Saturday, June 5, 2021

राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-२).

अब आज "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-२)." की तख़्ती पर फ़िल्मों के बहाने अंजानी भाषाओं के अंजाने शब्दों के साथ-साथ अपनी कई आपबितियों की भी बतकही को आगे पसारने की कोशिश करते हैं।

हाँ .. तो .. "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-१)."  के तहत अन्त में बात हो रही थी- सन् 1993 ईस्वी में फ़िल्म ग़ुलामी की तरह ही संयोगवश मिथुन चक्रवर्ती की ही एक और फ़िल्म आने के बाद फिर से एक अंजान शब्द से पल्ले पड़ने की। वह शब्द था, उस फ़िल्म का नाम- "तड़ीपार"। दरअसल .. यूँ तो बचपन में शैतानी से किसी के सिर पर चपत लगाने के लिए स्थानीय बोली में तड़ी मारना शब्द तो सुना था। पर तड़ीपार का शाब्दिक अर्थ बाद में जानकारों से जान पाया कि इसका अर्थ होता है- निर्वासन यानी देश निकाला। मतलब किसी दोषी को उसके किसी गैरकानूनी कृत्य के लिए या फिर किसी विशेष संक्रमण से संक्रमित किसी रोगी को बलपूर्वक कुछ नियत समय के लिए या हमेशा-हमेशा के लिए घर, गाँव, मुहल्ले, शहर या देश से बलपूर्वक निकाल देना।

अंजान शब्दों की बातें करते-करते बीच-बीच में कुछ फ़िल्मी बातें भी होती रहें तो हमारा मनोरंजन होता रहता है। है कि नहीं ? ... दरअसल सत्तर-अस्सी के दशक तक हमारे कई समाज में, जिनमें एक हमारा समाज भी था, गाने में प्रयुक्त शब्द या फ़िल्म के नाम वाले शब्द का अर्थ एकदम से घर में या शिक्षक से पूछना या उसकी चर्चा करना, अनुशासनहीनता मानी जाती थी। तब फ़िल्में देख पाना भी आज की तरह इतना सहज़-सुलभ और आसान नहीं था। जितना कि आज .. स्मार्ट फ़ोन (Smart Phone) के स्क्रीन (Screen) पर उंगलियाँ दौड़ाने-फिसलाने भर से पलक झपकते ही स्क्रीन पर मनपसंद फ़िल्मों के गाने या कई सारी पूरी की पूरी फ़िल्में ही/भी हमारी इंद्रियों को फ़ौरन तृप्त करने में लग जाती हैं। उस दौर में तो अभिभावक की मर्ज़ी से फ़िल्म देखने की अनुमति मिलती थी, जो बच्चों या किशोरों के लिए अभिभावकों की नज़र में उचित होती थी। अधिकांशतः तो उन लोगों के साथ ही जाना होता था।
और फ़िल्में भी कैसी-कैसी ? .. बिहार (तत्कालीन बिहार = वर्तमान बिहार + वर्तमान झाड़खण्ड) की राजधानी पटना के सिनेमाई पर्दे पर दोबारा-तिबारा आयी हुई पुरानी श्वेत-श्याम फ़िल्में- दो बीघा जमीन, जिस देश में गंगा बहती है, मुग़ल-ए-आज़म, दोस्ती या फिर रंगीन फ़िल्में- वक्त (पुरानी), मदर इंडिया, हाथी मेरे साथी, आराधना, एक फूल दो माली, जानवर और इंसान, रानी और लाल परी, हक़ीकत (पुरानी), आँखें (पुरानी), अमन, अनुराग, अँगूर, खट्टा-मिट्ठा, गोलमाल (पुरानी), रोटी कपड़ा और मकान, शोर, जय संतोषी माँ जैसी फ़िल्में ही दिखलाने के लिए ले जाया जाता था।

इसके अलावा जब एक ही फ़िल्म, एक ही सिनेमा हॉल में तीन-तीन साल तक अपने चारों या पाँचों शो (Show) के साथ टिकी रह जाती थी, तो लोकप्रियता के कारण शोले जैसी फ़िल्म पटना के एलफिंस्टन (Elphinstone) सिनेमा हॉल में देखने के लिए मिल जाती थी। छुटपन में शोले हो या जिस देश में गंगा बहती है, इन फिल्मों के डाकूओं द्वारा की जाने वाली गोलीबारी या मारधाड़ वाले दृश्यों के आने पर हॉल ही में कुर्सी के नीचे डर कर रोते हुए छुप जाने वाली बात पर, आज ख़ासकर तब स्वयं पर हँसी आती है, जब कभी भी आज दो-तीन साल के बच्चों को भी मोबाइल पर गेम (Game) खेलते हुए आराम से 'ठायँ-ठायँ', 'ढ-ढ-ढ-ढ' कर के बन्दूक चलाते हुए देखता हूँ।

