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Saturday, February 5, 2022

खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-३ (अन्तिम भाग).

(i) खुरपी के ब्याह में हँसुए का गीत : -
अब आज "खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-३" में गत भाग-२ में साझा किए गए ग्राफ़युक्त चित्रों के आधार पर "क़ैद में वर्णमाला" की बतकही को आगे बढ़ाते हैं और इसी बहाने लीक से हट कर खुरपी के ब्याह में हँसुए का गीत गाते हैं .. बस यूँ ही ... 
इन ग्राफ़युक्त चित्रों में .. आपका तो पता नहीं, पर मेरे लिए तो चौंकाने वाली बात है या यूँ कहें कि .. स्वीडन, कनाडा इत्यादि जैसे देशों के नाम और उनके पाठकों की संख्या भी हैं। नहीं क्या ? मुझे तो बहुत ही विस्मयकारी लगा। पहले हम स्वीडन की ही बात करते हैं। 
वैसे तो सर्वविदित है, कि स्वीडन देश यूरोपीय महाद्वीप में स्थित है और स्टॉकहोल्म शहर जैसी राजधानी वाले इस देश की मुख्य भाषा और राजभाषा, दोनों ही स्वीडिश है। यूँ तो ज्यादातर यहाँ बसे हुए विदेशी मूल के लोग नगण्य संख्या में हैं। मुख्यतः सीरिया, फिनलैंड, इराक, पोलैंड, ईरान और सोमालिया आदि जैसे देशों के लोग बसे हुए हैं, पर कुछ भारतीय भी हैं, जो अनुमानतः ज्यादातर हिंदी भाषी ही होने चाहिए .. शायद ...
अब उपरोक्त आंकड़े में जो स्पष्ट रूप से दिख रहा है, कि जिस किसी भी चिट्ठाकार के 'ब्लॉग' से यह 'स्क्रीन शॉट' (Screen shot), जिस दिन भी लिया गया होगा ; उसके विगत सात दिनों में (Last 7 days) उस ब्लॉग विशेष को झाँकने वाले भारत के छः सौ पाठकों की तुलना में स्वीडन के पाठकों की तादाद छः हजार (6K) दिख रही है। अगर गौर किया जाए तो .. भारतीय पाठकों की तुलना में ठीक-ठीक दस गुणा। 
पर ऐसे में .. मन में एक सवाल उठता है, कि लगभग एक सौ पैंतीस करोड़ से भी ज्यादा जनसंख्या वाले देश- भारत की तुलना में उस एक करोड़ से कुछ ही ज्यादा आबादी वाले, जहाँ हिंदी पढ़ने-जानने वाले अगर भारतीय हैं भी, तो बहुत ही कम ; स्वीडन देश में फिर अचानक हिंदी भाषी ब्लॉग पढ़ने वाले पाठकों या पाठिकाओं की बाढ़-सी क्यों और क्योंकर आयी होगी भला ? 
यूँ तो स्वीडन में भी कई विश्वविख्यात लेखक हुए है, जिनमें से अब तक सात लोगों को नोबेल पुरस्कार का सम्मान भी मिल चुका है। पर फिर मन में सवाल आता है कि .. इन नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से अगर आज कई लोग जीवित भी होंगे और स्वीडिश भाषी होने के साथ-साथ अगर उन्हें हिंदी भाषा आती भी होगी, तो इन से पाठकों की इतनी ज्यादा संख्या बढ़ने की संभावना नहीं बनती है। फिर अचानक हिंदी भाषी ब्लॉग पढ़ने वाले पाठकों की बाढ़-सी भारत से ज्यादा स्वीडन में क्यों और क्योंकर भला आ गयी होगी ? 
अगर आप में से किन्हीं सुधीजन को इस विषय में मालूम हो, तो मुझे भी इस की यथोचित वजह से अवगत अवश्य करवाइएगा। वैसे उपरोक्त आंकड़े के अनुसार, अमेरिका के दो सौ सत्ताईस पाठकों की संख्या तो फिर भी समझ में आती है .. शायद ...

