Thursday, April 23, 2026

"पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !"

सरवर चिश्ती

"पंचम वेद ...", "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !", "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !"  और "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के बाद आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" .. आप सभी के लिए  :-

क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...


वर्तमान में घटी सर्वविदित नासिक व अमरावती की दो पाशविक एवं मक्कारी भरी घटनाओं की चर्चा तथा आठ सौ चौंतीस साल पहले 1192 के उपलब्ध इतिहास के पन्नों को टटोल कर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ और उसके शागिर्दों की मंशा एवं उनके काले कारनामों से अवगत होने के पश्चात अब ...


चौंतीस साल पहले 1992 में :-


अजमेर के जयपुर रोड में मीर शाह अली कॉलोनी में महिलाओं की शिक्षा के लिए दस एकड़ में डॉ हाजी मोहम्मद दाऊद शरीफ द्वारा 1959 में स्थापित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय से संबद्ध सोफिया गर्ल्स कॉलेज नामक एक स्वायत्त शिक्षण संस्थान है। जिसे अब तक NAAC (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा 'A+' ग्रेड मिल चुका है। हालांकि इस ग्रेड के बिना मिले भी .. 1992 में भी यह लड़कियों के लिए उस शहर का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान था।

उस दौर में 'सोशल मीडिया' और 'इंटरनेट' नहीं होने के बावजूद जब एक दिन एक अख़बार के 'फ्रंट पेज' पर उसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की छात्राओं की 'न्यूड फोटोज' 'ब्लर' करके छापे गए तो पूरे देश में तहलका मच गया। 

अचानक इसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की छात्राओं की एक के बाद एक होने वाली आत्महत्या के सिलसिले ने भी लोगों का ध्यान खींचा। उन दौर में अख़बार के पन्नों पर छपी कुछ 'हेडलाइंस' की निम्न बानगी ही काफ़ी हैं .. उन दिनों की क्रूरता की सच्चाई बयान करने के लिए। मसलन -  

"आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या है और इसके पीछे शहर के बड़े लोगों का हाथ है", 

"250 कॉलेज गर्ल्स हुईं शिकार, बँटने लगी न्यूड फोटो", 

"एक के बाद एक सुसाइड से उठा पर्दा", 

"28 परिवार रातोंरात हुए लापता" इत्यादि .. इत्यादि।


चूंकि उस कांड में शहर के रसूख़दार परिवारों के लोग शामिल थे, तो उस 'केस' को शुरुआत में भरसक दबाने की कोशिश की गयी। प्रशासन और पुलिस तो मुज़रिमों की मानो चाकरी कर रही थी। परन्तु कुछेक दिलेर 'मीडिया' और 'मास' के दबाव में हुई जाँच-पड़ताल और पक्के सुबूतों के आधार पर राजस्थान के अजमेर में उसी हिंदू विरोधी मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के दरगाह- अजमेर शरीफ़ की देखभाल करने वाले ख़ादिमों की पीढ़ियों में से एक फारूख चिश्ती को सालों तक होने वाले देश के सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार व भयादोहन कांड का 'मास्टरमाइंड' पाया गया था। 

समस्त जाँच-पड़ताल के बाद निम्न 18 आरोपियों के खिलाफ़ 'केस' दर्ज किया गया था :-

१) फारूक चिश्ती, जो तत्कालीन युवा कांग्रेस का शहर अध्यक्ष भी था, २) नफीस चिश्ती, जो तत्कालीन युवा कांग्रेस का शहर उपाध्यक्ष था, ३) अनवर चिश्ती, जो संयुक्त सचिव था और ये तीनों उसी मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के दरगाह के ख़ादिम चिश्ती परिवार से हैं। ४) अलमास महाराज, जो पूर्व कांग्रेस विधायक का नजदीकी रिश्तेदार था और आज तक वह फरार ही है। ये सभी शहर के रसूख़दार व दबंग लोग थे या .. यूँ कहें कि आज भी हैं।

इनके अलावा ५) इशरत अली, ६) इकबाल खान, ७) सलीम चिश्ती, ८) सैयद जमीर हुसैन, ९) सुहैल गनी, १०) मोईजुल्‍लाह पुत्तन इलाहाबादी, ११) नसीम अहमद उर्फ टार्जन, १२) जुहूर चिश्‍ती, १३) मोहिबुल्लाह उर्फ मेराडोना, १४) पुरुषोत्तम उर्फ बबली के अलावा १५) परवेज अंसारी, १६) कैलाश सोनी, १७) महेश लुधानी और १८) हरीश तोलानी नामक दोषियों के नाम केस दर्ज़ हुआ था। जिनमें से अंतिम चार नाम, परवेज अंसारी, कैलाश सोनी, महेश लुधानी और हरीश तोलानी सुनवाई के दौरान ही बरी हो गए थे।

