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Tuesday, June 22, 2021

मन-मंजूषा ...

खींच भी लो हाथ रिश्तों से अगर,

मेरी ख़ातिर अपनी तर्जनी रखना।

मायूसियों में मैं किसी उदास शाम,

मुस्कुरा लूँ, इतनी गुदगुदी करना।


जो किसी गीत के बोल की तरह,

भूल भी जाओ तुम प्यार हमारा।

माना हो जाए मुश्किल वो गाना,

तो बस यूँ ही कभी गुनगुना लेना।


रिश्तों के फूल मुरझा भी जाए तो,

फेंकना बदगुमानी में क़तई भी ना।

मान के किसी मंदिर या मज़ार के,

फूलों-सी मन-मंजूषा सजा रखना।

 

सुलगने से मेरे महकता हो अगर,

रौशन मन का घर-कमरा तुम्हारा।

हरदम किसी मन्दिर की सुलगती,

अगरबत्तियों-सा सुलगता रखना।