उन दिनों राजकपूर जी की मेरा नाम जोकर नामक फ़िल्म सामान्य से तुलनात्मक ज़्यादा लम्बी अवधि की फ़िल्म होने के कारण इसके होने वाले दो मध्यांतरों (Intervals) का भी एक अलग रोमांच और कौतूहल था, जिस कारणवश मेरा नाम जोकर को भी पटना के अशोक सिनेमा हॉल में देखने का अवसर मिल पाया था। पद्म विभूषण व साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एक प्रसिद्ध लेखक- आर॰ के॰ नारायण के उपन्यास पर आधारित फ़िल्म होने के कारण गाइड फ़िल्म को भी देखने का अवसर मिला था। तब "काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल" या फिर "ओ मेरे हमराही ! मेरी बाँह थामे चलना" जैसे गीतों का भावार्थ कम ही समझ में आता था। बस यह लगता था कि नायक-नायिका अभी खुश हैं, इसी कारण से दोनों ख़ुशी में गा रहे हैं-  "गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंज़िल, हाय ~~, कहीं बीते ना ये रातें, कहीं बीते ना ये दिन, .. गाता रहे मेरा दिल ..~~ ..."
सन् 1972 ई. में आयी मनोज कुमार की शोर फ़िल्म संयोग से पटना के तत्कालीन आधुनिकतम तकनीक से सुसज्जित अप्सरा नामक नए सिनेमा हॉल में आयी थी। यह पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान के दक्षिण की ओर, एक्सिबिशन रोड के उत्तरी छोर पर अवस्थित था। "था" इस लिए बोल रहा हूँ, क्योंकि वर्तमान में मल्टीप्लेक्स युग आने के कारण यह पटना के और भी कई पुराने गोदामनुमा सिनेमा हॉलों की तरह वर्षों से बन्द पड़ा है। अप्सरा सिनेमा हॉल के उद्घाटन के दिन वाले शोर फ़िल्म के इकलौते शो का निमंत्रण-सह-प्रवेश पत्र मेरे अभिभावक को भी मिला था। हमलोग गए भी शोर फ़िल्म, वो भी नए हॉल में पहला दिन, देखने के लिए। मध्यांतर (Interval) में समोसा-कचौड़ी और मिठाई से भरा एक-एक स्नैक्स-बॉक्स (Snax Box) भी सभी निमन्त्रित दर्शकगण को हॉल के मालिक की ओर से बाँटा गया। छः वर्ष की उम्र में तो अपनी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। मानो खुशियों का खज़ाना मिल गया था।

इसमें सोने पर सुहागा वाली एक और बात ये हुई थी कि इस फिल्म में ख़ान बादशाह के क़िरदार को निभाने वाले प्रेमनाथ जी उस दिन अपनी इंडियन एयरलाइन्स (Indian Airlines) की  फ्लाइट/उड़ान (Flight) में किसी तकनीकी कारण से बिलम्ब होने के कारण उस अप्सरा सिनेमा हॉल के पास के ही इंडिया होटल (India Hotel) में ठहराए गए थे। तब पटना का यह आलीशान (Posh)  होटल हुआ करता था। उस समय तो गाँधी मैदान में बीचोबीच खड़ा हो कर चारों ओर नज़रें घुमाने पर इकलौती सबसे ऊँची बिल्डिंग (Building) आरबीआई (RBI - Reserve Bank of India) की बिल्डिंग ही नज़र आती थी। पर आज तो चारों ओर के ज्ञान भवन और उसके प्रांगण में अवस्थित बापू सभागार व सभ्यता द्वार, श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल, ट्विन टॉवर-बिज़नेस सेंटर्स (Twin Tower-Business Centres), पाँच सितारा मौर्या होटल, दो-दो गगनचुम्बी बिस्कोमान भवन, जिनमें से एक के ऊपर एक रिवॉल्विंग रेस्टुरेन्ट (Revolving Resturant)- पिंड बालूची (Pind Balluchi), एलफिंस्टन (Elphinstone) और मोना सिनेमा के मल्टीप्लेक्स (Multiplex) वाली बिल्डिंग के समक्ष आरबीआई की बिल्डिंग तो मानो 'गुलिवर्स ट्रेवल्स' (Gulliver's Travels) के उस 'गुलिवर' के सामने 'लिलिपुट' की तरह प्रतीत होती है।

हाँ तो .. बातों-बातों में अप्सरा सिनेमा हॉल, शोर फिल्म और प्रेमनाथ जी की बातें कहीं और भटक गई। ख़ैर ! ... जब प्रेमनाथ जी को यह पता चला कि उनकी फ़िल्म शोर से ही यहाँ किसी नए हॉल का उद्घाटन हो रहा है तो, वह मध्यांतर में आकर अपनी अदा और आवाज़ के साथ हँसते हुए सभी को सम्बोधित किए थे। तब पटना की आबादी आज के पटना की तरह, गंगा नदी पर उत्तरी बिहार को पटना से जोड़ने वाले पुल- गाँधी सेतु को 1980 में चालू होने के बाद, घनी-बढ़ी आबादी वाली नहीं हुआ करती थी। तब भी और आज भी फ़िल्मी कलाकारों को देखना, उन से मिलना, हाथ मिलाना, ऑटोग्राफ (Autograph) लेना, अब तो सेल्फ़ी (Selfie) लेना भी एक सनक (Craze) तो है ही ना .. शायद ...