जब पीड़िताओं को बयान के लिए सामने आने की बारी आयी तो कुछ लोक-लाज से मौन रहीं, कुछ हिम्मत करके तीस-पैंतीस के आसपास ही बयान के लिए आगे आईं। परन्तु इनमें से भी अधिकांश को डरा-धमका कर चुप करा दिया गया। अंत में मात्र दो लड़कियों की गवाही पर ही उपरोक्त सभी मुज़रिम पकड़े गए थे।

पीड़िताओं में से हिम्मत करने वालियों ने अपने बयान में ऐसी बातें कहीं, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। उनका कहना था, कि पहले एक छात्रा को प्रेमजाल में उलझा कर शहर के रसूख़दार परिवारों के कुछ लड़कों ने उसके साथ दुष्कर्म किया और चूंकि वो ज़माना मोबाइल का नहीं था, तो चोरी से उसकी आपत्तिजनक फोटो खींची गई। फिर उसे शहर भर में 'सर्कुलेट' कर देने की उस पीड़िता को धमकी दी गई और उसके आपत्तिजनक फोटो को नष्ट करने के बदले में उसे किसी दूसरी लड़की को बहला-फुसला कर उन दरिंदों के हवसगाह तक लाने के लिए कहा गया। एक से दो, दो से चार, चार से .. इस तरह ये सिलसिला सैकड़ों की संख्या पार करती गयी।  

इस प्रकार मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सैकड़ों हिन्दू लड़कियों का यौन शोषण कर उनकी नंगी तस्वीरें खींची थी। "गैंगरेप" और "ब्लैकमेल" के घिनौना से भी घिनौना स्वरूप को अंजाम दिया गया था। उस शहर में रहने वाले कई लोगों ने अपनी बेटी-बहनों को पेड़ से लाश बनकर लटकते देखा था।

ढाई सौ से भी अधिक पीड़िताओं के न्याय की यात्रा देश की न्याय व्यवस्था की दुर्बलताओं के कारण वर्षों तक उच्च न्यायालय, त्वरित विशेष न्यायालय (Fast Track Special Courts, सर्वोच्च न्यायालय और पॉक्सो (POCSO- Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) 'कोर्ट' के पड़ावों से होती हुई गुजरी। कुछ बरी हो गए, कुछ को उम्रक़ैद की सजा हुई, फिर सजा कम भी कर दी गई। एक तो आज तक फरार है। फिर मुख्य आरोपी अपने आप को बनावटी पागल घोषित कर के जेल से बाहर आ गया। इस प्रकार .. कारण जो भी रहा हो, अन्ततः फांसी की सजा के बिना सैकड़ों पीड़िताओं का न्याय अधूरा ही रह गया।

सर्वविदित है कि ख़बरों के अनुसार उसी मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के अजमेर दरगाह के ख़ादिम परिवार का गौहर चिश्ती .. हिन्दू दर्जी कन्हैया लाल की निर्मम हत्या के एक आरोपी रियाज अत्तारी से मिला था और “सिर तन से जुदा” का नारा देकर हिन्दुओं को धमकी भी दी थी।

इसी अजमेर शरीफ दरगाह के ख़ादिमों की "अंजुमन सैयद जादगान" नामक संगठन के सचिव सरवर चिश्ती ने उग्र बयान देकर हिंसा को बढ़ावा दिया था और पूरे देश को हिलाने की धमकी भी दी थी। उसने ख़ुद को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) नामक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य बताया था और अजमेर दरगाह से हिन्दुओं के आर्थिक बहिष्कार का आह्वान भी किया था। 

उसके बेटे सैयद अली चिश्ती और आदिल चिश्ती ने हिन्दुओं के लिए नफ़रत दिखलाते हुए हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान भी किया था। सरवर चिश्ती ने हमारी हिंदू बहन-बेटियों के विरुद्ध अपमानजनक कथन कही थी, कि - ''लड़की चीज़ ही ऐसी है .. बड़े से बड़ा फिसल जाता है।''


1992 में राजस्थान के शहर अजमेर में घटी उस भयावह सच को "चिश्ती सेक्स स्कैंडल" या "अजमेर दरगाह कांड 1992" भी कहते हैं। अगर आप के परिवार में बहन-बेटी है या नहीं भी है और आप केवल संवेदनशील इंसान हैं, तो इन सब को आज की निम्न फ़िल्म में भी देखकर आपकी आत्मा काँप जाएगी .. शायद ...




