Sunday, April 19, 2026

नौ सप्ताह का गर्भ ...






क्या ? ...

गंगा घाटों पर है भगवान ?

या पत्थरों में है भगवान ?

नींद, चैन-सुकून में है भगवान ?

या बेजुबानों में है भगवान ?

मन्दिरों में है भगवान ?

या श्मशानों में है भगवान ?


किंकर्तव्यविमूढ़ ! ...

दुधमुँहे के 

दुग्धपानों में है भगवान ?

या नौ माह तक गर्भ सम्भाल,

प्रसव पीड़ा को झेल,

जन्म देने वाली 

माँ ही है भगवान ?


तो फिर ..

नौ माह ना सही,

नौ सप्ताह तक ही 

गर्भ संभालने वाली 

श्वान माँओं (कुत्तियों) में भी तो 

होते ही होंगे ना भगवान ? 

है ना ? ...


(उपरोक्त वीडियो में बतकही से संबद्ध चित्रों / दृश्यों का समावेश है।)


Instagram Link :-

(https://www.instagram.com/reel/DXSAbqbEpWb/?igsh=MjhjM2RxdTh3bmds)

Friday, April 17, 2026

"पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !"


"पंचम वेद ...", "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !", और "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !" के बाद आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (४)_ 'प्रोपेगैंडा' !", परन्तु दो भागों में - "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" एवं "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !"। 

चूंकि इस बार का आलेख अति लम्बा होता चला गया है, तो "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" अगले अंक में एवं .. आज केवल "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" .. आप सभी की नज़रों एवं निगहबानी के लिए  :-

क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...


प्रोपेगैंडा ( Propaganda ) और वर्तमान :-

अभी हाल ही में देखे-सुने गए समाचार के अनुसार महाराष्ट्र के नासिक में TCS जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में एक समुदाय विशेष के कर्मचारियों द्वारा हिन्दू महिला कर्मचारियों को साजिशन प्रेम जाल में उलझा कर या 'इन्क्रीमेंट' व 'प्रमोशन' का लालच देकर लव जिहाद, धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न जैसी कुकर्मों को गत चार वर्षों से अंजाम दिया जा रहा था। 

साथ ही .. आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती में उसी समुदाय विशेष के मात्र 19 साल के छोकरे द्वारा, जो AIMIM नामक राजनीतिक दल से भी जुड़ा है, हालांकि ये आलेख लिखे जाने तक .. अब तक उसे दल से निलम्बित किया जा चुका है, साजिशन लगभग 180 हिन्दू युवतियों व नाबालिग लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाकर उनका यौन शोषण किया जा रहा था और उनका अश्लील वीडियो बनाकर भयादोहन (Blackmail) भी किया जा रहा था। 

अब इन कुत्सित व भयावह घटी घटनाओं के दस-बीस साल बाद अगर इन सच्ची घटनाओं पर फ़िल्में बनेंगी, तब भी उन फ़िल्मों को हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी समाज के कुछ आवश्यकता से अधिक बुद्धिमान लोग 'प्रोपेगैंडा' कहने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे .. शायद ...

यूँ तो भिन्न-भिन्न मतों के लोग हर कालखंड में रहते आए हैं, तो स्वाभाविक है कि वर्तमान में भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे ही। मत भिन्नता के लिए विषय तो कुछ भी हो सकता है। जैसे .. इन दिनों फंतासी से परे और देश-समाज को आईना दिखलाती सच्ची घटनाओं पर आधारित कुछ फ़िल्में प्रदर्शित हुईं हैं, तो कुछ लोगों के लिए सच्ची घटनाओं पर आधारित ये फ़िल्में उन घटनाओं का एक अंश मात्र भर ही है ; जबकि वास्तविकता इससे भी ज़्यादा भयावह थी या .. है। वहीं .. कई लोगों के लिए ये फ़िल्में एक 'प्रोपेगैंडा' मात्र है, जो वर्तमान सरकार को खुश करने के लिए और एक समुदाय विशेष को बदनाम करने के लिए बनायीं गईं हैं .. शायद ...

जब कि उन फ़िल्मों को बनाने के लिए प्रेरित करने वाली सच्ची भयावह घटनाओं का सही-सही अनुमान उन्हीं परिवारों को है, जिनकी हथेलियाँ उन पाशविक दुर्घटनाओं रूपी गर्म तवे पर पड़ी हैं। सामने से केवल देख कर तवे के तापमान का अनुमान नहीं लगाया जा सकता .. है ना ? 

