Saturday, June 6, 2026

पंचम वेद ... (६)_क, ख, ग से BPL कार्ड तक ... !

"पंचम वेद ...", " पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !",  "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !",  "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !",  "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !"  और   "पंचम वेद ... (५)_सोलह सोमवार का व्रत"  के बाद आज उसकी अगली कड़ी ..  "पंचम वेद ... (६)_क, ख, ग से BPL कार्ड तक ... !" .. आप सभी के सामने  :-क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...

अनुभवी व ज्ञानी लोगों का मानना है, कि कला की किसी भी विधा की रचना .. कलाकार की दक्षता एवं एकाग्रता पर निर्भर करती है, परन्तु उसका निखरना निर्भर करता है उस कलाकार की अवलोकन क्षमता पर और विराट कल्पनाशीलता पर .. वो भी मन की आँखों से। भले ही वह हमारे रसोई घर में पकने वाली पाक कला ही क्यों ना हो .. नहीं क्या ?

यही अवलोकन क्षमता व कल्पनाशीलता-क्षमता हमलोगों में से किसी को सूरदास तो .. किसी को जॉन एलिया बना देती है। ऐसी ही अवलोकन क्षमता के धनी एक युवा ने बिना बम्बईया तामझाम के कुछ स्थानीय कलाकारों के साथ मिलकर एक ज़मीन से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर की फ़िल्म की रचना कर डाली है। वो भी झारखंड के धनबाद जिला जैसी जगह की पृष्ठभूमि में रहकर।


कभी चौक-चौराहों पर अपने समाज-देश की बुराइयों को आईना दिखलाने वाले लौंडा नाच दिखला कर भिखारी ठाकुर जी ने और नुक्कड़ नाटक दिखला कर सफ़दर हाशमी जी ने आमजन को समाज में आमूलचूल ज़मीनी परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करने की जो शुरुआत की थी, उसी का एक आधुनिक स्वरूप दिखलाने वाली लगभग एक घंटा छियालिस मिनट की इस फ़िल्म को हम सभी को देखनी चाहिए। विशेष कर युवा वर्ग को, जिसे आज हम Gen Z या Gen G बोलते हैं।


इस फ़िल्म को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में काफी प्रशंसा मिल रही है। इस फिल्म ने बर्लिन में इंडो-जर्मन 'फिल्म वीक' में 'बेस्ट सोशल इम्पैक्ट मूवी' और 'बेस्ट डेब्यू फिल्म' का पुरस्कार जीता है और इस फ़िल्म की अभिनेत्री मौलश्री सिंह ने इसमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान भी प्राप्त किया है। इस फ़िल्म ने लंदन में यूके-एशियन 'फ़िल्म फेस्ट' में भी प्रशंसा बटोरी है। इसके अलावा कोलकाता और जर्मनी के 'फ़िल्म फेस्टिवल' में भी ये फ़िल्म शामिल हो चुकी है। इसे कई सारे 'अवार्ड' भी मिले हैं। विश्व का सबसे प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध वार्षिक फिल्म समारोह, जो हर वर्ष फ्रांस के कान्स शहर में कान्स फ़िल्म महोत्सव (Cannes Film Festival) के नाम से आयोजित किया जाता है। वहाँ भी इस वर्ष हाल ही में यह फ़िल्म और इसके मुख्य कलाकार शामिल हुए हैं।

तन्मय शेखर (तन्मय)

इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक तन्मय शेखर के अनुसार लगभग तीन साल पहले इस फ़िल्म की 'शूटिंग' में केवल एक महीना लगा था, परन्तु 'पोस्ट-प्रोडक्शन' और 'प्रमोशन' के साथ-साथ 'सेंसर सर्टिफिकेट' लेने में भी तीन साल का समय लग गया। इसकी पूरी 'शूटिंग' धनबाद में ही की गई थी। पूरी फिल्म की 'शूटिंग' आईआईटी-आईएसएम 'कैंपस' में और वहाँ से आठ किलोमीटर दूर बगुला बस्ती जैसी मलिन बस्ती के साथ-साथ बिग बाज़ार रोड जैसे वास्तविक स्थानों पर 'शूट' किए गए हैं।

आईआईटी-आईएसएम, धनबाद (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी-इंडियन स्कूल ऑफ माइंस) मूल रूप से 1926 में एक प्रमुख खनन संस्थान के रूप में स्थापित आईएसएम (इंडियन स्कूल ऑफ माइंस) है, जो 2016 से पूर्ण रूप से आईआईटी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) बन गया है। यह संस्थान अपने खनन और भूविज्ञान सम्बन्धित इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए विश्व स्तरीय संस्थान के रूप में एक प्रसिद्ध नाम है । 

मौलश्री सिंह (मौलश्री)

इस फ़िल्म में मौलश्री सिंह, निर्मला हाजरा, शिवांग राजपाल और दानिश हुसैन के साथ-साथ आईआईटी-आईएसएम के छात्रों व स्थानीय कलाकारों ने भी अभिनय किया है।

इस फ़िल्म का लेखक-निर्देशक तन्मय शेखर आईआईटी कानपुर से 2011 का 'पास आउट' है। वह इससे पहले भी चार-पाँच 'शॉर्ट फिल्में' बना चुका है। अभिनेत्री मौलश्री सिंह की शुरुआती स्कूली शिक्षा सोफिया गर्ल्स स्कूल, कोटा से हुई है और दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में बी ए ऑनर्स की पढ़ाई की है। वर्तमान में चार-पाँच वर्ष से मुम्बई में रहकर अब तक चार-पाँच 'शॉर्ट' फिल्में कर चुकी है, पर यह उसकी पहली 'फीचर फ़िल्म' है। अभिनेता शिवांग राजपाल मूल रूप से मध्यप्रदेश के रीवा से है, जो वर्तमान में मुम्बई में रहता है। अब तक फ़िल्म का नाम तो जान ही गए होंगे।