फ़िल्म - "अजमेर 92" :-


वर्तमान से लगभग तीन साल पहले 21 जुलाई 2023 को प्रदर्शित हुई दो घंटे इक्कीस मिनट की फ़िल्म - "अजमेर 92" को बनाने के लिए भी तो इसके निर्माता को एक दिल दहलाने वाली उपरोक्त दुर्घटना ने ही प्रेरित की होगी। हालांकि इस फ़िल्म को लेकर तब भी इतनी ही चिल्लपों मची थी, जितनी वर्तमान की सत्य घटनाओं पर आधारित बनी फ़िल्मों के लिए हाय-तौबा मची हुई है। बस एक 'प्रोपेगैंडा' जैसा विशेषण उसके साथ नहीं जुड़ा था। 

हालांकि ... "अजमेर 92" फ़िल्म का 'सो कॉल्ड बॉक्स ऑफिस' पर कुछ ख़ास कमाल हो पाया था। अजमेर बलात्कार कांड पर आधारित इस फ़िल्म के निर्देशक हैं पुष्पेन्द्र सिंह तथा इसके लेखक व पटकथा लेखक हैं सूरज पाल रजक, ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह और पुष्पेन्द्र सिंह की तिकड़ी।

इसके मुख्य अभिनेता हैं करण वर्मा और अभिनेत्री हैं सुमित सिंह। इनके अलावा अन्य कलाकार हैं- ज़रीना वहाब, सयाजी शिंदे, मनोज जोशी, ब्रिजेन्द्र काले, राजेश शर्मा, ईशान मिश्रा, अभिषेक, शालिनी कपूर, सीरत कौर, शहनवाज़ खान, आकाश दाहिया, सिमरन गंगवानी, अनूप गौतम, अलका अमीन इत्यादि। रिलायंस एंटरटेनमेंट (Reliance Entertainment) के इस निर्माण को कला की दृष्टिकोण से IMDb (Internet Movie Database) द्वारा 10 में से 8 'ग्रेड' मिला है।

जबकि "जमीयत उलेमा-ए-हिंद" संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी के अनुसार फ़िल्म को 'बैन' कर देना चाहिए था, क्योंकि उसके अनुसार यह फ़िल्म अजमेर शरीफ़ के दरगाह को बदनाम करने का प्रयास भर था। 


आपको भी ऐसा महसूस होता है क्या ? ...


दूसरी तरफ़ अभी हाल ही में देहरादून में भीमसेन जोशी जी के सम्मान में "भीमसेन जोशी समारोह" नामक एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच पर नृत्यांगना स्वाति सिन्हा कत्थक नृत्य पेश कर रहीं थीं, तो समी उल्लाह ख़ान गायन व हारमोनियम के साथ उनका संगत कर रहे थे। 

ना जाने ऐसे अनूठे माहौल कट्टरपंथियों की भीड़ में कब, कैसे, कहाँ और क्यों विलुप्त हो गए हैं ?


आपको मालूम है क्या ? ...


पुनः 'पॉपुलर डायलॉग' .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। ", के आधार पर .. शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (५)_सोलह सोमवार का व्रत ... !" के साथ .. बस यूँ ही ... 🙂







Sunday, April 19, 2026

नौ सप्ताह का गर्भ ...






क्या ? ...

गंगा घाटों पर है भगवान ?

या पत्थरों में है भगवान ?

नींद, चैन-सुकून में है भगवान ?

या बेजुबानों में है भगवान ?

मन्दिरों में है भगवान ?

या श्मशानों में है भगवान ?


किंकर्तव्यविमूढ़ ! ...

दुधमुँहे के 

दुग्धपानों में है भगवान ?

या नौ माह तक गर्भ सम्भाल,

प्रसव पीड़ा को झेल,

जन्म देने वाली 

माँ ही है भगवान ?


तो फिर ..

नौ माह ना सही,

नौ सप्ताह तक ही 

गर्भ संभालने वाली 

श्वान माँओं (कुत्तियों) में भी तो 

होते ही होंगे ना भगवान ? 

है ना ? ...


(उपरोक्त वीडियो में बतकही से संबद्ध चित्रों / दृश्यों का समावेश है।)


Instagram Link :-

(https://www.instagram.com/reel/DXSAbqbEpWb/?igsh=MjhjM2RxdTh3bmds)

Friday, April 17, 2026

"पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !"


"पंचम वेद ...", "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !", और "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !" के बाद आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (४)_ 'प्रोपेगैंडा' !", परन्तु दो भागों में - "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" एवं "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !"। 

चूंकि इस बार का आलेख अति लम्बा होता चला गया है, तो "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" अगले अंक में एवं .. आज केवल "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" .. आप सभी की नज़रों एवं निगहबानी के लिए  :-

क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...


