Showing posts with label चन्द पंक्तियाँ - (16) - "मादा जुगनूओं के" - बस यूँ ही .... Show all posts
Showing posts with label चन्द पंक्तियाँ - (16) - "मादा जुगनूओं के" - बस यूँ ही .... Show all posts

Wednesday, September 18, 2019

चन्द पंक्तियाँ - (16) - "मादा जुगनूओं के" - बस यूँ ही ...

(1)***

यूँ तो सुना है ...
क़ुदरत की एक
नाइंसाफी कि ...
मादा जुगनूओं के
पंख नहीं होते

ये रेंगतीं हैं बस
उड़ नहीं सकती
नर जुगनूओं की तरह
मनचाहा आकाश में

बस गढ़ सकती हैं
कड़ियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी
मायके में पाले सपनों के
पंखों को कतरी गई
आम औरतों की तरह ...

(2)***

आदतें अक़्सर बस
"बदल" जाती हैं
पर "बदलती" हैं
कहाँ भला !?

आकाश में उड़ती
पतंगों से ज्यादा
कटी पतंगों को
देख कर बचपन की
चमकने वाली आँखें

सयानी होने पर
आकाश में चमकते
तारों में नहीं
टूटते तारों में
अपनी इच्छाएं पूरी
होने की चमक
भरती हैं ...

(3)***

वाह री चलन दुनिया की
जीवित बिल्लियों के
राह में गुजरने से
खराब हो जाती है
'जतरा' (जात्रा) इनकी

और किसी के सगे की
मृत देह वाली
गुजरती अर्थी के
देखने से कहते हैं
'जतरा' (जात्रा) बनती ...