सिद्धार्थ जी - " सुप्रभातम् पवन बेटा "
पवन - " सुप्रभातम् 'अँकल' जी "
वैसे तो पवन और सिद्धार्थ जी आपस में ना तो पड़ोसी हैं, ना सगे-सम्बन्धी हैं, ना ही स्वजातीय और ना ही एक ही नौकरी-पेशे में हैं। परन्तु .. दोनों ही लोगों का परिवार बिहार राज्य के अंगिका भाषी भागलपुर जिला के पीरपैंती गाँव का ही रहने वाला है।
दरअसल .. कहीं पर भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से व्याप्त क्षेत्रवादिता के माहौल में जब एक ही स्थान के दो निवासी अन्य स्थानों पर प्रवास या पर्यटन के दौरान संयोगवश मिलते हैं तो .. उनकी आपस में घनिष्ठता प्रायः बढ़ ही जाती है। चाहे वह स्थान विशेष अपने शहर ही में कहीं जाने पर .. मुहल्ला, 'सोसाईटी', या गाँव के सन्दर्भ में हो या यही क्षेत्रवादिता अपने शहर या गाँव से देश के भीतर कहीं भी जाने पर जिला, शहर, गाँव या राज्य के सन्दर्भ में हो या फिर देश से बाहर विदेशों में कहीं भी जाने पर अपने देश के सन्दर्भ में हो .. वो वहाँ चाहे सैलानी के रूप में हों या प्रवासी के रूप में हों .. ऐसी परिस्थितियों में समान भाषा-भाषी का होना भी सम्बन्ध को जोड़ने में गोंद-सा असर करता हैं .. शायद ...
सिद्धार्थ जी - " पवन बेटा .. आज तुम अकेले आये हो सुबह की सैर करने .. तुम्हारे पापा और तुम्हारी वो .. छुटकी बिटिया नहीं आयी .. वो .. क्या नाम है उसका .. ? "
पवन - " समीक्षा "
सिद्धार्थ जी - " अरे हाँ, हाँ .. समीक्षा .. उम्र की वज़ह से .. कभी-कभी .. छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे नाम तक भी याद ही नहीं रह पाते .. हाँ तो .. आज वो .. समीक्षा बिटिया भी नहीं आयी ? .. "
पवन - " 'अँकल' कल पड़ोस के एक घर में सुबह से ही पूजा-पाठ शुरू हुआ और .. सारी रात 'जगराता' होता रहा .. बड़े- बड़े 'डी जे-स्पीकर' पर सुबह से लेकर सारी रात भर फ़िल्मी गाने की 'पैरोडी' वाले भजनों की और वाद्य यंत्रों की तेज़ कानफोड़ू आवाज़ों से घर की खिड़की के काँच और रसोई की 'कटलरी' व 'कप-प्लेट' तक खड़खड़ाते रहे .. "
सिद्धार्थ जी - " ओह ! .. तो ? .. "
पवन - " तो क्या अँकल .. हम सभी लोग शोर की वज़ह से नहीं सो पाए सारी रात .. "
सिद्धार्थ जी - (गुस्सा व चिंतित भाव के साथ) " वो तो स्वाभाविक है बेटा .. यही तो है .. किसी भी धर्म का अपभ्रंश स्वरूप और रीति-रिवाज़ के मुखौटों में हमारे बुद्धिजीवियों के समाज की अंधपरंपराओं की विडम्बना .. लोगों ने मानसिक व आध्यात्मिक जागरण को अपभ्रंश स्वरूप में परिवर्तित कर के .. रात भर जाग कर और लोगों को भी जगा कर तथाकथित पूजा के नाम पर शोर मचाने को ही जागरण या जगराता मान लिया है। "
पवन - " आप तो जानते ही हैं .. पापा दिल के मरीज़ हैं .. उनकी कल शाम से ही तबियत ख़राब है और इन दिनों समीक्षा की 'एग्जाम' भी चल रही है .. वह भी कल ना तो ढंग से पढ़ पायी और ना ही सो पायी .. 'मिसेज़' भी सुबह से .. "
सिद्धार्थ जी - " .. च् .. च् .. "
पवन - " हम भी तो अभी 'मॉर्निंग वॉक' के लिए नहीं आए हैं 'अँकल' जी। बल्कि .. आदतन केवल 'स्ट्रीट डॉग्स' को सुबह-सुबह रोटी खिलाने यहाँ आ गए हैं .. हमारा भी शरीर सुस्त लग रहा है .. "
सिद्धार्थ जी - " च् .. ख़ैर ! .. चलो .. आज मेरी भी सुबह की सैर 'कैंसिल' .. चलो .. चल कर तुम्हारे घर .. पहले तुम्हारे पापा की ख़ैर- ख़बर लेते हैं। "
अब दोनों लोग, सिद्धार्थ जी और पवन, गाँधी मैदान के पश्चिमी 'गेट' से निकल कर छज्जूबाग की तरफ़ पवन के घर की ओर प्रस्थान कर रहे हैं।
जाते-जाते उन्हें गाँधी मैदान के पश्चिमोत्तर छोर पर तथाकथित महात्मा गाँधी की मूर्ति के चबूतरे के पास कुछ लोगों की झुण्ड बैठी दिखाई दे रही है। वो लोग वहाँ ज़ोर-ज़ोर से बजाए जा रहे करताल और ढोलक की शोर से प्रतियोगिता करते हुए गला फाड़-फाड़ कर हनुमान चालीसा गा रहे हैं। उन सभी की मिलीजुली आवाज़ उन दोनों को विचलीत कर रही है - " जै जै हनुमान गोसाईं .. " - और केवल उन दोनों को ही नहीं वरन् गाँधी मैदान में सभी शांतिप्रिय टहलने वाले लोगों को भी और बैठ कर योग या ध्यान लगाने वाले लोगों के साथ-साथ सुबह-सवेरे पक्षियों के कलरव को भी।
अब सिद्धार्थ जी अन्यमनस्क-सा पवन से पूछ रहे हैं कि - " लगता है कि आज मंगल (मंगलवार) है .. है ना ? "
" ... महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी ... "
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