Tuesday, May 5, 2026

नासपीटी जाती ही नहीं ... 😡

अपने देश में पाँच राज्यों के विधानसभा के कल,04.05.2026 वाले चुनाव परिणाम के दिन हम सभी के लिए दो बातें विशेष चौंकाने वाली थीं। 

पहली बात कि .. पश्चिम बंगाल के लिए राजनीतिक दृष्टिकोण से कल का परिणाम वर्षों बाद एक नया विहान लेकर आया है। साथ ही समस्त देशवासियों के लिए भी एक शुभ संदेश भी लाया है , सिवाय कुछ तथाकथित मोदी विरोधियों को छोड़ कर .. शायद ...


दूसरी बात .. तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने इलाया थलपति उर्फ़ जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ विजय की दो वर्षों पूर्व गठित की गई राजनीतिक पार्टी- तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) की जीत। 

हालांकि दो वर्षों पूर्व गठित की गई राजनीतिक पार्टी की जीत चौंकाता तो है, परन्तु अभिनेता से राजनेता बनने वाली बात चौंकाती नहीं है, बल्कि केवल अपना इतिहास दोहराती दिखती है ; क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति का इतिहास सत्तर के दशक के बाद फ़िल्मी गलियारे से चल कर ही आता रहा है। मुथुवेल करुणानिधि, मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन (MGR), वी एन रामचन्द्रन उर्फ़ जानकी रामचंद्रन और जय ललिता जैसे नाम इसके उदाहरण हैं।


अब आज की बतकही .. बस यूँ ही ...


नासपीटी जाती ही नहीं ... 😡


पाले फिरते हैं कुछेक यूँ वहम में अहम,

मान के कि नर-काया से है हुआ जनम।

ना आज वेद-पुराणों से कोई सरोकार,

न जाने है ये सनातनी का कैसा प्रकार ?


माथे पे टीका और नाम संग 'टाइटल',

अकड़ी है गर्दन, भले हो 'सर्वाइकल'।

अहंकार को ही हैं सब मानते संस्कार,

पहचान आदमी की, पद, कोठी, कार।


दसवीं सदी के पुरखे का पता ही नहीं,

पर कोई श्रीवास्तव, तो तिवारी कोई।

हो सोच और काम इंसान के कैसे भी,

'टाइटल' ही से है बस सबको दरकार।


इंसानियत यहाँ इंसानों में आती नहीं,

और ये जाति नासपीटी जाती ही नहीं।

जाति, आरक्षण, न जाने कितने दरार,

उलझे हैं हम इनमें, वो करें आविष्कार।



{ N. B. :-  

(१) "नर-काया"


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब तथाकथित ब्रह्मा जी ने ग्यारह हज़ार वर्षों तक ध्यान करने के पश्चात अपनी आँखें खोलीं, तो उन्हें अपने समक्ष एक तेजस्वी पुरुष दिखाई दिया, जिसके हाथ में कथित तौर पर कलम और स्याही की दवात थी। ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने और उसमें गुप्त रूप से स्थित रहने के कारण उस पुरुष को तथाकथित चित्रगुप्त और उनके वंशजों को तथाकथित कायस्थ कहा गया है। इस प्रकार मान्यता है कि कायस्थ जाति की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा रूपी नर के काया से हुई है।

मेरे नाम के साथ भी अभिभावक द्वारा "सिन्हा" (तथाकथित) जैसा 'टाइटल' (तथाकथित) जोड़ दिया गया है और कहा गया है कि तुम कायस्थ जाति के हो ; परन्तु मुझे आज भी 15वीं सदी या उससे पहले की सदियों वाले मेरे पुरखों के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं हो पाया है। आपको अपना ज्ञात है क्या ? 

लोगबाग़ तो यहाँ भी नहीं रुकते .. लोग अपनी तथाकथित कायस्थ जाति के बाद भी .. श्रीवास्तव, सक्सेना, भटनागर, अम्बष्ठ, अस्थाना, बाल्मीक (वाल्मीकि गौड़), माथुर, कुलश्रेष्ठ, सूर्यध्वज, करण, गौर (गौड़) और निगम जैसी 12 उपजातियों में भेद करके अपनी-अपनी गर्दनों को अकड़ाते हैं। अपने नाम के पीछे तथाकथित "श्रीवास्तव" शब्द ज़बरन जोड़ कर तो कुछ लोग कुछ ज़्यादा ही वहम में अहम पाले अपनी साँसें लेते हैं .. शायद ... 