प्रोपेगैंडा ( Propaganda ) और वर्तमान :-

अभी हाल ही में देखे-सुने गए समाचार के अनुसार महाराष्ट्र के नासिक में TCS जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में एक समुदाय विशेष के कर्मचारियों द्वारा हिन्दू महिला कर्मचारियों को साजिशन प्रेम जाल में उलझा कर या 'इन्क्रीमेंट' व 'प्रमोशन' का लालच देकर लव जिहाद, धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न जैसी कुकर्मों को गत चार वर्षों से अंजाम दिया जा रहा था। 

साथ ही .. आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती में उसी समुदाय विशेष के मात्र 19 साल के छोकरे द्वारा, जो AIMIM नामक राजनीतिक दल से भी जुड़ा है, हालांकि ये आलेख लिखे जाने तक .. अब तक उसे दल से निलम्बित किया जा चुका है, साजिशन लगभग 180 हिन्दू युवतियों व नाबालिग लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाकर उनका यौन शोषण किया जा रहा था और उनका अश्लील वीडियो बनाकर भयादोहन (Blackmail) भी किया जा रहा था। 

अब इन कुत्सित व भयावह घटी घटनाओं के दस-बीस साल बाद अगर इन सच्ची घटनाओं पर फ़िल्में बनेंगी, तब भी उन फ़िल्मों को हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी समाज के कुछ आवश्यकता से अधिक बुद्धिमान लोग 'प्रोपेगैंडा' कहने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे .. शायद ...

यूँ तो भिन्न-भिन्न मतों के लोग हर कालखंड में रहते आए हैं, तो स्वाभाविक है कि वर्तमान में भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे ही। मत भिन्नता के लिए विषय तो कुछ भी हो सकता है। जैसे .. इन दिनों फंतासी से परे और देश-समाज को आईना दिखलाती सच्ची घटनाओं पर आधारित कुछ फ़िल्में प्रदर्शित हुईं हैं, तो कुछ लोगों के लिए सच्ची घटनाओं पर आधारित ये फ़िल्में उन घटनाओं का एक अंश मात्र भर ही है ; जबकि वास्तविकता इससे भी ज़्यादा भयावह थी या .. है। वहीं .. कई लोगों के लिए ये फ़िल्में एक 'प्रोपेगैंडा' मात्र है, जो वर्तमान सरकार को खुश करने के लिए और एक समुदाय विशेष को बदनाम करने के लिए बनायीं गईं हैं .. शायद ...

जब कि उन फ़िल्मों को बनाने के लिए प्रेरित करने वाली सच्ची भयावह घटनाओं का सही-सही अनुमान उन्हीं परिवारों को है, जिनकी हथेलियाँ उन पाशविक दुर्घटनाओं रूपी गर्म तवे पर पड़ी हैं। सामने से केवल देख कर तवे के तापमान का अनुमान नहीं लगाया जा सकता .. है ना ? 

इस बार तीन साल पहले प्रदर्शित हुई जिस फ़िल्म की चर्चा करनी है, उससे पहले चौंतीस साल पूर्व 1992 में दिल दहलाने वाली जिस सच्ची घटना पर वह फ़िल्म आधारित थी, उस घटना की हमें ताक-झाँक करनी होगी। परन्तु इससे भी बेहतर होगा, उससे भी पहले आठ सौ चौंतीस साल पुराने 1192 के इतिहास के पन्नों को टटोलना। फिर तो चौंतीस साल और आठ सौ चौंतीस साल पूर्व की घटनाओं को दोहराने के बाद इस फ़िल्म को बनाने की वज़ह हमें पूर्णतः ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ जाएगी। तभी उस फ़िल्म के लिए भी तथाकथित 'प्रोपेगैंडा' वाला फैलाया गया भ्रम दूर हो पाएगा .. शायद ...


आठ सौ चौंतीस साल पहले 1192 में :-

उपलब्ध इतिहास के अनुसार एक ईरानी- मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ बारहवीं शताब्दी के अंत में लगभग 1192-93 के आसपास मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत में लाहौर होते हुए अजयमेरू आया था और मुहम्मद ग़ोरी द्वारा अजयमेरू को जीतने से पहले तत्कालीन प्रशासनिक एवं राजनीतिक केन्द्र अजयमेरू के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए मुहम्मद ग़ोरी के कहने पर अपने शार्गिदों के साथ बस गया था। वही अजयमेरू बाद में शायद मुस्लिमों द्वारा अपभ्रंश हो कर अजमेर हो गया होगा।

अजयमेरू में पृथ्वीराज चौहान के दादा जी- अर्णोराज यानी आना जी चौहान द्वारा एक ऐतिहासिक कृत्रिम झील- आना सागर झील और विष्णु के तथाकथित तीसरे अवतार- वराह का मन्दिर भी बनवाया गया था। इतिहास के अनुसार .. जहाँ मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय को क़त्ल करते थे और मंदिर परिसर में ही बैठकर गोमांस खाते भी थे। उनकी मंशा मंदिरों को अपवित्र कर के हिंदुओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की थी। 