इस बार तीन साल पहले प्रदर्शित हुई जिस फ़िल्म की चर्चा करनी है, उससे पहले चौंतीस साल पूर्व 1992 में दिल दहलाने वाली जिस सच्ची घटना पर वह फ़िल्म आधारित थी, उस घटना की हमें ताक-झाँक करनी होगी। परन्तु इससे भी बेहतर होगा, उससे भी पहले आठ सौ चौंतीस साल पुराने 1192 के इतिहास के पन्नों को टटोलना। फिर तो चौंतीस साल और आठ सौ चौंतीस साल पूर्व की घटनाओं को दोहराने के बाद इस फ़िल्म को बनाने की वज़ह हमें पूर्णतः ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ जाएगी। तभी उस फ़िल्म के लिए भी तथाकथित 'प्रोपेगैंडा' वाला फैलाया गया भ्रम दूर हो पाएगा .. शायद ...


आठ सौ चौंतीस साल पहले 1192 में :-

उपलब्ध इतिहास के अनुसार एक ईरानी- मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ बारहवीं शताब्दी के अंत में लगभग 1192-93 के आसपास मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत में लाहौर होते हुए अजयमेरू आया था और मुहम्मद ग़ोरी द्वारा अजयमेरू को जीतने से पहले तत्कालीन प्रशासनिक एवं राजनीतिक केन्द्र अजयमेरू के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए मुहम्मद ग़ोरी के कहने पर अपने शार्गिदों के साथ बस गया था। वही अजयमेरू बाद में शायद मुस्लिमों द्वारा अपभ्रंश हो कर अजमेर हो गया होगा।

अजयमेरू में पृथ्वीराज चौहान के दादा जी- अर्णोराज यानी आना जी चौहान द्वारा एक ऐतिहासिक कृत्रिम झील- आना सागर झील और विष्णु के तथाकथित तीसरे अवतार- वराह का मन्दिर भी बनवाया गया था। इतिहास के अनुसार .. जहाँ मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय को क़त्ल करते थे और मंदिर परिसर में ही बैठकर गोमांस खाते भी थे। उनकी मंशा मंदिरों को अपवित्र कर के हिंदुओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की थी। 

दरअसल सूफी संत का पैरहन ओढ़ कर प्रेम, शान्ति और मानवता के संदेशों को फैलाने के नाम पर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ उन दिनों इस्लामिक जिहाद को विस्तार दे रहा था। जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत की विसात बिछाने का काम बख़ूबी किया जा रहा था। धर्मांतरण और साम्राज्यवाद के लिए क्रूरता की सारी हदें पार की गयीं थीं। 

धर्मांतरण के लिए राजी नहीं होने पर इन्हीं सूफ़ी-संतों के फ़रमान पर तथाकथित बहत्तर हूरों की चाह में तथाकथित शरिया क़ानून, ग़ज़वा-ए-हिंद और जिहाद की आड़ में उनके शागिर्दों ने हज़ारों-लाखों पुरुषों का कत्लेआम किया और महिलाओं-लड़कियों को जबरन अपनी हवस की आग में झोंक दिया था। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती और उसके तमाम शागिर्द हिंदू विरोधी, गौ हत्यारे और मन्दिर-मूर्ति भंजक थे।

इतिहास के गर्त में ऐसे दसों उदाहरण हैं औलिया-फ़कीरों के जो अपने तमाम शागिर्दों के साथ भारत के कई हिस्सों में मुस्लिम आक्रांताओं के साथ इस्लामिक जिहाद को बढ़ावा देने, तथाकथित काफ़िरों के धर्मांतरण करने और इस्लाम का प्रचार करके उसे स्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए थे।

हालांकि उपलब्ध इतिहास की मानें तो पैगम्बर मोहम्मद के तथाकथित आदेशानुसार मोइनुद्दीन हसन चिश्ती ने जीवन के आख़िरी वर्षों में दो शादियाँ की थी। इतिहास के कई पन्नों में तो कुछ शागिर्दों द्वारा उसे हिंदू लड़कियों-महिलाओं को उपहार स्वरूप पेश किए जाने का भी ज़िक्र मिलता है।

इस्लामिक विचारकों और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा सदियों उपरोक्त होने वाले क्रूर हिंसात्मक उत्पीड़न की वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर सदियों से प्रेम, शान्ति, मानवता और भाईचारे के मिथक रूप में प्रस्तुत करने के क्रम में .. मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के मरणोपरांत अजमेर में बने उसके अजमेर शरीफ़ नामक दरगाह को एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में पेश किया गया। जहाँ आज भी कई हिन्दू लोग भी तथाकथित चादर चढ़ाने जाते रहते हैं। रही-सही कसर पूरी करते हुए बम्बईया फ़िल्मों द्वारा इस स्थल को शिरडी और साईं बाबा की तरह ही ख़ूब महिमामंडित करने का भी ये दुष्परिणाम है।

