Showing posts with label काश !!! ये मलाल .... Show all posts
Showing posts with label काश !!! ये मलाल .... Show all posts

Tuesday, October 6, 2020

काश !!! ये मलाल ...

 " आज घर में बहुत सारे मेहमान आये हुए हैं बेटी। आज तो पूर्णिमा के साथ-साथ संयोग से रविवार होने के कारण आमंत्रित किये गए लगभग सारे पड़ोसी, इसी शहर के अपने सारे नाते-रिश्तेदार, जान-पहचान वाले आए हुए हैं। घर में सत्यनारायण स्वामी की कथा के बाद सभी मेहमानों के लिए शहर के नामी कैटरर द्वारा दोपहर के भोजन की व्यवस्था भी किया है हमने। तुम्हारी भी सारी सहेलियाँ शामिल हैं .. हमारी आज की इस ख़ुशी में। और तो और .. सब से ख़ास बात तो ये है कि आज के इस ख़ुशीयुक्त आयोजन की वज़ह ही हो तुम और .. तुमको मिलने वाली बैंक के पी.ओ. की नौकरी। तुम्हारी ख़ुशी के लिए ही तो ये सब आयोजन किया गया है ना बेटी ? " - ये श्री सत्येंद्र मेहता जी द्वारा अपनी बेटी को इतनी ख़ुशी के माहौल में भी उदास देख कर पूछा गया सवाल था। -" वैसे तो तुम लगभग एक सप्ताह से, जब से तुम्हारा पी. ओ. वाला रिजल्ट आया है, तुम उसी दिन से उदास दिख रही हो। हम समझ रहे थे कि .. कोई मामूली बात होगी। किसी छोटी-मोटी वजह से मन या तबियत खराब होगा शायद। पर .. आज तो इस ख़ुशी के माहौल में .. सभी लोग तो खुश हैं रानी बिटिया .. सिवाय तुम्हारे ...। आख़िर क्यों बेटा ?

सत्येंद्र मेहता जी जनगणना के आंकड़े के अनुसार ओ. बी. सी. होने के कारण आरक्षण के तहत मिली अपनी सरकारी नौकरी में 12 साल के कार्यकाल में ही आरक्षण के तहत सरकारी आंकड़ों में दर्ज सामान्य वर्ग वाली जाति की तुलना में कम समय में ही ज्यादा पदोन्नति यानि तीन-तीन बार पदोन्नति पाकर वर्तमान में अपने गृह-जिला के एक ब्लॉक में बी डी ओ के पद पर विराजमान हैं। अच्छी तनख़्वाह पर .. सीमित के साथ-साथ असीमित ऊपरी आय का भी आगमन है उनके ज़ेब और घर .. दोनों में। जिसका उपभोक्ता या यूँ कहें कि हिस्सेदार या दावेदार परिवार का हर सदस्य किसी-न-किसी रूप में होता ही रहता  है।

मेहता जी के इतना कहने पर उनकी लाडली बिटिया- कंचन, जिसे लाड से वे कंचू बुलाते हैं और जो अब तक मौन थी , अपने पापा की स्नेह भरी बातों के प्रभाव में अपनी उदासी से मुक्त होने के बजाय उल्टा और भी रुआँसी हो गई। अब तो मेहता जी का रहा-सहा धैर्य भी जवाब दे गया। वह भी बेटी का साथ देते हुए मायूस हो कर प्यार से उसका झुका हुआ सिर सहलाते हुए पूछ बैठे - " क्या बात है बेटा ? कोई बात है मन में तो .. हमको बतलाओ ना ! पर उदास मत रहो बेटा .. तुम मेरे ज़िगर का टुकड़ा हो। हम कभी कोई कमी होने दिए हैं आज तक घर से लेकर बाहर तक तुम लोगों को ? किये हैं क्या ? .. आयँ ! .. बोलो ! .. अपने जानते-सुनते भर में क्या नहीं किये हैं तुमलोगों के लिए घर में ? " 

अब कंचन के सब्र का बाँध भी अपने पापा के प्यार की नमी पाकर ढह गया। सारे उपस्थित मेहमानों की परवाह किये बिना लगभग कपसते हुए वह फूट पड़ी - " पापा ! .. राकेश .. श्रीवास्तव अंकल का बेटा .. आप तो जानते ही हैं ना अंकल को, राकेश तो स्कूल से ही मेरा सहपाठी रहा है। एक अच्छा दोस्त भी। हर साल मुझ से ज्यादा ही अंक मिलते आये हैं उसको। मैं हमेशा उस से नोट्स लेकर अपनी पढ़ाई में मदद भी लिया करती थी। आपको तो सब पता है ना पापा। " - बोलते-बोलते बिलख-बिलख कर रोने लगी। - " आप तो अच्छी तरह ये भी जानते हैं कि उसके पापा एक साधारण प्राइवेट नौकरी करते हैं, जहाँ एक पैसा भी ऊपरी कमाई की गुंजाईश नहीं है। बहुत त्याग और कष्ट कर के उसके पापा एक उम्मीद के साथ अपने राकेश को पढ़ा कर यहाँ तक लाये हैं। पर .. उनकी सब उम्मीदें जमींदोज़ हो गई ना पापा ..  देखिये ना जरा .. आज के आपके इस आयोजन में ना तो राकेश आया है पापा और ना ही श्रीवास्तव अंकल आये हैं। पता है क्यों ? .. दरसअल .. इस प्रतियोगिता में  राकेश के मार्क्स मुझ से बेहतर हैं , पर .. मेरे मार्क्स कम होने के बावजूद ये नौकरी मुझे इसलिए मिली .. क्योंकि .. हम लोग आरक्षण के तहत आते हैं और वह जेनरल कैटगरी में आता है तो .. ऐसे में आज आज़ादी के सत्तर साल से ज्यादा गुजर जाने के बाद भी सफलता के लिए जातिगत अलग-अलग कट-ऑफ मार्क्स तय किये जाते हैं पापा। आखिर क्यों ? अब उसकी ये दुर्दशा जान-सुनकर उदास ना होऊं .. या रोऊँ नहीं तो और क्या करूँ पापा ? ... "

श्री सत्येंद्र मेहता जी अब अपनी बेटी के सवाल के समक्ष अपनी नज़रें झुकाए मौन और मूर्तिवत .. पूर्णरूपेण निरूत्तर खड़े थे। उनके मन में अब बिटिया को आरक्षण के तहत तथाकथित अधिकारस्वरूप या फिर भिक्षास्वरूप मिली पी. ओ. की नौकरी की ख़ुशी से कहीं ज्यादा मलाल .. अपनी बिटिया से ज्यादा अंक लाने के बावज़ूद जेनरल कैटगरी के कारण उन से ग़रीब श्रीवास्तव जी के बेटा राकेश को पी. ओ. की नौकरी नहीं मिलने की होने लगी थी .. शायद ... 

काश !!! ये मलाल और भी कई तथाकथित सभ्य-सुसंस्कृत इन्सानी मनों (मन का बहुवचन) में पनप पाता .. बस यूँ ही ...