यह "नुक्कड़ नाटक" फ़िल्म नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने वाले कलाकारों के संघर्ष को दर्शाती है। इस फ़िल्म के किस्से में .. आईआईटी में पढ़ते समय दो 'स्टूडेंट्स' को संस्थान से निकाल दिया जाता है। इसके बाद वो दोनों प्रबंधन के पास जाकर उनसे उन दोनों को निकालने के बदले कोई दूसरी सजा की माँग करते हैं। तभी उन्हें कुछ पिछड़ी बस्ती के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए उनके स्कूल में 'एडमिशन' करवाने की सजा मिलती है। दूसरी तरफ़ इसमें इंजीनियरिंग के छात्रों के जीवन और उनके भटकाव के इर्द-गिर्द घूमती हुई युवावस्था की दिल को छू लेने वाली कहानी है। इसमें 'गे' (Gay) जैसे वास्तविक व प्रामाणिक विषय को दृश्यों व संवादों के माध्यम से मुखर होकर उठाया गया है, जो भले ही हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी मुखौटाधारी समाज के लिए एक दमित व घिनौना विषय हो। 


हमलोगों के समक्ष एक और प्रश्नचिन्ह छोड़ती है ये फ़िल्म, विशेष तौर पर युवाओं के समक्ष, कि हम इंजीनियरिंग जैसी उच्च शिक्षा के बाद मोटी रकम वाली तनख्वाह के साथ विदेशों में पलायन कर जायें या देश में ही एक भौतिक विलासी जीवन गुज़ार दें या फिर हमारे समाज में आर्थिक या अन्य किसी भी कारणवश जो शैक्षणिक दृष्टिकोण से एक अन्तर है, उसे मिलकर दूर करें ?

दरअसल वास्तविक रूप से ये सवाल पहली दफ़ा इस फ़िल्म के लेखक-निर्देशक आईआईटीयन तन्मय शेखर के मन में पनपा था। तन्मय शेखर के पिता राजीव शेखर भी आईआईटीयन हैं। जो कभी आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त थे और उसके बाद  आईआईटी-आईएसएम धनबाद में।


तन्मय जब फ़िल्म के पहले एक साल दिवाली के समय धनबाद अपने माता-पिता के पास छुट्टी बिताने आया था, तभी अपनी माँ के साथ आईआईटी-आईएसएम धनबाद से लगभग आठ किलोमीटर दूर बगुला बस्ती गया, जहाँ उसकी माँ एक साल से एक स्कूल में पढ़ा रहीं थीं। महज़ आठ किलोमीटर की दूरी पर भयावह शैक्षणिक अन्तर ने झकझोर कर रख दिया। एक तरफ़ आईआईटी-आईएसएम, जहाँ विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा और दूसरी तरफ़ एक ऐसी बस्ती जहाँ बच्चे पढ़ने की जगह काम और भिक्षावृत्ति कर रहे थे। कुछ सप्ताह उस बस्ती में बिताने और स्थानीय लोगों से दोस्ती करने के बाद तन्मय के दिलोदिमाग में फ़िल्म की 'आइडिया' और 'स्क्रिप्ट' ने जन्म लिया।

वैसे तो फ़िल्म निर्माण के लिए पैसे जुटाना और फ़िल्म को दर्शकों तक पहुँचाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। किसी तरह फिल्म बनाने के बाद भी वह केवल 'हार्ड ड्राइव' में पड़ी रह जाती है। भारत में हर वर्ष अनुमानतः हजार से ज़्यादा स्वतंत्र फिल्में बनती हैं, परन्तु उनमें से नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा फ़िल्में दर्शकों तक नहीं पहुँच पाती हैं। पर इन सारी चुनौतियों को तन्मय की 'टीम' ने स्वीकार करते हुए अन्ततः विजय हासिल की है। 

जबकि इस फिल्म में 'म्यूजिक डायरेक्टर' से लेकर 'पोस्ट-प्रोडक्शन' से जुड़े सभी लोगों का बॉलीवुड से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस फ़िल्म को बनाने में करोड़ों लगा है। जो मेधा खन्ना और मौलश्री सिंह के अलावा अधिकांश धनराशि के लिए लेखक-निर्देशक तन्मय शेखर और उसके आईआईटीयन दोस्तों सहित लगभग तीस लोगों ने 'ऑनलाइन पेमेंट' करके सहयोग किया था। इस फ़िल्म के प्रचार के लिए लगभग पैंतालीस दिनों के प्रचार-संबंधी अभियान के तहत पूरी 'टीम' अहमदाबाद, वडोदरा, इंदौर, भोपाल, कोटा, जयपुर, दिल्ली, चंडीगढ़, नागपुर, पुणे, धनबाद और कोलकाता जैसे शहरों में गयी थी। यह फ़िल्म 27 फरवरी 2026 को सिनेमाघरों में 'रिलीज' हुई थी। परन्तु अब तो यह Netflix पर सहज ही उपलब्ध है।


दिल्ली में प्रचार-अभियान
तन्मय के अनुसार उसके माता-पिता को फ़िल्में देखने का शौक़ है। तो बचपन से ही उस को भी सिनेमाघर ले जाते रहे हैं। मज़ाकिया अंदाज़ में उसके अनुसार वह पहली बार घर के बाहर शौचालय का इस्तेमाल सिनेमाघर में ही किया था।

बाद में आईआईटी कानपुर से स्नातक कर के न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में अपनी पहली नौकरी करने के दौरान ही उसे फ़िल्मी कीड़ा परेशान करने लगा और उसे एहसास हुआ कि फ़िल्म निर्माण एक ऐसा क्षेत्र है जिसे कोई भी अपना सकता है। यह कोई आनुवंशिक गुण नहीं है। यह केवल फ़िल्मी परिवारों तक ही सीमित नहीं है। कोई भी कलम और कैमरा उठाकर इसे कर सकता है। उसी प्रेरणादायक क्षण में उसने अपनी नौकरी छोड़ कर भारत वापस आ गया था। भारत के संवेदनशील व प्रबुद्ध दर्शकों को "नुक्कड़ नाटक" जैसी विश्वस्तरीय फ़िल्म जो मिलनी थी।


निर्मला हाजरा (छोटी)

"नुक्कड़ नाटक" फ़िल्म की नायिका मौलश्री धनबाद की मलिन बस्ती- बगुला बस्ती की छोटी नाम की एक बच्ची को पढ़ाने का बीड़ा उठाती है और उसे शिक्षित करने के लिए संघर्ष करती है। उसे क, ख, ग, घ जैसे वर्णमाला से परिचित करके इतना शिक्षित कर देती है, कि छोटी भिक्षावृत्ति छोड़कर अपने अनपढ़, गरीब और नशे में लिप्त पिता वाले परिवार के लिए 'फॉर्म' भर कर 'बीपीएल कार्ड' (BPL Card) बनवा पाने में सक्षम हो जाती है।


पुनः उसी 'डायलॉग' .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। ", के आधार पर .. शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (७)_ पिरामिड ... !" के साथ .. बस यूँ ही ...

