Wednesday, March 18, 2026

पंचम वेद ...


हमारे समाज में कुछेक या यूँ कहें कि .. अधिकतर घर-परिवारों में आज भी नाटक व नाटककारों को "नाटक-नौटंकी" तथा नृत्य व गीत-संगीत एवं नर्तकों-नर्तकियों व गायकों-वादकों को "नचनिया- बजनिया" या "तबलची" या फिर "ऑर्केस्ट्रा वाला" बोल कर उपेक्षित नज़रों से देखा जाता है। 

इन्हीं तरह के अधिकतर घर-परिवारों की अवधारणा कमोबेश कुछ हद तक लेखन क्षेत्र के लिए .. लेखक-लेखिका व कवि-कवयित्री के लिए भी नकारात्मक ही देखने के लिए मिलती है .. विशेष रूप से पुरुष प्रधान समाज में रचनाकार महिलाओं के लिए।

इसी धरती का एक वर्ग विशेष प्राणी (?) तो उपरोक्त पावन कृत्यों को हराम और ग़ुनाह मानते हुए उन्हें एक सिरे से नकार देता है। परन्तु अन्य शेष लोग भी .. विशेषतौर पर सनातनी धर्मभीरू-धर्मपरायण लोग भी अगर .. इन सबको उपेक्षित दृष्टिकोण से देखते हैं, तो अचरज होता है। 


जबकि हिंदू मान्यताओं के अनुसार भरत मुनि का मानना था, कि अतिप्राचीन चारों वेदों में से ऋग्वेद से संवाद, सामवेद से गीत-संगीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से लिये गए रस के समन्वय से ही नाटक का जन्म हुआ है। उस कालखंड में लेखन माध्यम के अभाव में मौखिक रूप से ही इन चारों वेदों के ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम नाटक ही होने के कारण .. भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नाटक को पंचम वेद कह कर प्रतिष्ठा प्रदान की है।


भारतीय वेद-पुराणों के आधार पर ब्रह्मा को नाट्यवेद का रचयिता माना जाता है, जबकि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर नाटक सदियों से क्रमवार विकसित होता आने वाला कला का एक स्वरूप है। जिसकी .. आदिम युगीन मानव द्वारा हर्षोल्लास के अवसरों पर सामूहिक बेतरतीब थिरकन से लेकर लयबद्ध सामूहिक नृत्य तक की यात्रा और फिर नौटंकी, रासलीला व रामलीला से लेकर आधुनिक नाटक तक की यात्रा भी चार्ल्स डार्विन के जैव-विकास सिद्धांत की तरह ही क्रमवार तय हुई होगी .. शायद ...


नाटक द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों में धार्मिक कहानियों को जन-जन तक सहजता से पहुँचाने के साथ-साथ .. आमजन को उन्हीं के समाज की चंद सामाजिक बुराईयों को मनोरंजक तरीके से दिखला कर उनमें सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए और कभी-कभी विशुद्ध मनोरंजन के लिए भी सदियों से होने वाला नाटक पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदियों से क्रमवार विकसित होता आया है। जात्रा जैसी लोक नाट्य शैली, डोमकच जैसी पारम्परिक नाट्य शैली, लौंडा नाच, नुक्कड़ नाटक इत्यादि भी इसी विकास यात्रा के अहम पड़ाव रहे हैं।


नाटक का वही ऐतिहासिक-पौराणिक स्वरूप आज एक बहुत बड़ा उद्योग- फ़िल्म उद्योग बन चुका है। जिसको आधुनिक युग का सर्वोच्च कलात्मक माध्यम माना जाता है, क्योंकि इनमें लेखन, अभिनय, नृत्य, गीत-संगीत, छायांकन-दृश्यांकन, 'सेट डिजाइन', प्राकृतिक दृश्यों, पोशाक परिकल्पना, सौंदर्य संयोजन, प्रकाश-ध्वनि इत्यादि जैसी तकनीकी व रचनात्मक अनेक विधाओं का समन्वय होता है। इसीलिए दर्शकों की भावनाओं को सहजता व सुगमता से उकेरने के लिए फ़िल्म को कला का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है।


