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Thursday, May 14, 2020

" बताइए ना पापा " - ...

अगर पूरा पढ़ने का समय हो तभी आगे बढ़िएगा / पढ़िएगा ...

हमलोगों ने इन अनायास आयी वैश्विक विपदा की परिस्थितियों के दौरान हमारी सुरक्षा के लिए ही हमारी केंद्र और राज्य सरकार की सहमति से लागू लॉकडाउन की तीन श्रंखलाओं - 1.0, 2.0 और 3.0 - की अवधि को अपने-अपने तरीके से गुजारा है। अब आज से तीन दिनों बाद इसकी अगली कड़ी लॉकडाउन- 4.0 को भी गुजारना है। आगे के लिए भी तैयार रहना है, हर रूप में, चाहे वो आर्थिक हो, शारीरिक हो, मानसिक हो या सामाजिक हो। ना, ना, मैं कोई ज्ञान नहीं बाँट रहा और ना ही किसी को दाल-रोटी। बस यूँ ही ...
इस दौरान कई लोग तो अपनी दाल-रोटी, तो कोई नौकरी-रोजगार, तो कोई अपने घर वापसी के लिए तो, कोई कुछ, कोई कुछ के लिए परेशान रहा। पर कुछ लोग सौभाग्यशाली थे या हैं जो अपने घर-परिवार के बीच अपने घर में "वर्क फ्रॉम होम" के तहत सही समय पर खाते-पीते हुए अपनी सुषुप्त रुचियों को जगा रहे थे या हैं और साथ ही तरह-तरह के उपलब्ध मनोरंजन के साधन का सदुपयोग भी कर रहे हैं। इन में से एक मैं और मेरा परिवार भी है।
इसी मनोरंजन के तहत आपने अपनी-अपनी पसंद की कई फ़िल्में भी देखी होगीं। श्वेत-श्याम, ईस्ट मैन कलर से लेकर आज तक की आधुनिक तकनीक से बनी फ़िल्में। पुरानी और नयी फिल्मों में रंग, शैली, अदाकारी और समसामयिक कथानकों में अंतर के अलावा एक बात और भी नोटिस की होगी कि कास्टिंग यानि पर्दे पर किसी चलचित्र और धुन के साथ जब उस फ़िल्म के पर्दे पर के और पर्दे के पीछे के सभी संबंधित कलाकारों और तकनीशियनों के नाम दिखाए जाते हैं; जिसे पहले के समय में फ़िल्म शुरू होते ही दिखलाई जाती थी और आजकल फ़िल्म ख़त्म होने के बाद , अंत में। इसके कारण का तो पता नहीं, किसी को हो यहाँ बतला सकते हैं वैसे।
परन्तु एक समानता भी है इनमें और टी. वी. सीरियलों में भी जो आरम्भ में ही पर्दे पर एक खंडन (Disclaimer) दिखला दी जाती है और वो ये कि ... " इस कहानी के किसी भी पात्र या घटना का किसी भी सच्ची घटना से कोई लेना-देना नहीं है। अगर ऐसा होता भी है तो यह एक संयोगमात्र होगा। इसके लिए निर्माता या निर्देशक जिम्मेवार नहीं होगा या है। "
उसी शैली में मैं कह (लिख) रहा हूँ कि निम्नलिखित कहानी के साथ भी सारी उपरोक्त शर्तें लागू होती हैं। और हाँ ... एक विशेष बात और कि इसको संस्मरण या आत्मसंस्मरण समझने की भूल तो कतई नहीं की जाए।
अब आज की अपनी बकैती को यहीं पर देता हूँ विराम ... और आप शुरू कर दीजिए कहानी पढ़ने का काम ...

" बताइए ना पापा " - ...