एक और भी महत्वपूर्ण कारण और स्रोत भी रहा है उपरोक्त महिमामंडन का, क्योंकि .. सर्वविदित है कि स्वतंत्रता के पूर्व उच्च विद्यालय सहित उसके नीचे और ऊपर की कक्षाओं के लिए भी इतिहास के पाठ्यक्रमों को औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रेरित होकर बनाए गए थे, जिनमें ब्रितानी शासन को सभ्य बनाने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया था। उसी प्रकार स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्र भारत में भी जब, अब तक की सबसे लंबी अवधि 11 वर्षों तक बने रहने वाले, शिक्षा मंत्री- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा तत्कालीन सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की धर्म निरपेक्षता के नाम पर पक्षपाती नीति की आड़ लेकर हिंदू विरोधी मुग़ल काल को आक्रांताओं के काल की जगह उस काल के आक्रांताओं को नायकों की तरह इतिहास के पाठ्यक्रम में दम भर महिमामंडित किया गया था।

हालांकि उसी समुदाय से इंसानियत को ही अपना धर्म- मज़हब मानने वाले भी कई लोग हुए हैं और आज हैं भी। परन्तु उन सभी की जनसंख्या "ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन" वाले मुहावरे को भी चरितार्थ करने लायक नहीं हैं .. शायद ...

ऐसे लोगों में से प्रसिद्ध लोगों में स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल ग़फ्फार ख़ान, शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान, विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम, लालोन फ़कीर, गायक मोहम्मद रफ़ी, रचनाकार निदा फ़ाज़ली, लेखक सह पत्रकार व विचारक तारिक़ फ़तह, लेखिका इस्मत चुगताई व तस्लीमा नसरीन, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफ़ज़ई के नाम स्वतःस्फूर्त मस्तिष्क में आ जाते हैं। इनके अलावा उस समुदाय के वो सभी सच्चे सैनिक लोग जो देश के लिए जीते हैं एवं देश के लिए ही कभी-कभी शहीद भी हो जाते हैं और वो सभी कलाकार या आमजन भी, जो .. साजिशन या जबरन किए जाने वाले धर्म परिवर्तन व यौन शोषण को हराम मानते  हैं और ग़ज़वा-ए-हिंद जैसे दुष्टता व मक्कारी भरे सपने भी नहीं देखा करते हैं .. शायद ...


चौंतीस साल पहले 1992 में :-

1959 में अजमेर के जयपुर रोड में मीर शाह अली कॉलोनी में दस एकड़ में महिलाओं की शिक्षा के लिए डॉ हाजी मोहम्मद दाऊद शरीफ द्वारा स्थापित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्वायत्त शिक्षण संस्थान है- सोफिया गर्ल्स कॉलेज, जिसे अब तक NAAC (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा 'A+' ग्रेड मिल चुका है। हालांकि इस ग्रेड के बिना मिले भी .. 1992 में भी यह लड़कियों के लिए उस शहर का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान था।

पुनः उस एक 'पॉपुलर डायलॉग' - " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " के आधार पर .. अब शेष बातें ज़ल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के साथ .. जिसमें होगी .. 1992 में घटी चौंतीस साल पहले की दुर्घटना और उस पर आधारित बनी फ़िल्म की बातें .. बस यूँ ही ...

Wednesday, April 15, 2026

तब तो .. ज़िन्दगी और भी ...


 




 (१)

तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


सुबह-सवेरे टहलते हुए कभी

डालियों पर पेड़ों की 

या फिर कुछ पौधों की

झुरमुटों में कभी,

सुनकर आवाज़ें 

बुलबुलों की जोड़ी की,

साथ हमारे ठिठकती कभी तुम भी।

सुन कर चहचहाहट गौरैयों की 

मन ही मन मंद-मंद मुस्कुराती, 

साथ हमारे निहारती उन्हें कभी तुम भी।

आवारा तो नहीं, 

पर बेचारे बेसहारे 

गली-मोहल्ले के कुत्तों को भी 

पुचकारती-सहलाती कभी तुम भी।

साथ हमारे उन्हें खिलाती, 

उन्हीं की पसन्द के, 

प्यार से कुछ भी कभी तुम भी।

संग हमारे हर रोज़ आती 

सुबह-शाम छत्त पर भी,

दाने कुछ मूँगफली, बाजरे-कँगनी के, 

गिलहरी, पक्षी-वृंद को चुगाती कभी तुम भी .. बस यूँ हीं ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...