साहित्य की कोख़ से ही जन्मी फ़िल्में भी साहित्य की तरह ही किसी भी कोमल मन पर सहज़ ही अपनी गहरी छाप छोड़ जाती हैं। बचपन में देखी गई फ़िल्म- वक्त (बलराज साहनी वाली) का असर कुछ ऐसा पड़ा था बालमन पर; कि आज तक .. किसी भी बात पर रत्ती भर भी घमंड मन में पनपना चाहता भी है, तो वक्त फ़िल्म में "ऐ मेरी ज़ोहरा-ज़बीं तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हंसीं और मैं जवाँ .. तुझपे क़ुरबान मेरी जान, मेरी जान" ... वाले गाने के बाद वो अचानक आया क़ुदरती क़हर- भूकम्प की याद ताजा हो जाती है। इस फ़िल्म ने तभी से छुटपन में ही प्रकृति या समय से सहम कर जीना समझा दिया था। आज भी किसी भी बात पर गर्दन अकड़ाने की हिम्मत या नौबत नहीं आती है और ताउम्र आएगी भी नहीं या आनी भी नहीं चाहिए  .. शायद ...

और हाँ ... फ़िल्म जय संतोषी माँ फ़िल्म की तो कुछ अलग ही महिमा देखी गई थी। देश भर में हिन्दी भाषी अन्य राज्यों के शहरों-गाँवों का तो नहीं पता, पर बिहार की राजधानी पटना के रूपक सिनेमा हॉल का तो पता है, कि पर्दे पर जब-जब फ़िल्मी अवतार के रूप में तथाकथित संतोषी माता परंपरागत सिनेमाई "ढन-ढनाक" वाली आवाज़ (संगीत) के साथ अवतरित होतीं थीं .. अपनी दुखियारी भक्तिन की विपदा की घड़ी में उसके दुःख भरे गाने- "मदद करो हे संतोषी माता ~~~" की समाप्ति पर; तब-तब दर्शकगण में से अधिकांश लोगों द्वारा उनकी अपनी हैसियत और श्रद्धा के मुताबिक सिनेमा हॉल में पर्दे की तरफ, मतलब फ़िल्मी संतोषी माँ की तरफ, तत्कालीन प्रचलन वाले पाँच, दस, बीस, पच्चीस (चवन्नी), पचास (अठन्नी) पैसे या एक रुपए के सिक्के, फूल-माले उछाले जाते थे। कई बार पीछे से या ऊपर के डी सी, बी सी (DC, BC) क्लास (class) के दर्शकों द्वारा उछाले गए सिक्के अपनी रफ़्तार वाले संवेग से आगे बैठे हुए कई दर्शकों के कान या सिर चोटिल कर देते थे। लगभग प्रत्येक शो के बाद सिक्के हॉल में इतना ज़्यादा जमा हो जाते थे कि हर शो के बाद सारे सिक्के बुहार कर सिनेमा हॉल के कर्मचारियों द्वारा बोरे में भरे जाते थे। जिस कारण से हर अगला शो आधे घन्टे-पैंतालीस मिनट देर से ही शुरू हो पाता था।


 वैसे तो प्रायः फिल्मों को या इस की बातों को हम केवल मनोरंजन का साधन मात्र मानते हैं, परन्तु इसके सम्मोहन के असर के विराट रूप का अनुमान तो तब होता है .. जब हम अपनी एक नज़र ...... फ़िलहाल तो हम अपनी आँखों को थोड़ा विश्राम दे लें आज अभी और फिर कल मिलते हैं "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-३)". के तहत जय संतोषी माँ फ़िल्म से जुड़ी और भी रोचक और अनूठी बातों को लेकर। साथ ही फिल्मों के सम्मोहन वाले असर के विराट रूप की बातों के साथ .. बस यूँ ही ...

(तब तक अगर आपके पास समय हो तो गाइड फ़िल्म के इस लोकप्रिय और सदाबहार गाने से अपने मन के तार को छेड़ने के लिए इस की साझा की गई लिंक को छेड़ने की बस ज़हमत भर कीजिए ... .. बस यूँ ही ...)





Thursday, June 3, 2021

राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-१).