Sunday, May 31, 2026

तुम भी झूठे हो ! ...


हमारे मानव जीवन में कई-कई बार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से न्यूटन के गति का तीसरा नियम ग़लत साबित होता ही रहता है .. शायद ... 
मसलन - एक तरफ़ .. एक इंसान, जो अपनी कई गंभीर बीमारियों के साथ-साथ मनोभ्रंश (डिमेंशिया = Dementia) से जूझने के कारण अपनी याददाश्त खो देता है और धीरे-धीरे लोगों को पहचानने में असमर्थ हो जाता है। वहीं .. दूसरी तरफ़ .. दुनिया भर के आम व ख़ास सभी लोग उन्हें अब भी याद करते हैं .. पहचानते हैं .. बशीर बद्र या डॉ बशीर बद्र के नाम से। जिनके शैक्षणिक प्रमाण पत्र में बेशक़ सैयद मुहम्मद बशीर नाम लिखा हुआ है। जिन्हें पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसा सम्मान प्रदान किया गया है।

न्यूटन के गति का तीसरा नियम ग़लत साबित होने का एक अन्य उदाहरण .. एक तरफ़ .. जिन मशहूर शायर के मुशायरों में हज़ारों की तादाद में लोग शरीक हुआ करते थे। जिनके शेरों और नज़्मों को सुनकर लाखों लोगों के मुँह से वाहवाही निकला करती थी या यूँ कहें कि आज भी निकला करती हैं, वहीं .. दूसरी तरफ़ .. उपलब्ध समाचारों के अनुसार .. उन्हीं के जनाज़े और सुपुर्द-ए-ख़ाक में उनके परिवार के सदस्य, कुछ क़रीबी रिश्तेदारों, भोपाल के स्थानीय साहित्यकारों और पत्रकारों सहित बमुश्किल केवल लगभग बीस से तीस लोग ही शामिल हो पाए थे।


उनके जनाज़े में उनके छोटे बेटे तैयब बद्र नज़र आए, जो प्रायः आधुनिक 'सोशल मीडिया' के कई 'प्लेटफॉर्म्स' पर बशीर बद्र जी के बारे में, विशेष तौर पर नयी पीढिय़ों को, जानकारी उपलब्ध कराते रहते हैं। 


उनके बड़े बेटे नुसरत बद्र का जनाज़े में शामिल ना होना कोई अचरज वाली बात नहीं थी, क्योंकि उनका इंतिक़ाल लगभग छः वर्ष पहले ही हो चुका है। 

उनके बड़े बेटे नुसरत बद्र एक प्रसिद्ध गीतकार थे, जिन्होंने सौ से ज़्यादा फिल्मों में लगभग आठ सौ से ज़्यादा गाने लिखे थे। शाहरुख़ खान वाली देवदास फ़िल्म के गीत- "मन डोला रे, डोला" के लिए वर्ष 2002 के सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार हेतु उन्हें नामांकित किया गया था। 

वर्ष 2003 में लोकप्रिय गायक अभिजीत भट्टाचार्य के "तेरे बिना" नामक एक बहुत ही मशहूर 'म्यूजिक एल्बम' के कुल आठ गाने नुसरत बद्र ने ही लिखे थे। जिन आठ गीतों में "कभी यादों में आऊँ ~~~" और "चलने लगी हैं हवाएँ ~~~" लोगों के बीच अत्यधिक कर्णप्रिय और लोकप्रिय हैं।




दरअसल .. प्राप्त जानकारियों के अनुसार .. नुसरत बद्र .. बशीर बद्र जी की पहली पत्नी क़मर जहाँ की दो संतानों में से एक थे और दूसरी संतान थीं नुसरत बद्र की बहन .. सबा वाहिद।



अपनी पहली पत्नी क़मर जहाँ की मृत्यु के बाद इनके जीवन में आशा की एक नयी किरण बन कर आईं थीं भोपाल की डॉ. राहत सुल्ताना जो बाद में उनसे निकाह करके डॉ. राहत बद्र बन गयीं। वह स्वयं भी प्रख्यात लेखिका हैं, जिनकी उर्दू साहित्य में कई उल्लेखनीय रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।




उनकी उन्हीं दूसरी पत्नी डॉ. राहत बद्र का बेटा है तैयब बद्र, जो जनाज़े में शामिल दिखा था। बशीर बद्र जी मेरठ के सांप्रदायिक दंगे में अन्य सम्प्रदाय के लोगों द्वारा अपने घर के साथ-साथ अपनी तमाम अप्रकाशित रचनाओं की पांडुलिपियाँ जल जाने के बाद वहाँ से अपनी दूसरी पत्नी डॉ. राहत बद्र के साहित्यिक माहौल वाले भोपाल में स्थायी रूप से पलायन कर गए थे, जहाँ इनकी मृत्यु भी हाल ही में इसी 28 मई को हुई है। 

इस प्रकार "नये मौसमों का पता" तलाशने वाले मुसाफ़िर अपने घर का पता मेरठ से भोपाल बदलते-बदलते एक अंजान पता की ओर प्रस्थान कर गए और .. छोड़ गए अपनी संवेदनशील रचनाओं की अनगिनत अनमोल थाती .. शायद ...



गत तीन-चार दिनों से सोशल मीडिया पर उनको शाब्दिक श्रद्धांजलि देने वाले कई प्रख्यात लोगों में से एक .. गीतकार

और लेखक प्रसून जोशी ने कहा, कि बशीर बद्र ने आम ज़िन्दगी को जिस ख़ूबसूरती से शायरी में पिरोया, वह केवल वही कर सकते थे। उनके शेर इतने लोकप्रिय थे, कि ट्रकों के पीछे भी लिखे दिखाई देते थे। ऐसा बहुत कम लोगों के साथ होता है। प्रसून जोशी ने बशीर बद्र की याद में एक भावुक कविता भी सुनाई है, जिसकी सबसे ख़ास पंक्तियाँ हैं - 


“सुने तू बैठ कर मुझको, नहीं ऐसी तमन्ना है। 

  मैं हूँ ट्रक पर लिखा एक शेर, तू मुझको गुज़रने दे।” 


चलते-चलते .. बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल जगजीत सिंह जी की आवाज़ में सुनते हैं, मानों वह हम सभी से बोल रहे हों,  कि - 

" मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो, मेरी तरह तुम भी झूठे हो ! " 

.. बस यूँ ही ...