दरअसल सूफी संत का पैरहन ओढ़ कर प्रेम, शान्ति और मानवता के संदेशों को फैलाने के नाम पर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ उन दिनों इस्लामिक जिहाद को विस्तार दे रहा था। जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत की विसात बिछाने का काम बख़ूबी किया जा रहा था। धर्मांतरण और साम्राज्यवाद के लिए क्रूरता की सारी हदें पार की गयीं थीं। 

धर्मांतरण के लिए राजी नहीं होने पर इन्हीं सूफ़ी-संतों के फ़रमान पर तथाकथित बहत्तर हूरों की चाह में तथाकथित शरिया क़ानून, ग़ज़वा-ए-हिंद और जिहाद की आड़ में उनके शागिर्दों ने हज़ारों-लाखों पुरुषों का कत्लेआम किया और महिलाओं-लड़कियों को जबरन अपनी हवस की आग में झोंक दिया था। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती और उसके तमाम शागिर्द हिंदू विरोधी, गौ हत्यारे और मन्दिर-मूर्ति भंजक थे।

इतिहास के गर्त में ऐसे दसों उदाहरण हैं औलिया-फ़कीरों के जो अपने तमाम शागिर्दों के साथ भारत के कई हिस्सों में मुस्लिम आक्रांताओं के साथ इस्लामिक जिहाद को बढ़ावा देने, तथाकथित काफ़िरों के धर्मांतरण करने और इस्लाम का प्रचार करके उसे स्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए थे।

हालांकि उपलब्ध इतिहास की मानें तो पैगम्बर मोहम्मद के तथाकथित आदेशानुसार मोइनुद्दीन हसन चिश्ती ने जीवन के आख़िरी वर्षों में दो शादियाँ की थी। इतिहास के कई पन्नों में तो कुछ शागिर्दों द्वारा उसे हिंदू लड़कियों-महिलाओं को उपहार स्वरूप पेश किए जाने का भी ज़िक्र मिलता है।

इस्लामिक विचारकों और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा सदियों उपरोक्त होने वाले क्रूर हिंसात्मक उत्पीड़न की वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर सदियों से प्रेम, शान्ति, मानवता और भाईचारे के मिथक रूप में प्रस्तुत करने के क्रम में .. मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के मरणोपरांत अजमेर में बने उसके अजमेर शरीफ़ नामक दरगाह को एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में पेश किया गया। जहाँ आज भी कई हिन्दू लोग भी तथाकथित चादर चढ़ाने जाते रहते हैं। रही-सही कसर पूरी करते हुए बम्बईया फ़िल्मों द्वारा इस स्थल को शिरडी और साईं बाबा की तरह ही ख़ूब महिमामंडित करने का भी ये दुष्परिणाम है।

एक और भी महत्वपूर्ण कारण और स्रोत भी रहा है उपरोक्त महिमामंडन का, क्योंकि .. सर्वविदित है कि स्वतंत्रता के पूर्व उच्च विद्यालय सहित उसके नीचे और ऊपर की कक्षाओं के लिए भी इतिहास के पाठ्यक्रमों को औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रेरित होकर बनाए गए थे, जिनमें ब्रितानी शासन को सभ्य बनाने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया था। उसी प्रकार स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्र भारत में भी जब, अब तक की सबसे लंबी अवधि 11 वर्षों तक बने रहने वाले, शिक्षा मंत्री- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा तत्कालीन सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की धर्म निरपेक्षता के नाम पर पक्षपाती नीति की आड़ लेकर हिंदू विरोधी मुग़ल काल को आक्रांताओं के काल की जगह उस काल के आक्रांताओं को नायकों की तरह इतिहास के पाठ्यक्रम में दम भर महिमामंडित किया गया था।

हालांकि उसी समुदाय से इंसानियत को ही अपना धर्म- मज़हब मानने वाले भी कई लोग हुए हैं और आज हैं भी। परन्तु उन सभी की जनसंख्या "ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन" वाले मुहावरे को भी चरितार्थ करने लायक नहीं हैं .. शायद ...

ऐसे लोगों में से प्रसिद्ध लोगों में स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल ग़फ्फार ख़ान, शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान, विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम, लालोन फ़कीर, गायक मोहम्मद रफ़ी, रचनाकार निदा फ़ाज़ली, लेखक सह पत्रकार व विचारक तारिक़ फ़तह, लेखिका इस्मत चुगताई व तस्लीमा नसरीन, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफ़ज़ई के नाम स्वतःस्फूर्त मस्तिष्क में आ जाते हैं। इनके अलावा उस समुदाय के वो सभी सच्चे सैनिक लोग जो देश के लिए जीते हैं एवं देश के लिए ही कभी-कभी शहीद भी हो जाते हैं और वो सभी कलाकार या आमजन भी, जो .. साजिशन या जबरन किए जाने वाले धर्म परिवर्तन व यौन शोषण को हराम मानते  हैं और ग़ज़वा-ए-हिंद जैसे दुष्टता व मक्कारी भरे सपने भी नहीं देखा करते हैं .. शायद ...


