Thursday, January 8, 2026

बूँदों का बतंगड़ ...


देखा है मैने एक सपना,
या कि .. की है एक कल्पना, 
कि हो .. पास हमारे झरने का ग़ुलगपाड़ा, 
चेहरे पे हों हमारे बूँदों का बतंगड़।
हों दूर तक पर्वत-श्रृंखलाएं 
ओढ़े हुए चीड़ के बीहड़।
हो वहाँ चाय की एक झोपड़ी,
जिसमें सुलगती-सी हो चीड़ की लकड़ी।
धुआँ-धुआँ-सी आग में जिसकी 
कुछ सेंकती, कुछ उबालती,
भुट्टे कुछेक एक मासूम-सी लड़की।



और छिलकों पे भुट्टों के परोसती

हम जैसे सैलानी अपने ग्राहकों को

नर्म-गर्म सिंके-उबले भुट्टे के संग 

नमक-नींबू-मिर्ची की चटक जुगलबंदी।

अपने दोनों हाथों में लिए तुम भुट्टे

एक में सिंके और दूसरे में उबले हुए।

सिंका हुआ स्वयं खाती-चबाती-गुनगुनाती

और उबला हुआ मुझे खिलाती-पुचकारती,

अपने-अपने स्वाद के अनुसार और वहीं 

गुड़ वाली गर्मागर्म कड़क चाय से भरे 

भाप उगलते हों दो अदद कुल्हड़।

और .. 

वहीं पर .. 

नर्म-नर्म बुग्याल पर

हो आग़ोश में एक-दूजे की बैठी 

हम दोनों की एक अदद जोड़ी।

और हों .. 

हम दोनों के दोनों ही अल्हड़।

लिपटते, चिपटते, खुल्लम-खुल्ला,

हो जैसे प्यार हमारा 

मानो ..  बस्स ! .. 

खुला खेल फर्रुखाबादी ..बस यूँ ही ...







2 comments:

  1. अति मनमोहक,सुंदर अनूठे बिंबों सै सजी रूमानियत से सराबोर बहुत प्यारी अभिव्यक्ति।
    सादर।
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    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    Replies
    1. जी ! .. आपको मन से नमन संग हार्दिक आभार आपका .. हमारी बतकही को मंच प्रदान करने के लिए ...

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