( सभी चित्र व वीडियो क्रमशः गूगल व यूट्यूब के सौजन्य से.)🙏


Tuesday, May 12, 2026

बतकही की खिचड़ी ...

आज परोसी गयी हमारी बतकही की खिचड़ी कितनी सुपाच्य है .. ये तो खिचड़ी के साथ-साथ आपकी पाचन शक्ति पर भी निर्भर करेगा। जिसका संज्ञान आपके द्वारा खिचड़ी ग्रहण करने के पश्चात ही हो पाएगा। 

आज की बतकही की खिचड़ी के तौर पर चार लघुकथाओं या यूँ कहें कि घटनाक्रमों का हम-आप मिलकर अवलोकन करते हैं, जो वार्तालाप शैली में हैं। शायद आप भी निम्न चार घटनाक्रमों में से किसी एक-दो या चारों से कभी-ना-कभी रूबरू हुए हों या .. नहीं भी हो सकते हैं। सम्भव हो तो आप अपने अनुभव के आधार पर .. "हाँ" या "ना" बतलाइएगा .. बस यूँ ही ...


घटनाक्रम -१ :-


" भैया ! .. आप अख़बार लेते हैं ना ? "

" हाँ.. काहे (क्यों) ? "

" कौन सा अख़बार लेते हैं ? "

" हम तो अंग्रेजी वाला 'द हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ते हैं और भाभी के लिए दैनिक जागरण लेते हैं। .. कोई बात है का (क्या) ?

" ना .. कौनो (कौन) ख़ास नहीं .. बस .. आज फिर "दैनिक जागरण" के "सप्तरंग" वाले पन्ने में मेरी एगो (एक) कविता छपी है .. वही बतलाने के लिए पूछ रहे थे। "

" उ (वह) हिंदी वाला अख़बार तो वही (उनकी पत्नी / भाभी) देखती है। .. वइसे (वैसे) .. "दैनिक जागरण" के .. 'प्रेस' में तुम्हारा कोई जान-पहचान वाला है का (क्या) जी ? "


{संदेश - लोग आपको और आपकी कला की प्रतिभा को कम आँकते हैं या फिर आपको भी अपनी ही तरह जान-पहचान या पैरवी या फिर चापलूसी की सहायता से जुगाड़ करने वाला जुगाड़ू समझते हैं।}.


घटनाक्रम - २ :-


" मामा ! .. आप 'ऑफिस' से कै (कितने) बजे लौटते हैं ? "

" जाने का तो 'फिक्स है, पर .. आने का नहीं .. "

" फिर भी .. रात में कितने बजे तक सो जाते हैं ? "

" दस-ग्यारह तो बज ही जाता है। .. काहे (क्यों) कोई काम था क्या ? "

" ना-ना .. बस .. आज रात में दस बजे 'रेडियो' पर कविता वाला हमरा (हमारा) एगो (एक) 'प्रोग्राम' आएगा। .. उसी के लिए पूछ रहे थे (हैं)। "

" अब .. आजकल 'रेडियो' कौन सुनता है जी ! .. अब कोई 'रेडियो' रखता भी तो नहीं है .. "

" नहीं मामा जी .. ऊ (वो) तो अब आपके 'स्मार्ट मोबाइल' में ही एक 'लिंक' से ही 'रेडियो' बजने लगता है। हम आपको 'लिंक' 'व्हाट्सएप' कर देते हैं। "

" ठीक है भेजना .. देखते हैं .. इ (ये) सब करने में कुछो (कुछ रुपया) .. मिलता भी है का (क्या) ? "


{संदेश - लोगों की दिलचस्पी आपकी कला, प्रतिभा या रुचि में कम होती है। साथ ही लोग दुनिया के हर पहलू को पैसे से ही तौलने के क्रम में कला को भी पैसे के आधार पर ही आँकने के आदी होते हैं।}.


घटनाक्रम - ३ :-


" ए चच्चा (चाचा) ! .. आप फिलिम-उलिम (फ़िल्म) देखते हैं ? "

" ना .. काहे  (क्यों) .. कौनो (कौन) बात है का (क्या) ? "

" ना चच्चा .. बात का रहेगा चच्चा .. कल्हे (कल) जे (जो) एगो (एक) फिलिमवा (फ़िल्म) 'रिलीज' हुआ (हुई) है ना .. "

" हमरा (हमको) का (क्या) पता जी ? "

" हाँ .. हुआ है ना ! .. ओकर (उसका) नाम है- 'जूली वेड्स जॉनी' "

" हाँ .. तअ (तो) ? .. लगता है कि .. पोस्टरवा (पोस्टर) तो देखे हैं कहीं पर सटल (सटा हुआ) .. "

" तअ (तो) ओकरा (उस) में हमरा (हमारा) भी एक ठो (एक) 'रोल' (रॉल) है चच्चा। "

" मने (मतलब) ? "

" उसमें हम भी काम किए हैं। "

" ओ ! .. इ (ये) सब नाटक-नौटंकी आ (और) फिलिम-उलिम (फ़िल्म) जो करते हो .. ओकरा (उसको) करे (करने) में .. पाईयो (पारिश्रमिक के तौर पर पैसा) भेंटाता (मिलता) है का (क्या) ? .. केतना (कितना) पाई (पैसा) भेंटाता (मिलता) है ? "


{संदेश - लोग आपकी रुचि या अभिरुचि से मिली कलात्मक उपलब्धियों को कम और .. उसके बदले मिलने वाली पारिश्रमिक को ज़्यादा महत्व देते हैं। उन उपलब्धियों का भी पैसे के आधार पर ही मूल्यांकन करते हैं।}.