(ii) बेरंग हाथ भी नहीं : -
अब मुख्य बिन्दु पर आते हैं। अगर इन विदेशियों में से कोई लिखने वाले (तथाकथित साहित्यकार) अपनी देशी भाषा (जो हमारे लिए निश्चित रूप से विदेशी भाषा ही है और अंजान भी) के साथ-साथ हमारी हिंदी भाषा को भी किसी दुभाषिया की तरह जानते होंगे, तो वह तो हमारी टुच्ची बतकही को तो नहीं, परन्तु आप जैसे प्रबुद्ध लोगों की रचनाओं को बहुत ही आसानी से अपनी भाषा में अनुवाद करके, अपने नाम से प्रकाशित कर या करवा सकते हैं। या फिर राम (तथाकथित) जाने, कि वहाँ के सात नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से ही किसी एक या दो-तीन ने हमारे यहाँ के किसी तथाकथित बहुत ही पुराने दिग्गज चिट्ठाकारों की ही किसी भी नायाब रचना का अपनी स्वीडिश भाषा में भाषांतर या लिप्यंतरण कर के ही नोबेल पुरस्कार झटक लिया हो। 
मतलब .. ये हम नहीं कह रहे या दावा कर रहे हैं, कि वे लोग ऐसा किये ही होंगें या करेंगे ही, बल्कि इसकी एक प्रबल सम्भावना बनती भर है। दूसरी तरफ ना तो हमें उनकी भाषा की और ना ही उनकी लिपि की भी जानकारी है, जो हम उन्हें रंगे हाथ पकड़ पायेंगे, कि वहाँ पर, हमारी टुच्ची बतकही की तो कदापि नहीं पर, आप दिग्गज़ों में से किसी एक की भी रचना की चोरी या डकैती कर ली गई हो या आगे भविष्य में होने की संभावना हो तो भी .. शायद ...
अजी साहिब ! विदेशों में ही क्यों .. अपने ही देश के अन्य वैसे राज्यों में, जहाँ की लिपि देवनागरी से बहुत ही भिन्न हैं ; विशेष कर दक्षिण भारत की। अब अगर वहाँ भी कोई अपनी भाषा के अलावा हिंदी भी जानने-समझने और लिखने-पढ़ने वाले दुभाषिए जैसे हों, तो उन लोगों से भी ऐसी चोरी या नक़ल की संभावना बनती हैं। हम तो तब भी नहीं पकड़ सकेंगे उनको, रंगे हाथ तो क्या, बेरंग हाथ भी नहीं। वैसे ये सब मेरी टुच्ची सोच-समझ की कोरी कल्पना भर भी हो सकती है .. बस यूँ ही ...

(iii) बेचारी सदियों से घेरे में घिरी : -
मगर .. अगर एक बार के लिए उपर्युक्त नक़ल या चोरी की सम्भावना को सच मान लिया जाए, तो फिर आप में से कई लोगों की "सर्वाधिकार सुरक्षित" या "©" वाली महान रचनाओं में से कोई एक-दो ही सही, विश्व की किसी विदेशी भाषा में या अपने ही देश के अन्य राज्य की अंजान भाषा में किसी दुभाषिए की तरह अनुवाद कर के वहाँ कोई छपवा ले या उसी के आधार पर कहीं कोई नोबेल पुरस्कार लपक ले तो ? उन अंजान भाषाओं की जानकारी नहीं होने के कारण हम-आप उन्हें कैसे पकड़ पायेंगे भला ? पकड़ पायेंगे क्या ? शायद .. नहीं ?  और अगर "हाँ" तो, वह विधि हमको भी तनिक बतलाने का कष्ट कीजियेगा आप सभी लोग, जो अपनी-अपनी बेशकीमती रचनाओं के साथ-साथ "सर्वाधिकार सुरक्षित" या "©" के फुदने लटकाते हैं .. बस यूँ ही ... 
