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Wednesday, September 9, 2020

एक अवतार पत्थर से परे ... (1)

आइए ! आज हम "एक अवतार पत्थर से परे ... (0)" (25.08.2020) से आगे "एक अवतार पत्थर से परे ... (1)" पर अपनी नज़र डालते हैं और जानते हैं कि कौन पुरुष कविता से इतना भी ज्यादा प्यार कर सकता है, जो अपनी धर्मपत्नी के मूल नाम की जगह उसे "कविता" नाम से ही सम्बोधित करने लगता है।

अधिकांशतः हम और हमारा तथाकथित सभ्य और सुसंस्कृत समाज किसी "सुनीता नारायणन" को कम जानता या पहचानता है, परन्तु प्रायः किसी "सपना चौधरी" को बख़ूबी जानता और पहचानता भी है .. शायद ...

हम अपनी पुरानी बातों, रीति-रिवाजों को अपनी धरोहर मानने में अपनी अकड़ समझते हैं। वैसे तो समझनी भी चाहिए .. पर कुछ बातें या रीति-रिवाज़ जिनके बदल देने से ही समाज की भलाई हो सकती है और हम उसे भी नहीं बदलते .. बल्कि उसे बदलने में अपनी नाक कटती महसूस करने लगते हैं .. तब हम अपनी भावी पीढ़ी के साथ अन्याय करते हैं .. शायद ... । मसलन .. अगर मज़ाहिया अंदाज़ में कहूँ तो .. हम आज भी बड़े आराम से या यूँ कहें कि धड़ल्ले से बातों-बातों में कहते हैं कि - "ना रहे बाँस, ना बजे बाँसुरी।" जबकि आज बाँस के साथ-साथ कई धातुओं, मसलन- पीतल, चाँदी आदि की भी बाँसुरी बाज़ार में उपलब्ध है। यहाँ तक कि एलक्ट्रॉनिक बाँसुरी की भी मधुर और सुरीली आवाज़ की उपलब्धता हमारे पास है। अब तो कम-से-कम इस मुहावरे को त्याग देना चाहिए। इसी तर्ज़ पर कई गम्भीर बातें और कुरीतियाँ भी हैं .. जो बदलने या त्यागने के लायक हैं, जिनकी बतकही फिर कभी।


अब इन बातों से परे आज अतीत के पत्थर बन चुके अवतार के बदले वर्त्तमान युग के अवतारों की बात करते हैं। परन्तु उपर्युक्त बातें हैं तो इसी आलेख के संदर्भ में ही, तो उन्हें कहनी पड़ी। एक और बात भी इसी संदर्भ में है कि कविता लिखने की रूचि या उस से प्रेम होने के लिए किसी इंसान के पास "साहित्य वाचस्पति" (Doctor of Literature) की उपाधि का होना आवश्यक नहीं है .. शायद ... परन्तु अचरज तो तब होता है, जब कोई इंसान कविता का इतना बड़ा प्रेमी हो जाए कि वह अपनी धर्मपत्नी को उस के मूल नाम की जगह कविता नाम से ही सम्बोधित करने लग जाए और समाज में उस महिला की पहचान कविता नाम से ही बन जाए। अब बतकही को विराम .. और आज के मूल बातों का आरम्भ ...

