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Sunday, April 26, 2020

" लंका-दहन बनाम माचिस " - हाईजैक ऑफ़ पुष्पक ...-भाग-४-( आलेख/विचार ).

आजकल लॉकडाउन की अवधि में हम में से कई परिवार के लोग सपरिवार बहुत ही तन्मयता के साथ रामायण नामक टी वी धारावाहिक का डी डी नेशनल चैनल पर हो रहे पुनः प्रसारण का आनन्द ले ही रहे होंगें। इस के किसी एक या अधिक एपिसोडों में निश्चित रूप से महिमामंडित लंका-दहन का प्रकरण का प्रसारण भी आया ही होगा।
इस दौरान हमारी पीढ़ी को जो कुछ भी विचारधाराएँ अपने बुजुर्गों से डाउनलोड की गई हैं और जो उन्हें भी क्रमवार उनके पुरखों से उन्हें मिलता आया है, अपनी नई पीढ़ी को भी डाउनलोड करने से हमलोगों ने जरा सा परहेज नहीं किया होगा। करना भी नहीं चाहिए .. धर्म और आस्था की बातें हैं, भले ही मिथक हों।
बहरहाल हम इस विषय पर बहस नहीं कर रहे कि किसी भी प्राणी की पूँछ में आग लगने पर वह नहीं जलेगा क्या ? आपकी (अन्ध)भक्ति और (अन्ध)आस्था हताहत ना हो इसीलिए इस समय इसकी चर्चा भी बेमानी है कि इच्छानुसार किसी प्राणी की अपनी पूँछ या शरीर को घटाना या बढ़ाना असंभव है। खैर ! आपके अनुसार वे कुछ भी कर सकते थे और कर सकते हैं। भगवान जो ठहरे।
ऐसे में हमारे मन में जलाते हए और जलते हुए तथाकथित वीर हनुमान जी की पूँछ और लंका के स्वर्ण-महल को देख कर कभी हमारे मन में उस आग के स्रोत के बारे में ख़्याल ना आया हो, पर कम से कम उस नई पीढ़ी को तो दिमाग पर जोर देने देना चाहिए था जो पीढ़ी इसे अग्नि देवता की करामात की जगह एक आम रासायनिक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप उत्त्पन्न ऊर्जा को जिम्मेवार मानती है। पर नहीं ... आप ऐसा नहीं करेंगे, आप तो उस अंधानुकरण का चश्मा उसे अवश्य पहनायेंगे, जो खुद बचपन से पहनते आये हैं।
वैसे पुरखों ने कहा भी है कि :-
ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्।
मतलब तो आपको पता ही होगा कि :-
हे अग्नि स्वरूप परमात्मा ! इस यज्ञ के द्वारा मैं आपकी आराधना करता हूं। सृष्टि के पूर्व भी आप थे और आपके अग्निरूप से ही सृष्टि की रचना हुई। हे अग्निरूप परमात्मा! आप सब कुछ देने वाले हैं। आप प्रत्येक समय एवं ऋतु में पूज्य हैं। आप ही अपने अग्निरूप से जगत् के सब जीवों को सब पदार्थ देने वाले हैं एवं वर्तमान और प्रलय में सबको समाहित करने वाले हैं। हे अग्निरूप परमात्मा ! आप ही सब उत्तम पदार्थों को धारण करने एवं कराने वाले है।
पुरखों द्वारा परोसी मिथक बातों का आपका अन्धानुसरण उस बेचारे को पाठ्यक्रम की बातें, रासायनिक प्रतिक्रियाएँ , ऊर्जा-विज्ञान सब भूला देती हैं। इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी वे बेचारे पढ़ते कुछ और हैं, मानते कुछ और हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम बोलते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। मुँह से कुछ और बोलते हैं और मन में कुछ और रखते हैं। दोहरी मानसिकता ... दोहरी ज़िन्दगी।
कम से कम एक बार तो सोचने देते नई पीढ़ी को कि क्या उस लंका-दहन के समय माचिस थी ?
अगर नहीं थी तो आग जलाते कैसे थे ? महसूस कीजिये कि पहली बार जब चकमक पत्थर से आदिमानव ने आग की चिंगारी निकाली होगी और उसके उपयोग से शिकार में मारे गए जानवरों के माँस को कच्चे की जगह भून कर, पका कर खाया होगा। बहुत बाद में क्रमवार जब आग की खोज हुई होगी पहिया के पहले, पहिया ही की तरह , तो क्या ये अग्नि देवता ने आग को जन्माया होगा या मानव परिकल्पना ने अग्नि देवता की कल्पना करके उनका मानवीकरण या भगवानीकरण की होगी ? एक बार सोचना चाहिए। है ना ?