कुछ-कुछ ऊहापोह-सा है कि ... आज हम अपनी बतकही शुरू कहाँ से शुरू करें ? ... वैसे अगर हम वर्तमान परिवेश की बातें करें, तो ऐसे में परिहास का मि. इंडिया (Mr. India- एक फ़िल्म का नाम) हो जाना यानी मि. इंडिया की तरह अदृश्य हो जाना स्वाभाविक ही है .. शायद ...। क्योंकि जब आज का परिवेश परेशानियों के दौर से गुजर रहा हो, तो ऐसे में परिहास का गुजारा हो भी तो भला क्योंकर ? ..  ख़ैर ! .. बातों-बातों में फ़िल्म मि. इंडिया के ज़िक्र होने से ये ख़्याल आ रहा है कि क्यों ना .. मनोरंजन के साधनों में से एक साधन - फ़िल्मों की ही कुछ फ़िल्मी बातें कर ली जाएं। शायद .. आज के इस तनावग्रस्त अवसाद भरे क्षणों को कुछ राहत ही मिल पाए .. बस यूँ ही ...

आपने कभी भी किसी गाने के ऐसे मुखड़े को सुना या गाया-गुनगुनाया है क्या ? -

"जो हाल है मस्ती में, कौन है रंजिश, बेहाल बेचारा दिल है" -

शायद .. आपका जवाब "ना" हो और .. अगर आपका जवाब सच्ची-मुच्ची "ना" है, तो आप बिलकुल सही हैं। क्योंकि लगभग अपनी किशोरावस्था के बाद जब सन् 1985 ई. में "गुलामी" नाम की फ़िल्म अपने शहर के सिनेमा हॉल में आयी थी, तो उसके जिस गीत का मुखड़ा हम टीनएज (Teenage) के आख़िरी पड़ाव यानी उन्नीसवें साल में किसी तरह टो-टा कर (अनुमान लगा कर) गुनगुनाने या गाने की भूल भरी कोशिश कर रहे थे .. उस के बारे में बहुत सालों के बीत जाने के बाद जानकारों से जान पाया कि दरसअल उस गीत का मुखड़ा फ़ारसी भाषा में लिखा गया है और अंतरा हिन्दी में। उस लोकप्रिय गीत का वह फ़ारसी मुखड़ा कुछ यूँ है :-

"ज़े-हाल-ए-मिस्कीं, मकुन-ब-रन्जिश, बहाल-ए-हिज्र बेचारा दिल है" 

जिसका हिन्दी मतलब भी उन्हीं जानकारों से ही कुछ यूँ ज्ञात हुआ था कि :-

"मुझे रंजिश से भरी इन निगाहों से ना देखो क्योंकि मेरा बेचारा दिल जुदाई के मारे यूँ ही बेहाल है।"

इस फ़िल्म का यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ था; जो कि राग भैरवी पर आधारित था। जिसके संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल थे और गायिका-गायक थे लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार। जिसको फ़िल्मी पर्दे के लिए मिथुन चक्रवर्ती, अनीता राज और हुमा खान के साथ राजस्थान की पृष्ठभूमि में फ़िल्माया गया था। हुमा क़ुरैशी मत समझ लीजिएगा, क्योंकि उनका तो जन्म ही उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् 1986 ई. में हुआ था। आधिकारिक तौर पर इस लोकप्रिय गीत के गीतकार सम्पूर्ण सिंह कालरा उर्फ़ जाने-माने गुलजार साहब हैं। 
किसी गीत में इस तरह से मुखड़ा फ़ारसी में और अंतरा अन्य भाषा में रचने का एक अनूठा प्रयोग साहित्य जगत में शायद पहली बार नहीं किया था गुलज़ार साहब ने। बल्कि सदियों पहले तेरहवीं-चौदहवीं सदी (1253 - 1325) के दरम्यान ही सूफ़ी गीतों के रचयिता और एक अच्छे संगीतज्ञ अबुल हसन यमीनुद्दीन उर्फ़ अमीर ख़ुसरो जी ने, जिन्हें हिन्द का तोता और मुलुकशुअरा (राष्ट्रकवि) भी कहा गया है, फ़ारसी और ब्रज भाषा के सम्मिश्रण से एक अद्भुत और अनूठी रचना रची थी। इस पूरी रचना में पहली पंक्ति फ़ारसी में है, जबकि दूसरी पंक्ति ब्रज भाषा में .. जो आज भी एक मील का पत्थर प्रतीत होता है .. शायद ...
यूँ तो इस अनन्त ब्रह्माण्ड का एक अल्पांश भर ही है हमारी पृथ्वी .. जिस पर बसे हम इंसानों द्वारा अनुमानतः छः हजार से भी ज्यादा बोलने-लिखने वाली उपलब्ध भाषाओं को किसी भी एक व्यक्ति विशेष के लिए बोल-सुन पाना या जान-समझ पाना असम्भव ही होता होगा या यूँ कहें कि .. वास्तव में असम्भव ही है .. शायद ...
केवल एक भाषा मात्र ही क्यों .. वैसे तो विश्व भर में उपलब्ध विज्ञान या सामान्य ज्ञान के अलावा और भी विभिन्न प्रकार की कई-कई तकनीकों व ज्ञानों की जानकारी का दायरा भी इस ब्रह्माण्ड की तरह ही असीम-अनन्त जान पड़ता है। जितना भी हम जान-सीख जाएँ, पर हम अपनी गर्दन अकड़ाने के लायक नहीं बन सकते हैं कभी भी। क्योंकि हम ताउम्र अपनी अन्तिम साँस तक जितना कुछ भी जान-सीख पाते हैं ; वो सब विश्व के समस्त ज्ञान-भंडार की तुलना में नगण्य ही जान पड़ता है। सम्भवतः प्राकृतिक रूप से भी विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान को जान-समझ पाने की माद्दा हम में से किसी एक व्यक्ति विशेष के पास है भी नहीं .. शायद ...
ऐसे में .. अक़्सर जो बुद्धिजीवी लोग "मेरी भाषा - तेरी भाषा" जैसी बातें करते रहते हैं या हिन्दी-अंग्रेजी के सम्बन्ध में वैमनस्यता का राग अलापते रहते हैं या फिर जिनको आवश्यकतानुसार भी दूसरी भाषा का किया गया प्रयोग एक घुसपैठ की शक़्ल में दिखता है या दूसरी अन्य भाषओं के प्रयोग से अपनी भाषा का अस्तित्व खतरे में जान पड़ता है; उन सभी महानुभावों की सोच पर तरस खाने के लिए अमीर ख़ुसरो जी की यह रचना ही काफ़ी है  .. शायद ...

