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Sunday, May 3, 2020

शोहरत की चाह में

                                (१)

समय और समाज को ही है जब तय करना जिसे
ख़ातिर उसके तू भला क्यों है इतना मतवाला ?
है होना धूमिल आज नहीं तो कल-परसों जिसे
काल और सभ्यता की परतों का बन कर निवाला

हो आतुर व्याकुल मन उस शोहरत की चाह में
क्यों पल-पल खंडित करता है अंतर्मन की शाला ?
हो मदांध शोहरत में ऐसे साहित्यकार बन बैठे
समानुभूति को भूल कर सहानुभूति रचने वाला ?

                                    (२)

किसी सुबह हाथ में चाय की प्याली, जम्हाई, सामने फैला अख़बार
या फिर किसी शाम वातानुकूलित कमरे में बैठा पूरा परिवार
उधर सामने चलते चालू टी वी के पर्दे पर चीख़ता पत्रकार
कहीं मॉब-लीचिंग में मारा गया कभी एक-दो, कभी तीन-चार
कभी तेज़ाब से नहाया कोई मासूम चेहरा तो कभी तन तो
कभी किसी अबला के सामूहिक बलात्कार का समाचार
इधर पास डायनिंग टेबल पर सजा कॉन्टिनेंटल डिनर
रोज की तरह ही भर पेट खाकर लेते हुए डकार
बीच-बीच में "च्-च्-च्" करता संवेदनशील बनता पूरा परिवार
अपलक निहारते हुए उस रात का चित्कार भरा समाचार

देख जिसे पनपती संवेदना, तभी संग जागते साहित्यकार
भोजनोपरांत फिर उन समाचार वाली लाशों से भी भारी-भरकम
सहेजना कई शब्दों का चंद लम्हों में मन ही मन अम्बार
कर के कुछ सोच-विचार, गढ़ना छंदों का सुविधानुसार श्रृंगार
मिला कर जिसमें अपनी तथाकथित संवेदना की लार
साहित्यकार करते हैं फिर शोहरत की चाह में एक कॉकटेल तैयार
फिर वेव-पृष्ठों पर सोशल मिडिया के करते ही प्रेषित-प्रचार
लग जाता है शोहरत जैसा ही कई लाइक-कमेंट का अम्बार

ना , ना, बिदकना मत मेरी बातों से साहित्यकार
वैसे तो क़ुदरत ना करे कभी ऐसा हो पर फिर भी ...
फ़र्ज़ करो मॉब लिंचिंग हो जाए आपकी या आपके रिश्तेदार की
या किसी दिन सामूहिक बलात्कार अपने ही किसी परिवार की
तब भी आप क्या रच पाओगे कोई रचना संवेदना भरी ?
आप क्या तब भी कोई पोस्ट करोगे सोशल मिडिया पर रोष भरी ?
नहीं .. शायद नहीं साहित्यकार ... तब होगी आपकी आँखें भरी
है शोहरत की चाह ये या संवेदनशीलता आपकी .. पता नहीं
साहित्यकार एक बार महसूस कीजिए समानुभूति भी कभी
सहानुभूति तो अक़्सर रखते हैं हम गली के कुत्तों से भी ...
है ना साहित्यकार ....???...







Wednesday, March 18, 2020

बस यूँ ही ...

गत वर्ष 2019 में 14 फ़रवरी को पुलवामा की आतंकी हमला में शहीद हुए शहीदों के नाम पर सोशल मिडिया पर या चौक चौराहों पर घड़ियाली आँसू बहाने वाले लोग गत वर्ष कुछ पहले से ही 21 मार्च की होली से सम्बंधित अपनी सेल्फियाँ चमका रहे थे।
तब 20 मार्च को होलिका दहन यानी होली की पूर्व सन्ध्या पर ये मन रोया था और ये कविता मन में कुंहकी थी। हू-ब-हू उस दिन की मन की प्रतिक्रिया/रचना/विचार आज copy-paste कर रहा हूँ ...
(ये मत कहिएगा कि " हँसुआ के बिआह, आ खुरपी के गीत " गा रहे हम ...)

बस यूँ ही ...

होली
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बारूदों के राखों से कुछ गुलाल चुरा लाऊँ
या शहीदों के बहे लहू से पिचकारी भर लाऊँ
कहो ना ! होली का त्योहार भला किस तरह मनाऊँ !?

तिरंगे में लिपटे ताबूतों की होलिका जलाऊँ
या उनकी बेवा की चीत्कारों से फगुआ-राग सजाऊँ
कहो ना ! होली का त्योहार भला किस तरह मनाऊँ !?

निर्भया के रूह पर लगे दाग किस उबटन से छुड़ाऊं
या आसिफा के दागदार बदन को किस पानी से नहलाऊँ
कहो ना ! होली का त्योहार भला किस तरह मनाऊँ !?

अपनों के 'जाने' का गम या मिले मुआवज़े का जश्न मनाऊँ
या 'सच' के करेले को 'झूठ' की चाशनी में पुए-पकवान बनाऊँ
कहो ना ! होली का त्योहार भला किस तरह मनाऊँ !?



(14 फरवरी को अगर हम Social Media पर आँसू बहाते और जलते मोमबत्तियों के मोम पिघलाते Selfie को post कर रहे थे ... और ... आज हम होलियों वाले Selfie डाल रहे हैं।

"उनका" परिवार भी इस साल होली का त्योहार मना रहा होगा क्या !?!?!????????

Social Media पर हम भी ना real life की तरह दोहरी ज़िन्दगी खूब जीते हैं । "उन्हें" शायद 'समानुभूति' की जरूरत है ना कि 'सहानुभूति' की ... वो भी ढोंगी social media वाली .... आप क्या कहते/सोचते हैं !?!?!?)