अगर किसी विवाहित लड़की का मायका और ससुराल एक ही शहर में हो ..  मसलन - बिहार की राजधानी पटना की बात करें तो मान लेते हैं कि मायका कंकड़बाग में और ससुराल राजा बाज़ार में है .. लगभग दस-बारह किमी की दूरी , तो इसके कई फ़ायदे हैं और हानियाँ भी। पर फ़िलहाल फ़ायदे यानि लाभ की ही बात करते हैं।मसलन - छोटे से छोटे आयोजन या त्योहार में भी मायके की दूरियाँ नाप आती हैं लड़कियाँ। या फिर मायके वाले भी अपनी ब्याही बेटी के ससुराल के सारे सुख-दुःख में आसानी से शरीक हो लेते हैं। ठीक ऐसा ही ससुराल वाले भी अपने समधीयाना यानि परिवार के बहू के मायके वाले के साथ करते हैं। बराबर आने-जाने से आपसी औपचारिकताएं भी कम हो जाती हैं .. शायद ।
ऐसे ही लाभ का लाभ उठाते हुए एक शाम मैं सपरिवार - अम्मा, पापा, तथाकथित अर्द्धांगिनी , तथाकथित इसलिए कह रहा हूँ कि मेरे बेटे को जन्म देते वक्त इस ने अकेले ही प्रसव-पीड़ा झेली थी, वो भी लगभग पन्द्रह-सोलह घन्टे तक, मुझे तो जरा भी दर्द नहीं हुआ था।अर्द्धांगिनी यानि आधा अंग होने के नाते आधे दर्द में मैं भी तो तड़पता ना ? पर जरा भी नहीं तड़पा। फिर भी यह पुरुष-प्रधान समाज इन्हें अर्द्धांगिनी  कह कर भरमाए रख कर ख़ुश रखने की कोशिश भर करता है .. शायद ...।
हाँ .. तो साथ में अम्मा, पापा, अर्द्धांगिनी और मेरा पाँच साल का बेटा भी था - सोमू। सोमवार को उसका जन्म हुआ था। दिन सोमवार - 25.08.1997 को। तो .. इए तरह प्यार से घर में बुलाने के लिए सोमू नाम के पीछे दो सोचें थी - एक तो जन्म लेने का दिन सोमवार और दूसरा ये कि मेरे नाम सिद्धार्थ का 'स' और एक नाम मंजरी का 'म' भी इस नाम में शामिल हो जा रहा था। मंजरी मतलब सोमू की मम्मी और मेरी पत्नी।
हम सभी पाँचों लोग कंकड़बाग से अपनी छोटी बहन मधुलिका के राजा बाज़ार स्थित उसके ससुराल उसके छोटे बेटे के तीसरे जन्मदिन के अवसर पर भेजे गए निमन्त्रण आने पर जा रहे थे। हम पाँचों सार्वजनिक वाहन से उतर कर बाहरी मेन गेट को खोलते हुए उसके घर के अंदर घुसे। जूली - उसके घर की पालतू कुतिया - गेट खुलने की आवाज़ सुन कर जोर-जोर से भौंकने लगी। तभी अमर जी - छोटी बहन के पति जिन्हें हमलोग इसी नाम से बुलाते हैं - यानि हमारे बहनोई हमलोगों को जूली को शांत कराते हुए और अम्मा-पापा का पाँव छू कर आशीर्वाद लेते हुए मुस्कुरा कर अंदर की ओर ले गए। वैसे मेन गेट पर इनके नेमप्लेट पर तो अंग्रेजी में - अमरेंद्र भूषण प्रसाद- एडवोकेट , वाटिका एपार्टमेंट, रोड न.-3, अम्बेडकर नगर, पटना-800014. लिखा हुआ है।
घर का अतिथि-कक्ष रंगीन गुब्बारों और फीतों से सजा हुआ था। दीवार पर थर्मोकोल से बना हुआ, अंग्रेजी में हैप्पी बर्थ डे दीपू लिखा हुआ चिपकाया हुआ था। सभी वयस्क और युवा लोग अपने-अपने हमउम्रों से गपशप में मशग़ूल हो गए और बच्चे धमाचौकड़ी में। ख़ुशी के माहौल में व्यस्तता और गपशप के कारण रात के कब दस बज गए, पता ही नहीं चला। वो तो सभी में खलबली तब मची , जब सब को पता चला कि चार वर्षीय दीपू घर आये अतिथि-बच्चों के साथ खेलता-खेलता थक कर सो गया था।
