इस फूल को सिक्किम में हाथीपैला कहा जाता है, जिसकी पंखुड़ियाँ लगभग एक छिले हुए केले के पाँच खण्डों में बँटे छिलके की तरह होती हैं। यह फूल मधुर और सुगन्धित होने के कारण चमगादड़ इन की तरफ़ काफी आकर्षित होते हैं। ये फूल हरसिंगार या महुआ के फूल की तरह ही खिलने के बाद केवल एक रात के बाद झर कर ज़मीन पर बिछ जाते हैं। इस फूल के खिलने का मौसम लगभग वसंत ऋतु होता है यानी .. लगभग मार्च से जून तक।
इसके पेड़ के पत्ते की अत्यधिक लम्बाई-चौड़ाई के कारण इसे Dinner Plate Tree यानी खाने की थाली वाला पेड़ भी कहा जाता है। इस फूल को पश्चिम बंगाल में रोसु कुंडा, English में Bayur Tree बोलते हैं और इसका Scientific नाम है- टेरोस्पर्मम एसरीफोलियम (Pterospermum acerifolium) परन्तु हिंदी भाषी क्षेत्र में इसे ही कनक चंपा, मुचकुंद या पद्म पुष्प कहा जाता है।
यह वृक्ष अपने देश भारत के कुछ तटीय राज्यों के साथ ही म्यांमार में भी पाया जाता है। म्यांमार .. जिसे 1989 से पहले बर्मा कहा जाता था और 1937 के पहले यह भारत का ही हिस्सा था।
इसके पत्ते और छाल चेचक व खुजली की दवा बनाने में उपयोग किए जाते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो खांसी, वात-पित्त दोष, त्वचा संबंधी विकारों व बवासीर के उपचार में इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग किया जाता है। परन्तु आज हम आधुनिक रासायनिक दवाओं के सामने इन प्राकृतिक उपहारों को अनदेखा करते जा रहे हैं .. शायद ...
इसके वृक्ष की लाल रंग की लकड़ी से तख्ते, बक्से या दराज आदि बनाये जाते हैं।
संस्कृत में एक प्राचीन श्लोक के अनुसार -
मुचकुन्दः क्षत्रवृक्षचित्रकः प्रतिविष्णुः।
मुचकुन्दः शिरःपीड़ापित्तस्रविषानाशनः।
अर्थात् -
मुचकुंद, क्षत्रवृक्ष, चित्रक और प्रतिविष्णु इसके पर्यायवाची हैं। यह सिरदर्द, पित्त दोष, रक्तस्राव संबंधी विकारों को दूर करता है और विष प्रभाव (Toxic effects) के उपचार में भी सहायक होता है।
आयुर्वेद के अनुसार कनक चंपा के फूलों के शरबत में औषधीय गुण भरपूर होता है। जो शरीर के ठंडक और श्वसन संबंधी विकारों में राहत प्रदान करता है। साथ ही पित्त नियंत्रण और सूजन कम करने का काम करता है। इसके शरबत का सेवन बुखार, सिरदर्द और पाचन सम्बन्धी समस्याओं में भी बहुत ही लाभप्रद है।
अब शरबत बनाने के लिए .. सबसे पहले तो अपने आसपास इसके वृक्ष की तलाश कीजिए। चूंकि इसके फूलों के खिलने का मौसम लगभग मार्च से जून तक होता है। तो इन दिनों अगर इसके फूलों से भरा वृक्ष दिख जाए .. और वृक्ष से फूल तोड़ा गया हो तो बिना धोए अन्यथा अगर टपके हुए फूलों को ज़मीन से उठाया गया हो, तो हल्का-सा धोकर आठ-दस फूलों को किसी शाम में ही एक बर्त्तन में फूल डूबने भर पानी में डालकर रात भर के लिए छोड़ दीजिए।
फिर सुबह-सुबह उसे छान कर स्वादानुसार मधु या गुड़ मिला कर या फिर अगर आप मधुमेह से पीड़ित हैं, तो बिना शक्कर के भी पी सकते हैं। औषधीय प्रभाव के साथ-साथ इसकी भीनी-भीनी सुगन्ध से आपको तरोताज़गी मिलेगी और मानसिक तृप्ति भी।
वैसे सालों भर इस फूल का शरबत पीने के लिए इसके फूलों का सुखौता बना कर रखा जा सकता है। अगर आपके मुहल्ले, गाँव-शहर में इसका वृक्ष नहीं भी है, तो उदास होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि .. कई Online Market Platforms पर इसका सुखौता क्रय-विक्रय के लिए उपलब्ध है।
अब अगर आपकी रुचि ऐसे अनमोल प्राकृतिक उपहारों के बारे में जानने और चखने में है, तो आशा है कि आपको इसका शरबत अच्छा लगेगा .. शायद ...