परन्तु संभवतः कुछ फ़िल्में तथाकथित 'बॉक्स ऑफिस' पर कुछ विशेष कमाल नहीं कर पातीं यानी 'सिनेमा हॉल' के परिवर्तित विराट स्वरूप- 'मल्टीप्लेक्स' तक वैसे दर्शकों की भीड़ नहीं जुटा पातीं जो .. वहाँ रुपए खर्च करके जाते ही हैं केवल मनोरंजन करने के लिए या यूँ कहें कि .. सतही या फूहड़ मनोरंजन करने के लिए और वहाँ से वो निकलते भी हैं तो अपने मन-दिमाग़ को 'सो कॉल्ड रिफ्रेश' महसूस करते हुए। 


दूसरी तरफ़ इसी वर्ग के दर्शकगण 'नेटफ्लिक्स' और 'हॉटस्टार' जैसे कई 'ओ टी टी प्लेटफॉर्म' पर भी अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार अपने-अपने फ़ुर्सत के वक्त .. प्रायः दोपहर वाले खाली समय में या रात में सोने से पहले .. सोफे या बिस्तर पर अधलेटे-से अपने मोबाइल के 'स्क्रीन' पर 'स्क्रॉल' कर-कर के स्वाभाविक है कि मनोरंजन की तलाश करते हुए लीक से तनिक हट कर बनी .. कुछ विशेष सोचने या यूँ कहें कि चिंतन-मनन के लिए मजबूर करने वाली फ़िल्मों या 'वेब सीरीजों' को देखना तो कतई पसन्द नहीं करेंगे। 


अगर उन्हीं लोगों की सोचों वाली भाषा का प्रयोग करें तो ऐसे लोगों के लिए अच्छी 'कॉन्सेप्ट' या गंभीर 'कॉन्टेंट' वाली प्रायः 'डाक्यूमेंट्री' जैसी लगने वाली 'स्लो' और धैर्यपूर्वक देखी जाने वाली फ़िल्में या 'वेब सीरीज' .. उनके लिए सिरदर्द देने वाली या बोर करने वाली होतीं हैं। ऐसे दर्शकों को ऐसी फ़िल्में भूले से कभी-कभार देखने का मौक़ा मिलता भी है, तो .. उन्हें सिर दर्द भगाने वाले 'बाम' लगाने की या सिर दर्द भगाने वाली गोली खाने की आवश्यकता पड़ जाती है। भले ही उन फ़िल्मों को ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया हो या कई सारे 'अवॉर्ड' उन फ़िल्मों के नाम के साथ जुड़ गये हों।


ख़ैर .. अभी तथाकथित मसाला फ़िल्मों को पसन्द करने या देखने वालों की ऐसी भीड़ को नज़रंदाज़ करते हुए उन गंभीर फ़िल्मों के दर्शकों की नज़रों से फ़िलहाल .. .. ..


शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !" में .. बस यूँ ही ...






Saturday, March 7, 2026

Monday, March 2, 2026

गुबार मन में हो या पवन में ...



बलपूर्वक बलात्कार, छलपूर्वक धर्मांतरण, 

लगता है सभी को एक समाचार की तरह।

पड़े नहीं हाथ जब तक किसी गर्म तवे पर,

होती नहीं चीत्कार की फिर तो कोई वजह।


है आसान प्रोपेगैंडा कहना किसी वारदात को

उनके लिए, हैं जिनकी खुशनुमा शाम-सुबह।

प्रोपेगैंडा कह के सिर झटकने से पहले पूछो

उन साँसों से, होता है जिनका सरेआम जबह।


फ़तह या सुलह, सुलह या फ़तह, है ऊहापोह,

दिन-रात, सुबह-शाम, गाँव-शहर हर जगह।

अचरज से देखती है हमें जन्म देने वाली भी

जन्मदात्री प्रकृति, देख धर्म-मज़हब के कलह।


युद्ध-प्रतियुद्ध, अत्याधुनिक रासायनिक अस्त्र,

धमाके-धुआँ जानलेवा, पारिस्थितिकी दुस्सह।

हानिकारक है सदा गुबार मन में हो या पवन में,

होते हैं नष्ट देश-धरती संग समस्त ग्रह-उपग्रह।



[ प्रोपेगैंडा = Propaganda ]

Friday, February 13, 2026

Valentine's Day के बहाने ...