अगर ऐसे सवालों में हम या हमारी कोई भी पीढ़ी उलझी होती तो शायद हम को श्रेय मिलता इस आज मामूली सी दिखने वाली माचिस और उसकी तिल्ली को बनाने या आविष्कार करने का। पर शर्म आती है ये सोच कर कि हम तो अग्नि देवता को पूजते रहे .. मनों, टनों अनाज और पशु तक को भी हवन के नाम पर जलाते रहे, सुलगाते रहे और उधर दूसरे देशों में क्रमवार माचिस पर शोध होता रहा। आज हम उसका ही सबसे सुधरा हुआ रूप प्रयोग में ला रहे हैं।
हमने कभी सोचा कि माचिस या दियासलाई का आविष्कार कैसे, कब और कहाँ हुआ या माचिस की तिल्लियाँ किस पेड़ की लकड़ी से बनती है ? शायद नहीं।
दियासलाई बहुत काम की चीज है। इसके बिना आग जलाना संभव नहीं है। हालांकि अब आग जलाने के लिए अच्छे लाईटर भी उपलब्ध हैं। लेकिन ग्रामीण चूल्हे पर लकड़ी जलाने के लिए आज भी दियासलाई का ही प्रयोग किया जाता है। या फिर मंदिर का दिया और मज़ार की अगरबत्ती जलाने के लिए भी इसी को प्रयोग में लाते हैं। और हाँ ... श्मशान में भी। है ना !?  छोटी सी डिबिया, जिनमें नन्हीं-नन्हीं तीलियाँ। आज भी दियासलाई काफी सस्ती आती है और यह लाइटर से तो बहुत ही सस्ती आती हैं। इस वजह से दियासलाई का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है।
परन्तु प्रचीन काल में लोग चकमक पत्थर से रगड़कर आग पैदा करते थे। ‌‌‌पुराने जमाने में जब दियासलाइयाँ नहीं थीं तो लोग हमेशा आग को जलाए रखते थे। यदि किसी घर में आग बुझ जाती थी तो दूसरे घर से आग को लाया जाता था। यह स्थिति 19वीं शताब्दी के पहले तक की है। 19वीं शताब्दी में ही दियासलाई का आविष्कार कई लोगों द्वारा कई चरणों में अलग-अलग विदेशों में हुआ था।
ब्रिटेन के जॉन वॉकर ने 1827 के अंत यानी दिसम्बर महीने में हमारे इसी अग्नि देवता को सबसे सुरक्षित और आज वाली सुधरे हए रूप वाली माचिस की डिब्बी में भरने की कोशिश की थी।
भारत में माचिस का निर्माण 1895 में अहमदाबाद में और फिर 1909 में कलकत्ता (कोलकाता) में शुरू हुआ था, जिसका रसायन विदेश से आता था। इसके पहले तक माचिस 1827 में इसके सुधरे हुए रूप के आविष्कार होने के बहुत बाद में विदेश से भारत आती थी। उसके बाद भारत में लगभह 200 छोटे-बड़े और कारखाने भी खुल गए। 1926 में भारत सरकार ने दियासलाई उधोग को संरक्षण प्रदान किया। जिसके बाद 1927 में शिवाकाशी में नाडार बंधुओं द्वारा पूर्णतः स्वदेशी माचिस का उत्पादन शुरू किया गया था।
तिल्लियाँ बनाने के लिए पहले केवल चीड़ की लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब हर प्रकार की लकड़ी प्रयोग की जा सकती है, जो जल्दी सूखने की क्षमता रखती हो। सबसे पहले तिल्ली को ऐमोनियम फॉस्फेट अम्ल से लेप करते हैं। उसके बाद पैराफिन मोम और फिर फास्फोरस का प्रयोग किया जाता है। इसमें ‌‌‌रंग भी मिला दिया जाता है।
आइए ! ... अब से जब भी हम माचिस जलाएं तो एक बार अपने सनातनी अग्नि देवता और शून्य के आविष्कार के लिए गर्दन अकड़ाने के पहले उस फिरंगी/ब्रिटिश जॉन वॉकर को भी मन से धन्यवाद, शुक्रिया अवश्य प्रदान करें, जिसने आज ये मामूली-सी दिखने वाली सुविधजनक माचिस या दियासलाई नामक वस्तु हमें प्रदान की है। नहीं तो आज भी हम अपने अग्नि देवता को अनवरत जिन्दा रखने के लिए अपने-अपने घरों में अनवरत कोई ना कोई ईंधन जला कर बर्बाद कर रहे होते।
आप नहीं तो कम से कम अपनी अगली युवा पीढ़ी को तो तार्किक होने दीजिए। उसके तर्क करने की क्षमता को कुतर्की, नास्तिक, मुँहजोर, अनुशासनहीन, उद्दंड या नालायक के विशेषण का तमगा मत दीजिए। आज ना सही ... आने वाले सुनहरे कल के लिए ही सही ... प्लीज ........






