Monday, March 2, 2026

गुबार मन में हो या पवन में ...



बलपूर्वक बलात्कार, छलपूर्वक धर्मांतरण, 

लगता है सभी को एक समाचार की तरह।

पड़े नहीं हाथ जब तक किसी गर्म तवे पर,

होती नहीं चीत्कार की फिर तो कोई वजह।


है आसान प्रोपेगैंडा कहना किसी वारदात को

उनके लिए, हैं जिनकी खुशनुमा शाम-सुबह।

प्रोपेगैंडा कह के सिर झटकने से पहले पूछो

उन साँसों से, होता है जिनका सरेआम जबह।


फ़तह या सुलह, सुलह या फ़तह, है ऊहापोह,

दिन-रात, सुबह-शाम, गाँव-शहर हर जगह।

अचरज से देखती है हमें जन्म देने वाली भी

जन्मदात्री प्रकृति, देख धर्म-मज़हब के कलह।


युद्ध-प्रतियुद्ध, अत्याधुनिक रासायनिक अस्त्र,

धमाके-धुआँ जानलेवा, पारिस्थितिकी दुस्सह।

हानिकारक है सदा गुबार मन में हो या पवन में,

होते हैं नष्ट देश-धरती संग समस्त ग्रह-उपग्रह।



[ प्रोपेगैंडा = Propaganda ]

2 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर मंगलवार 3 मार्च 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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    1. जी ! .. सुप्रभातम् सह सादर नमन संग हार्दिक आभार हमारी बतकही को मंच तक ले जाने के लिए ...

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