अब .. मैं तो चला .. भीनी-भीनी सुगन्ध से सराबोर और औषधीय गुणों से सम्पन्न हाथीपैला यानी मुचकुंद के फूलों का शरबत पीने के लिए .. बस यूँ ही ...
बीते कल यानी 31 मार्च को हिंदी पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के त्रयोदशी को हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी जैन धर्मावलंबियों द्वारा जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती मनायी गयी है और .. आने वाले कल यानी .. 02 अप्रैल को हिंदी पंचांग के अनुसार इसी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन हिन्दू लोग अपनी मान्यता के अनुसार हनुमान जयंती मनाने वाले हैं।
इन दो दिनों के अन्तर में मनाए जाने वाले इन दोनों उत्सवों के संदर्भ में मेरे नासमझ बचपन में बहुत ही ऊहापोह होता था, कि अभी परसों ही महावीर जयंती मनाई गई है और आज फिर हनुमान जयंती ? भला ये क्या बला है ? और .. मेरा ऊहापोह भी कोई निरर्थक नहीं था। उसकी वजह थी, कि .. सभी लोग हनुमान को महावीर नाम से भी बुलाते हैं।
वैसे तो अभिभावक द्वारा मेरे उस नासमझ ऊहापोह को खत्म करने का प्रयास किया गया था। परन्तु तदोपरान्त विद्यालय में पढ़ाई के दौरान विशेष रूप से हम महावीर को जान पाए। पर .. सच्चाई तो ये है, कि हम उन महान विभूतियों को जान ही नहीं पाते हैं .. केवल पढ़ पाते हैं .. शायद ...
आज भी तीर्थंकर महावीर की सोचों से हम कोसों दूर हैं। जिनका दिया मूलमंत्र है - अहिंसा परमो धर्मः यानी जियो और जीने दो। अहिंसा, आत्म-नियंत्रण और करुणा उनके संदेश हैं। उनके अनुसार सत्य की राह पर चलना, अपरिग्रह यानी इच्छाओं पर नियंत्रण और वर्तमान में जीना ही हमें मनुष्य की श्रेणी में रखता है।
अगर तीर्थंकर महावीर की बहुमूल्य बातों को हम मन से मानें तो मांसाहार हम सभी को त्याग देना चाहिए,
क्योंकि मांसाहारी बाज़ार से कच्चा मांसाहार भोजन (?) को .. हमारी रसोई और रसोई से हमारी थाली और हमारी थाली से हमारे निवाले और पेट तक पहुँचने के पहले .. अत्यधिक पीड़ाओं से होकर गुज़रना पड़ता है .. शायद ...
आइए .. अभी तो .. हनुमान जयंती के लिए वेद, भेद और खेद के फुँदने वाली बंदनवार से अपने मन-मन्दिर को सजाने का प्रयास भर करते हैं .. बस यूँ ही ...
क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। " ...
एक साहित्यिक प्राणी के रूप में एक प्रबुद्ध साहित्यकार या फिर एक कुशल पाठक होने के नाते क्या आपको मालूम है कि हर वर्ष की भांति इस 27 मार्च को भी "विश्व रंगमंच दिवस "(World Theatre Day) पूरे विश्व में संवेदनशील बुद्धिजीवियों के द्वारा मनाया गया है ?
जाने भी दीजिए .. ऐसे बेतुके सवाल को ... वैसे तो ये सवाल इसलिए पूछ रहा हूँ कि .. नाटक और सिनेमा दोनों का गहरा सम्बन्ध है साहित्य के साथ और .. इन तीनों का सम्बन्ध है हमारे समाज से .. शायद ...