Tuesday, February 18, 2020

हाईजैक ऑफ़ पुष्पक ... - भाग- २ - ( आलेख / एक विचार ).

आज मंगलवार है। हम में से एक सम्प्रदाय विशेष के अधिकांश लोग अपनी साप्ताहिक दिनचर्या के अनुसार आज और शनिवार को भी कहीं जाएं या ना जाएं परन्तु अपने आसपास या शहर के किसी नामीगिरामी हनुमान उर्फ़ महावीर मन्दिर में जरूर जाते हैं। फिर एक सिन्दूरी टीका माथे पर लगाये, अकड़े गर्दन में गेंदे के फूलों की माला और हाथ में लड्डू का डिब्बा या ठोंगा या फिर दोना मन्दिर से बाहर आते दिख जाएंगे।
अगर किसी कारणवश ना भी जा पाएं तो घर में उनकी पूजा अवश्य करते हैं। अगर यह भी ना हो पाया तो अपने आम दिनचर्या निपटाते हुए हनुमान- चालीसा जोर-जोर से या मन ही मन दुहराते हैं।
कईयों को इसका शाब्दिक अर्थ मालूम है और कईयों को नहीं, चाहे वे किसी भी पीढ़ी के हों।
बाक़ी दिन मांसाहार करने वाले कई लोग भी आज दिल्ली सरकार के परिवहन की व्यस्तता को सुचारू करने के लिए चलाये गए "ऑड-इवन" वाली प्रणाली की तरह शाकाहार खा कर तथाकथित हनुमान जी को खुश करने की कोशिश करते हैं।
कुछ लोग अपनी मंशा पूरी होने की ख़ुशी में, भले वो दो नंबर की कमाई वाली मनचाहे स्थान पर तबादले की बात हो या परीक्षा में चोरी कर के पास करने की बात हो या फिर नाजायज़ कोई केस किसी मंहगे वकील के दम पर जीती गई हो, डब्बा भर-भर कर अपने औकातानुसार डालडे या शुद्ध घी का बेसन या मोतीचूर का लड्डू उनके भोग में चढ़ाते हैं। भले वह लड्डू भक्तगण प्रसादस्वरूप स्वयं सपरिवार या मुहल्ले में बाँट कर खाते हैं और कुछ अंश तोंदिले पंडित के हिस्से आता है।
अब हमें हमारी भावी पीढ़ी को ये हनुमान-चालीसा बकवाने के पहले उसका अर्थ उन्हें समझाना चाहिए और बुरा ना माने तो खुद भी जानना चाहिए।
उसके कुछ अंश विचारणीय अवश्य हैं। इसका विश्लेषण अवश्य करना चाहिए कि इसमें सच्चाई कितनी है। है भी या नहीं । या कहीं तुलसीदास जैसे प्रकांड विद्वान की कोरी कल्पना भर है, किसी कॉमिक्स के किसी काल्पनिक पात्र "स्पाइडर मैन" , "सुपर मैन" या फिर "शक्तिमान" की तरह।
तुलसीदास जी ने लिखा है :-

" जुग सहस्र जोजन पर भानू ।
  लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥"

मतलब :-

" जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है कि उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया। "

आप की कितनी भी अंधभक्ति हो, एक बार इसको सत्यता की कसौटी पर अवश्य कसनी चाहिए। अगर आप नहीं कसेंगें तो कम से कम भावी पीढ़ी को तो कसने से मत रोकिये-टोकिए। हनुमान जी की कृपा आप पर हो या ना हो पर ऐसा करने से आपकी बड़ी कृपा होगी।

तुलसीदास जी ने पूरी रचना में बस हनुमान जी की अति महिमामंडन ही की है। हम भी उसे सम्प्रदायविशेष की सभ्यता-संस्कृति बचाने के नाम पर बस दुहराए जा रहे हैं।
आगे उन्होंने लिखा है :-