घटनाक्रम - ४:-


" 'अंकल' .. 'गुड मॉर्निंग' .. "

" 'मॉर्निंग-मॉर्निंग' .. और सब .. ठीक है ना ? और .. क्या चल रहा है आजकल ? "

" बस .. 'कम्पीटीशन' की तैयारी चल रही है। "

" अब तो 'एज' भी हो रहा है जी तुम्हारा तो .. ध्यान दो। "

" जी .. वो तो दे ही रहे हैं 'अंकल' .. बस .. हर बार .. दो-चार 'नम्बर' से चूक जाते हैं। वैसे आप .. "एमेजॉन-किंडर" के बारे में जानते हैं ? "

" "एमेजॉन-किंडर" ? .. ना जी .. इसका तो नाम ही पहली बार सुन रहे हैं तुम्हारे मुँह से। "

" ये एक 'एप्प' है 'अंकल' .. उसी 'एप्प' पर मेरी एक 'ई-बुक नोवेल' 'पब्लिश' हुई है। आप भी एक बार देखिएगा ना .. "

" अब ये 'ई-बुक' कौन सी बला है ? "

" 'अंकल' वो .. किताबों के 'डिजिटल' संस्करण को 'ई-बुक' कहते हैं। "

" ओ~~~ .. अच्छा ! .. जैसे .. तुम लोगों की 'जेनेरेशन' बिना कल-पुर्जे के इस्तेमाल किए हुए ही 'इंजीनियर' बन जाता है। है ना ? "

" मतलब ? "

" अरे .. वही .. जिसको तुमलोग 'सॉफ्टवेयर इंजीनियर' बोलते हो। " - कुछ-कुछ व्यंग्यात्मक लहज़े में बोलते-बोलते 'अंकल' की अट्टहास वातावरण को बोझिल कर जाती है।


{संदेश - पुरानी पीढ़ी प्रायः अपने आप को समझदार और अपने बाद की भावी पीढ़ी को मूर्ख व कमतर समझती है। साथ ही .. प्रायः आपके परिवार या आस-पड़ोस के आम लोगों में कलात्मक सृजन करने का तो दूर .. कला अवलोकन करने तक का शऊर अधिकांशतः नहीं होता है।}.


अब अपने अनुभव के आधार पर आप .. "हाँ" या "ना" बतलाना मत भूलिएगा, ताकि ये समझ आए कि उपरोक्त घटनाक्रमों का भुक्तभोगी केवल उपरोक्त चारों पात्र ही हैं या ..  और अन्य भी .. आप सभी में से किसी के साथ भी ऐसा हुआ है या होता है ? .. बस यूँ ही ...

Sunday, May 10, 2026

प्रतिज्ञान : "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" ...



बीते हुए कल .. 9 मई को .. पश्चिम बंगाल में बंगाली पंचांग के अनुसार वैशाख के पच्चीसवें दिन "कविगुरु" रविन्द्र नाथ टैगोर की 165वीं जयंती के शुभ अवसर पर वहाँ की सुसंस्कृत एवं कला से सराबोर तथा हर्षोल्लास जनित आँसू-सिक्त आम जनता के समक्ष वहाँ के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच नयी विजयी सरकार के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के हम सभी साक्षी बने हैं। प्रतीत हो रहा है, कि वर्षों बाद पश्चिम बंगाल की आम जनता किसी मज़हब विशेष की हिंसक एवं क्रूर मानसिकता के दमन के चंगुल से छूट कर सुकून की साँसें ले रही है। 

एक स्वतंत्र देश होने के बावजूद भारत के किसी राज्य में इतनी वीभत्स परिस्थितियों को वर्षों झेलना .. ये कश्मीरी पंडितों के परिवारों की तरह ही वही लोग बेहतर समझ सकते हैं, जिनकी हथेलियाँ गर्म तवे पर पड़ने के बाद उस पर टीस से भरे फफोले पड़े हों। ख़ैर .. समाचार चैनलों के अनुसार पश्चिम बंगाल में एक हिंदू विरोधी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के समापन के साथ ही वहाँ नवीन सत्ता का सूर्योदय हो गया है .. शायद ...


अब .. आज .. 10 मई की बात .. हालांकि हम किसी भी दिवस विशेष के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि एक औपचारिक दिवस की जगह किसी भी दिवस विशेष के सारगर्भित महत्वपूर्ण विषय या उद्देश्य को मन से हमारी दिनचर्या में समाहित करने में विश्वास रखते हैं। फिर भी .. आज 10 मई को समस्त विश्व में "विश्व मातृ दिवस" मनाया जा रहा है। 

उपलब्ध इतिहास के अनुसार पहला आधिकारिक मातृ दिवस समारोह 10 मई, 1908 को संयुक्त राज्य अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया के एक कुशल व कर्मठ कार्यकर्ता एना मारिया जार्विस द्वारा वहाँ के ऐतिहासिक शहर ग्राफ्टन के एंड्रयूज मेथोडिस्ट एपिस्कोपल नामक चर्च में आयोजित किया गया था। 

दरअसल इतिहास की मानें, तो उन दिनों वहाँ गृहयुद्ध का दौर चल रहा था। जिसमें जिन युवा लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, उन सभी की माँ और अपनी कर्मठ समाजसेविका दिवंगत माँ एन रीव्स जारविस के लिए एना मारिया जार्विस ने 1908 के 10 मई को मातृ दिवस समारोह मना कर उन सभी के प्रति श्रद्धा प्रकट की थी। चूंकि एना मारिया जार्विस की माँ एन रीव्स जारविस का देहांत 9 मई 1905 को हुआ था, अतः उनके द्वारा संभवतः मई महीने के ही 10 तारीख को मातृ दिवस समारोह के लिए चुना गया होगा।

1914 में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन द्वारा वर्ष 1908 के 10 मई के दिन पड़ने वाले माह के दूसरे रविवार को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष के मई माह के दूसरे रविवार को ही 'मदर्स डे' के रूप में मनाने की घोषणा के पश्चात विश्व भर में उसी दिन "विश्व मातृ दिवस" (World Mother's Day) के रूप में मनाया जाता है।

यह एक संयोगमात्र ही है, कि वर्ष 1908 में 10 मई को जब "मातृ दिवस" मनाया गया था, तो उस दिन भी वर्तमान वर्ष 2026 की तरह ही मई माह का दूसरा रविवार 10 मई को ही था। परन्तु वह वर्ष अधिवर्ष (Leap Year) था, पर वर्तमान वर्ष 2026 अधिवर्ष नहीं है।


वैसे भी .. माँ का अस्तित्व तो तभी सम्भव है, जब मातृत्व सुरक्षित हो। .. है ना ? इसीलिए सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की प्रबल समर्थक रहीं बा उर्फ़ कस्तूरबा गाँधी के जन्मदिन यानी 11 अप्रैल को वर्ष 2003 से हमारे देश में माँ और मातृत्व की सुरक्षा के सम्मान व प्रतीकात्मक महत्व के रूप में "राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस" मनाने की परम्परा चली आ रही है। 