चौंतीस साल पहले 1992 में :-

1959 में अजमेर के जयपुर रोड में मीर शाह अली कॉलोनी में दस एकड़ में महिलाओं की शिक्षा के लिए डॉ हाजी मोहम्मद दाऊद शरीफ द्वारा स्थापित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्वायत्त शिक्षण संस्थान है- सोफिया गर्ल्स कॉलेज, जिसे अब तक NAAC (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा 'A+' ग्रेड मिल चुका है। हालांकि इस ग्रेड के बिना मिले भी .. 1992 में भी यह लड़कियों के लिए उस शहर का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान था।

पुनः उस एक 'पॉपुलर डायलॉग' - " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " के आधार पर .. अब शेष बातें ज़ल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के साथ .. जिसमें होगी .. 1992 में घटी चौंतीस साल पहले की दुर्घटना और उस पर आधारित बनी फ़िल्म की बातें .. बस यूँ ही ...

Wednesday, April 15, 2026

तब तो .. ज़िन्दगी और भी ...


 




 (१)

तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


सुबह-सवेरे टहलते हुए कभी

डालियों पर पेड़ों की 

या फिर कुछ पौधों की

झुरमुटों में कभी,

सुनकर आवाज़ें 

बुलबुलों की जोड़ी की,

साथ हमारे ठिठकती कभी तुम भी।

सुन कर चहचहाहट गौरैयों की 

मन ही मन मंद-मंद मुस्कुराती, 

साथ हमारे निहारती उन्हें कभी तुम भी।

आवारा तो नहीं, 

पर बेचारे बेसहारे 

गली-मोहल्ले के कुत्तों को भी 

पुचकारती-सहलाती कभी तुम भी।

साथ हमारे उन्हें खिलाती, 

उन्हीं की पसन्द के, 

प्यार से कुछ भी कभी तुम भी।

संग हमारे हर रोज़ आती 

सुबह-शाम छत्त पर भी,

दाने कुछ मूँगफली, बाजरे-कँगनी के, 

गिलहरी, पक्षी-वृंद को चुगाती कभी तुम भी .. बस यूँ हीं ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...



(२)

तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


हर शाम .. साथ मेरे

लगाए टकटकी,

चाँद-तारों को 

आसमानों में निहारती,

टहपोर चाँदनी में पूर्णमासी की, 

संग मेरे गोते लगाती कभी तुम भी। 

बेशक़ तुम किसी शाम 

ऋषिकेश में करती गंगा-आरती,

पर तदोपरान्त ..

अमावस के धुंधलके में

या कभी पूर्णमासी की 

चाँदनी में बैठ कर 

सीढ़ियों पे घाट की, 

कलकल बहती गंगधार में 

गोते अपने पैरों को, कभी-कभार, 

घँटों साथ हमारे, पुरानी फ़िल्मी 

युगल गीत एक रूमानी -

" अपनी कहो ~~

कुछ मेरी सुनो " ~~ के तर्ज़ पर,

कुछ .. अपनी कहती, 

कुछ .. मेरी भी सुनती .. कभी तुम भी .. बस यूँ ही ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...



(३)


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


ग़ज़ल पसंदीदा अपनी कोई

सुनूँ किसी शाम जो, 

तो .. तुम बीच में टोकती,

और उस ग़ज़ल के कुछ 

ख़ालिस उर्दू शब्द के  

मायने भी पूछती मुझसे कभी।

कभी युगल गीत रूमानी कोई

गुनगुनाने-गाने पर मेरे,

संग-संग नारी स्वर अपना भी

मिलातीं साथ मेरे कभी तुम भी,

मैं मुखड़ा गाता,

तुम अंतरा गातीं

या गीत के सम पर किसी

वाद्य यंत्रों की जुगलबंदी-सी

थाप अपनी हथेलियों की,

लिए खनखनाहट अपनी चूड़ियों की,

पीठ पर मेरी थपथपाती कभी।

या फिर .. 

बतकही पर मेरी किसी, 

"वाह-वाह" ना सही,

निकालती कोई मीन-मेख ही तुम कभी .. बस यूँ ही ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...





[ सभी तस्वीरें "M. F. Hussain A Pictorial Tribute by Pradeep Chandra" नामक पुस्तक के सौजन्य से. ]


Friday, April 3, 2026

हाथीपैला का शरबत ...


