कि हो .. पास हमारे झरने का ग़ुलगपाड़ा,
चेहरे पे हों हमारे बूँदों का बतंगड़।
हों दूर तक पर्वत-श्रृंखलाएं
ओढ़े हुए चीड़ के बीहड़।
हो वहाँ चाय की एक झोपड़ी,
जिसमें सुलगती-सी हो चीड़ की लकड़ी।
धुआँ-धुआँ-सी आग में जिसकी
कुछ सेंकती, कुछ उबालती,
भुट्टे कुछेक एक मासूम-सी लड़की।
और छिलकों पे भुट्टों के परोसती
हम जैसे सैलानी अपने ग्राहकों को
नर्म-गर्म सिंके-उबले भुट्टे के संग
नमक-नींबू-मिर्ची की चटक जुगलबंदी।
अपने दोनों हाथों में लिए तुम भुट्टे
एक में सिंके और दूसरे में उबले हुए।
सिंका हुआ स्वयं खाती-चबाती-गुनगुनाती
और उबला हुआ मुझे खिलाती-पुचकारती,
अपने-अपने स्वाद के अनुसार और वहीं
गुड़ वाली गर्मागर्म कड़क चाय से भरे
भाप उगलते हों दो अदद कुल्हड़।
वहीं पर ..
नर्म-नर्म बुग्याल पर
हो आग़ोश में एक-दूजे की बैठी
हम दोनों की एक अदद जोड़ी।
और हों ..
हम दोनों के दोनों ही अल्हड़।
लिपटते, चिपटते, खुल्लम-खुल्ला,
हो जैसे प्यार हमारा
मानो .. बस्स ! ..
खुला खेल फर्रुखाबादी ..बस यूँ ही ...








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