अब आज की मूल बतकही .. सर्वविदित है कि .. परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है, तो यह .. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हर जगह बहुत ही शिद्दत से लागू भी होता है। इसी नियम के तहत हम सभी हमारे नब्बे के दशक तक .. बीते दिनों वाली अपनों की चिठ्ठियों की सुगन्धों से इतर .. आज 'व्हाट्सएप्प' की रंगीनियों में मशगूल हो चुके हैं। 

ठीक वैसे ही .. परिवर्तन के इस नियम के तहत कागज़ी किताबों के पृष्ठों को उसकी सरसराहट वाली आवाज़ के साथ पलटने की जगह इन दिनों 'डिजिटल' पुस्तकों व पत्रिकाओं को अपने 'मोबाइल' या 'लैपटॉप' व 'डेस्कटॉप' के चमकते 'स्क्रीन' पर बेआवाज़ ही 'स्क्रॉल' करके हम सभी पढ़ रहे हैं। 

हमारे पुरखों का गौरवान्वित प्रमाणिक इतिहास बतलाता है, कि पहले मौखिक वेद-पुराणों की थाती, फिर पत्थरों पर ब्रह्मलीपि, तदोपरान्त ताड़ पत्र पर उकेरी गयी ग्रंथों की पांडुलिपि, फिर कल तक काग़ज़ी किताबें थीं या आज हैं भी, फिर .. वर्तमान में 'डिजिटल' पुस्तकें। आज ये सब हैं और .. हो सकता है, कि कल हम हों या ना हों .. पर भावी पीढ़ी इससे भी इतर कुछ देख पाएगी .. पढ़ पाएगी .. शायद ...

लब्बोलुआब ये है कि हम सभी कंडे की लेखनी से लेकर 'कंप्यूटर' तक की यात्रा के साक्षी रहे हैं।


अब आगे .. आज की बतकही में हमलोग आज ऐसी ही आठ माह की एक नवजात 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" के बारे में जानने का प्रयास करते हैं। जिसके सम्पादक श्री नितेश मोहन वर्मा एवं सह सम्पादक श्री शिव कुमार शर्मा हैं।


"प्रतिज्ञान" का 'वेब साइट लिंक' :- 👇

www.pratigyan.com


गत वर्ष सितम्बर 2025 में इस 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" का पहला अंक अमेज़न (Amazon) के किंडल (Kindle) पर उपलब्ध हुआ था। "किंडल (Kindle)"  अमेज़न द्वारा विकसित एक 'इलेक्ट्रॉनिक ई-रीडर डिवाइस' है, जिस पर उपलब्ध किताबें, पत्रिकाएं इत्यादि हम अपनी सुविधानुसार यथोचित शुल्क 'ऑनलाइन' भुगतान करके पढ़ सकते हैं। 


अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle) का 'लिंक' :-  👇

https://read.amazon.com/kindle-library



गत माह अप्रैल 2026 में इसका आठवाँ अंक आया है। जनवरी 2026 के इसके पाँचवें अंक को छोड़कर .. सितम्बर 2025 के पहले अंक से लेकर अप्रैल 2026 तक के आठवें अंक तक की प्रतियाँ किंडल (Kindle) पर उपलब्ध है। दरअसल "प्रतिज्ञान" के सह सम्पादक श्री शिव कुमार शर्मा के अनुसार इसके जनवरी का पाँचवाँ अंक कागज़ी पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है और हर वर्ष केवल जनवरी माह का अंक ही साल में एक बार कागज़ी पुस्तक के स्वरूप में ही प्रकाशित किया जाएगा।



इसी कागज़ी पुस्तक के स्वरूप वाले पाँचवें अंक- "प्रतिज्ञान वार्षिक संचयन - 2026" की एक प्रति इसके सह सम्पादक- श्री शिव कुमार शर्मा द्वारा मेरे लिए 'स्पीड पोस्ट' करने पर अभी हाल ही में मुझे प्राप्त हुआ है।




आप सभी पाठकों के बीच जो भी रचनाकार हैं, चाहे आप दक्ष व परिपक्व रचनाकार हों या नवोदित(ता) रचनाकार हों, आप सभी अपनी रचनाओं को "प्रतिज्ञान" तक भेजने के लिए निम्नलिखित दोनों 'ईमेल आईडी' पर 'ईमेल' कर सकते हैं।

"प्रतिज्ञान" के दोनों 'ईमेल आईडी' :- 👇

contact@pratigyan.com

hello@pratigyan.com


आपकी स्वरचित व अप्रकाशित रचना "प्रतिज्ञान" के सम्पादन दल द्वारा यदि चयनित की जाएगी, तो इसके आगामी अंकों में सम्भवतः प्रकाशित की जाएगी। संज्ञान रहे कि यहाँ ना तो आपकी रचना को प्रकाशित करने के लिए आप से कोई शुल्क लिया जाता है और ना ही किसी भी प्रकार के पारिश्रमिक का आपको भुगतान भी किया जाता है। यदि आप भी संस्कृत के श्लोक-अंश- "स्वान्तः सुखाय" के शब्दार्थ या भावार्थ में निष्ठापूर्वक विश्वास रखते हैं, तो निजी स्वान्तः सुखाय के लिए वहाँ अपनी रचनाओं को भेज सकते हैं।


"प्रतिज्ञान" का 'इंस्टाग्राम लिंक' :- 👇

https://www.instagram.com/pratigyanprakashan?igsh=YXJpYWoyajQ5Ymdp


हमने भी इनके 'इंस्टाग्राम' से 'ईमेल आईडी' लेकर अपनी एक बतकही (अतुकान्त कविता) 'ईमेल' की थी। जो चयनित होने के पश्चात अप्रैल माह में "प्रतिज्ञान" के अधुनातन आठवें अंक- "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" नामक विशेषांक में विशेषांक के विषय से इतर मेरे द्वारा प्रेषित बतकही छपी है। जिसका शीर्षक है- "खुरचा हुआ चाँद"। 

आज "विश्व मातृ दिवस" के उपलक्ष्य में "प्रतिज्ञान" के उस विशेषांक "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" को पढ़ने के लिए आपको "अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle)" के 'एप' तक जाना चाहिए .. शायद ...