एक अवतार पत्थर से परे ... (1) :--

(अ) कविता :-

मायानगरी मुंबई की बहुत सारी सूफी संतों की दरगाहों में से एक दरगाह है .. उपलब्ध इतिहास के अनुसार मज़हब से ऊपर और मानवतावादी सूफी संत- मख्दूम अली माहिमी का माहिम इलाके में। उस इलाके का नामकरण- "माहिम" भी सम्भवतः उन्हीं सूफ़ी संत- मख्दूम अली माहिमी के दरगाह के वहाँ अवस्थित होने के कारण ही हुआ होगा।
उसी माहिम में स्थित हिंदुजा अस्पताल (पी डी हिंदुजा हॉस्पिटल ऐंड मेडिकल रिसर्च सेंटर) में लगभग 6 साल पहले सितम्बर,2014 में मष्तिष्क घात ('ब्रेन हैमरेज') से मस्तिष्क रक्तस्राव होने के बाद एक 57 वर्षीया महिला को भर्ती कराया गया था। बाद में 'कोमा' में चले जाने के कारण उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली ('वेंटिलेटर') पर भी रखा गया था। लोग कहते हैं ना कि- " जब तक साँस, तब तक आस। " परन्तु कुछ दिनों के बाद ही वहाँ के डॉक्टरों ने उस महिला की तीनों बच्चों, दो बेटियाँ और एक बेटा, को बताया था कि अब उनकी माँ के  जीवित रहने की संभावना कम बची थी।
अन्ततः 29 सितम्बर' 2014, सोमवार की सुबह अस्पताल के द्वारा उस महिला का 'ब्रेन डेड' घोषित कर दिया गया था। जिसके बाद फ़ौरन ही  उनके तीनों बच्चों ने अपनी माँ के यानि उस महिला के अंगदान करने के लिए सम्बन्धित अस्पताल वालों को अपनी सहमति दे दी थी। फिर जीवन को अलविदा कहने वाली उस महिला की अपनी जीवितावस्था में अपने बच्चों से प्रकट की गयी उनकी इच्छानुसार ही उनके गुर्दे ( 'किडनी' ), यकृत ( 'लिवर' / ज़िगर ) वगैरह .. कुछ महत्वपूर्ण स्वस्थ अंग कुछ जरुरतमंद लोगों को दान कर दिए गए थे। हालांकि हम प्रायः रक्त के लिए भी दान शब्द यानि रक्तदान शब्द का ही प्रयोग करते हैं, पर मेरे विचारानुसार इन सब के लिए "दान" के बजाए "साझा" शब्द का प्रयोग करना चाहिए। अतः हमें यह कहना चाहिए कि मरणोपरान्त उस महिला के "अंगसाझा" कर दिए गए थे।
वह जाते-जाते तीन लोगों को जिंदगी दे कर गईं थीं। उन का एक गुर्दा 48 वर्ष के उस एक व्यक्ति को दिया गया था, जो उस समय पिछले 10 साल से 'डायलिसिस' पर टिका हुआ था। दूसरा गुर्दा जसलोक अस्पताल में 59 साल के उस व्यक्ति को दिया गया था, जो सात साल से 'किडनी ट्रांसप्लांट' का इंतज़ार कर रहा था और उन के लीवर ने कोकिलाबेन अम्बानी अस्पताल ( Kokilaben Dhirubhai Ambani Hospital ) में 49 साल के एक व्यक्ति को नया जीवन दिया था। और तो और .. परेल के हाजी बचूली ( K B H Bachooali Charitable Ophthalmic & ENT Hospital ) के Eye Bank में दान की गईं उनकी आंखें भी कुछ जरूरतमंद की रोशनी बन रही हैं।
दरअसल यह महिला थीं (हैं)- ज्योत्स्ना करकरे उर्फ़ कविता करकरे, जिन्हें उनके धर्मपति- हेमंत करकरे अपने अत्यधिक कविता-प्रेम और कविता लिखने के अपने शौक़ के कारण अपनी धर्मपत्नी को प्यार से ज्योत्स्ना की जगह कविता नाम से सम्बोधित करते थे। जिस कारण वह कविता करकरे के नाम से ज्यादा जानी जाने लगीं थीं। पेशे से वह मुम्बई के ही एक बी एड कॉलेज में प्रोफ़ेसर थीं। उनकी दो बेटियों में बड़ी जुई करकरे नवारे अमेरिका में और छोटी बेटी सयाली करकरे जर्मनी में रहती हैं। उन का बेटा आकाश करकरे लॉ ग्रेजुएट है, जो अब पहले तो अपने पिता की शहादत और बाद में उस कारण से अपनी माँ की मानसिक तनाव व सदमे से असमय मृत्यु के कारण लगे दोहरे सदमे में अपने घर पर ना रह कर अपने मामा जी के साथ मध्य प्रदेश में रहता है और .. उनके धर्मपति तो शायद किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं ... हेमंत करकरे, 1982 बैच के आई पी एस ( भारतीय पुलिस सेवा ) और मुंबई ए टी एस चीफ ( आतंक विरोधी दस्तासेवा प्रमुख ), जिन्हें 26/11 ( 26 नवंबर 2008 ) के आतंकी हमले के दौरान आतंकवादियों की गोलियों से शहीद होने के बाद मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।
आज से लगभग 6 साल पहले 2014 में कविता जी पंचतत्व में विलीन हुईं और उस से भी 6 साल पहले यानि आज से लगभग 12 साल पहले 2008 में, एक रात हेमंत करकरे जी डिनर के लिए उन के साथ आउटिंग पर गए थे। एक फोन कॉल के बाद आधे में ही डिनर छोड़कर निकले और फिर कभी नहीं लौटे।
कविता जी अपने धर्मपति के शहीद होने के बाद उनके शहीद होने में हुए सुरक्षा चूक को लेकर हमेशा मुखर रहीं। उनके अनुसार सुरक्षा चूक की वजह से ही 26 नवंबर 2008 को आतंकी हमला हुआ था और उसी रात दक्षिण मुंबई में आतंकियों के हमले में उनके पति की जान गयी थी। वह अपने धर्मपति के शहीद होने के बाद पुलिस कर्मियों के लिए बेहतर हथियार, प्रशिक्षण और सुविधाओं की भी मांग जीवनपर्यन्त करती रहीं थीं। मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद उन्होंने मुखर हो कर आरोप लगाया था कि हमले के दौरान उनके पति को पीछे से सुरक्षा नहीं मिली थी और वह 40 मिनट तक घायल अवस्था में सड़क पर पड़े रहे थे। सूचना के अधिकार ( Right to Information-RTI / आरटीआई ) से पता चला था कि हेमंत जी का बुलेट प्रूफ जैकेट भी वहाँ नहीं था। दरअसल आरोप यह था कि वह बुलेट प्रूफ जैकेट किसी काम का था ही नहीं।