ज़्यादातर रचनाओं के साथ रचनाकारों के नाम प्रायः © वाले चिन्ह के साथ ही देखने के लिए मिलते हैं। किसी-किसी 'ब्लॉग' पर तो एक टिप्पणीनुमा अनुच्छेद भी चिपका हुआ देखने/पढ़ने के लिए मिलता है यदाकदा। कहीं-कहीं तो विशुद्ध हिंदी में बजाप्ता कनिष्ठ कोष्टक में "सर्वाधिकार सुरक्षित" या "स्वरचित रचना" का भी 'टैग' या एक फुदना लटका रहता है। गर्वोक्ति के लिए "स्वरचित रचना" वाली 'टैग' तो समझ में आती है, पर ये "सर्वाधिकार सुरक्षित" वाला फुदना हास्यास्पद लगता है, ख़ासकर स्वीडन में या भारत के ही अन्य राज्यों में किसी दुभाषिये साहित्यकार द्वारा इसके गलत इस्तेमाल करने वाली संभावनाओं के मामले में। वैसे इसका अर्थ तो हमें भी समझ में आता ही है, कि © का मतलब .. उन रचनाकार की रचनाओं की 'कॉपीराइट' (Copyright) उनके पास है .. अगर विशुद्ध हिंदी में कहें तो प्रतिलिप्याधिकार या सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। 
परन्तु विश्वस्तर पर अन्य भाषाओं में भाषांतर या लिप्यंतरण कर के, हमारी अपनी चुरायी गई रचना को हम अगर पकड़ नहीं सकते, तो फिर ये  "सर्वाधिकार सुरक्षित" या "©" वाले फुदने अपनी रचनाओं में भला किस के लिए ? केवल अपनी भाषा- हिंदी जानने वाले लोगों के लिए ? ये तो वही बात हो गयी कि अक़्सर देखने में आता है, कि कई मोहतरमा पूरे शहर घुम आती हैं बुर्क़े को अपने 'हैण्ड बैग' में रख के और मुहल्ला-घर आते ही 'हैण्ड बैग' से निकाल कर खुद को बुर्क़े से ढाँक लेती हैं या फिर कई घूँघट वाली बहुएँ 'मल्टीप्लेक्स-मॉल' तो घुम आती हैं बिना घूँघट के और घर आते ही घूँघट काढ़ लेटी हैं, वैसे हम बताते चलें कि हम किसी बुर्क़े या घूँघट के पक्षधर कतई नहीं हैं जी,
हम तो केवल यह कहना चाह रहे हैं, कि जब विश्व के विदेशों के या अपने ही देश के अन्य राज्यों के तथाकथित चोरों से अपनी रचना की चोरी नहीं पहचान या पकड़ सकते तो इस "सर्वाधिकार सुरक्षित" या "©" वाले फुदने केवल अपने ही हिंदी भाई-बंधुओं के लिए क्यों लगाना भला ? सवाल नहीं दाग़ रहे हम। ना , ना, हम केवल बात को समझना चाह रहे हैं .. बस यूँ ही ...
