"पंचम वेद ...", " पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !", "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !", "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !", "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" और "पंचम वेद ... (५)_सोलह सोमवार का व्रत" के बाद आज उसकी अगली कड़ी .. "पंचम वेद ... (६)_क, ख, ग से BPL कार्ड तक ... !" .. आप सभी के सामने :-क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...
अनुभवी व ज्ञानी लोगों का मानना है, कि कला की किसी भी विधा की रचना .. कलाकार की दक्षता एवं एकाग्रता पर निर्भर करती है, परन्तु उसका निखरना निर्भर करता है उस कलाकार की अवलोकन क्षमता पर और विराट कल्पनाशीलता पर .. वो भी मन की आँखों से। भले ही वह हमारे रसोई घर में पकने वाली पाक कला ही क्यों ना हो .. नहीं क्या ?
यही अवलोकन क्षमता व कल्पनाशीलता-क्षमता हमलोगों में से किसी को सूरदास तो .. किसी को जॉन एलिया बना देती है। ऐसी ही अवलोकन क्षमता के धनी एक युवा ने बिना बम्बईया तामझाम के कुछ स्थानीय कलाकारों के साथ मिलकर एक ज़मीन से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर की फ़िल्म की रचना कर डाली है। वो भी झारखंड के धनबाद जिला जैसी जगह की पृष्ठभूमि में रहकर।
कभी चौक-चौराहों पर अपने समाज-देश की बुराइयों को आईना दिखलाने वाले लौंडा नाच दिखला कर भिखारी ठाकुर जी ने और नुक्कड़ नाटक दिखला कर सफ़दर हाशमी जी ने आमजन को समाज में आमूलचूल ज़मीनी परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करने की जो शुरुआत की थी, उसी का एक आधुनिक स्वरूप दिखलाने वाली लगभग एक घंटा छियालिस मिनट की इस फ़िल्म को हम सभी को देखनी चाहिए। विशेष कर युवा वर्ग को, जिसे आज हम Gen Z या Gen G बोलते हैं।
इस फ़िल्म को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में काफी प्रशंसा मिल रही है। इस फिल्म ने बर्लिन में इंडो-जर्मन 'फिल्म वीक' में 'बेस्ट सोशल इम्पैक्ट मूवी' और 'बेस्ट डेब्यू फिल्म' का पुरस्कार जीता है और इस फ़िल्म की अभिनेत्री मौलश्री सिंह ने इसमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान भी प्राप्त किया है। इस फ़िल्म ने लंदन में यूके-एशियन 'फ़िल्म फेस्ट' में भी प्रशंसा बटोरी है। इसके अलावा कोलकाता और जर्मनी के 'फ़िल्म फेस्टिवल' में भी ये फ़िल्म शामिल हो चुकी है। इसे कई सारे 'अवार्ड' भी मिले हैं। विश्व का सबसे प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध वार्षिक फिल्म समारोह, जो हर वर्ष फ्रांस के कान्स शहर में कान्स फ़िल्म महोत्सव (Cannes Film Festival) के नाम से आयोजित किया जाता है। वहाँ भी इस वर्ष हाल ही में यह फ़िल्म और इसके मुख्य कलाकार शामिल हुए हैं।
तन्मय शेखर (तन्मय)
इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक तन्मय शेखर के अनुसार लगभग तीन साल पहले इस फ़िल्म की 'शूटिंग' में केवल एक महीना लगा था, परन्तु 'पोस्ट-प्रोडक्शन' और 'प्रमोशन' के साथ-साथ 'सेंसर सर्टिफिकेट' लेने में भी तीन साल का समय लग गया। इसकी पूरी 'शूटिंग' धनबाद में ही की गई थी। पूरी फिल्म की 'शूटिंग' आईआईटी-आईएसएम 'कैंपस' में और वहाँ से आठ किलोमीटर दूर बगुला बस्ती जैसी मलिन बस्ती के साथ-साथ बिग बाज़ार रोड जैसे वास्तविक स्थानों पर 'शूट' किए गए हैं।आईआईटी-आईएसएम, धनबाद (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी-इंडियन स्कूल ऑफ माइंस) मूल रूप से 1926 में एक प्रमुख खनन संस्थान के रूप में स्थापित आईएसएम (इंडियन स्कूल ऑफ माइंस) है, जो 2016 से पूर्ण रूप से आईआईटी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) बन गया है। यह संस्थान अपने खनन और भूविज्ञान सम्बन्धित इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए विश्व स्तरीय संस्थान के रूप में एक प्रसिद्ध नाम है ।