(ब) हेमन्त और जुई :-

इस आलेख में अगर इनकी बड़ी बेटी- जुई करकरे नवारे की चर्चा ना की जाए तो शायद यह आलेख अधूरी रह जाए। जुई करकरे नवारे, जो अमेरिका के बॉस्टन में अपने पति, जो बैंकिंग सेक्टर में कार्यरत हैं और दो बेटियों ईशा और रूतुजा के साथ रहती हैं। वह स्वयं पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। उन्होंने लगभग 11 सालों के बाद 'हेमंत करकरे : अ डॉटर्स मेम्वायर' ( Hemant Karkare — A Daughter’s Memoir. ) नामक अपने पिता की जीवनी और उपलब्धियों पर आधारित किताब, जिसका विमोचन 2019 में हुआ था, में लिखा है कि उसके पिता ने वैश्विक स्तर पर अपने देश का प्रतिनिधित्व किया था। उसके पिता सिर्फ एक आदर्श आइपीएस अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता, पारिवारिक व्यक्ति, कलाकार और संवेदनशील बेहतरीन इंसान भी थे।
इस किताब के लिए जुई ने बोस्टन में अपने पिता हेमंत करकरे की कई डायरियाँ और चिट्ठियाँ इकट्ठी कीं और पढ़ीं थी। जुई ने शहीद हेमंत करकरे की ज़िन्दगी के कई संवेदनशील पहलुओं को इस किताब में उकेरा है। यह किताब आज भी अमेज़न पर भी उपलब्ध है।
जैसा कि इस आलेख में हम पहले ही जान चुके हैं कि कविता लिखना हेमन्त जी का शौक़ था, इतना ज्यादा कि अपनी पत्नी को ज्योत्स्ना नाम के जगह कविता नाम से बुलाते थे। जुई अपनी 11 साल की उम्र में दीवाली पर जब पटाखे लायीं तो उनके पिता यानि हेमन्त करकरे बोले कि दीवाली अनाथालय में मनाएंगे। क्योंकि उन अनाथ बच्चों के लिए पटाखे तो दुर्लभ या नदारद ही होंगे। फिर सारा परिवार पटाखे लेकर अनाथालय गया और दीवाली वहीं सपरिवार अनाथ बच्चों के साथ ही मनायी गयी थी।
महाराष्ट्र के  वर्धा में 12 दिसंबर 1954 को जन्मे शहीद हेमंत करकरे
1975 में विश्वेश्वरैया नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, नागपुर से मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री ली थी और शुरूआती समय में हिंदुस्तान यूनीलिवर में नौकरी भी की थी। फिर 1982 में वह आईपीएस अधिकारी बने थे। महाराष्ट्र के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर के बाद इनको एटीएस चीफ बनाया गया था। वह ऑस्ट्रिया में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के अधिकारी के रूप में भी सात साल तक थे।नक्सलियों से प्रभावित महाराष्ट्र के ही जिला चंद्रपुर में जब एसपी के तौर पर नियुक्त थे तो गाँव के लोगों को नक्सलियों से डरने से मना करते थे। उनका मानना था कि नक्सली एक विचारधारा है जिसे गोली से खत्म नहीं किया जा सकता। इसीलिए कभी नक्सलियों पर गोली नहीं चलाई। बल्कि गाँव वालों का हौसला बढ़ाते हुए बोलते थे कि वे पुलिस का साथ दें और नक्सलियों को कभी भी पनाह नहीं दें। नॉरकोटिक्स विभाग ( Narcotics Control Bureau ) में तैनाती के दौरान उन्होंने पहली बार किसी विदेशी ड्रग्स माफिया को गिरगांव चौपाटी के पास मार गिराया था। यह वही विभाग है जो इन दिनों सुशांत सिंह राजपूत केस में रिया चक्रवर्ती के ड्रग्स गैंग से उनके ड्रग्स इस्तेमाल करने के सबूत मिलने पर उन की तहक़ीक़ात कर रहा है। 8 सितंबर 2006 में महाराष्ट्र के मालेगांव में जो सीरियल ब्लास्ट हुए थे, उसकी जाँच भी इन्हीं को सौंपी गई थी। हालांकि जाँच के दौरान उनपर आरोपियों पर प्रताड़ित करने का आरोप भी लगा था। राजनीतिक पार्टी से सम्बन्ध रखने वाली साध्वी प्रज्ञा ने तो तब उनको शहीद मानने तक से इंकार करने का एलान कर दिया था। जब कि वे बेहद शांत और संयमी होने के साथ-साथ पुलिस महकमे में ईमानदार और निष्ठावान पदाधिकारी थे।
फिर उस मनहूस शाम/रात .. 26 नवंबर 2008 में मुंबई में आतंकी हमला हुआ और उस खबर के मिलते ही उस समय के अपने डिनर को बीच में ही छोड़ कर फौरन अपने दस्ते के साथ वे मौका-ए-वारदात पर पहुँचे थे। फिर उनको खबर मिली कि कॉर्पोरेशन बैंक के एटीएम के पास आतंकी एक लाल रंग की कार के पीछे छिपे हुए हैं। वह वहाँ तुरंत पहुँचे तो आतंकी फायरिंग करने लगे। इसी दौरान दोतरफा फायरिंग में एक गोली एक आतंकी के कंधे पर लगी और वह घायल हो गया। उसके हाथ से उसका एके-47 गिर गया और उसे करकरे ने धर दबोचा था। दरअसल वही आतंकी अजमल कसाब था।
इसी दौरान आतंकियों की ओर से जवाबी फायरिंग में तीन गोलियाँ इन को भी लगी, जिसके बाद वह शहीद हो गए। उन के साथ-साथ सेना के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, मुंबई पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त अशोक कामटे और वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक विजय सालस्कर भी शहीद हो गए थे। बाद में 26 नवंबर, 2009 को इन की शहादत का सम्मान कर के भारत सरकार ने मरणोपरांत अशोक चक्र से इन्हें सम्मानित किया था।