(२)

तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


हर शाम .. साथ मेरे

लगाए टकटकी,

चाँद-तारों को 

आसमानों में निहारती,

टहपोर चाँदनी में पूर्णमासी की, 

संग मेरे गोते लगाती कभी तुम भी। 

बेशक़ तुम किसी शाम 

ऋषिकेश में करती गंगा-आरती,

पर तदोपरान्त ..

अमावस के धुंधलके में

या कभी पूर्णमासी की 

चाँदनी में बैठ कर 

सीढ़ियों पे घाट की, 

कलकल बहती गंगधार में 

गोते अपने पैरों को, कभी-कभार, 

घँटों साथ हमारे, पुरानी फ़िल्मी 

युगल गीत एक रूमानी -

" अपनी कहो ~~

कुछ मेरी सुनो " ~~ के तर्ज़ पर,

कुछ .. अपनी कहती, 

कुछ .. मेरी भी सुनती .. कभी तुम भी .. बस यूँ ही ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...



(३)


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...


ग़ज़ल पसंदीदा अपनी कोई

सुनूँ किसी शाम जो, 

तो .. तुम बीच में टोकती,

और उस ग़ज़ल के कुछ 

ख़ालिस उर्दू शब्द के  

मायने भी पूछती मुझसे कभी।

कभी युगल गीत रूमानी कोई

गुनगुनाने-गाने पर मेरे,

संग-संग नारी स्वर अपना भी

मिलातीं साथ मेरे कभी तुम भी,

मैं मुखड़ा गाता,

तुम अंतरा गातीं

या गीत के सम पर किसी

वाद्य यंत्रों की जुगलबंदी-सी

थाप अपनी हथेलियों की,

लिए खनखनाहट अपनी चूड़ियों की,

पीठ पर मेरी थपथपाती कभी।

या फिर .. 

बतकही पर मेरी किसी, 

"वाह-वाह" ना सही,

निकालती कोई मीन-मेख ही तुम कभी .. बस यूँ ही ...


तो .. ज़िन्दगी तो यूँ .. अच्छी ही है मोटामोटी,

पर .. तब तो .. ज़िन्दगी और भी बेहतर होती .. शायद ...





[ सभी तस्वीरें "M. F. Hussain A Pictorial Tribute by Pradeep Chandra" नामक पुस्तक के सौजन्य से. ]


Friday, April 3, 2026

हाथीपैला का शरबत ...


इस फूल को सिक्किम में
हाथीपैला कहा जाता है, जिसकी पंखुड़ियाँ लगभग एक छिले हुए केले के पाँच खण्डों में बँटे छिलके की तरह होती हैं। यह फूल मधुर और सुगन्धित होने के कारण चमगादड़ इन की तरफ़ काफी आकर्षित होते हैं। ये फूल हरसिंगार या महुआ के फूल की तरह ही खिलने के बाद केवल एक रात के बाद झर कर ज़मीन पर बिछ जाते हैं। इस फूल के खिलने का मौसम लगभग वसंत ऋतु होता है यानी .. लगभग मार्च से जून तक।   



इसके पेड़ के पत्ते की अत्यधिक लम्बाई-चौड़ाई के कारण इसे Dinner Plate Tree यानी खाने की थाली वाला पेड़ भी कहा जाता है। इस फूल को पश्चिम बंगाल में रोसु कुंडा, English में Bayur Tree बोलते हैं और इसका Scientific नाम है- टेरोस्पर्मम एसरीफोलियम (Pterospermum acerifolium) परन्तु हिंदी भाषी क्षेत्र में इसे ही कनक चंपा, मुचकुंद या पद्म पुष्प कहा जाता है।



यह वृक्ष अपने देश भारत के कुछ तटीय राज्यों के साथ ही म्यांमार में भी पाया जाता है। म्यांमार .. जिसे 1989 से पहले बर्मा कहा जाता था और 1937 के पहले यह भारत का ही हिस्सा था।  

इसके पत्ते और छाल चेचक व खुजली की दवा बनाने में उपयोग किए जाते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो खांसी, वात-पित्त दोष, त्वचा संबंधी विकारों व बवासीर के उपचार में इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग किया जाता है। परन्तु आज हम आधुनिक रासायनिक दवाओं के सामने इन प्राकृतिक उपहारों को अनदेखा करते जा रहे हैं .. शायद ...