मौलश्री सिंह (मौलश्री)
इस फ़िल्म में मौलश्री सिंह, निर्मला हाजरा, शिवांग राजपाल और दानिश हुसैन के साथ-साथ आईआईटी-आईएसएम के छात्रों व स्थानीय कलाकारों ने भी अभिनय किया है।इस फ़िल्म का लेखक-निर्देशक तन्मय शेखर आईआईटी कानपुर से 2011 का 'पास आउट' है। वह इससे पहले भी चार-पाँच 'शॉर्ट फिल्में' बना चुका है। अभिनेत्री मौलश्री सिंह की शुरुआती स्कूली शिक्षा सोफिया गर्ल्स स्कूल, कोटा से हुई है और दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में बी ए ऑनर्स की पढ़ाई की है। वर्तमान में चार-पाँच वर्ष से मुम्बई में रहकर अब तक चार-पाँच 'शॉर्ट' फिल्में कर चुकी है, पर यह उसकी पहली 'फीचर फ़िल्म' है। अभिनेता शिवांग राजपाल मूल रूप से मध्यप्रदेश के रीवा से है, जो वर्तमान में मुम्बई में रहता है। अब तक फ़िल्म का नाम तो जान ही गए होंगे।
यह "नुक्कड़ नाटक" फ़िल्म नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने वाले कलाकारों के संघर्ष को दर्शाती है। इस फ़िल्म के किस्से में .. आईआईटी में पढ़ते समय दो 'स्टूडेंट्स' को संस्थान से निकाल दिया जाता है। इसके बाद वो दोनों प्रबंधन के पास जाकर उनसे उन दोनों को निकालने के बदले कोई दूसरी सजा की माँग करते हैं। तभी उन्हें कुछ पिछड़ी बस्ती के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए उनके स्कूल में 'एडमिशन' करवाने की सजा मिलती है। दूसरी तरफ़ इसमें इंजीनियरिंग के छात्रों के जीवन और उनके भटकाव के इर्द-गिर्द घूमती हुई युवावस्था की दिल को छू लेने वाली कहानी है। इसमें 'गे' (Gay) जैसे वास्तविक व प्रामाणिक विषय को दृश्यों व संवादों के माध्यम से मुखर होकर उठाया गया है, जो भले ही हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी मुखौटाधारी समाज के लिए एक दमित व घिनौना विषय हो।
हमलोगों के समक्ष एक और प्रश्नचिन्ह छोड़ती है ये फ़िल्म, विशेष तौर पर युवाओं के समक्ष, कि हम इंजीनियरिंग जैसी उच्च शिक्षा के बाद मोटी रकम वाली तनख्वाह के साथ विदेशों में पलायन कर जायें या देश में ही एक भौतिक विलासी जीवन गुज़ार दें या फिर हमारे समाज में आर्थिक या अन्य किसी भी कारणवश जो शैक्षणिक दृष्टिकोण से एक अन्तर है, उसे मिलकर दूर करें ?
दरअसल वास्तविक रूप से ये सवाल पहली दफ़ा इस फ़िल्म के लेखक-निर्देशक आईआईटीयन तन्मय शेखर के मन में पनपा था। तन्मय शेखर के पिता राजीव शेखर भी आईआईटीयन हैं। जो कभी आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त थे और उसके बाद आईआईटी-आईएसएम धनबाद में।
तन्मय जब फ़िल्म के पहले एक साल दिवाली के समय धनबाद अपने माता-पिता के पास छुट्टी बिताने आया था, तभी अपनी माँ के साथ आईआईटी-आईएसएम धनबाद से लगभग आठ किलोमीटर दूर बगुला बस्ती गया, जहाँ उसकी माँ एक साल से एक स्कूल में पढ़ा रहीं थीं। महज़ आठ किलोमीटर की दूरी पर भयावह शैक्षणिक अन्तर ने झकझोर कर रख दिया। एक तरफ़ आईआईटी-आईएसएम, जहाँ विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा और दूसरी तरफ़ एक ऐसी बस्ती जहाँ बच्चे पढ़ने की जगह काम और भिक्षावृत्ति कर रहे थे। कुछ सप्ताह उस बस्ती में बिताने और स्थानीय लोगों से दोस्ती करने के बाद तन्मय के दिलोदिमाग में फ़िल्म की 'आइडिया' और 'स्क्रिप्ट' ने जन्म लिया।