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, (फ़ारसी)
दुराये नैना बनाये बतियां | (ब्रज)
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान, (फ़ारसी)
न लेहो काहे लगाये छतियां || (ब्रज)

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
(फ़ारसी)
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां || (ब्रज)

यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं,
(फ़ारसी)
किसे 
पड़ी है जो जा सुनावे

पियारे पी को हमारी बतियां || (ब्रज)


चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान

हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह | (फ़ारसी)
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां || (ब्रज)

बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, गरीब खुसरौ |
 (फ़ारसी)
सपेट मन के, वराये राखूं
जो जाये पांव, पिया के खटियां ||
 (ब्रज)

इस रचना की शुरू की चार पँक्तियों -

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
दुराये नैना बनाये बतियां ।
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऐ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां ।।

- का अर्थ इसके जानकारों के अनुसार है :-

"आँखें फेर कर और बातें बना के मेरी बेबसी को नजरअंदाज मत करो। जुदाई की तपन से जान निकल रही है। ऐसे में तुम मुझे अपने सीने से क्यों नही लगा लेते ?"

कुछ जानकारों के अनुसार गुलज़ार साहब के मन को उस लोकप्रिय गीत के मुखड़े के लिए अमीर ख़ुसरो जी की वर्षों पुरानी इसी रचना ने कुछ हद तक या शायद बहुत हद तक अभिप्रेरित किया था।
ख़ैर ! .. इन बातों में जो भी सच्चाई हो ..  फ़िलहाल बात हो रही है फिल्मों के बहाने, अंजान भाषा या शब्दों की .. जिनके अर्थ नहीं जान पाने से उनका अर्थ और भाव नहीं जान पाते हैं हम। अपनी भाषा से इतर अन्य भाषाओं की जानकारी नहीं होने की कुछ ऐसी ही विवशता होती रहती हैं, कभी न कभी हमारे जीवन में हमारे साथ।
परन्तु उस दौर में (1998 में गूगल के आने के पहले तक) अनसुलझे सवालों को सुलझाने के लिए गूगल नामक कोई सहज-सुलभ माध्यम उपलब्ध नहीं था।  जिस से पलक झपकते ही किसी भी तरह की जानकारी प्रायः हासिल की जा सकती हो। तब तो जिस भाषा का शब्दकोश पास में नहीं होता था, तो उस भाषा के किसी भी अंजान शब्द का अर्थ जानने के लिए हमें अपने अभिभावक, शिक्षक या मुहल्ले के किसी अभिभावकस्वरुप जानकार व्यक्ति पर ही निर्भर होना पड़ता था।

एक बार एक और ऐसा ही अंजाना शब्द पल्ले पड़ा था, जिसका अर्थ पहली बार में पल्ले नहीं पड़ा था ; जब वह शब्द सुना था। वह भी तब, जबकि सन् 1993 ईस्वी में फ़िल्म ग़ुलामी की तरह ही संयोगवश मिथुन चक्रवर्ती की ही एक फ़िल्म आयी थी - " ...... " ... ख़ैर ! .. अब उस फ़िल्म और उस से जुड़े अंजाने शब्द की बातें "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-२)." के लिए छोड़ते हैं और अगली बार मिलते हैं .. बस यूँ ही ...

(तब तक आप नीचे साझा किए गए लिंक से फ़ारसी मुखड़े वाले उस लोकप्रिय गीत से रूबरू हो लीजिए , अगर समय हो तो .. 

"ज़े-हाल-ए-मिस्कीं, मकुन-ब-रन्जिश, बहाल-ए-हिज्र बेचारा दिल है").








