Sunday, May 10, 2026

प्रतिज्ञान : "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" ...



बीते हुए कल .. 9 मई को .. पश्चिम बंगाल में बंगाली पंचांग के अनुसार वैशाख के पच्चीसवें दिन "कविगुरु" रविन्द्र नाथ टैगोर की 165वीं जयंती के शुभ अवसर पर वहाँ की सुसंस्कृत एवं कला से सराबोर तथा हर्षोल्लास जनित आँसू-सिक्त आम जनता के समक्ष वहाँ के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच नयी विजयी सरकार के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के हम सभी साक्षी बने हैं। प्रतीत हो रहा है, कि वर्षों बाद पश्चिम बंगाल की आम जनता किसी मज़हब विशेष की हिंसक एवं क्रूर मानसिकता के दमन के चंगुल से छूट कर सुकून की साँसें ले रही है। 

एक स्वतंत्र देश होने के बावजूद भारत के किसी राज्य में इतनी वीभत्स परिस्थितियों को वर्षों झेलना .. ये कश्मीरी पंडितों के परिवारों की तरह ही वही लोग बेहतर समझ सकते हैं, जिनकी हथेलियाँ गर्म तवे पर पड़ने के बाद उस पर टीस से भरे फफोले पड़े हों। ख़ैर .. समाचार चैनलों के अनुसार पश्चिम बंगाल में एक हिंदू विरोधी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के समापन के साथ ही वहाँ नवीन सत्ता का सूर्योदय हो गया है .. शायद ...


अब .. आज .. 10 मई की बात .. हालांकि हम किसी भी दिवस विशेष के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि एक औपचारिक दिवस की जगह किसी भी दिवस विशेष के सारगर्भित महत्वपूर्ण विषय या उद्देश्य को मन से हमारी दिनचर्या में समाहित करने में विश्वास रखते हैं। फिर भी .. आज 10 मई को समस्त विश्व में "विश्व मातृ दिवस" मनाया जा रहा है। 

उपलब्ध इतिहास के अनुसार पहला आधिकारिक मातृ दिवस समारोह 10 मई, 1908 को संयुक्त राज्य अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया के एक कुशल व कर्मठ कार्यकर्ता एना मारिया जार्विस द्वारा वहाँ के ऐतिहासिक शहर ग्राफ्टन के एंड्रयूज मेथोडिस्ट एपिस्कोपल नामक चर्च में आयोजित किया गया था। 

दरअसल इतिहास की मानें, तो उन दिनों वहाँ गृहयुद्ध का दौर चल रहा था। जिसमें जिन युवा लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, उन सभी की माँ और अपनी कर्मठ समाजसेविका दिवंगत माँ एन रीव्स जारविस के लिए एना मारिया जार्विस ने 1908 के 10 मई को मातृ दिवस समारोह मना कर उन सभी के प्रति श्रद्धा प्रकट की थी। चूंकि एना मारिया जार्विस की माँ एन रीव्स जारविस का देहांत 9 मई 1905 को हुआ था, अतः उनके द्वारा संभवतः मई महीने के ही 10 तारीख को मातृ दिवस समारोह के लिए चुना गया होगा।

1914 में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन द्वारा वर्ष 1908 के 10 मई के दिन पड़ने वाले माह के दूसरे रविवार को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष के मई माह के दूसरे रविवार को ही 'मदर्स डे' के रूप में मनाने की घोषणा के पश्चात विश्व भर में उसी दिन "विश्व मातृ दिवस" (World Mother's Day) के रूप में मनाया जाता है।

यह एक संयोगमात्र ही है, कि वर्ष 1908 में 10 मई को जब "मातृ दिवस" मनाया गया था, तो उस दिन भी वर्तमान वर्ष 2026 की तरह ही मई माह का दूसरा रविवार 10 मई को ही था। परन्तु वह वर्ष अधिवर्ष (Leap Year) था, पर वर्तमान वर्ष 2026 अधिवर्ष नहीं है।


वैसे भी .. माँ का अस्तित्व तो तभी सम्भव है, जब मातृत्व सुरक्षित हो। .. है ना ? इसीलिए सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की प्रबल समर्थक रहीं बा उर्फ़ कस्तूरबा गाँधी के जन्मदिन यानी 11 अप्रैल को वर्ष 2003 से हमारे देश में माँ और मातृत्व की सुरक्षा के सम्मान व प्रतीकात्मक महत्व के रूप में "राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस" मनाने की परम्परा चली आ रही है। 


अब आज की मूल बतकही .. सर्वविदित है कि .. परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है, तो यह .. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हर जगह बहुत ही शिद्दत से लागू भी होता है। इसी नियम के तहत हम सभी हमारे नब्बे के दशक तक .. बीते दिनों वाली अपनों की चिठ्ठियों की सुगन्धों से इतर .. आज 'व्हाट्सएप्प' की रंगीनियों में मशगूल हो चुके हैं। 

ठीक वैसे ही .. परिवर्तन के इस नियम के तहत कागज़ी किताबों के पृष्ठों को उसकी सरसराहट वाली आवाज़ के साथ पलटने की जगह इन दिनों 'डिजिटल' पुस्तकों व पत्रिकाओं को अपने 'मोबाइल' या 'लैपटॉप' व 'डेस्कटॉप' के चमकते 'स्क्रीन' पर बेआवाज़ ही 'स्क्रॉल' करके हम सभी पढ़ रहे हैं। 

हमारे पुरखों का गौरवान्वित प्रमाणिक इतिहास बतलाता है, कि पहले मौखिक वेद-पुराणों की थाती, फिर पत्थरों पर ब्रह्मलीपि, तदोपरान्त ताड़ पत्र पर उकेरी गयी ग्रंथों की पांडुलिपि, फिर कल तक काग़ज़ी किताबें थीं या आज हैं भी, फिर .. वर्तमान में 'डिजिटल' पुस्तकें। आज ये सब हैं और .. हो सकता है, कि कल हम हों या ना हों .. पर भावी पीढ़ी इससे भी इतर कुछ देख पाएगी .. पढ़ पाएगी .. शायद ...