इसके वृक्ष की लाल रंग की लकड़ी से तख्ते, बक्से या दराज आदि बनाये जाते हैं।

संस्कृत में एक प्राचीन श्लोक के अनुसार -

मुचकुन्दः क्षत्रवृक्षचित्रकः प्रतिविष्णुः।

मुचकुन्दः शिरःपीड़ापित्तस्रविषानाशनः।

अर्थात् -

मुचकुंद, क्षत्रवृक्ष, चित्रक और प्रतिविष्णु इसके पर्यायवाची हैं। यह सिरदर्द, पित्त दोष, रक्तस्राव संबंधी विकारों को दूर करता है और विष प्रभाव (Toxic effects) के उपचार में भी सहायक होता है।


आयुर्वेद के अनुसार कनक चंपा के फूलों के शरबत में औषधीय गुण भरपूर होता है। जो शरीर के ठंडक और श्वसन संबंधी विकारों में राहत प्रदान करता है। साथ ही पित्त नियंत्रण और सूजन कम करने का काम करता है। इसके शरबत का सेवन बुखार, सिरदर्द और पाचन सम्बन्धी समस्याओं में भी बहुत ही लाभप्रद है। 



अब शरबत बनाने के लिए .. सबसे पहले तो अपने आसपास इसके वृक्ष की तलाश कीजिए। चूंकि इसके फूलों के खिलने का मौसम लगभग मार्च से जून तक होता है। तो इन दिनों अगर इसके फूलों से भरा वृक्ष दिख जाए .. और वृक्ष से फूल तोड़ा गया हो तो बिना धोए अन्यथा अगर टपके हुए फूलों को ज़मीन से उठाया गया हो, तो हल्का-सा धोकर आठ-दस फूलों को किसी शाम में ही एक बर्त्तन में फूल डूबने भर पानी में डालकर रात भर के लिए छोड़ दीजिए। 

फिर सुबह-सुबह उसे छान कर स्वादानुसार मधु या गुड़ मिला कर या फिर अगर आप मधुमेह से पीड़ित हैं, तो बिना शक्कर के भी पी सकते हैं। औषधीय प्रभाव के साथ-साथ इसकी भीनी-भीनी सुगन्ध से आपको तरोताज़गी मिलेगी और मानसिक तृप्ति भी।
वैसे सालों भर इस फूल का शरबत पीने के लिए इसके फूलों का सुखौता बना कर रखा जा सकता है। अगर आपके मुहल्ले, गाँव-शहर में इसका वृक्ष नहीं भी है, तो उदास होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि .. कई Online Market Platforms पर इसका सुखौता क्रय-विक्रय के लिए उपलब्ध है।

अब अगर आपकी रुचि ऐसे अनमोल प्राकृतिक उपहारों के बारे में जानने और चखने में है, तो आशा है कि आपको इसका शरबत अच्छा लगेगा .. शायद ...


अब .. मैं तो चला .. भीनी-भीनी सुगन्ध से सराबोर और औषधीय गुणों से सम्पन्न
हाथीपैला यानी मुचकुंद के फूलों का शरबत पीने के लिए .. बस यूँ ही ...







Wednesday, April 1, 2026

"जै जै जै हनुमान गोसाईं" ...


बीते कल यानी 31 मार्च को हिंदी पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के त्रयोदशी को हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी जैन धर्मावलंबियों द्वारा जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती मनायी गयी है और .. आने वाले कल यानी .. 02 अप्रैल को हिंदी पंचांग के अनुसार इसी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन हिन्दू लोग अपनी मान्यता के अनुसार हनुमान जयंती मनाने वाले हैं।


इन दो दिनों के अन्तर में मनाए जाने वाले इन दोनों उत्सवों के संदर्भ में मेरे नासमझ बचपन में बहुत ही ऊहापोह होता था, कि अभी परसों ही महावीर जयंती मनाई गई है और आज फिर हनुमान जयंती ? भला ये क्या बला है ? और .. मेरा ऊहापोह भी कोई निरर्थक नहीं था। उसकी वजह थी, कि .. सभी लोग हनुमान को महावीर नाम से भी बुलाते हैं।


वैसे तो अभिभावक द्वारा मेरे उस नासमझ ऊहापोह को खत्म करने का प्रयास किया गया था। परन्तु तदोपरान्त विद्यालय में पढ़ाई के दौरान विशेष रूप से हम महावीर को जान पाए। पर .. सच्चाई तो ये है, कि हम उन महान विभूतियों को जान ही नहीं पाते हैं .. केवल पढ़ पाते हैं .. शायद ...


आज भी तीर्थंकर महावीर की सोचों से हम कोसों दूर हैं। जिनका दिया मूलमंत्र है - अहिंसा परमो धर्मः यानी जियो और जीने दो। अहिंसा, आत्म-नियंत्रण और करुणा उनके संदेश हैं। उनके अनुसार सत्य की राह पर चलना, अपरिग्रह यानी इच्छाओं पर नियंत्रण और वर्तमान में जीना ही हमें मनुष्य की श्रेणी में रखता है।

अगर तीर्थंकर महावीर की बहुमूल्य बातों को हम मन से मानें तो मांसाहार हम सभी को त्याग देना चाहिए,


क्योंकि मांसाहारी बाज़ार से कच्चा मांसाहार भोजन (?) को .. हमारी रसोई और रसोई से हमारी थाली और हमारी थाली से हमारे निवाले और पेट तक पहुँचने के पहले .. अत्यधिक पीड़ाओं से होकर गुज़रना पड़ता है .. शायद ...


