Monday, January 26, 2026

"पूर्ण स्वराज दिवस" (?) ...

 


राष्ट्रीय छुट्टी, मौज-मस्ती, झण्डे, परेड व मिठाइयों के डिब्बे,

बोलना अंग्रेज़ी में एक-दूसरे को Happy Republic Day.


दोहे-चौपाई, कलमा, ख़ूब रटे, पर पलटे नहीं संविधान के पन्ने,

बस इतना ही काफ़ी है हमारा मौसमी देशभक्त बनने के लिए।


गणतंत्र दिवस है, 26 जनवरी .. 26 लोगों को भी याद कर लें,

ना पढ़ने पे कलमा, पहलगाम में गँवाई जिन्होंने अपनी जानें। 


2026 का 26 जनवरी है आया, 1950 से सफ़र तय करते हुए,

पर है 26 जनवरी का उद्गम, 1930 के "पूर्ण स्वराज दिवस" से

.. शायद ...












Wednesday, January 14, 2026

'एस फॉर सन' ...



कहते थे बचपन में अम्मा-बाबू जी 
कि उगता है सूरज पूरब से
और डूबता पश्चिम में।
ऐसा ही था तब दिखता भी,
ऐसा ही था कुछ लगता भी।

फिर आयी बारी अपने पढ़ने की,

स्कूल गए .. 'एस फॉर सन' पढ़ा भी।

पता चला कुछ फिर आगे भी कि 

सूरज तो है स्थिर जगह पर अपनी,

परिक्रमा तो लगाती है पृथ्वी ही।


आगे फिर बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि 

बदलता तो है जगह अपना सूरज भी। 

वो भी .. साल भर में बारह-बारह बार जी।

कहते हैं पंडित या खगोलशास्त्री 

और हम सभी भी जिसे संक्रांति।


फिर दुनिया के ज्ञानियों से ज्ञान मिला

कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन ही।

अपने व सगे ही क्यों भला .. साथ तो तन भी 

छोड़ ही तो जाता है हमारा .. कभी-ना-कभी।

लगा फिर तो बौना .. बदल जाना यकायक तेरा .. बस यूँ ही ...

Sunday, January 11, 2026

जगराता ...


सुबह लगभग सवा पाँच बजे पटना के गाँधी मैदान में सुबह की सैर के लिए हर आयु वर्ग के लोगों के आने-जाने से पनपी चहल-पहल में से ही एक व्यक्ति .. लगभग पैंतीस वर्षीय पवन पर .. मोटा-मोटी साठ वर्षीय सिद्धार्थ जी की नज़र पड़ते ही ...

सिद्धार्थ जी - " सुप्रभातम् पवन बेटा "

पवन - " सुप्रभातम् 'अँकल' जी " 

वैसे तो पवन और सिद्धार्थ जी आपस में ना तो पड़ोसी हैं, ना सगे-सम्बन्धी हैं, ना ही स्वजातीय और ना ही एक ही नौकरी-पेशे में हैं। परन्तु .. दोनों ही लोगों का परिवार बिहार राज्य के अंगिका भाषी भागलपुर जिला के पीरपैंती गाँव का ही रहने वाला है। 

दरअसल .. कहीं पर भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से व्याप्त क्षेत्रवादिता के माहौल में जब एक ही स्थान के दो निवासी अन्य स्थानों पर प्रवास या पर्यटन के दौरान संयोगवश मिलते हैं तो .. उनकी आपस में घनिष्ठता प्रायः बढ़ ही जाती है। चाहे वह स्थान विशेष अपने शहर ही में कहीं जाने पर .. मुहल्ला, 'सोसाईटी', या गाँव के सन्दर्भ में हो या यही क्षेत्रवादिता अपने शहर या गाँव से देश के भीतर कहीं भी जाने पर जिला, शहर, गाँव या राज्य के सन्दर्भ में हो या फिर देश से बाहर विदेशों में कहीं भी जाने पर अपने देश के सन्दर्भ में हो .. वो वहाँ चाहे सैलानी के रूप में हों या प्रवासी के रूप में हों .. ऐसी परिस्थितियों में समान भाषा-भाषी का होना भी सम्बन्ध को जोड़ने में गोंद-सा असर करता हैं .. शायद ...

