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Sunday, March 15, 2020

सच्चा दिलदार ...


बना कर दहेज़ की रक़म को आधार
करते हैं सब यूँ तो रिश्तों का व्यापार
वधु-पक्ष ढूँढ़ते जो पाए अच्छी पगार
वर खोजे नयन-नक़्श की तीखी धार
मिलाते जन्मपत्री भी दोनों बारम्बार
मँहगी बारात में मिलते दोनों परिवार
साहिब ! यही पति होता क्या सच में दिलदार ?...

जिसे दहेज़ की ना हो कोई दरकार
चेहरे की सुन्दरता करे जो दरकिनार
उत्तम विचारों को ही करे जो स्वीकार
फिर चाहे जले हो तेज़ाब से रुख़्सार
या कोई वेश्या पायी समाज से दुत्कार **
करे मन से जो निज जीवन में स्वीकार
साहिब ! वही है ना शायद एक सच्चा दिलदार ?...

** - परित्यक्ता हो कोई या किए गए हों बलात्कार






Saturday, November 30, 2019

शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?

अक़्सर देखता हूँ शहर में हमारे
"लगन" वाली रातों के .. प्रायः हर बारात में
आतिशबाजियों के साथ-साथ में
उड़ती हैं धज्जियाँ चार-चार क़ानूनों की कैसे
एक ही साथ समक्ष अपने सभ्य समाज के ...
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

उम्र भर की कमाई लुटाता कहीं मार कर मन
कुछ करते मन से भी दो नम्बरी कमा कर धन
पर कन्या का पिता फिर भी करता करबद्ध नमन
और रोता है "दहेज़ निषेध अधिनियम,1961"
कहीं बंद क़ानूनों की किताबों में सुबक कर
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

भौंडी नागिन नाच .. भौंडे ऑर्केस्ट्रा के गाने
"डेसीबेल" से बेख़बर लाउडस्पीकर .. बैंड-बाजे
जिस राह से गुजरते करते शोर-शराबे
आग .. धुएँ .. शोर .. बिखेरते जलते पटाखे
संग-संग  "ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000" और
"वायु अधिनियम, 1981" को सरेआम जलाते
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

टूटता है क़ानून चौथा जब टूटती हैं खाली
बोतलें शहर "पटना"में हमारे जो है
राजधानी भी राज्य बिहार की
कहते हैं लोग कि शायद है लागू यहाँ
"बिहार शराबबंदी क़ानून,2016" अभी भी
दिख जाते हैं लड़खड़ाते बाराती फिर भी
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

परम्पराएं हैं शायद सदियों से बनाई पुरखों की
कहते हैं सुसभ्य, सुसंस्कारी, अधिकारी भी सारे
भईया! इसको तो कर्ज़ लेकर भी निभानी पड़ेगी
होते ही हैं सभी बुद्धिजीवी भी हर बार शामिल
क़ीमती लिबासों में बन कर इनमें बाराती
टूटते क़ानूनों के साथ है सभ्यता बेबस कसमसाती
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...











Saturday, November 23, 2019

पूछ रही है बिटिया ...

क ख ग घ ... ए बी सी डी ..
सब तो आपने मुझ बिटिया को
बहुत पढ़वाया ना पापा ?
अब "एक्स-वाई" भी तो
समझा दो ना पापा !
अगर भईया बना "वाई" से
वंश-बेल माना आपका
पर मुझ बिटिया में भी तो
है ही ना "एक्स" आपका
फिर मुझ से तथाकथित
मोक्ष क्यों नहीं पापा !???
पूछ रही है बिटिया ...

गुड्डा-गुड़िया .. कुल्हिया-चुकिया ..
सब खेल चुके ..
अब तो हवाई-जहाज भी
उड़ाने दो ना पापा !
मुझ बिटिया को समझते क्यों
"बोझ" और "कमजोर" भला
हम जबकि सृष्टि रचयिता
नौ माह तक बोझ उठाती
नौ माह क्या .. नौ दिन भी नहीं ..
बस नौ मिनट तक ही
सम्भाल सके कोई भी नर
कोख़ और प्रसव-पीड़ा
है क्या आपकी नज़र में
कोई ऐसा .. बोलो ना पापा !...
पूछ रही है बिटिया ...