इस प्रकार हम स्वयं इन दोनों से प्रेरणा ले सकते हैं और अपनी युवा पीढ़ी को दे भी सकते हैं कि कविता करकरे जी ने इस नश्वर दुनिया को अलविदा कहने के पहले यह संदेश हमें दिया कि उनका परिवार अपना जीवन (हेमंत करकरे की शहादत) देना भी जानता है और अन्य को जीवन (कविता करकरे का अंगसाझा) देना भी। 

ऐसे में अगर कोई इंसान अपनी सौतेली माँ के प्रपंच के परिणामस्वरूप अपने पिता के आदेशानुसार 14 साल के लिए वनगमन कर के और अपनी पत्नी को उसके अपहरणकर्ता के चंगुल से छुड़ाने के लिए उस के साथ युद्ध करते हुए छल से उस को मार कर अवतार कहला सकता है, तो फिर अंगदान करके जीवनदान करने और देश सेवा में प्राण न्योछावर करने वाले इन युगल को अवतार कहें, तो अनुचित नहीं होना चाहिए। ऐसा केवल मेरा मानना है, हो सकता है गलत भी हो .. शायद ...। फ़िलहाल और बहरहाल तो .. इन दोनों - कविता करकरे और हेमन्त करकरे - पत्थर से परे अवतारों को मन से शत्-शत् ही नहीं .. सहस्त्र-सहस्त्र भी नहीं .. बल्कि कोटि कोटि नमन .. बस यूँ ही ...

( फिर मिलेंगे .. अपनी बतकही के साथ-साथ .. इसकी अगली कड़ी- "एक अवतार पत्थर से परे ... (2)" में एक और ऐसे इन्सानी अवतार से जो वर्तमान के पत्थर में तब्दील हो चुके अतीत के तथाकथित अवतारों से परे हैं .. शायद ... )



ज्योत्स्ना उर्फ़ कविता करकरे (गूगल से साभार).

"Hemant Karkare — A Daughter’s Memoir" किताब के साथ जुई (गूगल से साभार)