आइए .. अभी तो .. हनुमान जयंती के लिए वेद, भेद और खेद के फुँदने वाली बंदनवार से अपने मन-मन्दिर को सजाने का प्रयास भर करते हैं .. बस यूँ ही ...


"जै जै जै हनुमान गोसाईं" ...

वेद, वेद, वेद, वेद,

थे ज्ञाता चारों वेदों के 

हम- हमारे पुरखे कभी,

पड़ावों से फिर 

गुज़रते हुए पुराणों के,

ना जाने कब वाल्मीकि रामायण, 

वेदव्यास महाभारत से होते हुए, 

आकर हम फिर अटक गए 

तुलसीदास रचित रामचरितमानस के 

हनुमान चालीसा पे।


हैं रेल-पेल भी फिर ना जाने 

कितनी कथाओं की, 

आरतियों की, व्रतों की,

मन्दिरों की, मूर्तियों की, 

पर सर्वोपरि बन,

सर्वत्र है छाया आज 

"जै जै जै हनुमान गोसाईं"

पर रहे ना हम सब अब भाई-भाई,

क्योंकि ..

हो गया है मानव-मानव में ..


भेद, भेद, भेद, भेद,

लिंग भेद, 

वर्ण भेद, वर्ग भेद, 

जाति भेद, उपजाति भेद, 

धर्म भेद, 

सम्प्रदाय भेद, उपसम्प्रदाय भेद, 

भाषा भेद, बोली भेद, 

क्षेत्र भेद, नस्ल भेद 

और .. 

ना जाने कितने-कितने भेद।


खेद, खेद, खेद, खेद,

पर है हमें खेद कि ..

इतने भेदों के पश्चात भी 

लेते हैं हम अपनी साँसें 

उन हवाओं में,

हैं घुली जिनमें 

निःश्वासें भी ..

हर वर्ग के इंसानों के ही नहीं

बल्कि .. 

कुत्ते और सूअरों जैसे पशुओं के .. शायद ...

Monday, March 30, 2026

"पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !"


"पंचम वेद ..." और "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !" के बाद आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !" :-

क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। " ...

एक साहित्यिक प्राणी के रूप में एक प्रबुद्ध साहित्यकार या फिर एक कुशल पाठक होने के नाते क्या आपको मालूम है कि हर वर्ष की भांति इस 27 मार्च को भी "विश्व रंगमंच दिवस "(World Theatre Day) पूरे विश्व में संवेदनशील बुद्धिजीवियों के द्वारा मनाया गया है ? 

जाने भी दीजिए .. ऐसे बेतुके सवाल को ... वैसे तो ये सवाल इसलिए पूछ रहा हूँ कि .. नाटक और सिनेमा दोनों का गहरा सम्बन्ध है साहित्य के साथ और .. इन तीनों का सम्बन्ध है हमारे समाज से .. शायद ...


अभी हाल ही में बिहार राज्य की राजधानी पटना के एक 'गर्ल्स हॉस्टल' में रह कर पटना से लगभग पचास किलोमीटर दूर स्थित जहानाबाद जिला के एक आम परिवार की अठारह वर्षीया छात्रा 'नीट' (NEET) की तैयारी कर रही थी। जहाँ रहस्यमयी तरीके से उसकी मौत हो गई थी। 

पहले तो राज्य पुलिस ने उसे आत्महत्या का जामा पहना दिया। फिर एक 'प्राइवेट हॉस्पिटल' और एक सरकारी अस्पताल (PMCH) के 'पोस्टमार्टम रिपोर्ट' में ज़मीन-आसमान का अन्तर पाया गया। तब कुछ राजनीतिक महकमे में चिल्लपों भी मची थी। तभी दबी ज़ुबान में ये भी कहा गया कि यह प्राकृतिक मौत या आत्महत्या नहीं थी, बल्कि 'गैंगरेप' के बाद की गयी नृशंस हत्या थी। शक के आधार पर आनन-फानन में कई लोगों के 'डीएनए टेस्ट' भी करवाए गए। 

मामला राज्य पुलिस से 'एसआईटी' और 'एसआईटी' से 'सीबीआई' को सौंपे जाने में लगभग एक-सवा एक महीना लगा दिया गया। तब तक दबंग दोषी पक्ष को सारे यथोचित साक्ष्य को अलोप करने का भरपूर सुअवसर मिला। खानापूर्ति के नाम पर राज्य पुलिस के कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों को निलम्बित भी कर दिया गया। 