अभी हाल ही में बिहार राज्य की राजधानी पटना के एक 'गर्ल्स हॉस्टल' में रह कर पटना से लगभग पचास किलोमीटर दूर स्थित जहानाबाद जिला के एक आम परिवार की अठारह वर्षीया छात्रा 'नीट' (NEET) की तैयारी कर रही थी। जहाँ रहस्यमयी तरीके से उसकी मौत हो गई थी।
पहले तो राज्य पुलिस ने उसे आत्महत्या का जामा पहना दिया। फिर एक 'प्राइवेट हॉस्पिटल' और एक सरकारी अस्पताल (PMCH) के 'पोस्टमार्टम रिपोर्ट' में ज़मीन-आसमान का अन्तर पाया गया। तब कुछ राजनीतिक महकमे में चिल्लपों भी मची थी। तभी दबी ज़ुबान में ये भी कहा गया कि यह प्राकृतिक मौत या आत्महत्या नहीं थी, बल्कि 'गैंगरेप' के बाद की गयी नृशंस हत्या थी। शक के आधार पर आनन-फानन में कई लोगों के 'डीएनए टेस्ट' भी करवाए गए।
मामला राज्य पुलिस से 'एसआईटी' और 'एसआईटी' से 'सीबीआई' को सौंपे जाने में लगभग एक-सवा एक महीना लगा दिया गया। तब तक दबंग दोषी पक्ष को सारे यथोचित साक्ष्य को अलोप करने का भरपूर सुअवसर मिला। खानापूर्ति के नाम पर राज्य पुलिस के कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों को निलम्बित भी कर दिया गया।
परन्तु .. अन्ततः ढाक के वही तीन पात और .. मामला शांत होता चला गया। उल्टा उस पीड़िता के परिवार के सदस्यों से ही बार-बार पूछताछ और जाँच के नाम पर उन्हें मानसिक रूप से अत्यधिक प्रताड़ित किया गया। उन्हें दबंगों की ओर से जान मार देने की धमकी भी मिलती रही। अन्य कई सारी घटित पाशविक दुर्घटनाओं को भूल जाने की तरह ही आज .. उसी समाज, जिला, राज्य, देश के लोग .. यानी हम सभी लोग भूल चुके हैं .. उस निर्मम 'गैंगरेप' और हत्या को। किसी बासी अख़बार की तरह रद्दी के भाव किसी कबाड़ी वाले को या किसी 'मॉल' के किसी 'चेन स्टोर' में चल रहे 'स्कीम' के तहत सौ रुपए प्रति किलो के भाव में बेच चुके हैं या फिर उससे बने शंक्वाकार दोने या ठोंगे में मूँगफली या झालमुड़ी खा कर .. गली-सड़कों पर या 'डस्टबिन' में फेंक चुके हैं .. शायद ...
1980 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म- "आक्रोश" की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी .. कुछ रसूख़दारों द्वारा कमज़ोरों के साथ चौतरफ़ा अन्याय तथा उन्हीं रसूख़दारों के दबाव में पली-बढ़ी भ्रष्ट व्यवस्था द्वारा अन्याय के दोषियों की सुरक्षा-बचाव का दाँव-पेंच और .. कमज़ोर पीड़ितों पर अत्याचार का पहाड़। आज लगभग छियालिस वर्षों के बाद भी मानव समाज में व्यवस्थागत अन्याय और अत्याचार का स्वरूप जस का तस ही व्याप्त महसूस होता है .. शायद ...
दरअसल 1980 में बनी ये लगभग एक सौ चौवालीस मिनट की फ़िल्म यूट्यूब पर सहज उपलब्ध है। जो प्रख्यात नाटककार विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित रचना के आधार पर बनी थी। इसने फ़िल्म उद्योग की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया था। इसकी पटकथा सामाजिक यथार्थ को उजागर करने का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें पीड़ित के आक्रोश को संवादों से कम, लेकिन दृश्यों की चुप्पी की तीव्रता के माध्यम से ज़्यादा पैने ढंग से व्यक्त किया गया है। जो दर्शकों को घंटों सोचने के लिए मज़बूर करती है।
इसका निर्देशन एवं छायांकन भी गोविंद निहलानी ने की थी। संगीत रचा था अजीत वर्मन ने और संपादन किया था केशव नायडू ने। संवाद था पंडित सत्यदेव दुबे का। इसमें अभिनय करने वाले कलाकारों की फ़ेहरिस्त में ओम पुरी, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, मोहन अगाशे, रीमा लागू, महेश एलकोंचवार, नाना पालिसकर, अच्युत पोतदार, अरविंद देशपांडे, भाग्यश्री कोटनिस, दीपक शिरके इत्यादि का नाम आता है। यूँ तो अब से 46 वर्ष पहले अस्सी लाख की 'बज़ट' में बनी ये फ़िल्म तथाकथित 'बॉक्स ऑफिस' पर एक-सवा एक करोड़ का ही 'बिजनेस' कर पाई थी।
परन्तु 1980 में ही इस फ़िल्म की सर्वश्रेष्ठ कहानी व सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए विजय तेंदुलकर को, सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए सी एस भट्टी को, सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए गोविंद निहलानी को, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नसीरुद्दीन शाह और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए ओम पुरी को "राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार" मिला था। फिर इसी फ़िल्म को 1981 में आठवें "भारतीय अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव" (IFFI = International Film Festival of India) में 'गोल्डन पीकॉक' जैसा सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार भी मिला था।