लब्बोलुआब ये है कि हम सभी कंडे की लेखनी से लेकर 'कंप्यूटर' तक की यात्रा के साक्षी रहे हैं।


अब आगे .. आज की बतकही में हमलोग आज ऐसी ही आठ माह की एक नवजात 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" के बारे में जानने का प्रयास करते हैं। जिसके सम्पादक श्री नितेश मोहन वर्मा एवं सह सम्पादक श्री शिव कुमार शर्मा हैं।


"प्रतिज्ञान" का 'वेब साइट लिंक' :- 👇

www.pratigyan.com


गत वर्ष सितम्बर 2025 में इस 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" का पहला अंक अमेज़न (Amazon) के किंडल (Kindle) पर उपलब्ध हुआ था। "किंडल (Kindle)"  अमेज़न द्वारा विकसित एक 'इलेक्ट्रॉनिक ई-रीडर डिवाइस' है, जिस पर उपलब्ध किताबें, पत्रिकाएं इत्यादि हम अपनी सुविधानुसार यथोचित शुल्क 'ऑनलाइन' भुगतान करके पढ़ सकते हैं। 


अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle) का 'लिंक' :-  👇

https://read.amazon.com/kindle-library



गत माह अप्रैल 2026 में इसका आठवाँ अंक आया है। जनवरी 2026 के इसके पाँचवें अंक को छोड़कर .. सितम्बर 2025 के पहले अंक से लेकर अप्रैल 2026 तक के आठवें अंक तक की प्रतियाँ किंडल (Kindle) पर उपलब्ध है। दरअसल "प्रतिज्ञान" के सह सम्पादक श्री शिव कुमार शर्मा के अनुसार इसके जनवरी का पाँचवाँ अंक कागज़ी पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है और हर वर्ष केवल जनवरी माह का अंक ही साल में एक बार कागज़ी पुस्तक के स्वरूप में ही प्रकाशित किया जाएगा।



इसी कागज़ी पुस्तक के स्वरूप वाले पाँचवें अंक- "प्रतिज्ञान वार्षिक संचयन - 2026" की एक प्रति इसके सह सम्पादक- श्री शिव कुमार शर्मा द्वारा मेरे लिए 'स्पीड पोस्ट' करने पर अभी हाल ही में मुझे प्राप्त हुआ है।




आप सभी पाठकों के बीच जो भी रचनाकार हैं, चाहे आप दक्ष व परिपक्व रचनाकार हों या नवोदित(ता) रचनाकार हों, आप सभी अपनी रचनाओं को "प्रतिज्ञान" तक भेजने के लिए निम्नलिखित दोनों 'ईमेल आईडी' पर 'ईमेल' कर सकते हैं।

"प्रतिज्ञान" के दोनों 'ईमेल आईडी' :- 👇

contact@pratigyan.com

hello@pratigyan.com


आपकी स्वरचित व अप्रकाशित रचना "प्रतिज्ञान" के सम्पादन दल द्वारा यदि चयनित की जाएगी, तो इसके आगामी अंकों में सम्भवतः प्रकाशित की जाएगी। संज्ञान रहे कि यहाँ ना तो आपकी रचना को प्रकाशित करने के लिए आप से कोई शुल्क लिया जाता है और ना ही किसी भी प्रकार के पारिश्रमिक का आपको भुगतान भी किया जाता है। यदि आप भी संस्कृत के श्लोक-अंश- "स्वान्तः सुखाय" के शब्दार्थ या भावार्थ में निष्ठापूर्वक विश्वास रखते हैं, तो निजी स्वान्तः सुखाय के लिए वहाँ अपनी रचनाओं को भेज सकते हैं।


"प्रतिज्ञान" का 'इंस्टाग्राम लिंक' :- 👇

https://www.instagram.com/pratigyanprakashan?igsh=YXJpYWoyajQ5Ymdp


हमने भी इनके 'इंस्टाग्राम' से 'ईमेल आईडी' लेकर अपनी एक बतकही (अतुकान्त कविता) 'ईमेल' की थी। जो चयनित होने के पश्चात अप्रैल माह में "प्रतिज्ञान" के अधुनातन आठवें अंक- "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" नामक विशेषांक में विशेषांक के विषय से इतर मेरे द्वारा प्रेषित बतकही छपी है। जिसका शीर्षक है- "खुरचा हुआ चाँद"। 

आज "विश्व मातृ दिवस" के उपलक्ष्य में "प्रतिज्ञान" के उस विशेषांक "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" को पढ़ने के लिए आपको "अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle)" के 'एप' तक जाना चाहिए .. शायद ...




शीघ्र ही "प्रतिज्ञान" द्वारा "अनकही" नामक एक 'डिजिटल' काव्य संग्रह भी प्रकाशित होने वाला है, जिसमें हमारी दो बतकहियों (अतुकान्त कविताओं) के भी प्रकाशित होने की संभावना है .. बस यूँ ही ... 





Friday, May 8, 2026

एहसासों की धूप ...

हमारे जीवन के दो मूल मंत्र सर्वविदित हैं, कि .. (१) परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है .. और (२) जीवन में जो भी घटित होता है, हमारी भावी अच्छाई के लिए ही होता है। मैं तो मेरे जीवन में इन दोनों ही मूल मंत्रों को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।

अब यदि इस परिवर्तनशील दुनिया एवं जीवन में हर दिन, हर पल खुशियों से भरा होना असम्भव है ; तो हमारे जीवनकाल में भी कष्टकारी क्षणों को कभी-ना-कभी आना तय है। ऐसे में मेरा मानना होता है, कि प्रकृति ने शायद उन कष्टकारी क्षणों में भी हमारी कोई भावी भलाई तय कर रखी होगी। इस तरह .. इस सोच से कुछ हो या ना हो, पर मन में सकारात्मकता कूट-कूट कर भरी रहती है।


हमारे दुःख-कष्ट भरे दिनों में भले ही हमें क्षणिक मानसिक, शारीरिक या आर्थिक उलझनों से गुजरना पड़े भी तो .. वो सारे के सारे क्षण हमें एक अनमोल पाठ अवश्य पढ़ा कर जाते हैं, कि हमारे आसपास के सगों की भीड़ में भी सच्चीमुच्ची कौन अपना व कौन पराया है या औपचारिक रिश्तों की भीड़ में भी एक-दो कौन सगा-सा है। 


इस तरह हम अपने अच्छे दिनों में जिन रिश्तों को अपने मन से लगाए बैठे होते हैं, वही रिश्ते बुरे दिनों में केवल औपचारिकता की खानापूर्ति भर निकलते हैं। ऐसे में उन औपचारिक रिश्तों की छद्म अपनापन की पोल की धज्जी उड़ जाती है और औपचारिक रिश्तों के मकड़जाल से हमें छुटकारा मिल पाता है।


हमारे बुरे वक्त ही हमारे सम्बन्धों के 'लिटमस पेपर' होते हैं, जो सामने वाले की औपचारिक सहानुभूति के छलावे और सच्ची समानुभूति की सहायता व आत्मीयता वाले अन्तरों को पारदर्शी बना देते हैं .. शायद ...