(१) 
आयातित बुखार :-

किसी Fast Foods या 

Junk Foods-सा 

विकार भरा

और बीमार करता,

सात-आठ दिनों में

सिंझने वाला प्यार,

देखते-देखते ही यार

पा गया ऐसा विस्तार

गोया हो कोई

Viral बुखार .. शायद ...


कड़े घाम में

लम्बी अवधि तक

आहिस्ता-आहिस्ता

पकने वाला

किसी अचार-सा

था टिकाऊ 

प्रेम-प्यार तब तो,

जब तक था फैला नहीं 

एक आयातित बुखार

Gen Z को करने बीमार .. शायद ...


(२) Sapiosexual :-


गुलाब, 

चॉकलेट, 

टेडी, 

निवेदन, 

वचन, 

आलिंगन, 

चुम्बन ...

इनमें से

कुछ भी तो नहीं  

है बीच हमारे।

एक ..

Teenager Love 

या Lust भी तो नहीं ..

ना .. ना .. कतई नहीं .. शायद ...

मगर ..

अदीठ होकर भी

शामिल हैं हम-तुम ..

एक-दूसरे की

रोज़-रोज़ की जो

सुबह की अंगड़ाई में, 

दुपहरी की पुरवाई में,

शाम की जम्हाई में,

रात की तन्हाई में,

पल-पल पनपी

सोचों की तरुणाई में 

गोया ..

फैली हुई हो 

सुगन्ध कोई

इर्द-गिर्द हमारे।

इतना ही सब कुछ

है पर्याप्त शायद

हमारे .. 

Spritual 

Sapiosexual

Soul Connection के लिए .. बस यूँ ही ...

Sunday, February 8, 2026

चूड़ीदार ...


हाल ही में Google पर एक घटना की जानकारी मिली कि केरल के कोल्लम में एक स्कूल हेडमिस्ट्रेस को 'चूड़ीदार' पहनने के कारण स्कूल के मैनेजर के निर्देशानुसार सिक्योरिटी गार्ड ने गेट पर ही रोक दिया। हालांकि पुलिस के आने के बाद उन्हें अन्दर जाने दिया गया और गार्ड को सस्पेंड भी कर दिया गया।


गत वर्ष की एक ख़बर के मुताबिक़ अपने देश में एक राज्य के माननीय मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी, जो एक social worker होने के नाते एक सफ़ाई अभियान में शामिल हुईं थीं। क्योंकि हर वर्ष की तरह ही गत वर्ष भी so called भक्तगण ने गणेश मूर्ति विसर्जन के दौरान Juhu Beach पर गंदगी फैलायी थी, उसी की सफ़ाई के लिए। उस दौरान उनके पहने गए परिधान के लिए भी सभ्यता-संस्कृति के so called पक्षधर लोग सोशल मीडिया पर ऊटपटाँग प्रतिक्रियाएँ दिए जा रहे थे।

कुछ प्रतिक्रियाओं के अनुसार Public Place में तो उन्हें ऐसी पोशाक पहननी ही नहीं चाहिए थी। ऐसी पोशाक उन महानुभावों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का सवाल था।

तो फिर यही लोग देश की तमाम महिला Athlete और महिला तैराक के लिए Public Place पर किस तरह की पोशाक पहनने की सलाह देंगे भला ? 



