढ़ ही जाती है। चाहे वह स्थान विशेष अपने शहर ही में कहीं जाने पर .. मुहल्ला, 'सोसाईटी', या गाँव के सन्दर्भ में हो या यही क्षेत्रवादिता अपने शहर या गाँव से देश के भीतर कहीं भी जाने पर जिला, शहर, गाँव या राज्य के सन्दर्भ में हो या फिर देश से बाहर विदेशों में कहीं भी जाने पर अपने देश के सन्दर्भ में हो .. वो वहाँ चाहे सैलानी के रूप में हों या प्रवासी के रूप में हों .. ऐसी परिस्थितियों में समान भाषा-भाषी का होना भी सम्बन्ध को जोड़ने में गोंद-सा असर करता हैं .. शायद ...

सिद्धार्थ जी - " पवन बेटा .. आज तुम अकेले आये हो सुबह की सैर करने .. तुम्हारे पापा और तुम्हारी वो .. छुटकी बिटिया नहीं आयी .. वो .. क्या नाम है उसका .. ? "

पवन - " समीक्षा "

सिद्धार्थ जी - " अरे हाँ, हाँ .. समीक्षा .. उम्र की वज़ह से .. कभी-कभी .. छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे नाम तक भी याद ही नहीं रह पाते .. हाँ तो .. आज वो .. समीक्षा बिटिया भी नहीं आयी ? .. "

पवन - " 'अँकल' कल पड़ोस के एक घर में सुबह से ही पूजा-पाठ शुरू हुआ और .. सारी रात 'जगराता' होता रहा .. बड़े- बड़े 'डी जे-स्पीकर' पर सुबह से लेकर सारी रात भर फ़िल्मी गाने की 'पैरोडी' वाले भजनों की और वाद्य यंत्रों की तेज़ कानफोड़ू आवाज़ों से घर की खिड़की के काँच और रसोई की 'कटलरी' व 'कप-प्लेट' तक खड़खड़ाते रहे .. "

सिद्धार्थ जी - " ओह ! .. तो ? .. "

पवन - " तो क्या अँकल .. हम सभी लोग शोर की वज़ह से नहीं सो पाए सारी रात .. "

सिद्धार्थ जी - (गुस्सा व चिंतित भाव के साथ) " वो तो स्वाभाविक है बेटा .. यही तो है .. किसी भी धर्म का अपभ्रंश स्वरूप और रीति-रिवाज़ के मुखौटों में हमारे बुद्धिजीवियों के समाज की अंधपरंपराओं की विडम्बना .. लोगों ने मानसिक व आध्यात्मिक जागरण को अपभ्रंश स्वरूप में परिवर्तित कर के .. रात भर जाग कर और लोगों को भी जगा कर तथाकथित पूजा के नाम पर शोर मचाने को ही जागरण या जगराता मान लिया है। "

पवन - " आप तो जानते ही हैं .. पापा दिल के मरीज़ हैं .. उनकी कल शाम से ही तबियत ख़राब है और इन दिनों समीक्षा की 'एग्जाम' भी चल रही है .. वह भी कल ना तो ढंग से पढ़ पायी और ना ही सो पायी .. 'मिसेज़' भी सुबह से .. "

सिद्धार्थ जी - " .. च् .. च् .. "

पवन - " हम भी तो अभी 'मॉर्निंग वॉक' के लिए नहीं आए हैं  'अँकल' जी। बल्कि .. आदतन केवल 'स्ट्रीट डॉग्स' को सुबह-सुबह रोटी खिलाने यहाँ आ गए हैं .. हमारा भी शरीर सुस्त लग रहा है .. "

सिद्धार्थ जी - " च् .. ख़ैर ! .. चलो .. आज मेरी भी सुबह की सैर 'कैंसिल' .. चलो .. चल कर तुम्हारे घर .. पहले तुम्हारे पापा की ख़ैर- ख़बर लेते हैं। "

अब दोनों लोग, सिद्धार्थ जी और पवन, गाँधी मैदान के पश्चिमी 'गेट' से निकल कर छज्जूबाग की तरफ़ पवन के घर की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। 

जाते-जाते उन्हें गाँधी मैदान के पश्चिमोत्तर छोर पर तथाकथित महात्मा गाँधी की मूर्ति के चबूतरे के पास कुछ लोगों की झुण्ड बैठी दिखाई दे रही है। वो लोग वहाँ ज़ोर-ज़ोर से बजाए जा रहे करताल और ढोलक की शोर से प्रतियोगिता करते हुए गला फाड़-फाड़ कर हनुमान चालीसा गा रहे हैं। उन सभी की मिलीजुली आवाज़ उन दोनों को विचलीत कर रही है - " जै जै हनुमान गोसाईं .. " - और केवल उन दोनों को ही नहीं वरन् गाँधी मैदान में सभी शांतिप्रिय टहलने वाले लोगों को भी और बैठ कर योग या ध्यान लगाने वाले लोगों के साथ-साथ सुबह-सवेरे पक्षियों के कलरव को भी। 

अब सिद्धार्थ जी अन्यमनस्क-सा पवन से पूछ रहे हैं कि - " लगता है कि आज मंगल (मंगलवार) है .. है ना ? "

" ... महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी ... "





Thursday, December 5, 2019

" सूरज आग का गोला है। " (लघुकथा).