आपको आपके अब तक के जीवनकाल में कभी उपरोक्त अनुभूति हुई है क्या ? मुझे तो अपने जीवनकाल में ऐसा मुख्यतः दो बार अनुभव हुआ है। एक बार जब 2021 के कोरोनाकाल में लगभग ढाई माह तक स्वयं-पृथकवास (Self-Isolation) में रहकर मौत का निवाला बनते-बनते रह गया था। दूसरी बार गत दिसम्बर माह 2025 में एक भीषण दुर्घटना के तहत गंभीर चोटिल होने के बाद अस्पताल और अस्पताल के शल्य चिकित्सा कक्ष (Operation Theatre) के बिस्तर से लेकर घर के बिस्तर तक के सफ़र को तय करते हुए पाँच माह बाद भी अभी तक पूर्णतः स्वस्थ होने के लिए प्रतीक्षारत रहते हुए .. बस यूँ ही ...


ख़ैर ! .. आगे .. आज की बतकही के तहत २१ मई २०२६, मंगलवार को प्रसार भारती के तहत आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित होने वाले साहित्यिकी कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग तेरह मिनट के काव्य पाठ में हमारी सात बतकहियों (कविताओं) को आप सुन सकते हैं। जिनमें स्नेह, प्रेम और श्रद्धा में लिपटे रिश्तों के कई स्वरूपों को चंद शब्द-चित्रों में सजाने का प्रयास भर किया है हमने। हमारी आज की बतकही का शीर्षक- "एहसासों की धूप ..." भी इन्हीं बतकहियों में से किसी एक का वाक्यांश है .. बस यूँ ही ...


आप भी अपनी रचनाओं को लेकर सम्भवतः अपने-अपने शहर में अवस्थित प्रसार भारती के आकाशवाणी या दूरदर्शन केन्द्र जाते ही होंगे। अगर अभी तक नहीं गए हैं, तो परिपक्व रचनाकारों के अलावा .. विशेषतौर पर जो नवोदित(ता) रचनाकार हैं, उन्हें भी अपनी रचनाओं को लेकर वहाँ जाना ही चाहिए और सम्बन्धित विभाग के अधिकारी से मिल कर वहाँ अपना नाम पंजीकृत करवा लेना चाहिए। 



एक बार किसी भी शहर के प्रसार भारती के कार्यालय में आपका नाम पंजीकृत हो जाने पर वह पंजीकरण समस्त भारतवर्ष के प्रसार भारती के लिए मान्य होता है। फिर तो आप अपनी स्वरचित व अप्रकाशित चयनित रचना (कविता, कहानी, आलेख) को वहाँ के तयशुदा कार्यक्रम के लिए पढ़ सकते हैं। आपकी चयनित रचना की 'रिकॉर्डिंग' के बाद उसका प्रसारण किया जाएगा। उस प्रसारण के कुछ दिनों बाद इसके बदले सरकार द्वारा तय प्रसारण शुल्क (Fee of Broadcasting) के तौर पर कुछ धनराशि भी आपके बैंक खाता (Bank Account)  में स्वतः आ जाएगी।



तो .. आइए .. फ़िलहाल .. आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित होने वाले तेरह मिनट के उपरोक्त काव्य पाठ को निम्न 'यूट्यूब' पर सुनते हैं .. बस यूँ ही ... 👇👇👇









Tuesday, May 5, 2026

नासपीटी जाती ही नहीं ... 😡

अपने देश में पाँच राज्यों के विधानसभा के कल,04.05.2026 वाले चुनाव परिणाम के दिन हम सभी के लिए दो बातें विशेष चौंकाने वाली थीं। 

पहली बात कि .. पश्चिम बंगाल के लिए राजनीतिक दृष्टिकोण से कल का परिणाम वर्षों बाद एक नया विहान लेकर आया है। साथ ही समस्त देशवासियों के लिए भी एक शुभ संदेश भी लाया है , सिवाय कुछ तथाकथित मोदी विरोधियों को छोड़ कर .. शायद ...


दूसरी बात .. तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने इलाया थलपति उर्फ़ जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ विजय की दो वर्षों पूर्व गठित की गई राजनीतिक पार्टी- तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) की जीत। 

हालांकि दो वर्षों पूर्व गठित की गई राजनीतिक पार्टी की जीत चौंकाता तो है, परन्तु अभिनेता से राजनेता बनने वाली बात चौंकाती नहीं है, बल्कि केवल अपना इतिहास दोहराती दिखती है ; क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति का इतिहास सत्तर के दशक के बाद फ़िल्मी गलियारे से चल कर ही आता रहा है। मुथुवेल करुणानिधि, मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन (MGR), वी एन रामचन्द्रन उर्फ़ जानकी रामचंद्रन और जय ललिता जैसे नाम इसके उदाहरण हैं।


अब आज की बतकही .. बस यूँ ही ...


नासपीटी जाती ही नहीं ... 😡


पाले फिरते हैं कुछेक यूँ वहम में अहम,

मान के कि नर-काया से है हुआ जनम।

ना आज वेद-पुराणों से कोई सरोकार,

न जाने है ये सनातनी का कैसा प्रकार ?


माथे पे टीका और नाम संग 'टाइटल',

अकड़ी है गर्दन, भले हो 'सर्वाइकल'।

अहंकार को ही हैं सब मानते संस्कार,

पहचान आदमी की, पद, कोठी, कार।


दसवीं सदी के पुरखे का पता ही नहीं,

पर कोई श्रीवास्तव, तो तिवारी कोई।

हो सोच और काम इंसान के कैसे भी,

'टाइटल' ही से है बस सबको दरकार।


इंसानियत यहाँ इंसानों में आती नहीं,

और ये जाति नासपीटी जाती ही नहीं।

जाति, आरक्षण, न जाने कितने दरार,

उलझे हैं हम इनमें, वो करें आविष्कार।



{ N. B. :-  

(१) "नर-काया"


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब तथाकथित ब्रह्मा जी ने ग्यारह हज़ार वर्षों तक ध्यान करने के पश्चात अपनी आँखें खोलीं, तो उन्हें अपने समक्ष एक तेजस्वी पुरुष दिखाई दिया, जिसके हाथ में कथित तौर पर कलम और स्याही की दवात थी। ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने और उसमें गुप्त रूप से स्थित रहने के कारण उस पुरुष को तथाकथित चित्रगुप्त और उनके वंशजों को तथाकथित कायस्थ कहा गया है। इस प्रकार मान्यता है कि कायस्थ जाति की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा रूपी नर के काया से हुई है।

मेरे नाम के साथ भी अभिभावक द्वारा "सिन्हा" (तथाकथित) जैसा 'टाइटल' (तथाकथित) जोड़ दिया गया है और कहा गया है कि तुम कायस्थ जाति के हो ; परन्तु मुझे आज भी 15वीं सदी या उससे पहले की सदियों वाले मेरे पुरखों के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं हो पाया है। आपको अपना ज्ञात है क्या ? 