क्योंकि वो सभी महिला Athlete और महिला तैराक लोग तो सार्वजनिक स्थलों पर उन से भी कम कपड़ों में अपने खेलों का प्रदर्शन करती हैं और राष्ट्रीय सम्मान के लिए अनगिनत Medals लेकर भी आती हैं। 

कम पोशाकों के लिए ऐसी छिछोरी प्रतिक्रियाएँ देने वाले ये वही देशभक्तगण और सभ्यता- संस्कृति के so called पक्षधर लोग हैं , जो खैनी और गुटखा मुँह में ठूंस कर Happy Republic Day और Happy Independence Day बोलते हैं। 

या 2 October को Dry Day होने से पहले खरीदे गए बोतलों से National Holiday का लुत्फ़ लेते हुए One Leg with Two Peg के  साथ Happy Birthday Gandhi बोलते हैं।



ये वही लोग हैं, जो महिलाओं को समुद्र में या swimming pool में नहाते हुए या फिर गंगा स्नान करते वक्त उनके गीले परिधानों में उन्हें ताड़ते रहते हैं।




ये वही लोग हैं जो, पूजन स्थल के भीतर नग्न या अर्द्धनग्न, उत्तरीय वस्त्र या लंगोटी वाली मूर्तियों के रहने पर भी, बाहर से अन्दर जाने वाले so called भक्तों के लिए skirt, sleeveless या barmuda पहन कर प्रवेश वर्जित की तख़्ती लगाते हैं।


ये वही लोग हैं, जो .. Sports Channel को भी Fashion Channel की तरह देखते हैं और हम-आप अगर Fashion Channel को Discovery Channel की तरह भी देखते हैं, तो उनके पेट में मरोड़ होने लगती है।


ये वही लोग हैं, जो किसी के पैरहन से उसका चरित्र चित्रण या आकलन करते हैं। हद हो गयी यार !!!


याद होगा कि हम सभी ने कोरोना काल में तत्कालीन परिस्थितिवश अपने-अपने चेहरे पर मास्क लगाए थे, ना कि कोरोना वायरस को मास्क पहनाया था। तो अगर जिस समाज को किसी महिला की सुन्दरता से उनकी नीयत बिगड़ने का भय है, तो उस समाज को अपनी नीयत पर पर्दे डालने की ज़रूरत है, ना कि उस महिला को अपने चेहरे या शरीर को पर्दे में बंधक बनाने की ज़रूरत है .. शायद ...




Wednesday, January 28, 2026

ABC नियम ...


कल तक UGC के 2026 वाले नए क़ानून का उठा-पटक चल ही रहा था, कि आज अजीत पवार जी की दुर्घटनाग्रस्त अकाल मृत्यु ने News Channel वालों की Topic ही change कर दी। यूँ है तो ये एक दुखद घटना ... 

परन्तु आज ही एक और महत्वपूर्ण ख़बर सुनी है कि आज ही Supreme Court में देश के स्वदेशी कुत्तों के बारे में चल रही सुनवाई की एक और कड़ी आगे बढ़ी है। News Channel वालों की Coverage इस समाचार के लिए नहीं थी शायद। पर इस दौरान Supreme Court ने सभी राज्यों को ABC नियमों यानी Animal Birth Control के तहत कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और उन्हें उचित Shelter Home (?) में रखने का निर्देश दिया है। कल भी सुनवाई होगी .. शायद ... 

अगर इस विषय पर मैं अपनी बतकही आप सभी देश के बुद्धिजीवियों के द्वारा जज साहिब तक पहुँचा पाता तो .. कहता .. जज साहिब ! .. इस देश की बढ़ती मानव जनसंख्या से जो नाना प्रकार की समस्याएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जन्म ले रही हैं और देश की जनसंख्या पड़ोसी देश से भी ज़्यादा होकर विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन गया है हमारा देश। तो आप Human Birth Control के लिए कब तक और क्या प्रावधान लाएंगे ? या अधिकतम जनसंख्या से ही विश्वगुरु बनने-बनाने का इरादा है आपका ? आएँ ?