Wednesday, June 2, 2021

'मॉकटेल'-सी नाक ...

अक़्सर ...

बार-बार

हालात की

राख से

मंजे गए,

समय के 

बर्तन में,

पश्चाताप के

ताप से

पके-अधपके 

देह के

बुढ़ापे पर, 

लगाती हुई

पक्की मुहर,

पनप ही

आती हैं

अनायास

अनचाही, 

अनगिनत

झुर्रियाँ काली मिर्च-सी।


ऐसे में भी

ना जाने क्यों ...

लहसुन की 

पकती पत्तियों-से

पियराए, कुम्हलाये,

मुखड़े पर भी

छा जाती है

पुदीने की पत्तियों-सी

झुर्रीदार हरियाली,

जब कभी भी

चाही-अनचाही आती हैं 

यादें तुम्हारी पगी

नेह में तुम्हारे।

तुम्हारी .. वो .. 

कुछ सुतवां और 

कुछ मंगोली के

'मॉकटेल'-सी नाक, ..

तुलसी मंजरी-सी

सोंधी साँसें और ..

नाक की लौंग भी,

ठीक गर्म मसाले वाले 

लौंग के जैसे।


और यादें भी ना ! .. 

मानो जैसे ..

पिघलते हैं,

पसरते हैं,

हौले-हौले

जिह्वा पर 

सुगंधित और

स्वादिष्ट ज़ायक़े

बनकर अक़्सर,

पोपले 

मुँह में

दरकने पर,

अल्प दंतयुक्त

या दंतहीन

मसूड़ों के जाँते में,

हरी पोटली वाली

तिजोरी में बंद

नन्हें-नन्हें,

काले-काले दाने,

छोटी इलायची के .. बस यूँ ही ...


【 माॅकटेल - Mocktail - एकाधिक नशारहित  पेय-मिश्रण। - -  (मिश्रित रूप के अर्थ में) 】.




Sunday, May 30, 2021

आषाढ़ के वो चार दिन ... (भाग-३).【अन्तिम भाग】.

हमारे देश भारत में पृथ्वी यानी धरती को हम धरती माता कह कर स्त्री का दर्जा देते आए है। उड़ीसा राज्य के कई भागों में लोगों की मान्यता है कि आषाढ़ मास में चौदह जून यानी आषाढ़ संक्रान्ति के दिन से चार दिनों तक भूदेवी (पृथ्वी/धरती माता), जो इनकी मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पत्नी हैं, रजस्वला होती हैं। इस चार दिनों के दौरान खेतीबारी, बुआई, कटाई जैसे जमीन से जुड़े सारे काम बन्द कर दिए जाते हैं, ताकि उनकी मान्यताओं के अनुसार भूदेवी को आराम दे कर वे लोग खुश रखना चाहते हैं। सामान्यतः स्त्री रजस्वला होने के बाद से ही संतानोत्पत्ति में सक्षम हो जाती है। इसीलिए उन चार दिनों के बाद ही वे लोग खेतों में बीज डालते हैं, ताकि उनकी फसल की पैदावार अच्छी हो। स्थानीय लोग यह चार दिन त्योहार के रूप में मनाते हैं और इस रज पर्व को अपनी उड़िया भाषा में "रजो पर्व" कहते हैं।

इस रजपर्व में पहला दिन रज, दूसरा दिन मिथुन संक्रांति, तीसरा दिन बासी-रज कहलाता है। सजावट, गीत-संगीत (सोजा-बोजा) से शुरू होकर चौथे दिन वासुमति स्नान (गाधुआ) अर्थात भूदेवी स्नान के बाद इस पर्व का समापन होता है। इन चारों दिन बालिकाओं, युवतियओं और वयस्क महिलाओं की भी तो मानो बहार-सी छायी रहती है। घर के कामों से इनकी छुट्टी रहती है। वे लोग मेंहदी-आलता से सज-सँवर कर नए-नए कपड़े पहनती हैं। कई स्थानों पर तो खाना बनाने तक का काम उन चार दिनों में पुरुषों को ही करना पड़ता है। महिलाएँ घर का काम बंद कर के झूला झूलती हैं, खेल-मस्ती करती हैं। इन दिनों पीठा और चाकुली पीठा जैसा स्थानीय व्यंजन मुख्य खाना होता है। छेना पोडा, कनिका जैसे पकने में ज्यादा समय लगने वाले मीठे पकवान पर्व के पहले ही बना कर रख लिए जाते है। पाँचवे दिन महिलाएँ सिर/बाल धोकर ही किसी भी शुभ मांगलिक कार्य में शामिल होने लायक ख़ुद को पाती हैं। लब्बोलुआब ये है कि इनके आषाढ़ के वो चार दिन मस्ती भरे होते हैं .. शायद ...