इस फ़िल्म के मात्र दो-चार संवाद वाले एक आदिवासी पात्र- भीकू लहन्या के रूप में ओमपुरी के अभिनय को उनके समस्त अभिनय कार्यकाल का सर्वोत्तम अभिनय माना जा सकता है। पूरी फ़िल्म में दो दृश्यों के दो-चार संवादों एवं एक-दो चीत्कारों को छोड़कर केवल अपने चेहरे के हाव-भाव से पात्र की क्षुब्धता को दर्शकों तक पहुँचा पाना एक अनुपम अभिनय का स्वरूप है। भारतीय फिल्म उद्योग की शताब्दी बीत जाने पर उसकी सौ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की तालिका में भी "आक्रोश" फ़िल्म का नाम शामिल है।
इसकी कहानी कथित तौर पर एक सच्ची घटना पर आधारित है, जो 25 दिसम्बर 1978 को कोंडाची बाड़ी गाँव के पास एक कुएँ में एक विवाहिता आदिवासी युवती- नागी लहान्या की लाश मिलने और उसकी हत्या (?) की ज़ुर्म में उसके पति- भीकू लहान्या को ही व्यवस्था के दारोमदार लोगों द्वारा कारावास में डाल दिए जाने पर आधारित है।
जबकि वहाँ के सरकारी डॉक्टर, ठीकेदार, पुलिस ऑफिसर जैसे समाज के चार-चार रसूख़दारों द्वारा ही नागी लहान्या के साथ बलात्कार या यूँ कहें कि 'गैंग रेप' किए जाने के बाद उसकी हत्या कर के कुएँ में फेंक दिया जाता है और झूठे ख़रीदे गए गवाहों को पेश कर के भीकू लहान्या को हत्यारा बना कर सजा दिलवाई जाती है। यह न्यायिक प्रणाली व चिकित्सा प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार और सक्षम एवं शक्तिशाली लोगों द्वारा वंचितों के उत्पीड़न का एक कच्चा चिट्ठा है।
नागी लहान्या की हत्या और भीकू लहान्या को षड्यंत्र के तहत कारावास की सजा मिलने के पश्चात उसकी झोपड़ी में उसका एक दुधमुँहा बच्चा, एक वृद्ध पिता और एक युवा कुंवारी बहन बच जाती है। हालांकि भास्कर कुलकर्णी नामक एक ईमानदार वकील भीकू लहान्या की तरफ़ से एक सरकारी वकील के तौर पर मुकदमा लड़ने का असफल प्रयास करता है।
इसी बीच भीकू लहान्या के वृद्ध पिता की इन्हीं सब सदमा से मृत्यु हो जाती है। उन्हें मुखाग्नि देने के लिए हथकड़ी और रस्से में जकड़े हुए भीकू लहान्या को जेल से पुलिस की हिरासत में चिता तक लाया जाता है। वह वहाँ खड़ी अपनी कुंवारी बहन को देखकर आशंकित हो जाता है, कि कहीं भविष्य में उसकी बहन को भी इस दमनकारी व्यवस्था से उसकी पत्नी वाली पीड़ा ना झेलनी पड़े और .. हठात पास पड़ी कुल्हाड़ी से अपनी बहन का सिर काट देता है।
दमनकारी व्यवस्था से हताश होकर मूक विद्रोह के प्रतीकरूपी अपने इस औचक क़दम से अपनी क्षुब्धता में बार-बार आसमान की ओर मुँह करके भीकू लहान्या का आक्रोश में चीखना हर संवेदनशील दर्शक के दिल को दहला देता है। आपका भी दहलेगा .. शायद ...
आज भी समाज में लड़की के जन्म लेने पर आमजन प्रायः दो मुख्य कारणों से काँप जाते हैं- एक तो दहेज़ की रक़म व शादी के लिए तमाम भौंडेपन के नाम पर ख़र्च होने वाली रक़म के कारण और दूसरा है नापाक इरादे वाले बलात्कारी वहशियों से बेटी की इज़्ज़त लुट जाने का डर या नाजायज़ तरीके से गर्भवती हो जाने का भय।
इन दोनों के अलावा .. पुरखों की पाखंडी सोचों के अन्तर्गत फैलायी हुई विषाक्त भ्रांति या प्रथा तो है ही कि .. बेटे से ही किसी का तथाकथित वंश चलता है और उसके द्वारा ही दी गयी तथाकथित मुखाग्नि से तथाकथित मोक्ष की प्राप्ति भी होती है .. शायद ...
भास्कर कुलकर्णी जैसा वकील और एक ईमानदार समाचार पत्र संपादक भ्रष्टाचारियों की सच्चाई को उजागर करने की कोशिश करता तो है, परन्तु .. अन्ततः इस भ्रष्ट व्यवस्था के समक्ष हार जाता है। ठीक .. हाल ही में पटना में 'नीट' (NEET) की उस पीड़िता छात्रा के हारे हुए पीड़ित परिवार की तरह ही .. शायद ...
पुनः उस एक 'पॉपुलर डायलॉग' - " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। " के आधार पर .. अब शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (४)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के साथ .. बस यूँ ही ...