लोगबाग़ तो यहाँ भी नहीं रुकते .. लोग अपनी तथाकथित कायस्थ जाति के बाद भी .. श्रीवास्तव, सक्सेना, भटनागर, अम्बष्ठ, अस्थाना, बाल्मीक (वाल्मीकि गौड़), माथुर, कुलश्रेष्ठ, सूर्यध्वज, करण, गौर (गौड़) और निगम जैसी 12 उपजातियों में भेद करके अपनी-अपनी गर्दनों को अकड़ाते हैं। अपने नाम के पीछे तथाकथित "श्रीवास्तव" शब्द ज़बरन जोड़ कर तो कुछ लोग कुछ ज़्यादा ही वहम में अहम पाले अपनी साँसें लेते हैं .. शायद ... 

यही जाति-उपजाति वाला मनोविज्ञान कुछ कमोबेश हमारे देश की उपलब्ध हर जातियों में देखने के लिए मिलता है। इसके पीछे का कोई विज्ञान, कोई तथ्य, कोई गणित, कोई एतिहासिक प्रमाण .. यदि आपको ज्ञात हो तो मुझ जैसे मूढ़ का ज्ञानवर्धन अवश्य कीजिएगा .. बस यूँ ही ...


(२) "वो" = 


उपरोक्त "वो" .. वो सारे देश हैं, जहाँ के प्रबुद्ध नागरिकों में से ही वैज्ञानिक बने कुछ लोग हमारी दिनचर्या में उपयोग किए जाने वाले तमाम आम उपकरणों या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का दिन-प्रतिदिन निरन्तर आविष्कार करते आ रहे हैं। 

भले ही तमाम विदेशी आविष्कारों के बाद हमलोग उनसे प्रेरित हो कर बनाए गए भारतीय उत्पादनों को स्वदेशी मानकर अपनी-अपनी गर्दनों को अकड़ाए रहते हों। चाहे उन सारे उत्पादों की सूची में .. माचिस हो, स्टेनलेस स्टील हो, सिलाई मशीन हो, साइकिल हो, स्कूटर हो, बाइक हो, कार हो, ट्रेन हो, हवाई जहाज हो, प्रेशर कुकर हो, फ्रीज़ हो, बल्ब या एलईडी हो, ए सी हो, माइक हो, रेडियो हो, टेलीविजन हो, मोबाइल हो, लैपटॉप हो .. इत्यादि-इत्यादि हों। हम अपने आसपास नज़रों को दौड़ा-दौड़ा कर अपने आज के उपयोगी उपकरणों की सूची बनाते-बनाते थक जायेंगे .. पर उन विदेशी आविष्कारों की गिनती शीघ्र खत्म नहीं होगी.. शायद ...

अब कुछेक लोग पौराणिक कथाओं के पुष्पक विमान के लिए वहम में अहम पाल कर अपनी गर्दन आकड़ाएंगे। परन्तु अगर तत्कालीन पुष्पक विमान को एक बार सच मान भी लें, तो फिर उस कालखंड के बाद से लेकर हवाई जहाज के आने तक वह पुष्पक विमान "मिस्टर इंडिया" क्यों बना रहा ? आपको मालूम है क्या ? }




Monday, April 27, 2026

पंचम वेद ... (५)_सोलह सोमवार का व्रत ...



"पंचम वेद ...", "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !", "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !", "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" एवं "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के बाद आज उसकी अगली कड़ी .. "पंचम वेद ... (५)_सोलह सोमवार का व्रत" .. आप सभी के लिए  :-

क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...


आज की बतकही (आलेख) के शीर्षक में मुझ जैसे नास्तिक इंसान (?) द्वारा "सोलह सोमवार का व्रत" जैसे शब्द समूह जोड़ने का कारण हम इस आलेख के अंत में आप सभी से साझा करेंगे .. बस यूँ ही ...


सर्वप्रथम .. प्रसंगवश अभी हम तीन अभिनेताओं और एक लेखक-निर्देशक के बारे में संक्षिप्त में चर्चा कर लेते हैं। फिर आज की फ़िल्म की बातें करेंगे।


आज के तीन अभिनेताओं में पहला हैं- सुधीर पांडे जी, जो हिंदी भाषी फिल्मों, टी वी सीरियलों और रंगमंचों के जाने-माने वरिष्ठ अभिनेता हैं। वह "भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान" (FTII), पुणे से स्नातक हैं। उनके साथ लगभग पाँच दशकों से सहायक, चरित्र और नकारात्मक भूमिकाओं की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा में पाटिया उनका पैतृक गाँव है। 

उनके पिता देवकी नंदन पांडे जी आकाशवाणी (AIR) के प्रसिद्ध हिंदी समाचार वाचक थे। 'रेडियो-ट्रांज़िस्टर' युग के लोगों को उनकी विशेष आवाज़ की तरंगों की यादें आज भी कानों में एक खनक महसूस करा जाती है। वह 'रेडियो' से प्रसारित होने वाले नाटकों में अभिनय भी किया करते थे। वह भीष्म साहनी जी के उपन्यास "तमस" पर आधारित बनी 'टी वी सीरियल' में भी वनप्रस्थी जी नामक एक पात्र का अभिनय किए थे। 

सुधीर पांडे जी 1986-87 में डी डी नेशनल पर प्रसारित होने वाली एक सौ पाँच एपिसोड वाली 'टी वी सीरियल'- "बुनियाद" में मुख्य पात्र- हवेलीराम (आलोकनाथ) के पिता लाला गैंदामल की भूमिका में नज़र आए थे। धैर्यपूर्वक फ़िल्मों को देखने वाले दर्शकों को इनकी 2003 में आई फ़िल्म- "मातृभूमि : अ नेशन विदाउट वुमन" अवश्य देखनी चाहिए। जिसमें ये ट्यूलिप जोशी, पीयूष मिश्रा, आदित्य श्रीवास्तव और सुशांत सिंह के साथ रामशरण की भूमिका में नज़र आते हैं।


आज के दूसरे अभिनेता हैं अविनाश तिवारी, जो हिंदी भाषी फिल्मों, 'टी वी सीरियलों' और 'थिएटरों' के जाने-पहचाने युवा अभिनेता हैं। जो जन्में तो बिहार के गोपालगंज जिले में, पर पले-बढ़े और लिखे-पढ़े मुम्बई में। अभिनय का कीड़ा ही उन्हें चौथे 'सेमेस्टर' में 'इंजीनियरिंग' की पढ़ाई छोड़वा कर 'थिएटर' में शामिल करवा दिया था। बाद में अपनी अभिनय कला की क्षमता को और भी निखारने के लिए "बैरी जॉन एक्टिंग स्टूडियो" (BJAS), नई  दिल्ली से और तत्पश्चात "न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी" (NYFA) से भी अभिनय का प्रशिक्षण लिए हुए हैं।