इस फूल को सिक्किम में
हाथीपैला कहा जाता है, जिसकी पंखुड़ियाँ लगभग एक छिले हुए केले के पाँच खण्डों में बँटे छिलके की तरह होती हैं। यह फूल मधुर और सुगन्धित होने के कारण चमगादड़ इन की तरफ़ काफी आकर्षित होते हैं। ये फूल हरसिंगार या महुआ के फूल की तरह ही खिलने के बाद केवल एक रात के बाद झर कर ज़मीन पर बिछ जाते हैं। इस फूल के खिलने का मौसम लगभग वसंत ऋतु होता है यानी .. लगभग मार्च से जून तक।   



इसके पेड़ के पत्ते की अत्यधिक लम्बाई-चौड़ाई के कारण इसे Dinner Plate Tree यानी खाने की थाली वाला पेड़ भी कहा जाता है। इस फूल को पश्चिम बंगाल में रोसु कुंडा, English में Bayur Tree बोलते हैं और इसका Scientific नाम है- टेरोस्पर्मम एसरीफोलियम (Pterospermum acerifolium) परन्तु हिंदी भाषी क्षेत्र में इसे ही कनक चंपा, मुचकुंद या पद्म पुष्प कहा जाता है।



यह वृक्ष अपने देश भारत के कुछ तटीय राज्यों के साथ ही म्यांमार में भी पाया जाता है। म्यांमार .. जिसे 1989 से पहले बर्मा कहा जाता था और 1937 के पहले यह भारत का ही हिस्सा था।  

इसके पत्ते और छाल चेचक व खुजली की दवा बनाने में उपयोग किए जाते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो खांसी, वात-पित्त दोष, त्वचा संबंधी विकारों व बवासीर के उपचार में इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग किया जाता है। परन्तु आज हम आधुनिक रासायनिक दवाओं के सामने इन प्राकृतिक उपहारों को अनदेखा करते जा रहे हैं .. शायद ...

इसके वृक्ष की लाल रंग की लकड़ी से तख्ते, बक्से या दराज आदि बनाये जाते हैं।

संस्कृत में एक प्राचीन श्लोक के अनुसार -

मुचकुन्दः क्षत्रवृक्षचित्रकः प्रतिविष्णुः।

मुचकुन्दः शिरःपीड़ापित्तस्रविषानाशनः।

अर्थात् -

मुचकुंद, क्षत्रवृक्ष, चित्रक और प्रतिविष्णु इसके पर्यायवाची हैं। यह सिरदर्द, पित्त दोष, रक्तस्राव संबंधी विकारों को दूर करता है और विष प्रभाव (Toxic effects) के उपचार में भी सहायक होता है।


आयुर्वेद के अनुसार कनक चंपा के फूलों के शरबत में औषधीय गुण भरपूर होता है। जो शरीर के ठंडक और श्वसन संबंधी विकारों में राहत प्रदान करता है। साथ ही पित्त नियंत्रण और सूजन कम करने का काम करता है। इसके शरबत का सेवन बुखार, सिरदर्द और पाचन सम्बन्धी समस्याओं में भी बहुत ही लाभप्रद है। 



अब शरबत बनाने के लिए .. सबसे पहले तो अपने आसपास इसके वृक्ष की तलाश कीजिए। चूंकि इसके फूलों के खिलने का मौसम लगभग मार्च से जून तक होता है। तो इन दिनों अगर इसके फूलों से भरा वृक्ष दिख जाए .. और वृक्ष से फूल तोड़ा गया हो तो बिना धोए अन्यथा अगर टपके हुए फूलों को ज़मीन से उठाया गया हो, तो हल्का-सा धोकर आठ-दस फूलों को किसी शाम में ही एक बर्त्तन में फूल डूबने भर पानी में डालकर रात भर के लिए छोड़ दीजिए। 

फिर सुबह-सुबह उसे छान कर स्वादानुसार मधु या गुड़ मिला कर या फिर अगर आप मधुमेह से पीड़ित हैं, तो बिना शक्कर के भी पी सकते हैं। औषधीय प्रभाव के साथ-साथ इसकी भीनी-भीनी सुगन्ध से आपको तरोताज़गी मिलेगी और मानसिक तृप्ति भी।
वैसे सालों भर इस फूल का शरबत पीने के लिए इसके फूलों का सुखौता बना कर रखा जा सकता है। अगर आपके मुहल्ले, गाँव-शहर में इसका वृक्ष नहीं भी है, तो उदास होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि .. कई Online Market Platforms पर इसका सुखौता क्रय-विक्रय के लिए उपलब्ध है।

अब अगर आपकी रुचि ऐसे अनमोल प्राकृतिक उपहारों के बारे में जानने और चखने में है, तो आशा है कि आपको इसका शरबत अच्छा लगेगा .. शायद ...


