Showing posts with label शहीद-स्मारक. Show all posts
Showing posts with label शहीद-स्मारक. Show all posts

Thursday, November 28, 2019

शहीद-स्मारक

तुम्हारे सीनों को जब
फिरंगियों की बेधती
निर्दयी गोलियाँ
बना गई होगी
बेजान लाशें तुम्हें ..

बेअसर रही होगी
तब भी भले ही
मन्दिरों की
तमाम बेजान
पाषाण-प्रतिमाएं ..

पर बेज़ार
बिलखी होंगीं
घर तुम्हारे
बेबस .. बेताब
तुम्हारी जननी माँएं ...

सन् उन्नीस सौ बयालीस ईस्वी के ग्यारह अगस्त तदनुसार विक्रमी संवत उन्नीस सौ निन्यानवे के श्रावण मास कृष्ण पक्ष चतुदर्शी तिथि मंगलवार को बिहार की राजधानी पटना में अवस्थित




बिहार सचिवालय भवन पर राष्ट्रीय पताका फहराने के प्रयास में सात नवयुवक छात्रों ने विदेशी सरकार की गोलियों का सामना कर के वीर गति पाई। 1942 में ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देते हुए सूबे के ये सातों लाल पुलिस की गोलियों से छलनी कर दिए गए थे। बापू के आह्वान पर अगस्त क्रांति में शामिल हो गए और सचिवालय पर तिरंगा फहराने की कोशिश करते हुए शहीद हो गए।
भारत माता के नाम पर अपने प्राणों की आहूति दे दी। हमारी आजादी के लिए घर-परिवार भूल गए। अफसोस कि आज उन्हीं शहीदों को हम सब भूल रहे हैं।
हर साल 11 अगस्त को उनकी स्मृति एक रस्म अदायगी बनकर रह गई है। सातों युवा पटना के स्कूल-कॉलेजों के छात्र थे। देश या राज्य या फिर जिला की बात कौन कहे, उनके स्कूल-कॉलेज भी उन्हें याद रखने को तैयार नहीं। सात में से पांच की कोई तस्वीर नहीं है उनके संस्थान में। उनसे जुड़े तमाम रिकॉर्ड नष्ट हो चुके हैं।
स्वतन्त्र भारत की बिहार सरकार द्वारा निर्मित यह स्मारक भारत माता के इन सपूतों के बलिदान की पुण्य स्मृति में श्रद्धा समेत निवेदित है।

अहिंसक क्रांति में प्राणों की बलि देने वाले सात वीर :-
१) स्व. उमाकान्त प्रसाद सिंह
२) स्व. रामानन्द सिंह
३) स्व. सतीश प्रसाद झा
४) स्व. जगपति कुमार
५) स्व. देवी प्रसाद चौधरी
६) स्व. राजेंद्र सिंह
७) स्व. राम गोविन्द सिंह।

सालों भर इनकी मूर्तियाँ नभचरों के बीट और स्थानीय नागरिकों की तरह शहर की प्रदूषण भरी हवा के धूल-कणों की परत से आच्छादित होती रहती हैं।
आज मॉल और आधुनिक पार्कों की संस्कृति इनकी महत्ता को धूमिल करती जा रही है। इस राह से गुजरता शायद ही कोई व्यस्त यातायात में इनकी ओर देखता भर भी हो। मन्दिर की बेजान मूर्तियों की तरह इनके समक्ष कोई नतमस्तक नहीं होता। मन्दिरों के संगमरमरी फर्श की तरह इनका फर्श नहीं चमकता।
काश! किसी सरकारी एक दिवसीय खानापूर्ति से परे इन शहीदों के शहीद हुए हौसलों और सपनों को याद कर हम अपनी एक जोड़ी आँखे नम और उनकी मूर्तियों के आगे ही सही नमन कर पाते।
आज भी इनकी मूर्तियों की उपेक्षित सूनी आँखें पटना सचिवालय की ओर ताकती हुई मानो सचिवालय के घड़ी-स्तम्भ के चारों ओर की चारों घड़ियों की टिक-टिक में अपने ख़ामोश हो चुके हृदय-स्पन्दनों को महसूस कर रही हों।
भावी पीढ़ी को भी उनके पाठ्यक्रमों की पुस्तकों में हम इन्हें पढ़ा भी रहे हैं, तो बस .. अंक प्राप्ति के लिए। इस सन्दर्भ से हट कर भी हमें पढ़ाई को अंक-प्राप्ति के साधन से परे ज्ञान और अहसास का माध्यम बनाना चाहिए। चाहे वह विषय इतिहास-भूगोल का हो या विभिन्न विज्ञान का।
और हाँ ... खुद के और अपने परिवार के मोह से अलग अंग्रेजों की ग़ुलामी को नकारने वाले इन शहीद हुए उत्साही युवाओं के नाम के आगे लगा स्व. (स्वर्गीय) शब्द खटकता है। स्वर्गीय के जगह शहीद शब्द जोड़ा जाना चाहिए था .. शायद ..।
वैसे भी स्वर्ग की प्राप्ति के लिए तो कार्तिक माह में गंगा में और कुम्भ के समय संगम में स्नान करना पड़ता है ना !? पर ये लोग तो अपने गर्म लहू में नहाए थे। तब तो ये वैसे भी स्वर्गीय हो ही नहीं सकते ना ! ... है कि नहीं !???