यही जाति-उपजाति वाला मनोविज्ञान कुछ कमोबेश हमारे देश की उपलब्ध हर जातियों में देखने के लिए मिलता है। इसके पीछे का कोई विज्ञान, कोई तथ्य, कोई गणित, कोई एतिहासिक प्रमाण .. यदि आपको ज्ञात हो तो मुझ जैसे मूढ़ का ज्ञानवर्धन अवश्य कीजिएगा .. बस यूँ ही ...


(२) "वो" = 


उपरोक्त "वो" .. वो सारे देश हैं, जहाँ के प्रबुद्ध नागरिकों में से ही वैज्ञानिक बने कुछ लोग हमारी दिनचर्या में उपयोग किए जाने वाले तमाम आम उपकरणों या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का दिन-प्रतिदिन निरन्तर आविष्कार करते आ रहे हैं। 

भले ही तमाम विदेशी आविष्कारों के बाद हमलोग उनसे प्रेरित हो कर बनाए गए भारतीय उत्पादनों को स्वदेशी मानकर अपनी-अपनी गर्दनों को अकड़ाए रहते हों। चाहे उन सारे उत्पादों की सूची में .. माचिस हो, स्टेनलेस स्टील हो, सिलाई मशीन हो, साइकिल हो, स्कूटर हो, बाइक हो, कार हो, ट्रेन हो, हवाई जहाज हो, प्रेशर कुकर हो, फ्रीज़ हो, बल्ब या एलईडी हो, ए सी हो, माइक हो, रेडियो हो, टेलीविजन हो, मोबाइल हो, लैपटॉप हो .. इत्यादि-इत्यादि हों। हम अपने आसपास नज़रों को दौड़ा-दौड़ा कर अपने आज के उपयोगी उपकरणों की सूची बनाते-बनाते थक जायेंगे .. पर उन विदेशी आविष्कारों की गिनती शीघ्र खत्म नहीं होगी.. शायद ...

अब कुछेक लोग पौराणिक कथाओं के पुष्पक विमान के लिए वहम में अहम पाल कर अपनी गर्दन आकड़ाएंगे। परन्तु अगर तत्कालीन पुष्पक विमान को एक बार सच मान भी लें, तो फिर उस कालखंड के बाद से लेकर हवाई जहाज के आने तक वह पुष्पक विमान "मिस्टर इंडिया" क्यों बना रहा ? आपको मालूम है क्या ? }




8 comments:

  1. सुंदर और सटीक !

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    1. जी ! .. हार्दिक आभार आपका ...

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  2.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 09 मई, 2026
    को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
      

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    1. जी ! .. सादर नमन सह हार्दिक आभार आपका ...

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  3. विचारणीय आलेख

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    1. जी ! .. सादर नमन सह हार्दिक आभार आपका ...

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  4. जी सुबोध जी, आप जैसे गहन बुद्धिजीवी से कौन बहस भिड़ाए! सम्भवतः आपके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए हिमालय में वर्षो की तपस्या करनी पड़ेगी!'नासपीटी'को उसके 'हाल 'अथवा 'बेहाल 'पर छोड़ दें क्योंकि ये इतना गहरा संस्कार या कहें कुसंस्कार है जिससे आगामी दो सौ साल तक मुक्त होने की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं! आपके यहां भी कथित 'सिन्हा ' शब्द सदियों तक चलता रहेगा! आपके भावी नाती - पोतों की कई पीढ़ीयों तक! और जिस दिन हमारे देश की जनता जाति धर्म से ऊपर उठकर वोट करेगी वो दिन भारत के इतिहास में पूर्णरूपेण आजादी का दिन होगा! पर इन्ही की अफीम चटाकर तो सत्ता हाथ मे आती है! फिर भी आपके तर्क सोचने पर विवश करतेहैँ! हर चुनाव में नैतिक मूल्यों की गिरावट का नया कीर्तिमान स्थापित होता है! फिर भी सच्चे कलमकार इस ओर ध्यान दिलाते रंहेंगे! लिखते रहिये 🙏


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    1. जी नहीं रेणु जी, ये विषय बहस भिड़ाने के लिए नहीं हैं, बल्कि आत्मचिंतन के लिए है। और तार्किक होने के लिए हिमालय पर जाने की नहीं वरन् इसी समाज, परिवार के मध्य रहना आवश्यक होता है। हिमालय तक जाने पर तो मनुष्य विकार रहित शून्य हो जाता है।
      और हाँ, नाती-पोतों तक इस नासपीटी की बात ना जाए, इसीलिए हमने अपने इकलौते बेटे के नाम के आगे कोई जाति सूचक उपनाम जोड़ा ही नहीं है। केवल नाम है।
      और .. जब तक आरक्षण है, जाति का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है .. शायद ...🙏

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