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Wednesday, January 14, 2026

'एस फॉर सन' ...



कहते थे बचपन में अम्मा-बाबू जी 
कि उगता है सूरज पूरब से
और डूबता पश्चिम में।
ऐसा ही था तब दिखता भी,
ऐसा ही था कुछ लगता भी।

फिर आयी बारी अपने पढ़ने की,

स्कूल गए .. 'एस फॉर सन' पढ़ा भी।

पता चला कुछ फिर आगे भी कि 

सूरज तो है स्थिर जगह पर अपनी,

परिक्रमा तो लगाती है पृथ्वी ही।


आगे फिर बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि 

बदलता तो है जगह अपना सूरज भी। 

वो भी .. साल भर में बारह-बारह बार जी।

कहते हैं पंडित या खगोलशास्त्री 

और हम सभी भी जिसे संक्रांति।


फिर दुनिया के ज्ञानियों से ज्ञान मिला

कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन ही।

अपने व सगे ही क्यों भला .. साथ तो तन भी 

छोड़ ही तो जाता है हमारा .. कभी-ना-कभी।

लगा फिर तो बौना .. बदल जाना यकायक तेरा .. बस यूँ ही ...