वैसे तो फ़िल्म निर्माण के लिए पैसे जुटाना और फ़िल्म को दर्शकों तक पहुँचाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। किसी तरह फिल्म बनाने के बाद भी वह केवल 'हार्ड ड्राइव' में पड़ी रह जाती है। भारत में हर वर्ष अनुमानतः हजार से ज़्यादा स्वतंत्र फिल्में बनती हैं, परन्तु उनमें से नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा फ़िल्में दर्शकों तक नहीं पहुँच पाती हैं। पर इन सारी चुनौतियों को तन्मय की 'टीम' ने स्वीकार करते हुए अन्ततः विजय हासिल की है।
जबकि इस फिल्म में 'म्यूजिक डायरेक्टर' से लेकर 'पोस्ट-प्रोडक्शन' से जुड़े सभी लोगों का बॉलीवुड से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस फ़िल्म को बनाने में करोड़ों लगा है। जो मेधा खन्ना और मौलश्री सिंह के अलावा अधिकांश धनराशि के लिए लेखक-निर्देशक तन्मय शेखर और उसके आईआईटीयन दोस्तों सहित लगभग तीस लोगों ने 'ऑनलाइन पेमेंट' करके सहयोग किया था। इस फ़िल्म के प्रचार के लिए लगभग पैंतालीस दिनों के प्रचार-संबंधी अभियान के तहत पूरी 'टीम' अहमदाबाद, वडोदरा, इंदौर, भोपाल, कोटा, जयपुर, दिल्ली, चंडीगढ़, नागपुर, पुणे, धनबाद और कोलकाता जैसे शहरों में गयी थी। यह फ़िल्म 27 फरवरी 2026 को सिनेमाघरों में 'रिलीज' हुई थी। परन्तु अब तो यह Netflix पर सहज ही उपलब्ध है।
दिल्ली में प्रचार-अभियान
बाद में आईआईटी कानपुर से स्नातक कर के न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में अपनी पहली नौकरी करने के दौरान ही उसे फ़िल्मी कीड़ा परेशान करने लगा और उसे एहसास हुआ कि फ़िल्म निर्माण एक ऐसा क्षेत्र है जिसे कोई भी अपना सकता है। यह कोई आनुवंशिक गुण नहीं है। यह केवल फ़िल्मी परिवारों तक ही सीमित नहीं है। कोई भी कलम और कैमरा उठाकर इसे कर सकता है। उसी प्रेरणादायक क्षण में उसने अपनी नौकरी छोड़ कर भारत वापस आ गया था। भारत के संवेदनशील व प्रबुद्ध दर्शकों को "नुक्कड़ नाटक" जैसी विश्वस्तरीय फ़िल्म जो मिलनी थी।
निर्मला हाजरा (छोटी)
"नुक्कड़ नाटक" फ़िल्म की नायिका मौलश्री धनबाद की मलिन बस्ती- बगुला बस्ती की छोटी नाम की एक बच्ची को पढ़ाने का बीड़ा उठाती है और उसे शिक्षित करने के लिए संघर्ष करती है। उसे क, ख, ग, घ जैसे वर्णमाला से परिचित करके इतना शिक्षित कर देती है, कि छोटी भिक्षावृत्ति छोड़कर अपने अनपढ़, गरीब और नशे में लिप्त पिता वाले परिवार के लिए 'फॉर्म' भर कर 'बीपीएल कार्ड' (BPL Card) बनवा पाने में सक्षम हो जाती है।
पुनः उसी 'डायलॉग' .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। ", के आधार पर .. शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (७)_ पिरामिड ... !" के साथ .. बस यूँ ही ...





आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 08 जून 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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जी ! .. सादर नमन संग हार्दिक आभार आपका .. (आपका ये संदेश मुझे अभी-अभी Spam में मिला है।)
Deleteएक अच्छी फ़िल्म की बहुत अच्छी समीक्षा
ReplyDeleteजी ! .. सादर नमन संग हार्दिक आभार आपका ...
Deleteअच्छी समीक्षा, पर इतनी जगह इनवर्टेड कॉमा का इस्तेमाल क्यों किया है?
ReplyDeleteजी ! .. सादर नमन संग हार्दिक आभार आपका .. जी ! .. ये Inverted Commas नहीं, बल्कि Single Quotes का प्रयोग किया गया है।
ReplyDeleteदरअसल .. वरिष्ठ व प्रबुद्ध चिट्ठाकारों से ही सीख मिली है, कि हिंदी भाषा के आलेखों में बोलचाल वाले अंग्रेज़ी शब्द लिखने की मज़बूरी हो तो उसे Single Quotes से घेर कर ही लिखना चाहिए .. शायद ...
इसी कारणवश प्रयोग किया गया है। यदि कोई असुविधा हुई हो तो इस के लिए खेद है।