इन्हें टी वी धारावाहिक- युद्ध (2014) और फ़िल्म- लैला मजनू (2018), बुलबुल (2020), सिकंदर का मुकद्दर (2024) से पहचान मिली। नेटफ्लिक्स पर खाकी: द बिहार चैप्टर (2022) के अभिनय के लिए भी इन्हें काफ़ी प्रशंसा प्राप्त हुई है। इनकी अन्य फ़िल्में थीं- तू ही मेरा संडे, बम्बई मेरी जान, काला एवं मडगांव एक्सप्रेस। 

हालांकि इम्तियाज़ अली द्वारा प्रस्तुत अविनाश तिवारी की 2018 में आई फ़िल्म- लैला मजनू यूँ तो 'बॉक्स ऑफिस' पर पिट गयी थी, परन्तु जब शीघ्र ही 'ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म' पर आयी तो लोगों ने पसन्द किया, क्योंकि प्रायः अधिकांशतः Gen-Z वाली युवा पीढ़ी ही 'ओटीटी प्लेटफ़ॉर्मस्' पर सक्रिय रहती है और रूमानी फ़िल्में उन्हें अत्यधिक आकर्षित भी करती हैं। युवा दर्शकों की माँग पर ही इसे पुनः छः वर्षों बाद 2024 में सिनेमा घरों में प्रदर्शित किया गया था और इस बार 2024 में सिनेमा घरों में प्रदर्शित वही 2018 की फ़िल्म- लैला मजनू  'हिट' हो गई थी। 


प्रसंगवश .. अविनाश तिवारी से जुड़ी एक और घटना .. देहरादून में हर वर्ष साहित्य, सिनेमा और समाज जैसे विषय पर तीन दिवसीय ज्ञानवर्धक एवं मनोरंजक कार्यक्रम "देहरादून साहित्य महोत्सव" (DDLF) के तहत 2024 में भी 8 से 10 नवम्बर तक यह कार्यक्रम मनाया गया था। कार्यक्रम के अन्तिम दिन 10 नवम्बर 2024, रविवार को इसी फ़िल्म- लैला मजनू के प्रचार-प्रसार के लिए इस फ़िल्म में क़ैस भट्ट उर्फ़ मजनू की भूमिका निभाने वाले अभिनेता- अविनाश तिवारी के साथ इस फ़िल्म के लेखक व निर्माता- इम्तियाज़ अली, जो मूल रूप से झारखंड के जमशेदपुर के रहने वाले हैं और युवाओं के बीच विशेष लोकप्रिय 'स्टोरी टेलर'- लक्ष महेश्वरी, जो मध्यप्रदेश के इंदौर के रहने वाले हैं। जिन्होंने आर्मी पब्लिक स्कूल, इंदौर से पढ़ाई की है और आगे प्रबंधन अध्ययन संस्थान, इंदौर से वित्त में एमबीए किया है। ये इस फ़िल्म के प्रचार-प्रसार को अपनी 'स्टोरी टेलिंग' के माध्यम से नया जामा पहनाने के लिए मंच पर उपस्थित हुए थे। लक्ष महेश्वरी का बायाँ हाथ जन्म से ही नहीं है।  परन्तु कृत्रिम हाथ से ही वह सामान्य व्यक्ति की तरह काम कर पाते हैं।

मंच पर विराजमान अविनाश तिवारी, इम्तियाज़ अली और लक्ष महेश्वरी के समक्ष अन्य आम दर्शकों की भीड़ का एक हिस्सा भर बने तब हम भी दर्शक दीर्घा में मंत्रमुग्ध बैठे हुए थे।



आज के तीसरे अभिनेता हैं रोहित चौधरी। वह भी भारतीय युवा अभिनेता हैं। इनका जन्म तो इटावा में हुआ, परन्तु आगे की पढ़ाई लखनऊ व कानपुर में हुई है। 2003 में इन्होंने थिएटर शुरू किया। ये संगीत नाटक अकादमी, 'भारतेंदु अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स' और राय उमानाथ बाली ऑडिटोरियम में अभिनय कर चुके हैं। बाद में 'नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा' (NSD) से प्रशिक्षण प्राप्त करके फ़िल्मों में आए। कई फ़िल्में .. मसलन- ज़ंगूरा, झुमरू, बरेली की बर्फी, बहुत हुआ सम्मान, कनपुरिये, जबरिया जोड़ी और गदर-2 में भी उनकी भूमिकाओं के लिए उन्हें जाना जाता है। 



फिर चौथे में .. लेखक सह निर्देशक प्रशांत झा जी हैं, जिनके बारे में ज़्यादा जानकारी तो उपलब्ध नहीं है; परन्तु वह हम दो हमारे दो (2021) गुस्ताख़ इश्क (2025) जैसी फ़िल्मों के बाद वर्तमान में "गिन्नी वेड्स सन्नी-2" (गिन्नी वेड्स सन्नी की दूसरी कड़ी-Second Sequel) जैसी फ़िल्म के लेखक और निर्देशक भी हैं।


इस फ़िल्म- "गिन्नी वेड्स सन्नी-2" को ज़ी स्टूडियोज़ और सौंदर्या प्रोडक्शन ने प्रस्तुत किया है। इसके निर्माता विनोद बच्चन और उमेश कुमार बंसल हैं। इस फिल्म में मुख्य भूमिका में अविनाश तिवारी और मेधा शंकर के अलावा लिलेट दुबे, सुधीर पांडे, गोविंद नामदेव, गोपी भल्ला, नयनी दीक्षित, विश्वनाथ चटर्जी और रोहित चौधरी सहित कई प्रतिभाशाली कलाकार हैं। 

फ़िल्म- "गिन्नी वेड्स सन्नी-2" के लिए लेखक-निर्देशक प्रशांत झा जी का कहना है, कि " गिन्नी वेड्स सन्नी- 2 " के साथ हमारा लक्ष्य एक संपूर्ण पारिवारिक मनोरंजक फिल्म बनाना था। एक ऐसी फिल्म जो हास्य, नाटक, संगीत और भावनाओं को सहजता से मिलाकर एक सुसंगत गहन सिनेमाई अनुभव प्रदान करें। "

यूँ देखा जाए तो .. रोमांस, संगीत, पारिवारिक ड्रामा से भरपूर और दिल को छू लेने वाले पलों के मिश्रण के साथ यह फ़िल्म बड़े पर्दे पर एक आकर्षक सिनेमाई अनुभव आप सभी को प्रदान करने के लिए 24 अप्रैल 2026 को भारतीय सिनेमा घरों में प्रदर्शित किया जा चुका है।