परन्तु .. अन्ततः ढाक के वही तीन पात और .. मामला शांत होता चला गया। उल्टा उस पीड़िता के परिवार के सदस्यों से ही बार-बार पूछताछ और जाँच के नाम पर उन्हें मानसिक रूप से अत्यधिक प्रताड़ित किया गया। उन्हें दबंगों की ओर से जान मार देने की धमकी भी मिलती रही। अन्य कई सारी घटित पाशविक दुर्घटनाओं को भूल जाने की तरह ही आज .. उसी समाज, जिला, राज्य, देश के लोग .. यानी हम सभी लोग भूल चुके हैं .. उस निर्मम 'गैंगरेप' और हत्या को। किसी बासी अख़बार की तरह रद्दी के भाव किसी कबाड़ी वाले को या किसी 'मॉल' के किसी 'चेन स्टोर' में चल रहे 'स्कीम' के तहत सौ रुपए प्रति किलो के भाव में बेच चुके हैं या फिर उससे बने शंक्वाकार दोने या ठोंगे में मूँगफली या झालमुड़ी खा कर .. गली-सड़कों पर या 'डस्टबिन' में फेंक चुके हैं ..  शायद ...


1980 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म- "आक्रोश" की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी .. कुछ रसूख़दारों द्वारा कमज़ोरों के साथ चौतरफ़ा अन्याय तथा उन्हीं रसूख़दारों के दबाव में पली-बढ़ी भ्रष्ट व्यवस्था द्वारा अन्याय के दोषियों की सुरक्षा-बचाव का दाँव-पेंच और ..  कमज़ोर पीड़ितों पर अत्याचार का पहाड़। आज लगभग छियालिस वर्षों के बाद भी मानव समाज में व्यवस्थागत अन्याय और अत्याचार का स्वरूप जस का तस ही व्याप्त महसूस होता है .. शायद ...

दरअसल 1980 में बनी ये लगभग एक सौ चौवालीस मिनट की फ़िल्म यूट्यूब पर सहज उपलब्ध है। जो प्रख्यात नाटककार विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित रचना के आधार पर बनी थी। इसने फ़िल्म उद्योग की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया था। इसकी पटकथा सामाजिक यथार्थ को उजागर करने का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें पीड़ित के आक्रोश को संवादों से कम, लेकिन दृश्यों की चुप्पी की तीव्रता के माध्यम से ज़्यादा पैने ढंग से व्यक्त किया गया है। जो दर्शकों को घंटों सोचने के लिए मज़बूर करती है।

इसका निर्देशन एवं छायांकन भी गोविंद निहलानी ने की थी। संगीत रचा था अजीत वर्मन ने और संपादन किया था केशव नायडू ने। संवाद था पंडित सत्यदेव दुबे का। इसमें अभिनय करने वाले कलाकारों की फ़ेहरिस्त में ओम पुरी, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, मोहन अगाशे, रीमा लागू, महेश एलकोंचवार, नाना पालिसकर, अच्युत पोतदार, अरविंद देशपांडे, भाग्यश्री कोटनिस, दीपक शिरके इत्यादि का नाम आता है। यूँ तो अब से 46 वर्ष पहले अस्सी लाख की 'बज़ट' में बनी ये फ़िल्म तथाकथित 'बॉक्स ऑफिस' पर एक-सवा एक करोड़ का ही 'बिजनेस' कर पाई थी।

परन्तु 1980 में ही इस फ़िल्म की सर्वश्रेष्ठ कहानी व सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए विजय तेंदुलकर को, सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए सी एस भट्टी को, सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए गोविंद निहलानी को, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नसीरुद्दीन शाह और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए ओम पुरी को "राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार" मिला था। फिर इसी फ़िल्म को 1981 में आठवें "भारतीय अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव" (IFFI = International Film Festival of India) में 'गोल्डन पीकॉक' जैसा सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार भी मिला था।

इस फ़िल्म के मात्र दो-चार संवाद वाले एक आदिवासी पात्र- भीकू लहन्या के रूप में ओमपुरी के अभिनय को उनके समस्त अभिनय कार्यकाल का सर्वोत्तम अभिनय माना जा सकता है। पूरी फ़िल्म में दो दृश्यों के दो-चार संवादों एवं एक-दो चीत्कारों को छोड़कर केवल अपने चेहरे के हाव-भाव से पात्र की क्षुब्धता को दर्शकों तक पहुँचा पाना एक अनुपम अभिनय का स्वरूप है। भारतीय फिल्म उद्योग की शताब्दी बीत जाने पर उसकी सौ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की तालिका में भी "आक्रोश" फ़िल्म का नाम शामिल है।

