"पंचम वेद ..." के बाद अपने कथनानुसार आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !" :-
ख़ैर .. अभी तथाकथित मसाला फ़िल्मों को पसन्द करने या देखने वालों की भीड़ को नज़रंदाज़ करते हुए उन गंभीर फ़िल्मों के दर्शकों की नज़रों से फ़िलहाल .. 17 दिसम्बर 2003 को प्रदर्शित हुई मात्र एक घंटा और तैंतीस मिनट की फ़िल्म- "मातृभूमि : अ नेशन विदाउट वुमन" देखी जाए, जो आज भी यूट्यूब पर सहज ही उपलब्ध है।
यूँ तो इसका कथानक बानगी के तौर पर आगामी 2050 में बिहार के एक संभावित पिछड़े गाँव की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ नवजात लड़कियों को एक सामाजिक परम्परा के अंतर्गत सार्वजनिक तौर पर दूध से भरे बर्तन में डुबो कर मार दिया जाता है।
वैसे तो इसका कथानक समस्त भारत या विश्व के उन हिस्सों का प्रतिनिधित्व करता हुआ माना जा सकता है ; जहाँ लड़कियों को जन्म से पहले ही जननी की कोख में या फिर जन्म लेने के बाद भी ऐन केन प्रकारेण मार दिया जाता है।
उस पिछड़े गाँव में नवजात बेटी की निर्मम हत्या कर देने का यही सिलसिला दशकों अनवरत चलता रहता है .. इस आशा और अवधारणा के साथ कि .. अगली संतान बेटा होगा और उसी बेटे के हाथों से मिली मुखाग्नि से पिता को मरणोपरांत तथाकथित मोक्ष की प्राप्ति होगी या उसके भावी वंशावली की वृद्धि होगी।
परिणामस्वरूप कुछ दशकों के पश्चात लिंगानुपात असंतुलित होने से वहाँ की लड़कियों या महिलाओं की जनसंख्या शून्यता की ओर अग्रसर हो जाती है। फलस्वरूप घटती लड़कियों या महिलाओं की संख्या के कारण उस समाज में नौबत आती है .. अन्य स्थानों की ग़रीब लड़कियों को ख़रीद कर शादी करने की। जो बाद में अन्य (कु)प्रथाओं की तरह ही अंधानुकरण के लिए एक कंटीली प्रथा का रूप ले लेती है। जिसे मानवी तस्करी का ही एक रूप माना जा सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में उन लड़कियों के मन और मान दोनों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। वातानुकूलित सभागारों में हम चाहे लाख भाषण दे लें महिला सशक्तिकरण पर .. उसकी परिचर्चा कर लें। परन्तु लगभग डेढ़ घंटे की इस फ़िल्म का एक-एक दृश्य हमारे देश-समाज के कई हिस्सों का कटु प्रतिबिंब है। जो हर वर्ष प्रतीकात्मक रूप से रावण के पुतले को जलाए जाने पर भी समाज में व्यभिचारियों की कोई भी कमी नहीं होने की तरह ही .. 8 मार्च को 'सो कॉल्ड एलीट' समाज के बीच उसी 'एलीट' समाज के लिए मनाए जाने वाले "अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस" का पोल खोलता है।
अब केले के छिलके या किसी 'चॉकलेट' के 'रैपर' जैसे हर किसी भी फ़िल्म के उस उबाऊ हिस्से की बात करते हैं, जिससे प्रायः 99.9% दर्शकों को कोई लेना-देना नहीं होता है। जिसे पुरानी फ़िल्मों में फ़िल्म शुरू होते ही पर्दे पर दिखाए जाते थे और वर्तमान में फ़िल्म खत्म होने के समय। यानी पर्दे के पीछे और सामने जिन लोगों ने अपने संयमित और कठोर परिश्रम के योगदान दिए होते है .. उन्हीं लोगों के नाम की सूची।
इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक मनीष झा हैं। निर्माता हैं पैट्रिक सोबलमैन और पंकज खरबंदा। छायाकार हैं वेणु गोपाल और संपादन किया है अश्मित कुंदर और शिरीष कुंदर ने।संगीतकार हैं सलीम-सुलेमान की जोड़ी। अभिनेतागण हैं- सुधीर पांडे, पीयूष मिश्रा, आदित्य श्रीवास्तव, रोहिताश्व गौड़, पंकज झा, सुशांत सिंह, दीपक बंधु, राजेश जैश, संजय कुमार, मुकेश भट्ट, विनम्र पंचारिया, श्रीवास नायडू, चित्तरंजन गिरी और एकमात्र अभिनेत्री ट्यूलिप जोशी है।