आज भी परंपराओं के नाम पर असम के ही बंगाईगाँव ज़िला (बोंगाईगाँव) के सोलमारी गाँव में किसी भी लड़की को पहली बार रजस्वला होने पर उस लड़की की पहले दिन ही किसी केले के पेड़ से शादी करवा कर किसी भारतीय विवाह की तरह जश्न मनाया जाता है। इस अनोखी शादी को वे लोग "तोलिनी शादी" कहते हैं। इस अंधपरम्परा का बुरा पक्ष भी है कि लड़की को केले के पेड़ से शादी करवाने के बाद उस को ऐसे कमरे में बंद कर दिया जाता है, जहाँ सूरज की रोशनी ना आती हो और उस दौरान वह किसी का चेहरा तक भी नहीं देख सके। भोजन के नाम पर केवल कच्चा (बिना उबला) दूध और फल दिया जाता है, क्योंकि उस अवधि में पका हुआ खाना उनके अनुसार उस लड़की के लिए निषेध होता है। उसको रक्तस्राव बन्द होने के बाद नहा-धोकर (सिर-बाल) तथाकथित शुद्धिकरण होने तक जमीन पर ही सोना भी उसकी दिनचर्या में शामिल होता है। यह हमारे समाज की विडंबना ही है कि जिस अनूठी प्राकृतिक प्रक्रिया के लिए लड़कियों या स्त्रियों को गर्व महसूस करनी चाहिए, उसी से उन्हें हमारी दोहरी मानसिकता वाले समाज के सामने झेंपना पड़ता है .. शायद ...

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों  (दोनों का सयुंक्त रूप- पुराना आंध्र प्रदेश) के अधिकांश हिस्सों में जब किसी लड़की को पहली बार माहवारी आता है, तो इसके ग्यारह दिनों के बाद ... "पुष्पवती महोत्सवम्" (खिले हुए फूल का उत्सव) नामक एक समारोह का आयोजन किया जाता है। वह हमारे किसी भारतीय शादी-विवाह के आयोजन जैसा ही आडंबरयुक्त और खर्चीला होता है, जो परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के साथ सम्पन्न होता है। परन्तु इसका बुरा पक्ष यह है कि इस चक्कर में उस किशोरी की ग्यारह-बारह दिनों की स्कूल की पढ़ाई छुट जाती है। माहवारी के अगले पाँच से ग्यारह दिनों तक उनकी मान्यताओं के अनुसार उस लड़की को नहाने की अनुमति नहीं होती है। जब कि वैज्ञानिक तौर पर इस दौरान नहाना बेहद जरूरी होता है क्योंकि इससे संक्रमण का भय कम होता है। संक्रमण से बांझपन या अन्य कई बीमारियों के होने का भी खतरा रहता है और दूसरी तरफ नहाने से मनोदशा भी अच्छा होता है। साथ ही इस दौरान होने वाली पेट-शरीर के ऐंठन में भी आराम मिलता है। उसे घर में एक तय जगह पर अपनी आवश्यक दिनचर्या की चीजों के साथ रहना होता है। इन दिनों उसका शौचालय भी अलग होता है, ठीक किसी कोरोनाग्रस्त मरीज के स्वतः संगरोध ( Self Quarantine ) होते हुए गृह-अलगाव ( Home Isolation ) के जैसा। इस दौरान शारीरिक-हार्मोनल के अलावा और भी कई तरह के बदलाव होते हैं, जिस से कमर और पेट में दर्द, उल्‍टी होना, चक्‍कर आना और पैरों में दर्द आदि लक्षण उभर कर सामने आते हैं। ऐसे में उसे परिवार से अलग-थलग रहने पर अनचाही मानसिक पीड़ा और प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है .. शायद ...

जैसा कि माना जाता है कि हमारा देश विविधताओं से सम्पन्न देश है, तो एक ओर जहाँ केरल के सबरीमाला मंदिर में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट/Supreme Court) की अनुमति के बाद भी आज तक दस साल की लड़की से लेकर पचास साल तक की महिला का प्रवेश वर्जित है। कारण है- वही हमारी अंधपरम्परा, विकृत धार्मिकता अंध-आस्था  और अंधविश्वास वाली सामाजिक मान्यताएँ, जिसके अनुसार इन उम्रों में लड़कियाँ या महिलाएँ अपने मासिक धर्म चक्र के कारण रजस्वला (रजवती/ऋतुमती) होने से अशुद्ध हो जाती हैं। परन्तु दूसरी तरफ हमारे ही देश के असम राज्य के कामाख्या मन्दिर में कोई भी रजस्वला लड़कियाँ या महिलाएँ अपने मासिक धर्म के दौरान भी प्रवेश कर के पूजा सम्पन्न कर सकती हैं।