"   संकट कटै मिटै सब पीरा ।
    जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ "

मतलब :-

" हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है। "

ऐसे में तो इसको बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल करनी चाहिए थी या है। इस से विश्व ना सही अपने देश की दुर्दशा का विनाश तो कम से कम हो ही जाना चाहिए था या है। दिन प्रतिदिन जिस तरह मुहल्ले या शहर-गाँव के चौक-चौराहों या फुटपाथों पर अतिक्रमण कर-कर के इनके मंदिरों की संख्या बढ़ती जा रही है, उस तरह मंदिरों की आबादी की गणना के अनुसार तो अब तक भारतवर्ष को विपदा-आपदा मुक्त देश हो जाना चाहिए था। पर सच्चाई इस से इतर है। तनिक गौर कीजिए। भेड़-चाल मत चलिए। कम से कम बुद्धिजीवियों को तो पहल करनी चाहिए। या नहीं !???
बच्चे बेचारे अपनी लगन, बुद्धिमता और मेहनत से अच्छी पढ़ाई के फलस्वरूप वे अपनी कक्षा में प्रथम हो भी जाए तो आप उसके हौसले और आत्मबल व आत्मविश्वास का हनन कर उसे हनुमान जी की कृपा बतला कर उनके नाम पर सवा किलो लड्डू चढ़ा कर मुहल्ले वाले , नाते-रिश्तेदारों  और जान-पहचान वालों को हँस-हँस कर बाँटेंगें।
बेचारे बच्चे भी अपनी प्रतिभा को शक भरी निगाह से देखने लगते हैं। अन्ततः वे उस काल्पनिक शक्ति के समक्ष नतमस्तक हो कर आपकी तरह दुहराने लगते हैं ... " जै , जै , जै , हनुमान गोसाईं, कृपा करहुँ ....." और अपने पास करने के लिए तथाकथित हनुमान जी से मनता (मन्नत) मानने लगते हैं। फिर तो पीढ़ी दर पीढ़ी या सिलसिला चली आ रही है और उम्मीद ही नहीं आपकी कुम्भकर्णी नींद में विश्वास भी हो गया है कि अनवरत युगों-युगों तक इनकी दुकान चलते रहने वाली है, वर्ना कितने तोंदिलों की बेरोजगारी में इजाफ़ा हो जाएगा।
चलते-चलते एक-दो बात पूछनी है आप सभी से कि (१) क्या जो बातें सच्ची हो और लोगों को कड़वी लगे तो क्या नहीं बोलनी चाहिए ? (२) अगर एक-दो या समूह का मन खट्टा होता हो किसी बात से और उस बात की सच्चाई परखने की जरुरत हो तो क्या उसकी चर्चा एक गुनाह है ? (३) किसी बात को तर्क की कसौटी पर कसने के लिए चर्चा करना , बस चर्चा भर है या उसे कुतर्क कह कर ठंडे बस्ते में डाल कर अन्धानुसरण करना और भावी पीढ़ियों से भी करवाना सही है ???

जाते- जाते .... :-

हमारा महिमामंडित हनुमान चालीसा शाब्दिक अर्थ के साथ जो गूगल पर भी आसानी से उपलब्ध है। फिर भी आपकी सुविधा के लिए विस्तार से :-

हनुमान चालीसा तुलसीदास जी की अवधी में लिखी एक काव्यात्मक कृति है जिसमें तथाकथित प्रभु राम के महान भक्त हनुमान के गुणों एवं कार्यों का चालीस चौपाइयों में वर्णन है। यह अत्यन्त लघु रचना है जिसमें पवनपुत्र श्री हनुमान जी की सुन्दर स्तुति की गई है।