इसकी कहानी कथित तौर पर एक सच्ची घटना पर आधारित है, जो 25 दिसम्बर 1978 को कोंडाची बाड़ी गाँव के पास एक कुएँ में एक विवाहिता आदिवासी युवती- नागी लहान्या की लाश मिलने और उसकी हत्या (?) की ज़ुर्म में उसके पति- भीकू लहान्या को ही व्यवस्था के दारोमदार लोगों द्वारा कारावास में डाल दिए जाने पर आधारित है।

जबकि वहाँ के सरकारी डॉक्टर, ठीकेदार, पुलिस ऑफिसर जैसे समाज के चार-चार रसूख़दारों द्वारा ही नागी लहान्या के साथ बलात्कार या यूँ कहें कि 'गैंग रेप' किए जाने के बाद उसकी हत्या कर के कुएँ में फेंक दिया जाता है और झूठे ख़रीदे गए गवाहों को पेश कर के भीकू लहान्या को हत्यारा बना कर सजा दिलवाई जाती है। यह न्यायिक प्रणाली व चिकित्सा प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार और सक्षम एवं शक्तिशाली लोगों द्वारा वंचितों के उत्पीड़न का एक कच्चा चिट्ठा है।

नागी लहान्या की हत्या और भीकू लहान्या को षड्यंत्र के तहत कारावास की सजा मिलने के पश्चात उसकी झोपड़ी में उसका एक दुधमुँहा बच्चा, एक वृद्ध पिता और एक युवा कुंवारी बहन बच जाती है।  हालांकि भास्कर कुलकर्णी नामक एक ईमानदार वकील भीकू लहान्या की तरफ़ से एक सरकारी वकील के तौर पर मुकदमा लड़ने का असफल प्रयास करता है। 

इसी बीच भीकू लहान्या के वृद्ध पिता की इन्हीं सब सदमा से मृत्यु हो जाती है। उन्हें मुखाग्नि देने के लिए हथकड़ी और रस्से में जकड़े हुए भीकू लहान्या को जेल से पुलिस की हिरासत में चिता तक लाया जाता है। वह वहाँ खड़ी अपनी कुंवारी बहन को देखकर आशंकित हो जाता है, कि कहीं भविष्य में उसकी बहन को भी इस दमनकारी व्यवस्था से उसकी पत्नी वाली पीड़ा ना झेलनी पड़े और .. हठात पास पड़ी कुल्हाड़ी से अपनी बहन का सिर काट देता है।

दमनकारी व्यवस्था से हताश होकर मूक विद्रोह के प्रतीकरूपी अपने इस औचक क़दम से अपनी क्षुब्धता में बार-बार आसमान की ओर मुँह करके भीकू लहान्या का आक्रोश में चीखना हर संवेदनशील दर्शक के दिल को दहला देता है। आपका भी दहलेगा .. शायद ...



आज भी समाज में लड़की के जन्म लेने पर आमजन प्रायः दो मुख्य कारणों से काँप जाते हैं- एक तो दहेज़ की रक़म व शादी के लिए तमाम भौंडेपन के नाम पर ख़र्च होने वाली रक़म के कारण और दूसरा है नापाक इरादे वाले बलात्कारी वहशियों से बेटी की इज़्ज़त लुट जाने का डर या नाजायज़ तरीके से गर्भवती हो जाने का भय। 

इन दोनों के अलावा .. पुरखों की पाखंडी सोचों के अन्तर्गत फैलायी हुई विषाक्त भ्रांति या प्रथा तो है ही कि .. बेटे से ही किसी का तथाकथित वंश चलता है और उसके द्वारा ही दी गयी तथाकथित मुखाग्नि से तथाकथित मोक्ष की प्राप्ति भी होती है .. शायद ...

भास्कर कुलकर्णी जैसा वकील और एक ईमानदार समाचार पत्र संपादक भ्रष्टाचारियों की सच्चाई को उजागर करने की कोशिश करता तो है, परन्तु .. अन्ततः इस भ्रष्ट व्यवस्था के समक्ष हार जाता है। ठीक .. हाल ही में पटना में 'नीट' (NEET) की उस पीड़िता छात्रा के हारे हुए पीड़ित परिवार की तरह ही .. शायद ...


पुनः उस एक 'पॉपुलर डायलॉग' - " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। " के आधार पर .. अब शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (४)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के साथ .. बस यूँ ही ...


[ YouTube Link of Film "Aakrosh". 👇 ]


https://youtu.be/Qe0iRHo8eMM?si=zPCjFaxPB-nB_N-S