सर्वविदित है कि हिन्दू धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार तथाकथित भगवान विष्णु द्वारा अपने सुदर्शन चक्र से देवी माता सती/दुर्गा के इक्यावन भागों में अंग-भंग करने पर देवी का योनि-भाग कामाख्या में गिरा था। असम की राजधानी दिसपुर जो कि इस राज्य के महानगर- गुवाहाटी (गौहाटी) का ही एक हिस्सा है और इसी गौहाटी शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित कामख्या शक्तिपीठ मन्दिर में हिन्दू मान्यताओं के तहत देवी सती के उसी तथाकथित कटे योनि-भाग की पूजा-अर्चना की जाती है। यहाँ वर्ष के आषाढ़ महीने में हर वर्ष चार दिनों के लिए लगने वाले अंबुवाची मेला के दौरान लोकमान्यता के अनुसार तीन दिनों के लिए बाईस से पच्चीस जून तक माता रजस्वला होती हैं। जिस कारण से कामाख्या मंदिर उन तीन दिनों के लिए बंद रखा जाता है। चौथे दिन, छ्ब्बीस जून को माता को नहला कर तथाकथित शुद्धिकरण के बाद आस्थावान भक्तगणों के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है। यह कामाख्या मंदिर का आषाढ़ के वो चार दिन वाला सबसे बड़ा अनुष्ठान-उत्सव माना जाता है।

सर्वविदित है कि हमारे देश में नवरात्री के अवसर पर या अन्य कई अनुष्ठानों के दौरान कुँवारी कन्याओं की पूजा की जाने की परम्परा है। बजाप्ता उनके पाँव पखारे जाते हैं, पाँव छुए जाते हैं। पर यहाँ "कुँवारी" का अर्थ मैं निजी तौर पर "अनब्याही" लड़की समझता आया था गत वर्ष तक। मेरी यह अनभिज्ञता शायद पूजा-पाठ जैसे आडम्बरों में लिप्त नहीं रहने के कारण हो सकता है। पर गत वर्ष .. बस यूँ ही ... एक विचार-विमर्श के तहत एक जानकार से यह जान कर हैरान हो गया कि "कुँवारी" कन्या का मतलब उन लड़कियों से है, जो अभी तक पहली बार रजस्वला नहीं हुई हैं। इसमें हमें सब से हैरान करने वाली बात यह लगी थी कि जब कोई लड़की प्राकृतिक अनूठे वरदानस्वरुप पहली बार रजस्वला हो कर मानव नस्ल की कड़ी रचने के लिए सक्षम होती है; तब वह पूजने के लायक क्यों नहीं रह जाती है भला !? ...

कैसी बिडंबना है कि जो प्रक्रिया हमारे जीवन की कीमियागरी का आँवल है, हम उसी की खुल कर चर्चा करने से कतराते नज़र आते हैं। ठीक अपनी उस दोहरी मानसिकता की तरह, जिसके तहत हम जिस के लिए अक़्सर "गन्दी बात" कह कर मुँह बिचकाते हैं; उसी "गन्दी बात" के कारण विश्व में जनसंख्या के मामले में शिखर पर रहने वाले हमारे एक पड़ोसी देश के साथ होड़ लगाते हुए अपने देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ा कर अपनी भावी नई पीढ़ियों के लिए उनके भावी जीवन को दुष्कर से भी दुष्कर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं .. शायद ...

यूँ तो इस तरह वेब पन्नों को अपनी बकबक से भर कर सोशल मीडिया पर चिपकाने से जरूरतमन्द समाज में बदलाव तो नहीं आ सकता, बल्कि बहुत सारे एनजीओ या सरकारी संस्थानों के अलावा कई लोगों के निजी तौर पर आगे बढ़ कर बुनियादी तौर पर हाथ बढ़ाने से परिदृश्य कमोबेश बदल रहा है। फिर भी अपने देश-समाज के अधिकांश हिस्सों में, जहाँ पर सैनिटरी नैपकिन से महिलाएँ आज भी या तो अन्जान हैं या फिर जानते हुए भी पुराने कपड़ों से काम चलाने के लिए मज़बूर हैं; इस दिशा में अभी भी बहुत काम किए जाने की आवश्यकता है। सबसे पहली आवश्यकता है कि इस विषय पर खुल कर आपस में बात करने की; क्योंकि यह ना तो शर्मिदगी का विषय है और ना ही छुपाने का। आपस में बात करने से इसके लिए जो कुछ भी सामाजिक भ्रांतियां व मिथक हैं, वो दूर होंगी। मासिक धर्म को लेकर जब सब की चुप्पी टूटेगी, तो इस से जुड़ी वर्जनाएँ भी टूटेगी और गाँव-मुहल्ले की झेंपने वाली महिलाएँ और पुरानी सोच और बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं की कमी के कारण झेलनेने वाली महिलाएँ भी जागरूक होंगीं और उन दिनों में उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। इसके लिए हमें जागरूक होकर समाज को भी जागरूक करना होगा .. शायद ...

काश ! .. हमारा समाज रजस्वला लड़कियों या महिलाओं के मामले में सबरीमाला मन्दिर के नियम की तरह रूढ़िवादी होने के बदले कामाख्या मन्दिर के नियम जैसी उदार मानसिकता अपना पाता .. बस यूँ ही ...