हमारे भारतीय समाज में परिवार की आदर्श पूर्णता वाले मापदण्ड यानि दो बच्चें - हम दो , हमारे दो - और ऐसे में अगर दोनों में एक तथाकथित मोक्षदाता- बेटा हो, तब तो सोने पर सुहागा। उसी मापदण्ड के तरह ही ट्रक-ड्राईवर रमुआ और उसकी धर्मपत्नी- रमरातिया को भी एक सात साल की बिटिया- सुगिया और एक पाँच साल का बेटा- कलुआ है।

दोनों भाई-बहन अपने गाँव के ही पास वाले एक ही मिडिल स्कूल के एक ही कक्षा- तीन में पढ़ते हैं। दरअसल  सुगिया के दो साल बड़ी होने के बावजूद उसकी पढ़ाई भी भाई कलुआ के साथ ही शुरू करवाई गई थी।

एक दिन सामान्य-विज्ञान की कक्षा में शिक्षक पढ़ा रहे थे - " बच्चों ! सूरज आग का गोला है। "
उसी समय दोनों भाई-बहन कक्षा में ही ऊँघ रहे थे। शिक्षक महोदय की नज़र उन दोनों पर पड़ते ही वे आग-बबूला हो गए। अपने हाथ की हमजोली ख़जूर की छड़ी सामने के मेज पर पटकते हुए बोले - " का (क्या) रे तुम दोनों रात भर खेत में  मिट्टी कोड़ रहा था का (क्या)? चल ! इधर आके (आकर) दुन्नो (दोनों) मुर्गा बन के खड़ा हो जाओ। "
कलुआ अपनी शरारती आदतानुसार मुर्गा बनने के पहले बोल पड़ा - " सर ! हम तअ (तो) मुर्गा बन ही जाएंगे, पर सुगिया दीदी के तअ (तो) मुर्गी बने पड़ेगा ना !? "
कक्षा के सारे विद्यार्थी ठहाका मार के हँस पड़े। पर प्रतिक्रिया में शिक्षक के चिल्लाते हुए डाँटते ही - " चुप !!! .. शांति से रहो सब। ना तो सब के धर (पकड़) के कूट देंगें। समझे की नहीं !? " सब सटक सीता-राम हो गए।

तभी सुगिया रुआंसी हो कर बोल पड़ी -" सर ! हमलोग सच में रात भर सो नहीं पाए हैं। कल भोरे (सुबह) से लेकर रातो (पूरी रात) भर आ स्कूल आबे (आने) के समय तक घर के  बगल में फूल्लन चच्चा (चाचा) के घरे (घर) "जागरण" हो रहा था सर। खूब जोर-जोर से लाउडस्पीकर में "हरे रामा- हरे कृष्णा - कृष्णा, कृष्णा - हरे-हरे " चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी सर।"-  लगभग रो पड़ी थी सुगिया - " अब एकरा में हम दुन्नो (दोनों) भाई-बहिन के का (क्या) दोष है सर!? आज भर माफ़ कर दीजिए ना। अब से ना करेंगे ऐसा।"

"जाओ ! जा के बैठो दुन्नो (दोनों) अप्पन-अप्पन (अपना -अपना) सीट पर। " - शिक्षक महोदय के इतना कहते ही दोनों अपने-अपने जगह पर वापस जा कर बैठ गए।

लेकिन कलुआ तो ठहरा शरारती .. जाते-जाते तपाक से पूछ बैठा सर से - " आयँ ! सर ! भगवान जी बहिरा (बहरा) हैं का (क्या) !? .. जे (जो) एतना (इतना) जोर से सब चिल्लाते हैं। उ (वो) भी भोरे (सुबह) से लेके (लेकर) रातो (पूरी रात) भर। एकदम से मन अनसा (चिड़चिड़ा) जाता है। " - अपनी दीदी-सुगिया की ओर मुँह करके - " है की ना दीदी !? ".

" चुप ! चुपचाप बैठ। ना तो फिर मुर्गा बना देंगे तुमको। " - शिक्षक के गुर्रारते ही कलुआ शांत हो गया।

शिक्षक महोदय इस व्यवधान के बाद फिर से विज्ञान पढ़ाना शुरू कर दिए - " हाँ तो बच्चों ! सूरज आग का गोला है। "

तभी कलुआ से रहा नहीं गया। भरी कक्षा में खड़ा हो कर बीच में ही आश्चर्य भरे लहजे में अपने शिक्षक से बोला - " पर सर ! मम्मी आ दादी तअ कहती है कि सूरज भगवान हैं। ठेकुआ वाला भगवान। आउर (और) उनकी दु ठो (दो) पत्नी भी है। एगो (एक) रथ भी है जिसको सात गो घोड़ा मिलकर दौड़ाता है। उसी से तो दिन और रात होता है। "

" चुप ! चुपचाप बैठ। ना तअ (तो) अभी सच में मुर्गा बना देंगे तुमको। बहुत ज्यादा मुँह चलाता है। " - शिक्षक जी जोर से बमक कर उसे घुड़के और फिर पढ़ाने लगे - " हाँ .. तो बच्चों सूरज आग का गोला है। "

( "गो"/"ठो" - बिहार राज्य में स्थानीय भाषा में अंक या संख्या को बोलते समय उनके बाद "गो" या "ठो" का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है। )