Wednesday, April 15, 2026

तब तो .. ज़िन्दगी और भी ...


 




 (१)

तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


सुबह-सवेरे टहलते हुए कभी

डालियों पर पेड़ों की 

या फिर कुछ पौधों की

झुरमुटों में कभी,

सुनकर आवाज़ें 

बुलबुलों की जोड़ी की,

साथ हमारे ठिठकती कभी तुम भी।

सुन कर चहचहाहट गौरैयों की 

मन ही मन मंद-मंद मुस्कुराती, 

साथ हमारे निहारती उन्हें कभी तुम भी।

आवारा तो नहीं, 

पर बेचारे बेसहारे 

गली-मोहल्ले के कुत्तों को भी 

पुचकारती-सहलाती कभी तुम भी।

साथ हमारे उन्हें खिलाती, 

उन्हीं की पसन्द के, 

प्यार से कुछ भी कभी तुम भी।

संग हमारे हर रोज़ आती 

सुबह-शाम छत्त पर भी,

दाने कुछ मूँगफली, बाजरे-कँगनी के, 

गिलहरी, पक्षी-वृंद को चुगाती कभी तुम भी .. बस यूँ हीं ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...



(२)

तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


हर शाम .. साथ मेरे

लगाए टकटकी,

चाँद-तारों को 

आसमानों में निहारती,

टहपोर चाँदनी में पूर्णमासी की, 

संग मेरे गोते लगाती कभी तुम भी। 

बेशक़ तुम किसी शाम 

ऋषिकेश में करती गंगा-आरती,

पर तदोपरान्त ..

अमावस के धुंधलके में

या कभी पूर्णमासी की 

चाँदनी में बैठ कर 

सीढ़ियों पे घाट की, 

कलकल बहती गंगधार में 

गोते अपने पैरों को, कभी-कभार, 

घँटों साथ हमारे, पुरानी फ़िल्मी 

युगल गीत एक रूमानी -

" अपनी कहो ~~

कुछ मेरी सुनो " ~~ के तर्ज़ पर,

कुछ .. अपनी कहती, 

कुछ .. मेरी भी सुनती .. कभी तुम भी .. बस यूँ ही ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...



(३)


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


ग़ज़ल पसंदीदा अपनी कोई

सुनूँ किसी शाम जो, 

तो .. तुम बीच में टोकती,

और उस ग़ज़ल के कुछ 

ख़ालिस उर्दू शब्द के  

मायने भी पूछती मुझसे कभी।

कभी युगल गीत रूमानी कोई

गुनगुनाने-गाने पर मेरे,

संग-संग नारी स्वर अपना भी

मिलातीं साथ मेरे कभी तुम भी,

मैं मुखड़ा गाता,

तुम अंतरा गातीं

या गीत के सम पर किसी

वाद्य यंत्रों की जुगलबंदी-सी

थाप अपनी हथेलियों की,

लिए खनखनाहट अपनी चूड़ियों की,

पीठ पर मेरी थपथपाती कभी।

या फिर .. 

बतकही पर मेरी किसी, 

"वाह-वाह" ना सही,

निकालती कोई मीन-मेख ही तुम कभी .. बस यूँ ही ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...





[ सभी तस्वीरें "M. F. Hussain A Pictorial Tribute by Pradeep Chandra" नामक पुस्तक के सौजन्य से. ]


No comments:

Post a Comment