शीघ्र ही "प्रतिज्ञान" द्वारा "अनकही" नामक एक 'डिजिटल' काव्य संग्रह भी प्रकाशित होने वाला है, जिसमें हमारी दो बतकहियों (अतुकान्त कविताओं) के भी प्रकाशित होने की संभावना है .. बस यूँ ही ... 





Friday, May 8, 2026

एहसासों की धूप ...

हमारे जीवन के दो मूल मंत्र सर्वविदित हैं, कि .. (१) परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है .. और (२) जीवन में जो भी घटित होता है, हमारी भावी अच्छाई के लिए ही होता है। मैं तो मेरे जीवन में इन दोनों ही मूल मंत्रों को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।

अब यदि इस परिवर्तनशील दुनिया एवं जीवन में हर दिन, हर पल खुशियों से भरा होना असम्भव है ; तो हमारे जीवनकाल में भी कष्टकारी क्षणों को कभी-ना-कभी आना तय है। ऐसे में मेरा मानना होता है, कि प्रकृति ने शायद उन कष्टकारी क्षणों में भी हमारी कोई भावी भलाई तय कर रखी होगी। इस तरह .. इस सोच से कुछ हो या ना हो, पर मन में सकारात्मकता कूट-कूट कर भरी रहती है।


हमारे दुःख-कष्ट भरे दिनों में भले ही हमें क्षणिक मानसिक, शारीरिक या आर्थिक उलझनों से गुजरना पड़े भी तो .. वो सारे के सारे क्षण हमें एक अनमोल पाठ अवश्य पढ़ा कर जाते हैं, कि हमारे आसपास के सगों की भीड़ में भी सच्चीमुच्ची कौन अपना व कौन पराया है या औपचारिक रिश्तों की भीड़ में भी एक-दो कौन सगा-सा है। 


इस तरह हम अपने अच्छे दिनों में जिन रिश्तों को अपने मन से लगाए बैठे होते हैं, वही रिश्ते बुरे दिनों में केवल औपचारिकता की खानापूर्ति भर निकलते हैं। ऐसे में उन औपचारिक रिश्तों की छद्म अपनापन की पोल की धज्जी उड़ जाती है और औपचारिक रिश्तों के मकड़जाल से हमें छुटकारा मिल पाता है।


हमारे बुरे वक्त ही हमारे सम्बन्धों के 'लिटमस पेपर' होते हैं, जो सामने वाले की औपचारिक सहानुभूति के छलावे और सच्ची समानुभूति की सहायता व आत्मीयता वाले अन्तरों को पारदर्शी बना देते हैं .. शायद ...


आपको आपके अब तक के जीवनकाल में कभी उपरोक्त अनुभूति हुई है क्या ? मुझे तो अपने जीवनकाल में ऐसा मुख्यतः दो बार अनुभव हुआ है। एक बार जब 2021 के कोरोनाकाल में लगभग ढाई माह तक स्वयं-पृथकवास (Self-Isolation) में रहकर मौत का निवाला बनते-बनते रह गया था। दूसरी बार गत दिसम्बर माह 2025 में एक भीषण दुर्घटना के तहत गंभीर चोटिल होने के बाद अस्पताल और अस्पताल के शल्य चिकित्सा कक्ष (Operation Theatre) के बिस्तर से लेकर घर के बिस्तर तक के सफ़र को तय करते हुए पाँच माह बाद भी अभी तक पूर्णतः स्वस्थ होने के लिए प्रतीक्षारत रहते हुए .. बस यूँ ही ...


ख़ैर ! .. आगे .. आज की बतकही के तहत २१ मई २०२६, मंगलवार को प्रसार भारती के तहत आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित होने वाले साहित्यिकी कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग तेरह मिनट के काव्य पाठ में हमारी सात बतकहियों (कविताओं) को आप सुन सकते हैं। जिनमें स्नेह, प्रेम और श्रद्धा में लिपटे रिश्तों के कई स्वरूपों को चंद शब्द-चित्रों में सजाने का प्रयास भर किया है हमने। हमारी आज की बतकही का शीर्षक- "एहसासों की धूप ..." भी इन्हीं बतकहियों में से किसी एक का वाक्यांश है .. बस यूँ ही ...


आप भी अपनी रचनाओं को लेकर सम्भवतः अपने-अपने शहर में अवस्थित प्रसार भारती के आकाशवाणी या दूरदर्शन केन्द्र जाते ही होंगे। अगर अभी तक नहीं गए हैं, तो परिपक्व रचनाकारों के अलावा .. विशेषतौर पर जो नवोदित(ता) रचनाकार हैं, उन्हें भी अपनी रचनाओं को लेकर वहाँ जाना ही चाहिए और सम्बन्धित विभाग के अधिकारी से मिल कर वहाँ अपना नाम पंजीकृत करवा लेना चाहिए। 



एक बार किसी भी शहर के प्रसार भारती के कार्यालय में आपका नाम पंजीकृत हो जाने पर वह पंजीकरण समस्त भारतवर्ष के प्रसार भारती के लिए मान्य होता है। फिर तो आप अपनी स्वरचित व अप्रकाशित चयनित रचना (कविता, कहानी, आलेख) को वहाँ के तयशुदा कार्यक्रम के लिए पढ़ सकते हैं। आपकी चयनित रचना की 'रिकॉर्डिंग' के बाद उसका प्रसारण किया जाएगा। उस प्रसारण के कुछ दिनों बाद इसके बदले सरकार द्वारा तय प्रसारण शुल्क (Fee of Broadcasting) के तौर पर कुछ धनराशि भी आपके बैंक खाता (Bank Account)  में स्वतः आ जाएगी।



तो .. आइए .. फ़िलहाल .. आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित होने वाले तेरह मिनट के उपरोक्त काव्य पाठ को निम्न 'यूट्यूब' पर सुनते हैं .. बस यूँ ही ... 👇👇👇









Tuesday, May 5, 2026

नासपीटी जाती ही नहीं ... 😡

अपने देश में पाँच राज्यों के विधानसभा के कल,04.05.2026 वाले चुनाव परिणाम के दिन हम सभी के लिए दो बातें विशेष चौंकाने वाली थीं। 

पहली बात कि .. पश्चिम बंगाल के लिए राजनीतिक दृष्टिकोण से कल का परिणाम वर्षों बाद एक नया विहान लेकर आया है। साथ ही समस्त देशवासियों के लिए भी एक शुभ संदेश भी लाया है , सिवाय कुछ तथाकथित मोदी विरोधियों को छोड़ कर .. शायद ...