"लक्ष्मी आई - लक्ष्मी आई"
उदास मन से कहते हैं सब ना !?
बिटिया सुख देती तो है पर 
दुःखी करता दहेज़ सहेजना
अगर बिटिया की क़िस्मत जो फूटी
सरेराह उसकी इज्ज़त जो लुटी
शुरू कर देते क्यों सगे सारे
उस बिटिया से कतराना
दहेज़ के लोभी .. तन के भोगी
सब तो हैं नर ही सारे
तो फिर भला किसी बिटिया की
माँ के कोख़ में ही कर देते
भ्रूण-हत्या क्यों पापा !???...
पूछ रही है बिटिया ...

Thursday, October 31, 2019

सोना के सूप में ... (लघुकथा/कहानी).

अभी-अभी घर आकर थाना के बड़ा बाबू अपनी धर्मपत्नी - 'टोनुआ की मम्मी' के हाथों की बनी चाय की चुस्की का आनन्द ले रहे हैं।
अक़्सर हम स्थानीय भाषा में अपने करीबी या मातहत के नाम के आगे बिंदास 'या', 'आ' या 'वा' इत्यादि जोड़ कर उस नाम की संज्ञा को विशेषणनुमा अलंकृत कर देते हैं ।

बड़ा बाबू - दशरथ सिंह - पास ही सामने बैठी 'टोनुआ की मम्मी' से मुख़ातिब होते हुए बोले - " टोनुआ की मम्मी ! सोच रहे हैं कि इस बार (यानि इस साल) छठ में दू भरी (1 भर =11.66 ग्राम) सोना के सूप में तुम छट्ठी मईया ( छठ व्रत को इस नाम से भी बुलाते हैं) को अरग (अर्ध्य) दो । "

छठ - दरअसल चार दिनों तक क्रमशः अलग-अलग रस्म- 'नहाय-खाय', 'खरना', 'संझिया अरग' (साँझ का अर्ध्य) और 'भोरिया अरग' (प्रातःकाल का अर्ध्य) के साथ बिहार और बिहार के बाहर भी बिहारियों का सबसे बड़ा आस्था या सच कहें तो डर से भरा त्योहार जो इनकी आस्था के अनुसार सूर्य को भगवान मानकर उन्हें समर्पित  किया जाता है।

दशरथ सिंह बीच में एक लंबा डकार लेते हुए बोले - " हम ( मैं ) मनता (मन्नत) माने थे कि हमरी (हमारी) पोस्टिंग इह (इस) साल इन्हां (यहाँ) के थाना में हो जाएगा तअ (तो) छट्ठी मईया के सोना के सूप में अरग देंगें। "

टोनुआ की मम्मी अपने सिर पर का अंचरा (साड़ी का आँचल) ठीक से सिर ढंकने तक खींच कर और अपना ख़ुशी से हँसता हुआ मुँह आधा ढँक कर बोल पड़ी - " हाँ जी टोनुआ के पप्पा (पापा) ! हमहु ( हम भी) माने (मन्नत) थे पर .. डरे (डर से) ना बोल रहे थे आप से। आप तअ हमेशा खिसिआइले (गुस्साए हुए) ही रहते हैं। "

बड़ा बाबू प्यार से अपनी धर्मपत्नी की ओर देखते हुए - " एतना (इतना) डरती काहे (क्यों) हो हम से !? .. आयँ !? .. हम कोनो (कोई) बाघ हैं का (क्या) !? जे  (जो) खा जायेंगें .. बोलो !! "
अब तक अपनी खैनी की चुनौटी (खैनी और चूना रखने की डिब्बी) से खैनी और आनुपातिक चूना बड़ा बाबू की बायीं हथेली में निकल चुकी थी - " देखो (सुनो) .. एक्को ( एक भी) साल नहीं हुआ है और इहाँ (यहाँ) जेतना ( जितना) कमाएं हैं .. पूरी जिनगी (ज़िन्दगी) नहीं कमाए थे। है कि नहीं !? .. अरे एक्के लाख ना देबे (देना) पड़ा था इंहाँ (यहाँ) ट्रान्सफर (तबादला) के लिए। तअ (तो) का हुआ जी .. उस से कई गुणा जादा (ज्यादा) कमाइयो (कमा भी) लिए एतने (इतने) ही दिन में.. है ना जी !? "