कहता .. जज साहिब ! .. जैसे विश्व भर का हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता, परन्तु हर आतंकवादी मुसलमान ही होता है। जैसे हर मांसाहारी इंसान असंवेदनशील नहीं होता, परन्तु असंवेदनशील इंसान ही मांसाहारी होता है। जैसे हर शराबी विवेकहीन नहीं होता, परन्तु विवेकहीन इंसान ही शराबी होता है। ठीक वैसे ही हर कुत्ता काटने वाला नहीं होता, परन्तु हर काटने वाला सजीव प्राणी कुत्ता ही होता है। चाहे वो काटने वाला चौपाया कुत्ता हो या फिर दो पैरों वाले इंसान के शरीर में बलात्कारी कुत्ता या इंसानी भेड़िया हो। 

कुत्ते के काटने पर Rabies से बचने के लिए दवा के बाज़ारों में तो Injections उपलब्ध हैं। परन्तु .. एक बलात्कृत बच्ची के Broken Hymen Membrane यानी शीलभंग का क्या इलाज है भला ? जो कि दुर्भाग्यवश तो कतई नहीं .. निःसंदेह दुर्भावनावश इस पुरुष प्रधान समाज में उसकी so  called Virginity की so called Criteria भी है। 

बलात्कार के समय तो so called भूत-प्रेत से बचाने वाला so called हनुमान चालीसा का पाठ या कुरान की आयतें या कलमा या फिर बाइबल के वचन भी उसकी रक्षा करने में असमर्थ रहते हैं।

 .. शायद ...

एक-दो हिंसक कुत्तों के कारण गली के सभी देशी नस्ल के बेसहारा कुत्तों को आवारा नाम देकर उन्हीं हिंसक कुत्तों के साथ एक ही 'शेल्टर (?) होम' में रखे जाने का Supreme Court का फ़ैसला या यूँ कहें कि .. फ़रमान .. ठीक वैसा ही है कि गोया शहर के उन सभी चंद बलात्कारी दरिंदों मर्दों के साथ ही शहर के सभी रोड पर घूमने वाले Gen Z को भी एक ही कारावास में एक साथ बंद कर दिया जाए।

अगर हम सभी अपने-अपने सामर्थ्य  के अनुसार आसपास के लावारिस पशु-पक्षियों के पालनहार बन जाएं, तो Shelter Home (?) की नौबत ही नहीं आएगी। पर नहीं ...

ये सब हमारे दोगले समाज .. ओह Sorry .. दोहरी नीति वाले समाज की वज़ह से है। एक तरफ़ तो ये हर शनिवार काले लिबासों में so called शनि मंदिर में LED के युग में भी दिन के उजाले में दीए जलाएंगे और दूसरी तरफ़ उनके so called वाहन को यानी कुत्ते को अपने दरवाज़े से दुत्कारेंगे। और हाँ, कहते हैं कि कुत्ते शनि ही नहीं .. भैरव के भी वाहन हैं। अभी गत 12 नवम्बर को ही अपने देश में कालभैरव अष्टमी भी मनाई गई है हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा। 

और तो और ... पशुपतिनाथ यानी पशुओं के नाथ यानी शिव के मंदिरों में जाकर लोग पत्थर के बने नंदी के कान में कानाफूसी करेंगे, पर अगर उनके दरवाज़े पर या बाज़ार में सजीव बैल या साँड़ दिख जाए तो मार कर भगाएंगे। 

अरे कुछ तो शर्म करो, so called इंसानों ! 

जागो इंसानों जागो ! .. बस यूँ ही ... 

Monday, January 26, 2026

"पूर्ण स्वराज दिवस" (?) ...

 


राष्ट्रीय छुट्टी, मौज-मस्ती, झण्डे, परेड व मिठाइयों के डिब्बे,

बोलना अंग्रेज़ी में एक-दूसरे को Happy Republic Day.


दोहे-चौपाई, कलमा, ख़ूब रटे, पर पलटे नहीं संविधान के पन्ने,

बस इतना ही काफ़ी है हमारा मौसमी देशभक्त बनने के लिए।


गणतंत्र दिवस है, 26 जनवरी .. 26 लोगों को भी याद कर लें,

ना पढ़ने पे कलमा, पहलगाम में गँवाई जिन्होंने अपनी जानें। 


2026 का 26 जनवरी है आया, 1950 से सफ़र तय करते हुए,

पर है 26 जनवरी का उद्गम, 1930 के "पूर्ण स्वराज दिवस" से

.. शायद ...