अब .. मैं तो चला .. भीनी-भीनी सुगन्ध से सराबोर और औषधीय गुणों से सम्पन्न
हाथीपैला यानी मुचकुंद के फूलों का शरबत पीने के लिए .. बस यूँ ही ...







Wednesday, April 1, 2026

"जै जै जै हनुमान गोसाईं" ...


बीते कल यानी 31 मार्च को हिंदी पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के त्रयोदशी को हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी जैन धर्मावलंबियों द्वारा जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती मनायी गयी है और .. आने वाले कल यानी .. 02 अप्रैल को हिंदी पंचांग के अनुसार इसी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन हिन्दू लोग अपनी मान्यता के अनुसार हनुमान जयंती मनाने वाले हैं।


इन दो दिनों के अन्तर में मनाए जाने वाले इन दोनों उत्सवों के संदर्भ में मेरे नासमझ बचपन में बहुत ही ऊहापोह होता था, कि अभी परसों ही महावीर जयंती मनाई गई है और आज फिर हनुमान जयंती ? भला ये क्या बला है ? और .. मेरा ऊहापोह भी कोई निरर्थक नहीं था। उसकी वजह थी, कि .. सभी लोग हनुमान को महावीर नाम से भी बुलाते हैं।


वैसे तो अभिभावक द्वारा मेरे उस नासमझ ऊहापोह को खत्म करने का प्रयास किया गया था। परन्तु तदोपरान्त विद्यालय में पढ़ाई के दौरान विशेष रूप से हम महावीर को जान पाए। पर .. सच्चाई तो ये है, कि हम उन महान विभूतियों को जान ही नहीं पाते हैं .. केवल पढ़ पाते हैं .. शायद ...


आज भी तीर्थंकर महावीर की सोचों से हम कोसों दूर हैं। जिनका दिया मूलमंत्र है - अहिंसा परमो धर्मः यानी जियो और जीने दो। अहिंसा, आत्म-नियंत्रण और करुणा उनके संदेश हैं। उनके अनुसार सत्य की राह पर चलना, अपरिग्रह यानी इच्छाओं पर नियंत्रण और वर्तमान में जीना ही हमें मनुष्य की श्रेणी में रखता है।

अगर तीर्थंकर महावीर की बहुमूल्य बातों को हम मन से मानें तो मांसाहार हम सभी को त्याग देना चाहिए,


क्योंकि मांसाहारी बाज़ार से कच्चा मांसाहार भोजन (?) को .. हमारी रसोई और रसोई से हमारी थाली और हमारी थाली से हमारे निवाले और पेट तक पहुँचने के पहले .. अत्यधिक पीड़ाओं से होकर गुज़रना पड़ता है .. शायद ...


आइए .. अभी तो .. हनुमान जयंती के लिए वेद, भेद और खेद के फुँदने वाली बंदनवार से अपने मन-मन्दिर को सजाने का प्रयास भर करते हैं .. बस यूँ ही ...


"जै जै जै हनुमान गोसाईं" ...

वेद, वेद, वेद, वेद,

थे ज्ञाता चारों वेदों के 

हम- हमारे पुरखे कभी,

पड़ावों से फिर 

गुज़रते हुए पुराणों के,

ना जाने कब वाल्मीकि रामायण, 

वेदव्यास महाभारत से होते हुए, 

आकर हम फिर अटक गए 

तुलसीदास रचित रामचरितमानस के 

हनुमान चालीसा पे।


हैं रेल-पेल भी फिर ना जाने 

कितनी कथाओं की, 

आरतियों की, व्रतों की,

मन्दिरों की, मूर्तियों की, 

पर सर्वोपरि बन,

सर्वत्र है छाया आज 

"जै जै जै हनुमान गोसाईं"

पर रहे ना हम सब अब भाई-भाई,

क्योंकि ..

हो गया है मानव-मानव में ..


भेद, भेद, भेद, भेद,

लिंग भेद, 

वर्ण भेद, वर्ग भेद, 

जाति भेद, उपजाति भेद, 

धर्म भेद, 

सम्प्रदाय भेद, उपसम्प्रदाय भेद, 

भाषा भेद, बोली भेद, 

क्षेत्र भेद, नस्ल भेद 

और .. 

ना जाने कितने-कितने भेद।


खेद, खेद, खेद, खेद,

पर है हमें खेद कि ..

इतने भेदों के पश्चात भी 

लेते हैं हम अपनी साँसें 

उन हवाओं में,

हैं घुली जिनमें 

निःश्वासें भी ..

हर वर्ग के इंसानों के ही नहीं

बल्कि .. 

कुत्ते और सूअरों जैसे पशुओं के .. शायद ...