दरअसल बहन के ससुराल वाले दीपू के डॉक्टर अंकल का इंतज़ार कर रहे थे। डॉक्टर अंकल मतलब दीपू के फूफा जी मतलब इस घर के दामाद। ये अंग्रेज़ी भाषा भी ना .. बहुत ही कंजूस है। नहीं क्या ? अब देखिए ना .. चाचा, मामा, मौसा, फूफा .. सभी के लिए बस एक ही शब्द - अंकल। बहनोई और साला , दोनों के लिए ही - ब्रदर इन लॉ। साथ ही हमारे समाज में एक ये भी चलन है ना कि जब परिवार का कोई सदस्य बड़े ओहदे पर होता है तो परिवार , मुहल्ले या जान-पहचान वालों के बीच उसके सम्बोधन के लिए नाम गौण हो जाता है और उसका पद ही मुखर हो जाता है। जातिवाचक संज्ञा ना जाने कब खुद-ब-खुद व्यक्तिवाचक संज्ञा बन जाता है। मसलन - वक़ील चाचा, इंजीनियर मामा, डॉक्टर मौसा, दारोग़ा बउआ इत्यादि।
पता चला था कि बस कुछ ही देर में डॉक्टर अंकल आज शाम वाले अपने आखिरी मरीज़ का ऑपरेशन कर के आने ही वाले थे। कुछ ही देर में वे, जो इस शहर के नामी सर्जन हैं और अपने निजी अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर से निकल कर अपनी कार से सपत्नीक उत्सव में पहुँच भी गए थे।
दीपू को बहुत मुश्किल से जगाया गया। हैप्पी बर्थ डे टू यू दीपू के समवेत समूहगान और तालियों के बीच जन्मदिन के लिए शहर के एक नामी ब्रांडेड बेकरी वाले के वातानुकूलित शो रूम से आया हुआ केक कटवाया गया। लगभग ऊंघते हुए दीपू के साथ-साथ आए हुए बच्चों में से अब तक के जागे बच्चों का डांस, गुब्बारा फोड़ना, फोटोग्राफ़ी, गिफ्ट का लेना-देना और अंततः स्पेशल पार्टी वाली डिनर के बाद रिटर्न गिफ्ट की औपचारिकता पूरी की गई थी। फिर धीरे-धीरे ओके, बाई-बाई, गुड नाइट के साथ सारे मेहमान विदा होने लगे। रात का ग्यारह बज चुका था।
हम पाँचों लोग - मैं, पत्नी, सोमू, अम्मा और पापा - भी अब सार्वजनिक वाहन से राजा बाज़ार से कंकड़बाग अपने घर के लिए रास्ते में पार्टी और डिनर की प्रशंसा आपस में ही करते हुए लौट पड़े थे। सोमू गोद में ही सो चुका था।
घर आ कर उसे जगाया गया। सोने के लिए पार्टी वाला कपड़ा बदलते वक्त पाँच वर्षीय सोमू ने मुझ से अचानक एक सवाल पूछ कर मुझे किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया। उसने पूछा - " पापा , पिछले महीने हम, आप और मम्मी जब मामा जी के घर हाजीपुर गए थे, चिंटू भईया ( चिंटू -  ममेरा भाई है सोमू का ) के बर्थ डे में .. तब तो केक काटने के समय आपके सामने आने तक का इन्तज़ार नहीं किया गया था। आप भी तो दीपू भईया के डॉक्टर अंकल के तरह चिंटू भईया के फूफा जी हैं। फिर ऐसा अंतर क्यों पापा ? "
" ............ " - मैं निरूत्तर मौन सामने बैठा था।
" बताइए ना पापा ... " - फिर लगभग दस-पन्द्रह मिनट बाद साथ सोते समय सोमू अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए जोर देते हुए मुझे टोका - " आपको याद तो है ना पापा ? आपने ये अंतर नोटिस किया था ना ? "