अब NSD, FTII, NYFA और BJAS जैसे संस्थानों से प्रशिक्षित उपरोक्त दो-तीन कलाकारों के साथ किसी अप्रशिक्षित अभिनय प्रेमी को एक-दो संवादों वाली छोटी-सी भूमिका निभाने का अवसर प्राप्त हो जाए और .. वो भी एक बड़े पर्दे के लिए तो .. उसके मन में कुछ-कुछ होने लगता है। बशर्ते उसके अन्दर अभिनय का कीड़ा भले ही सोया हुआ ही हो, पर जीवित हो। वैसे भी लोग कहते हैं कि कला की किसी भी विधा का कीड़ा अगर एक बार किसी को काट ले, तो उसका प्रभाव उस पर ताउम्र रहता है।


दो घंटे व चौदह मिनट की फ़िल्म- "गिन्नी वेड्स सन्नी-2" में एक दृश्य है .. ऋषिकेश के गंगा घाट का। जहाँ अपने एक 'इंटर पास' बदनाम पहलवान बेटा (अविनाश तिवारी) की शादी नहीं हो पाने के कारण एक चिन्तित और परेशान पिता (सुधीर पांडे) घाट किनारे बैठे एक ज्योतिष (मैं स्वयं- सुबोध) के पास आते हैं। मतलब दो-दो वास्तविक ब्राह्मणों (अविनाश तिवारी व सुधीर पांडे) के बीच मुझ जैसे एक ग़ैर-ब्राह्मण नास्तिक कलाकार को एक भविष्यवक्ता पुजारी के पात्र का अभिनय करते हुए .. मुझे रोमांच की अनुभूति हो रही थी। 


मुख्य पात्र सन्नी के पिता- रामसेवक चतुर्वेदी का अभिनय करने वाले काफ़ी वरिष्ठ कलाकार सुधीर पांडे जी के सम्बोधन के लिए मेरे संवाद के अनुसार "तुम" की जगह एक-दो बार "आप" का सम्बोधन 'शूटिंग' के दौरान मेरे मुँह से निकल जा रहा था। परन्तु इस फ़िल्म के लेखक-सह-निर्देशक प्रशांत झा जी ने, एक मधुर और मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति होने के नाते, इसमें सुधार के लिए बहुत ही प्यार से एक बार मुझे टोके थे। हालांकि 'एडिटिंग' के बाद भी अन्ततः मेरे द्वारा बोला गया "आप" सम्बोधन वाला ही संवाद फ़िल्म में आया है।


उपरोक्त 10 नवम्बर 2024, रविवार के "देहरादून साहित्य महोत्सव" (DDLF) की चर्चा के आधार पर कहें तो .. उसके ठीक 32 सप्ताह पश्चात 22 जून 2025, रविवार को हम ऋषिकेश में राम झूला के निकट गीता प्रेस मिष्ठान दुकान के ठीक सामने गंगा नदी के किनारे एक घाट पर इसी अविनाश तिवारी के साथ बैठे फ़िल्म- "गिन्नी वेड्स सनी- 2" के लिए कैमरे का सामना कर रहे थे। 'रोल, कैमरा, एक्शन' बोले जाने और 'क्लापरबोर्ड' (Clapperboard) की गतिविधि शुरू होने के पहले .. जब हम सभी कलाकार अपने-अपने पात्र के अनुसार अपनी-अपनी स्थिति में अपने-अपने स्थान पर पालथी मार कर बैठे हुए थे तो हमने अपनी बाईं ओर बैठे अविनाश तिवारी को ये कहने से नहीं रोक पाया कि .. " पिछले साल छः-सात माह पहले आपके सामने मैं "देहरादून साहित्य महोत्सव" में दर्शकों की भीड़ में बैठा हुआ था। तब नहीं सोचा था कि आज हम साथ बैठ कर .. इस फ़िल्म के दृश्य के लिए साथ-साथ अभिनय कर रहे होंगे। " ये बात सुनकर एक मुस्कान तैर गई थी उनके चेहरे पर और उन्होंने बधाई देते हुए मुस्कुरा कर हाथ मिलाया।


अब एक प्रशिक्षित फ़िल्मी कलाकार के साथ मुझ जैसा एक अप्रशिक्षित कलाकार अभिनय करता है, तो स्वयं में कुछ-कुछ हीन भावना आती तो है। पर .. फिर अचानक .. "लल्लनटॉप" पर सौरभ द्विवेदी द्वारा 'वेबसीरीज'- पंचायत की सुनीता राजवार के साथ-साथ अन्य दो कलाकारों के बनाए गए 'पॉडकास्ट' की याद आ जाती है। उत्तराखंड के हल्द्वानी की सुनीता राजवार, जो 'वेबसीरीज' पंचायत की क्रांति देवी और 'वेबसीरीज' गुल्लक में बिट्टू की मम्मी बनकर लोगों में काफ़ी लोकप्रिय हो चुकी हैं। उनसे जब सौरभ द्विवेदी ने उपरोक्त 'पॉडकास्ट' में पूछा कि वह जब अप्रशिक्षित कलाकारों के साथ काम करती हैं, तो उन अप्रशिक्षित लोगों के साथ काम करते हुए उन्हें कुछ कमतर लगता है क्या ? तब सुनीता राजवार का बोलना कि वह इस विषय में ठीक उल्टा सोचती हैं। उनका मानना है कि जो काम वह एनएसडी (NSD) से प्रशिक्षण लेने के बाद कर रही हैं, वही काम साथ में काम करने वाले वो सभी कलाकार अप्रशिक्षित होकर भी कर पा रहे हैं, तो फिर .. वे लोग तो उनसे ज़्यादा बेहतर हुए, क्योंकि वे लोग बिना प्रशिक्षण के वही काम दक्षता के साथ कर पा रहे हैं, जो वह एनएसडी (NSD) से प्रशिक्षण लेकर कर रही हैं। "लल्लनटॉप" के 'पॉडकास्ट' की 'यूट्यूब' पर यही सुनी-देखी बातें याद कर के फिर हमारा भी मन संतुलित-संयमित हो कर पूर्णतः सकारात्मक हो जाता है।


अंत में .. हमारी 'कास्टिंग' व चयन के लिए देहरादून के Filmchii Studio की टीम के साथ-साथ इस फ़िल्म के लेखक- निर्देशक प्रशांत झा जी के टीम को मन से नमन और आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने मेरे कई 'ऑडिशंस' के बाद मेरे अभिनय को पुनः एक बार बड़े पर्दे पर प्रदर्शन करने का यह सुनहरा अवसर प्रदान किया।





और हाँ ... आज के शीर्षक में "सोलह सोमवार का व्रत" जैसा शब्द समूह जोड़ने का कारण इस आलेख के अंत में साझा करने का हमारा वादा स्वयं ही तोड़ते हुए .. आप सभी से नम्र निवेदन कर रहे हैं, कि आप सभी अपने-अपने परिवार के साथ अपने-अपने शहर के 'मल्टीप्लेक्स' में जाइए और फ़िल्म- "गिन्नी वेड्स सन्नी-2" का आनन्द लीजिए .. फिर वहीं हम ही आपको आज के शीर्षक के "सोलह सोमवार का व्रत" जैसे शब्द समूह का प्रयोजन बतलाएंगे .. और साथ ही प्रत्येक शुक्रवार को दही-चीनी खाने के लाभ भी, परन्तु .. आपके शहर के किसी 'मल्टीप्लेक्स' के बड़े पर्दे पर .. शायद ...