यह फ़िल्म सिनेमा घरों में औसत दर्शकों के बीच अपना जादू भले ही ना बिखेर पाई हो, परन्तु इसे 2003 में ही वेनिस फ़िल्म समारोह जैसे कई फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया था, जहाँ इस को बेहद सराहा गया था। बाद में "फिपेसकी पुरस्कार" से इसे सम्मानित भी किया गया था।
प्रसंगवश .. "फिपेसकी" (FIPRESCI = Fédération Internationale de la Presse Cinématographique, Munich, Germany = International Federation of Film Critics) पुरस्कार मुख्य रूप से कान्स, वेनिस और टोरंटो जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समीक्षक महासंघ (International Federation of Film Critics) द्वारा उत्कृष्ट फिल्मों को दिया जाने वाला एक प्रतिष्ठित सम्मान है। यह पुरस्कार किसी को व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि किसी फिल्म की सम्पूर्ण कलात्मक और रचनात्मक विशिष्टता के संदर्भ में प्रदान किया जाता है।
इस फ़िल्म के तीन दृश्यों में तो विशेष तौर से .. किसी भी संवेदनशील ही नहीं, असंवेदनशील इंसान का भी कलेजा मुँह को आ जाएगा।
(१) फ़िल्म के आरम्भ में जब एक पिता अगली बार तथाकथित ऊपर वाले से बेटा पैदा होने की गुहार लगाता हुआ अपनी नवजात बालिका शिशु को दूध भरे एक बर्त्तन में डुबो कर सार्वजानिक रूप से मार डालता है।
(२) फ़िल्म के मध्य में जब अपने पाँच बेटों के लिए एक अमीर पिता- रामचरण पाँच लाख में कल्कि नामक एक लड़की को उसके पिता से वस्तुतः खरीदते हैं और शादी का जामा पहना कर घर लाते हैं।
फिर पाँचों भाई अपने-अपने लिए कल्कि के साथ रात बिताने के लिए सप्ताह की सात रातों में से पाँच रातें आपस में बाँट लेते हैं। तदोपरान्त सप्ताह के शेष बची दो रातों के लिए उन पाँचों भाइयों के पिता यानी कल्कि के ससुर ही स्वयं अपने लिए माँग कर शेष बची दो रातों के सदुपयोग (?) की उधेड़बुन को खत्म कर देते हैं।
मतलब .. एक ख़रीदी गई लड़की- कल्कि के साथ पिता बनाम ससुर और उनके पाँचों पुत्र सप्ताह के सातों दिन हर रात सिलसिलेवार बीता कर .. कल्कि के पिता को दिया हुआ अपना पाँच लाख रुपया वसूल करते हैं।
(३) अंत में जब गाँव भर के लोग अंतर्जातीय झगड़े में बदला लेने के लिए गौशाला में गायों के बीच गायों की तरह या उनसे भी बुरी दशा में सिकड़ी से बंधी धूलधूसरित निस्तेज कल्कि के साथ कई रात सामूहिक बलात्कार करते हैं।
वहाँ गायों के मूत्र का छींटा उसके मुँह-बदन पर पड़ता रहता है। परन्तु अधमरी-सी कल्कि लाचार .. विवश .. अचेत लेटी रहती है। पर .. फ़िल्म का अंत .. एक छोटी-सी आशा के साथ होता है। लेकिन कैसे ?
ये और .. और भी बहुत कुछ जानने के लिए .. अगर आपको गम्भीर फ़िल्में देखनी पसन्द हो, तो .. समय मिलने पर .. यूट्यूब पर इसे एक बार अवश्य देखिए .. "मातृभूमि : अ नेशन विदाउट वुमन" .. मात्र एक घंटा और तैंतीस मिनट .. आपकी आत्मा काँप जाएगी .. शायद ...
आपने ये 'पॉपुलर डायलॉग' तो सुना ही होगा कि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। ", तो .. शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !" के साथ .. बस यूँ ही ...
( फ़िल्म का 'यूट्यूब लिंक' नीचे है 👇)
(Link of Film 👆).

















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