अब मैं कैसे कहता कि - हाँ, हमने भी नोटिस किया था। पिछले माह हम सभी मतलब तीनों - मैं, मंजरी और सोमू - मंजरी के बड़े भईया के छोटे बेटे - चिंटू - के चौथे जन्मदिन के उत्सव में शामिल होने बस से हाजीपुर उनके रेलवे विभाग के सरकारी बंगलानुमा आवास पर गए थे। हाजीपुर भारतीय पूर्वी मध्य रेलवे का मुख्यालय है। बिहार की राजधानी पटना से इसकी सड़क-मार्ग से दूरी लगभग पच्चीस किमी है। सरकारी आवास के मेन गेट पर अंग्रेजी में उनके नाम की तख़्ती टंगी थी - श्री अमिताभ श्रीवास्तव, आई. आर. ए. एस. ऑफिसर, मतलब - इंडियन रेलवे अकॉउंटस सर्विस ऑफिसर - भारतीय रेलवे लेखा सेवा अधिकारी।
अपने कुछ हज़ार की प्राइवेट नौकरी से बड़ी मुश्किल से सारे घरेलू ख़र्चे के बाद किसी आकस्मिक आवश्यकता के लिए कुछ जमा की गई राशी से अपनी हैसियत के पैमाने के अनुसार बर्थ डे वाले भतीजे चिंटू के लिए एक साधारण-सा खिलौना उपहारस्वरूप और औपचारिकता के लिए थोड़ी-सी मिठाइयाँ लेकर जा रहे थे हमलोग। रास्ते में गंगा-पुल - महात्मा गाँधी सेतु - पर आम दिनों की तरह ट्रैफिक-जाम के कारण हाजीपुर आने में कुछ ज्यादा ही विलम्ब हो गया था। बस की यात्रा और जून-जुलाई की गर्मी से चेहरे व शरीर पर रास्ते भर के धूल व पसीने और थकान को मिटाने के लिए हम तीनों बारी-बारी से वॉशरूम में गए थे। सबसे पहले सोमू, फिर मंजरी और अंत में आने ही पेश की गई गर्मा-गर्म चाय और नमकीन को उदरस्थ कर के मैं गया था वॉशरूम में।
मैं अभी वॉशरूम में ही था कि चिंटू के बर्थ डे केक .. " हैप्पी बर्थ डे टू यू चिंटू " के समूहगान और तालियों की आवाज़ के साथ कटने का आभास मिला। मैं जब तक मुँह-हाथ पोंछता हुआ बाहर आया तब तक आधा से ज्यादा केक मेहमान लोगों में वयस्क, युवा और बच्चों को बँट चुका था। अभी भी किसी-किसी को बाँटने की औपचारिकता चल ही रही थी।
मंजरी रसोईघर में और सोमू बच्चों के साथ ख़ुशी में शरीक था। तभी किसी ने कहा - " अरे, मीरा ( उस घर की काम वाली बाई ) सोमू के पापा को केक दो ला कर। " मीरा बोन चाइना के एक प्लेट में केक का एक टुकड़ा ला कर दी थी। वैसे तो उस वक्त रात का साढ़े आठ ही बजा था।
" पापा ! .. कुछ बोल नहीं रहे आप ? ... " - अपनी जिज्ञासा शांत हुए बिना चैन से नहीं बैठने वाली अपनी आदतानुसार , चाहे विषय कोई भी हो ... पाठ्यपुस्तक की हो या फिर थोड़ी बहुत उसकी समझ में आने वाली दुनियादारी की , सोमू मेरे नज़रअंदाज़ करने पर भी मुझे फिर से टोक दिया। अब उसे क्या जवाब देता उस वक्त .. उस वक्त तो क्या .. मैं आज तक अनुत्तरित और किंकर्तव्यविमूढ़ सोच ही रहा हूँ कि क्या कारण बतलाऊँ उसे भला ?
आप में से कोई बुद्धिजीवी हैं जो बता सकें मेरे बेटे सोमू को जो आज 23 वर्ष का हो चुका है, कि .. बर्थ डे केक काटने वाले मुख्य समय के लिए समाज में किस रिश्तेदार या परिचित का इंतज़ार किया जाता है और किसका नहीं ? किस के सामने केक कटता है और किसके ना भी होने से चलता है।
प्रतिक्रिया में ही सही .. कृपया बतलाइएगा जरूर .. ताकि मैं देर से ही सही .. सोमू के मन के उथल-पथल को सन्तुष्ट और शांत कर सकूँ ... आपके सही उत्तर के इंतज़ार में मैं ...