पुनः उसी 'डायलॉग' .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। ", के आधार पर .. शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (६)_क, ख, ग से BPL कार्ड तक ... !" के साथ .. बस यूँ ही ...








Thursday, April 23, 2026

"पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !"

सरवर चिश्ती

"पंचम वेद ...", "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !", "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !"  और "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के बाद आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" .. आप सभी के लिए  :-

क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...


वर्तमान में घटी सर्वविदित नासिक व अमरावती की दो पाशविक एवं मक्कारी भरी घटनाओं की चर्चा तथा आठ सौ चौंतीस साल पहले 1192 के उपलब्ध इतिहास के पन्नों को टटोल कर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ और उसके शागिर्दों की मंशा एवं उनके काले कारनामों से अवगत होने के पश्चात अब ...


चौंतीस साल पहले 1992 में :-


अजमेर के जयपुर रोड में मीर शाह अली कॉलोनी में महिलाओं की शिक्षा के लिए दस एकड़ में डॉ हाजी मोहम्मद दाऊद शरीफ द्वारा 1959 में स्थापित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय से संबद्ध सोफिया गर्ल्स कॉलेज नामक एक स्वायत्त शिक्षण संस्थान है। जिसे अब तक NAAC (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा 'A+' ग्रेड मिल चुका है। हालांकि इस ग्रेड के बिना मिले भी .. 1992 में भी यह लड़कियों के लिए उस शहर का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान था।

उस दौर में 'सोशल मीडिया' और 'इंटरनेट' नहीं होने के बावजूद जब एक दिन एक अख़बार के 'फ्रंट पेज' पर उसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की छात्राओं की 'न्यूड फोटोज' 'ब्लर' करके छापे गए तो पूरे देश में तहलका मच गया। 

अचानक इसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की छात्राओं की एक के बाद एक होने वाली आत्महत्या के सिलसिले ने भी लोगों का ध्यान खींचा। उन दौर में अख़बार के पन्नों पर छपी कुछ 'हेडलाइंस' की निम्न बानगी ही काफ़ी हैं .. उन दिनों की क्रूरता की सच्चाई बयान करने के लिए। मसलन -  

"आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या है और इसके पीछे शहर के बड़े लोगों का हाथ है", 

"250 कॉलेज गर्ल्स हुईं शिकार, बँटने लगी न्यूड फोटो", 

"एक के बाद एक सुसाइड से उठा पर्दा", 

"28 परिवार रातोंरात हुए लापता" इत्यादि .. इत्यादि।


चूंकि उस कांड में शहर के रसूख़दार परिवारों के लोग शामिल थे, तो उस 'केस' को शुरुआत में भरसक दबाने की कोशिश की गयी। प्रशासन और पुलिस तो मुज़रिमों की मानो चाकरी कर रही थी। परन्तु कुछेक दिलेर 'मीडिया' और 'मास' के दबाव में हुई जाँच-पड़ताल और पक्के सुबूतों के आधार पर राजस्थान के अजमेर में उसी हिंदू विरोधी मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के दरगाह- अजमेर शरीफ़ की देखभाल करने वाले ख़ादिमों की पीढ़ियों में से एक फारूख चिश्ती को सालों तक होने वाले देश के सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार व भयादोहन कांड का 'मास्टरमाइंड' पाया गया था। 

समस्त जाँच-पड़ताल के बाद निम्न 18 आरोपियों के खिलाफ़ 'केस' दर्ज किया गया था :-

१) फारूक चिश्ती, जो तत्कालीन युवा कांग्रेस का शहर अध्यक्ष भी था, २) नफीस चिश्ती, जो तत्कालीन युवा कांग्रेस का शहर उपाध्यक्ष था, ३) अनवर चिश्ती, जो संयुक्त सचिव था और ये तीनों उसी मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के दरगाह के ख़ादिम चिश्ती परिवार से हैं। ४) अलमास महाराज, जो पूर्व कांग्रेस विधायक का नजदीकी रिश्तेदार था और आज तक वह फरार ही है। ये सभी शहर के रसूख़दार व दबंग लोग थे या .. यूँ कहें कि आज भी हैं।

इनके अलावा ५) इशरत अली, ६) इकबाल खान, ७) सलीम चिश्ती, ८) सैयद जमीर हुसैन, ९) सुहैल गनी, १०) मोईजुल्‍लाह पुत्तन इलाहाबादी, ११) नसीम अहमद उर्फ टार्जन, १२) जुहूर चिश्‍ती, १३) मोहिबुल्लाह उर्फ मेराडोना, १४) पुरुषोत्तम उर्फ बबली के अलावा १५) परवेज अंसारी, १६) कैलाश सोनी, १७) महेश लुधानी और १८) हरीश तोलानी नामक दोषियों के नाम केस दर्ज़ हुआ था। जिनमें से अंतिम चार नाम, परवेज अंसारी, कैलाश सोनी, महेश लुधानी और हरीश तोलानी सुनवाई के दौरान ही बरी हो गए थे।

जब पीड़िताओं को बयान के लिए सामने आने की बारी आयी तो कुछ लोक-लाज से मौन रहीं, कुछ हिम्मत करके तीस-पैंतीस के आसपास ही बयान के लिए आगे आईं। परन्तु इनमें से भी अधिकांश को डरा-धमका कर चुप करा दिया गया। अंत में मात्र दो लड़कियों की गवाही पर ही उपरोक्त सभी मुज़रिम पकड़े गए थे।