अब तक टोनुआ की मम्मी भी अपने धर्मपति का अच्छा मूड देख कर उनसे मन की दबी बातें बोलने लगी - " हाँ जी .. आउर (और) एक- दू साल में सिलवा (शिला) के सोरह (सोलह) साल के होए (होने) पर बीआहो (ब्याह भी) तो करना है। ओकरा (उसके) बादो ( बाद भी) दू 'गो' बचिए (बच ही) जायेगी। है कि ना टोनुआ के पप्पा !? "

बिहार और झारखण्ड - जो कुछ साल पहले ही राजनितिक तौर पर बिहार से अलग होकर राज्य का दर्जा पाया है - में स्थानीय बोल-चाल के क्रम में किसी भी संख्या के बाद 'गो' या 'ठो' लगा कर ही बोलते हैं।

खैनी बायीं हथेली पर दाएँ अँगूठे से मलते हुए - " चिन्ता काहे (क्यों) करती हो !? पान (पाँच) साल और नौकरी बचा है। तब तक ओतना (उतना) कमा लेंगें। अब तीन-तीन 'गो' के बिआहे (ब्याह करना) पड़ेगा तअ (तो) बिआहेंगे। " - बीच में खैनी पर थपकी लगा कर उसका गर्दा झाड़ कर बोले - " पर देखो हम लोग भी हिम्मत नहीं हारे। केतना (कितना) मनता-दन्ता (मन्नत) से ये तीनों के बाद अंत में टोनुआ आइए  (आ ही) ना गया जी। खनदान (ख़ानदान) का नाम चलेगा ना अब !? मरला (मरने) के बाद मुँहवा (मुँह) में आग यही ना देगा टोनुआ की मम्मी ! तब्बे (तभी) ना मोछ (मोक्ष) मिलेगा !? है कि नहीं !? " - कहते हुए बड़ा बाबू  मल-मल कर तैयार खैनी को चुटकी में लेकर अपने निचले होंठ के पीछे दबा लिए।

" दूर ... थू .. थू .. थू ... (तथाकथित ग्रह कटने के लिए सामने वाले पर थूकने का एक टोटका) .. मार बढ़नी (झाड़ू) रे ! का (क्या) निहस् (नहस/अशुभ) बात करे लगे आप जी ! मरे आपका दुसमन (दुश्मन) । आपसे पहीले (पहले) छट्ठी मईया हमरे (हम ही को) ना उठाबेगीं (मृत्यु)। हम तअ एहबाते (सुहागन) मरेंगें। भर मांग टह-टह लाल सेनुर (सिन्दूर) भरल (भरा हुआ) जाएंगे जी ! आप देखिएगा टोनुआ के पप्पा । " - बोलते- बोलते टोनुआ की मम्मी भावना में रुआंसी हो गई।

" अच्छा - अच्छा ! बुढ़ापा में हम ही अकेले दुःख भोगेंगे। बाकिर (बाक़ी/लेकिन) ... पोतवा-पोतीया (पोता-पोती) को तेल कौन लगावेगा !? बोलो ! " - बोलते-बोलते खिड़की से बाहर के तरफ मुँह करके बड़ा बाबू 'पच्च' से थूक दिए।

खैनी खाने वाले की आदत होती है -किसी से भी हाथ पसार कर मांग लेना और कहीं भी मुँह घुमा के 'पच्च' से थूक देना।

बड़ा बाबू - " अब जाओ .. जा के खाना बनाओ। अबेर (देर) हो जाएगा खाना बनाने में तअ टोनुआ बिना खाए-पिए सो जाएगा। " - कहते हुए तरोताज़ा होने के लिए गुस्लखाने की ओर चल दिए।

और टोनुआ की मम्मी - " हे सुरुज (सूरज) भगवान् ! हे छट्ठी मईया ! सब ठीके (ठीक) से पार-घाट लगईह (कल्याण किजिएगा) ..." - मन  ही मन बड़बड़ाती हुई अपने 'अंचरा' से अपने गोल-मटोल गाल पर डबडबायी आँखों से भावना के ढलक आए आँसू पोंछते हुए चौकाघर की ओर चली जाती हैं ।.