सिद्धार्थ जी - " पवन बेटा .. आज तुम अकेले आये हो सुबह की सैर करने .. तुम्हारे पापा और तुम्हारी वो .. छुटकी बिटिया नहीं आयी .. वो .. क्या नाम है उसका .. ? "

पवन - " समीक्षा "

सिद्धार्थ जी - " अरे हाँ, हाँ .. समीक्षा .. उम्र की वज़ह से .. कभी-कभी .. छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे नाम तक भी याद ही नहीं रह पाते .. हाँ तो .. आज वो .. समीक्षा बिटिया भी नहीं आयी ? .. "

पवन - " 'अँकल' कल पड़ोस के एक घर में सुबह से ही पूजा-पाठ शुरू हुआ और .. सारी रात 'जगराता' होता रहा .. बड़े- बड़े 'डी जे-स्पीकर' पर सुबह से लेकर सारी रात भर फ़िल्मी गाने की 'पैरोडी' वाले भजनों की और वाद्य यंत्रों की तेज़ कानफोड़ू आवाज़ों से घर की खिड़की के काँच और रसोई की 'कटलरी' व 'कप-प्लेट' तक खड़खड़ाते रहे .. "

सिद्धार्थ जी - " ओह ! .. तो ? .. "

पवन - " तो क्या अँकल .. हम सभी लोग शोर की वज़ह से नहीं सो पाए सारी रात .. "

सिद्धार्थ जी - (गुस्सा व चिंतित भाव के साथ) " वो तो स्वाभाविक है बेटा .. यही तो है .. किसी भी धर्म का अपभ्रंश स्वरूप और रीति-रिवाज़ के मुखौटों में हमारे बुद्धिजीवियों के समाज की अंधपरंपराओं की विडम्बना .. लोगों ने मानसिक व आध्यात्मिक जागरण को अपभ्रंश स्वरूप में परिवर्तित कर के .. रात भर जाग कर और लोगों को भी जगा कर तथाकथित पूजा के नाम पर शोर मचाने को ही जागरण या जगराता मान लिया है। "

पवन - " आप तो जानते ही हैं .. पापा दिल के मरीज़ हैं .. उनकी कल शाम से ही तबियत ख़राब है और इन दिनों समीक्षा की 'एग्जाम' भी चल रही है .. वह भी कल ना तो ढंग से पढ़ पायी और ना ही सो पायी .. 'मिसेज़' भी सुबह से .. "

सिद्धार्थ जी - " .. च् .. च् .. "

पवन - " हम भी तो अभी 'मॉर्निंग वॉक' के लिए नहीं आए हैं  'अँकल' जी। बल्कि .. आदतन केवल 'स्ट्रीट डॉग्स' को सुबह-सुबह रोटी खिलाने यहाँ आ गए हैं .. हमारा भी शरीर सुस्त लग रहा है .. "

सिद्धार्थ जी - " च् .. ख़ैर ! .. चलो .. आज मेरी भी सुबह की सैर 'कैंसिल' .. चलो .. चल कर तुम्हारे घर .. पहले तुम्हारे पापा की ख़ैर- ख़बर लेते हैं। "

अब दोनों लोग, सिद्धार्थ जी और पवन, गाँधी मैदान के पश्चिमी 'गेट' से निकल कर छज्जूबाग की तरफ़ पवन के घर की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। 

जाते-जाते उन्हें गाँधी मैदान के पश्चिमोत्तर छोर पर तथाकथित महात्मा गाँधी की मूर्ति के चबूतरे के पास कुछ लोगों की झुण्ड बैठी दिखाई दे रही है। वो लोग वहाँ ज़ोर-ज़ोर से बजाए जा रहे करताल और ढोलक की शोर से प्रतियोगिता करते हुए गला फाड़-फाड़ कर हनुमान चालीसा गा रहे हैं। उन सभी की मिलीजुली आवाज़ उन दोनों को विचलीत कर रही है - " जै जै हनुमान गोसाईं .. " - और केवल उन दोनों को ही नहीं वरन् गाँधी मैदान में सभी शांतिप्रिय टहलने वाले लोगों को भी और बैठ कर योग या ध्यान लगाने वाले लोगों के साथ-साथ सुबह-सवेरे पक्षियों के कलरव को भी। 

अब सिद्धार्थ जी अन्यमनस्क-सा पवन से पूछ रहे हैं कि - " लगता है कि आज मंगल (मंगलवार) है .. है ना ? "

" ... महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी ... "





Thursday, January 8, 2026

बूँदों का बतंगड़ ...


देखा है मैने एक सपना,
या कि .. की है एक कल्पना, 
कि हो .. पास हमारे झरने का ग़ुलगपाड़ा, 
चेहरे पे हों हमारे बूँदों का बतंगड़।
हों दूर तक पर्वत-श्रृंखलाएं 
ओढ़े हुए चीड़ के बीहड़।
हो वहाँ चाय की एक झोपड़ी,
जिसमें सुलगती-सी हो चीड़ की लकड़ी।
धुआँ-धुआँ-सी आग में जिसकी 
कुछ सेंकती, कुछ उबालती,
भुट्टे कुछेक एक मासूम-सी लड़की।



और छिलकों पे भुट्टों के परोसती

हम जैसे सैलानी अपने ग्राहकों को

नर्म-गर्म सिंके-उबले भुट्टे के संग 

नमक-नींबू-मिर्ची की चटक जुगलबंदी।

अपने दोनों हाथों में लिए तुम भुट्टे

एक में सिंके और दूसरे में उबले हुए।

सिंका हुआ स्वयं खाती-चबाती-गुनगुनाती

और उबला हुआ मुझे खिलाती-पुचकारती,

अपने-अपने स्वाद के अनुसार और वहीं 

गुड़ वाली गर्मागर्म कड़क चाय से भरे 

भाप उगलते हों दो अदद कुल्हड़।

और .. 