पीड़िताओं में से हिम्मत करने वालियों ने अपने बयान में ऐसी बातें कहीं, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। उनका कहना था, कि पहले एक छात्रा को प्रेमजाल में उलझा कर शहर के रसूख़दार परिवारों के कुछ लड़कों ने उसके साथ दुष्कर्म किया और चूंकि वो ज़माना मोबाइल का नहीं था, तो चोरी से उसकी आपत्तिजनक फोटो खींची गई। फिर उसे शहर भर में 'सर्कुलेट' कर देने की उस पीड़िता को धमकी दी गई और उसके आपत्तिजनक फोटो को नष्ट करने के बदले में उसे किसी दूसरी लड़की को बहला-फुसला कर उन दरिंदों के हवसगाह तक लाने के लिए कहा गया। एक से दो, दो से चार, चार से .. इस तरह ये सिलसिला सैकड़ों की संख्या पार करती गयी।  

इस प्रकार मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सैकड़ों हिन्दू लड़कियों का यौन शोषण कर उनकी नंगी तस्वीरें खींची थी। "गैंगरेप" और "ब्लैकमेल" के घिनौना से भी घिनौना स्वरूप को अंजाम दिया गया था। उस शहर में रहने वाले कई लोगों ने अपनी बेटी-बहनों को पेड़ से लाश बनकर लटकते देखा था।

ढाई सौ से भी अधिक पीड़िताओं के न्याय की यात्रा देश की न्याय व्यवस्था की दुर्बलताओं के कारण वर्षों तक उच्च न्यायालय, त्वरित विशेष न्यायालय (Fast Track Special Courts, सर्वोच्च न्यायालय और पॉक्सो (POCSO- Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) 'कोर्ट' के पड़ावों से होती हुई गुजरी। कुछ बरी हो गए, कुछ को उम्रक़ैद की सजा हुई, फिर सजा कम भी कर दी गई। एक तो आज तक फरार है। फिर मुख्य आरोपी अपने आप को बनावटी पागल घोषित कर के जेल से बाहर आ गया। इस प्रकार .. कारण जो भी रहा हो, अन्ततः फांसी की सजा के बिना सैकड़ों पीड़िताओं का न्याय अधूरा ही रह गया।

सर्वविदित है कि ख़बरों के अनुसार उसी मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के अजमेर दरगाह के ख़ादिम परिवार का गौहर चिश्ती .. हिन्दू दर्जी कन्हैया लाल की निर्मम हत्या के एक आरोपी रियाज अत्तारी से मिला था और “सिर तन से जुदा” का नारा देकर हिन्दुओं को धमकी भी दी थी।

इसी अजमेर शरीफ दरगाह के ख़ादिमों की "अंजुमन सैयद जादगान" नामक संगठन के सचिव सरवर चिश्ती ने उग्र बयान देकर हिंसा को बढ़ावा दिया था और पूरे देश को हिलाने की धमकी भी दी थी। उसने ख़ुद को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) नामक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य बताया था और अजमेर दरगाह से हिन्दुओं के आर्थिक बहिष्कार का आह्वान भी किया था। 

उसके बेटे सैयद अली चिश्ती और आदिल चिश्ती ने हिन्दुओं के लिए नफ़रत दिखलाते हुए हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान भी किया था। सरवर चिश्ती ने हमारी हिंदू बहन-बेटियों के विरुद्ध अपमानजनक कथन कही थी, कि - ''लड़की चीज़ ही ऐसी है .. बड़े से बड़ा फिसल जाता है।''


1992 में राजस्थान के शहर अजमेर में घटी उस भयावह सच को "चिश्ती सेक्स स्कैंडल" या "अजमेर दरगाह कांड 1992" भी कहते हैं। अगर आप के परिवार में बहन-बेटी है या नहीं भी है और आप केवल संवेदनशील इंसान हैं, तो इन सब को आज की निम्न फ़िल्म में भी देखकर आपकी आत्मा काँप जाएगी .. शायद ...




फ़िल्म - "अजमेर 92" :-


वर्तमान से लगभग तीन साल पहले 21 जुलाई 2023 को प्रदर्शित हुई दो घंटे इक्कीस मिनट की फ़िल्म - "अजमेर 92" को बनाने के लिए भी तो इसके निर्माता को एक दिल दहलाने वाली उपरोक्त दुर्घटना ने ही प्रेरित की होगी। हालांकि इस फ़िल्म को लेकर तब भी इतनी ही चिल्लपों मची थी, जितनी वर्तमान की सत्य घटनाओं पर आधारित बनी फ़िल्मों के लिए हाय-तौबा मची हुई है। बस एक 'प्रोपेगैंडा' जैसा विशेषण उसके साथ नहीं जुड़ा था। 

हालांकि ... "अजमेर 92" फ़िल्म का 'सो कॉल्ड बॉक्स ऑफिस' पर कुछ ख़ास कमाल हो पाया था। अजमेर बलात्कार कांड पर आधारित इस फ़िल्म के निर्देशक हैं पुष्पेन्द्र सिंह तथा इसके लेखक व पटकथा लेखक हैं सूरज पाल रजक, ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह और पुष्पेन्द्र सिंह की तिकड़ी।

इसके मुख्य अभिनेता हैं करण वर्मा और अभिनेत्री हैं सुमित सिंह। इनके अलावा अन्य कलाकार हैं- ज़रीना वहाब, सयाजी शिंदे, मनोज जोशी, ब्रिजेन्द्र काले, राजेश शर्मा, ईशान मिश्रा, अभिषेक, शालिनी कपूर, सीरत कौर, शहनवाज़ खान, आकाश दाहिया, सिमरन गंगवानी, अनूप गौतम, अलका अमीन इत्यादि। रिलायंस एंटरटेनमेंट (Reliance Entertainment) के इस निर्माण को कला की दृष्टिकोण से IMDb (Internet Movie Database) द्वारा 10 में से 8 'ग्रेड' मिला है।

जबकि "जमीयत उलेमा-ए-हिंद" संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी के अनुसार फ़िल्म को 'बैन' कर देना चाहिए था, क्योंकि उसके अनुसार यह फ़िल्म अजमेर शरीफ़ के दरगाह को बदनाम करने का प्रयास भर था। 


आपको भी ऐसा महसूस होता है क्या ? ...


दूसरी तरफ़ अभी हाल ही में देहरादून में भीमसेन जोशी जी के सम्मान में "भीमसेन जोशी समारोह" नामक एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच पर नृत्यांगना स्वाति सिन्हा कत्थक नृत्य पेश कर रहीं थीं, तो समी उल्लाह ख़ान गायन व हारमोनियम के साथ उनका संगत कर रहे थे। 

ना जाने ऐसे अनूठे माहौल कट्टरपंथियों की भीड़ में कब, कैसे, कहाँ और क्यों विलुप्त हो गए हैं ?


आपको मालूम है क्या ? ...


पुनः 'पॉपुलर डायलॉग' .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। ", के आधार पर .. शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (५)_सोलह सोमवार का व्रत ... !" के साथ .. बस यूँ ही ... 🙂