दूसरी बात .. तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने इलाया थलपति उर्फ़ जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ विजय की दो वर्षों पूर्व गठित की गई राजनीतिक पार्टी- तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) की जीत। 

हालांकि दो वर्षों पूर्व गठित की गई राजनीतिक पार्टी की जीत चौंकाता तो है, परन्तु अभिनेता से राजनेता बनने वाली बात चौंकाती नहीं है, बल्कि केवल अपना इतिहास दोहराती दिखती है ; क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति का इतिहास सत्तर के दशक के बाद फ़िल्मी गलियारे से चल कर ही आता रहा है। मुथुवेल करुणानिधि, मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन (MGR), वी एन रामचन्द्रन उर्फ़ जानकी रामचंद्रन और जय ललिता जैसे नाम इसके उदाहरण हैं।


अब आज की बतकही .. बस यूँ ही ...


नासपीटी जाती ही नहीं ... 😡


पाले फिरते हैं कुछेक यूँ वहम में अहम,

मान के कि नर-काया से है हुआ जनम।

ना आज वेद-पुराणों से कोई सरोकार,

न जाने है ये सनातनी का कैसा प्रकार ?


माथे पे टीका और नाम संग 'टाइटल',

अकड़ी है गर्दन, भले हो 'सर्वाइकल'।

अहंकार को ही हैं सब मानते संस्कार,

पहचान आदमी की, पद, कोठी, कार।


दसवीं सदी के पुरखे का पता ही नहीं,

पर कोई श्रीवास्तव, तो तिवारी कोई।

हो सोच और काम इंसान के कैसे भी,

'टाइटल' ही से है बस सबको दरकार।


इंसानियत यहाँ इंसानों में आती नहीं,

और ये जाति नासपीटी जाती ही नहीं।

जाति, आरक्षण, न जाने कितने दरार,

उलझे हैं हम इनमें, वो करें आविष्कार।



{ N. B. :-  

(१) "नर-काया"


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब तथाकथित ब्रह्मा जी ने ग्यारह हज़ार वर्षों तक ध्यान करने के पश्चात अपनी आँखें खोलीं, तो उन्हें अपने समक्ष एक तेजस्वी पुरुष दिखाई दिया, जिसके हाथ में कथित तौर पर कलम और स्याही की दवात थी। ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने और उसमें गुप्त रूप से स्थित रहने के कारण उस पुरुष को तथाकथित चित्रगुप्त और उनके वंशजों को तथाकथित कायस्थ कहा गया है। इस प्रकार मान्यता है कि कायस्थ जाति की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा रूपी नर के काया से हुई है।

मेरे नाम के साथ भी अभिभावक द्वारा "सिन्हा" (तथाकथित) जैसा 'टाइटल' (तथाकथित) जोड़ दिया गया है और कहा गया है कि तुम कायस्थ जाति के हो ; परन्तु मुझे आज भी 15वीं सदी या उससे पहले की सदियों वाले मेरे पुरखों के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं हो पाया है। आपको अपना ज्ञात है क्या ? 

लोगबाग़ तो यहाँ भी नहीं रुकते .. लोग अपनी तथाकथित कायस्थ जाति के बाद भी .. श्रीवास्तव, सक्सेना, भटनागर, अम्बष्ठ, अस्थाना, बाल्मीक (वाल्मीकि गौड़), माथुर, कुलश्रेष्ठ, सूर्यध्वज, करण, गौर (गौड़) और निगम जैसी 12 उपजातियों में भेद करके अपनी-अपनी गर्दनों को अकड़ाते हैं। अपने नाम के पीछे तथाकथित "श्रीवास्तव" शब्द ज़बरन जोड़ कर तो कुछ लोग कुछ ज़्यादा ही वहम में अहम पाले अपनी साँसें लेते हैं .. शायद ... 

यही जाति-उपजाति वाला मनोविज्ञान कुछ कमोबेश हमारे देश की उपलब्ध हर जातियों में देखने के लिए मिलता है। इसके पीछे का कोई विज्ञान, कोई तथ्य, कोई गणित, कोई एतिहासिक प्रमाण .. यदि आपको ज्ञात हो तो मुझ जैसे मूढ़ का ज्ञानवर्धन अवश्य कीजिएगा .. बस यूँ ही ...


(२) "वो" = 


उपरोक्त "वो" .. वो सारे देश हैं, जहाँ के प्रबुद्ध नागरिकों में से ही वैज्ञानिक बने कुछ लोग हमारी दिनचर्या में उपयोग किए जाने वाले तमाम आम उपकरणों या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का दिन-प्रतिदिन निरन्तर आविष्कार करते आ रहे हैं। 

भले ही तमाम विदेशी आविष्कारों के बाद हमलोग उनसे प्रेरित हो कर बनाए गए भारतीय उत्पादनों को स्वदेशी मानकर अपनी-अपनी गर्दनों को अकड़ाए रहते हों। चाहे उन सारे उत्पादों की सूची में .. माचिस हो, स्टेनलेस स्टील हो, सिलाई मशीन हो, साइकिल हो, स्कूटर हो, बाइक हो, कार हो, ट्रेन हो, हवाई जहाज हो, प्रेशर कुकर हो, फ्रीज़ हो, बल्ब या एलईडी हो, ए सी हो, माइक हो, रेडियो हो, टेलीविजन हो, मोबाइल हो, लैपटॉप हो .. इत्यादि-इत्यादि हों। हम अपने आसपास नज़रों को दौड़ा-दौड़ा कर अपने आज के उपयोगी उपकरणों की सूची बनाते-बनाते थक जायेंगे .. पर उन विदेशी आविष्कारों की गिनती शीघ्र खत्म नहीं होगी.. शायद ...

अब कुछेक लोग पौराणिक कथाओं के पुष्पक विमान के लिए वहम में अहम पाल कर अपनी गर्दन आकड़ाएंगे। परन्तु अगर तत्कालीन पुष्पक विमान को एक बार सच मान भी लें, तो फिर उस कालखंड के बाद से लेकर हवाई जहाज के आने तक वह पुष्पक विमान "मिस्टर इंडिया" क्यों बना रहा ? आपको मालूम है क्या ? }