वहीं पर .. 

नर्म-नर्म बुग्याल पर

हो आग़ोश में एक-दूजे की बैठी 

हम दोनों की एक अदद जोड़ी।

और हों .. 

हम दोनों के दोनों ही अल्हड़।

लिपटते, चिपटते, खुल्लम-खुल्ला,

हो जैसे प्यार हमारा 

मानो ..  बस्स ! .. 

खुला खेल फर्रुखाबादी ..बस यूँ ही ...







Monday, January 5, 2026

'इत्यादि' का इत्यादि ...





क्या ...

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

गोरों के लिए काले पानी वाली तेज़ाबी आँधी हूँ मैं ?

या ..

आज़ादी के नाम पे हुए उस बँटवारे की बर्बादी हूँ मैं ?

या ..

कर्ज़दार विवश आत्महंता किसान की त्रासदी हूँ मैं ?

या ..

आत्महंता किसान के अनाथ परिवार की आधि हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

भ्रष्टाचारी का ख़ाकी या सज़ायाफ़्ता की खादी हूँ मैं ?

या ..

बढ़ती ज्यामितीय आकार से वतन की आबादी हूँ मैं ?

या ..

विकास की आड़ में कुदरती आपदा की मुनादी हूँ मैं ?

या ..

धर्मनिरपेक्ष होकर भी आरक्षण भोगी जातिवादी हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

निःसहाय, परवश बलात्कृत की झीनी आपत्ति हूँ मैं ?

या ..

राजा-महाराजाओं के अंतःपुर, हरम की व्युत्पत्ति हूँ मैं ?

या ..

एक प्रेम-निशानी परन्तु समाज की अवैध संतति हूँ मैं ?

या ..

व्यभिचारी नरों की जननी, कोठेवाली की उपाधि हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

अंधपरंपराओं को रीति-रिवाज मानने का आदी हूँ मैं ?

या ..

पृथ्वी का वर्तमान भर या पूरे ब्रह्माण्ड का आदि हूँ मैं ?

या ..

हूँ जीवन रेखा से बँधा नश्वर शरीर भर या अनादि हूँ मैं ?

या ..

वीर्य-बूँद से भस्म तक का राही, आज मांस-पिंडी हूँ मैं ?

बिहारी था कभी, राज्य बँट जाने से अब झारखंडी हूँ मैं ?

Saturday, January 3, 2026

विह्वल कुतिया
























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Thursday, December 11, 2025

आखि़र में है लिखा नाम उस फ़ेहरिस्त के ...


अभी-अभी आज ही रविवारीय सुबह हमने,

उठायी है एक पर्ची 'स्टडी टेबल' से अपनी।

लिखीं हैं जिस पर एक लम्बी-सी फ़ेहरिस्त,

जाग कर देर रात तक कल मेरी धर्मपत्नी।


माह भर के रसद सामग्रियों के साथ-साथ,

तेल-मसाले, साबुन-मंजन जैसी चीज़ें भी।

सुबह जागने से रात सोने तक महीने भर में

इस्तेमाल करने वाले सामान सभी के सभी।


अरहर दाल दो किलो, एक किलो मूंग दाल,

झींगोरा दो किलो, चावल पाव भर बासमती।

हल्दी पाउडर, कसूरी मेथी, 'मिलेट्स' दलिया,

साबुत धनिया ढाई सौ ग्राम, सौ ग्राम मेथी भी।


बेसन व गुड़ एक-एक किलो, खांड पाव भर,

रसोईघर में है जो चीनी और मैदे पर पाबन्दी !

'कोल्ड क्रीम', 'हेयर डाई', भीमसेनी कपूर और

साथ में 'बटर पेपर', 'नैपकिन पेपर' तक भी।


अंत में फ़ेहरिस्त के लिखा दिखा एक और नाम,

लिखावट है जिसकी बदली, पर है तो पहचानी।

दरअसल ये लिखावट है एक सरकारी स्कूल में

पढ़ने वाली तेरह वर्षीया हमारी प्यारी बिटिया की।


मित्रवत् व्यवहार ने ही हमारे बना पाया है जिसे 

इतना बिंदास कि वह कह सके हर बातें मुझसे भी,

हर महीने .. अपने मुश्किलों से भरे चार दिनों की 

पीड़ाओं और उस ... 'सैनिटरी नैपकिन' की भी।


हाँ .. हाँ .. आपने सही सुना .. आखि़र में है लिखा

नाम उस फ़ेहरिस्त के .. 'सैनिटरी नैपकिन' का भी।

लंद-फंद-देवानंद जग भर के करके आप शरमाते नहीं,

समक्ष बेटियों के 'पैगें' तो बनाते हैं, बढ़ाइए पींगे भी .. बस यूँ ही ...