॥ हनुमान चालीसा ॥

दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवनकुमार ।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥
राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचित केसा ॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥
संकर सुवन केसरीनंदन ।
तेज प्रताप महा जग बंदन ॥
विद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥
सूक्श्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सँवारे ॥
 लाय सजीवन लखन जियाये ।
 श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥
 रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।
 तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥
 सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
 अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥
 सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
 नारद सारद सहित अहीसा ॥
 जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
 कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥
 तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा ।
 राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥
 तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना ।
 लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥
 जुग सहस्र जोजन पर भानू ।
  लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥
  प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
  जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥
  दुर्गम काज जगत के जेते ।
  सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥
  राम दुआरे तुम रखवारे ।
  होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥
  सब सुख लहै तुम्हारी सरना ।
  तुम रच्छक काहू को डर ना ॥
  आपन तेज संहारो आपै ।
  तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥
  भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
  महाबीर जब नाम सुनावै ॥
   नासै रोग हरै सब पीरा ।
   जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥
   संकट तें हनुमान छुड़ावै ।
   मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥
   सब पर राम तपस्वी राजा ।
    तिन के काज सकल तुम साजा ॥
    और मनोरथ जो कोई लावै ।
    सोई अमित जीवन फल पावै ॥
    चारों जुग परताप तुम्हारा ।
    है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
    साधु संत के तुम रखवारे ।
    असुर निकंदन राम दुलारे ॥
    अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
    अस बर दीन जानकी माता ॥
    राम रसायन तुम्हरे पासा ।
    सदा रहो रघुपति के दासा ॥
    तुम्हरे भजन राम को पावै ।
    जनम जनम के दुख बिसरावै ॥
    अंत काल रघुबर पुर जाई ।
    जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥
   और देवता चित्त न धरई ।
   हनुमत सेई सर्ब सुख करई ॥
    संकट कटै मिटै सब पीरा ।
    जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥
     जै जै जै हनुमान गोसाईं ।
     कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥
     जो सत बार पाठ कर कोई ।
      छूटहि बंदि महा सुख होई ॥
      जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा ।
      होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
      तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
      कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ॥
   
दोहा
 पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप ।
 राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥

आरती
 मंगल मूरती मारुत नंदन
 सकल अमंगल मूल निकंदन
 पवनतनय संतन हितकारी
 हृदय बिराजत अवध बिहारी
 मातु पिता गुरू गणपति सारद
 शिव समेट शंभू शुक नारद
 चरन कमल बिन्धौ सब काहु
 देहु रामपद नेहु निबाहु
 जै जै जै हनुमान गोसाईं
 कृपा करहु गुरु देव की नाईं
 बंधन राम लखन वैदेही
 यह तुलसी के परम सनेही ॥

 सियावर रामचंद्रजी की जय॥

इन सारे चौपाइयों-दोहों का शाब्दिक हिन्दी रूपांतरण निम्न प्रकार है :-

गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ। जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।
हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए.

श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों - स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।
हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है
हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है और अच्छी बुद्धि वालों के साथी और सहायक है।
आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।
हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर में वन्दना होती है।
आप प्रकान्ड विद्या निधान है। गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।
आप श्री राम चरित सुनने में आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।
आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके लंका को जलाया।
आपने विकराल रुप धारण करके राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।
आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मण जी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।
श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।
श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से लगा लिया कि तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।
श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सन्त कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुणगान करते है।
यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।
आपने सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।
आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया, जिससे वे लंका के राजा बने। इसको सब संसार जानता है।
जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है कि उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।
आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते हैं।
रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले है, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता अर्थात् आपकी प्रसन्नता के बिना राम-कृपा दुर्लभ है।
जो भी आपकी शरण में आते है, उस सभी को आनन्द प्राप्त होता है और जब आप रक्षक हैं तो फिर किसी का डर नहीं रहता।
आपके सिवाय आपके वेग को कोई नहीं रोक सकता। आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप जाते हैं।
जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहां भूत, पिशाच पास भी नहीं फटक सकते।
वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती है।
हे हनुमान जी! विचार करने में, कर्म करने में और बोलने में, जिनका ध्यान आपमें रहता है, उनको सब संकटों से आप छुड़ाते है।
तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है। उनके सब कार्यों को आपने सहज में कर दिया।
जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करें तो उसे ऐसा फल मिलता है, जिसकी जीवन में कोई सीमा नहीं होती।
चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में आपका यश फैला हुआ है। जगत में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।
हे श्री राम के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।
आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।
आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण में रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम-नाम की औषधि है।
आपका भजन करने से श्री राम जी प्राप्त होते हैं और जन्म-जन्मांतर के दुख दूर होते हैं।
अंत समय में आप श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलाएंगे।
हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नहीं रहती।
हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।
हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।
जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बंधनों से छूट जाएगा और उसे परमानन्द मिलेगा।
भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया है , इसलिए वे साक्षी हैं कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।
हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है। इसलिए आप उसके हृदय में निवास कीजिए।

हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनंद मंगलों के स्वरूप हैं।
हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए.

सियावर रामचंद्रजी की जय॥
अब तक आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा और इतु-सा भी सोचा तो फिर भाग-३ के लिए वक्त निकालिएगा जरूर ...