दूसरी तरफ अब अगर किसी विदेशी या देशी अन्य राज्यों के साहित्यकार को इस तरह की चोरी-सह-डकैती कर के ख़ुशी मिलती भी है, नाम मिलता भी है, तो क्या बुराई है इसमें भला ? हमने भी तो कभी उनकी चाय, तो कभी चाऊमीन, कभी पिज्ज़ा-बर्गर, तो कभी इडली-डोसा चुरा-चुरा कर अपनी कुल्हड़ें-प्यालियों और थालियों-कटोरियों को सजा कर अपनी गर्दनें अकड़ायी ही हैं। कभी चुरा कर किसी के अचकन-शेरवानी, तो किसी के पतलून, कोट-टाई से हमने अपने परिधानों की शान भी बढ़ाई ही है .. है ना ? ( ये एक विशुद्ध कुतर्क हो गया है .. शायद ... है ना ? 😃😃😃 )
और फिर .. हम तो "वसुधैव कुटुम्बकम्" के बैनर-पोस्टर वाले हैं ही। कोई चुराया भी तो, है तो अपने परिवार का ही अंग या अंश, फिर भला बिदकना कैसा ? दूसरी ओर हम लाउडस्पीकर पर , बीच-बीच में आयी गैस वाली अपनी लम्बी डकार की आवाज़ के साथ, गीता का सार वांचने वाले लोग भी तो हैं ही, कि "खाली हाथ आये हैं और खाली हाथ वापस चले जाना है। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।" ऐसे में अपनी रचना चुराए जाने से दुःखी या क्रोधित मन वाले मौकों के लिए, आपके मन की शांति के लिए गीता के सार की इन अनमोल पंक्तियों को भी मन ही मन में दुहराने से भी हमारा-आपका कल्याण हो सकता है .. शायद ... कि "तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए थे, बल्कि जो लिया, यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी/उसी (तथाकथित) भगवान से लिया। जो दिया, इसी/उसी को दिया।" सच भी तो है, कि जो भी लिखा शब्दकोश से उधार लिया या चोरी किया, फिर जो उन्होंने चुराया और हमारी ही चोरी के माल को अपना नाम दे दिया, तो फिर हमें इन सब से परेशान क्यों होना भला ! है कि नहीं ? (ये एक और विशुद्ध कुतर्क हो गया है .. शायद ... 😀😀😀)

(iv) पिया मिलन की आस : -
ऐसे में 'कॉपीराइट' (Copyright) वाली संकेतात्मक चिन्ह - © में अंग्रेजी वर्णमाला वाली C बेचारी सदियों से घेरे में घिरी, क़ैद में चीख़-चीख़ कर कहती जान पड़ती है, कि तथाकथित राम-कथा - रामायण के अनुसार, लक्ष्मण रेखा से घिरी सीता माता को आखिरकार रावण हरण (अपहरण) कर के लंका ले ही गया, तो जब तथाकथित भगवान राम की धर्मपत्नी सीता माता किसी लक्ष्मण रेखा में सुरक्षित ना रह पायीं तो, हम अदना-सी 'सी' (C) कैसे सुरक्षित रह सकती है इस गोल घेरे में भला .. शायद ...
तथाकथित राम और रामायण से एक और घटना याद आयी कि बेचारे तुलसीदास जी और वाल्मीकि जी के घोर परिश्रम वाले रामायण की 'कॉपीराइट' का उल्लंघन रामानंद सागर साहब ने तो किया ही और ना ही उन लोगों को कोई 'रॉयल्टी' मिली .. शायद ... 
यूँ तो अनगिनत उदाहरण हैं तथाकथित 'कॉपीराइट' उल्लंघन के, पर एक और मज़ेदार उल्लंघन की चर्चा कर ही दूँ यहाँ। आपने भी तो सुना ही होगा कि नए या पुराने फ़िल्मी गानों या ग़ज़लों में धड़ल्ले से दो निम्न पंक्तियों को इस्तेमाल किया जाता है -
"कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो मांस,
दोइ नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।"
जिन्हें उपलब्ध जानकारियों के अनुसार अमीर ख़ुसरो जी के गुरु- निज़ामुद्दीन औलिया जी के भी गुरु- बाबा फ़रीद उर्फ़ हजरत ख्वाजा फरीद्दुद्दीन गंजशकर जी, जिन्हें भारतवर्ष में चिश्ती सम्प्रदाय का संस्थापक माना जाता है, ने लगभग हजार साल पहले इसे अपनी आवाज़ और सूफ़ी अंदाज़ में गाया होगा .. शायद ...
पर आज इस रचना के साथ ना तो 'कॉपीराइट' और ना ही 'रॉयल्टी' जैसी कोई बात नज़र आती हैं। हो सकता है .. उन्होंने भी मेरी तरह अपनी रचनाओं में "सर्वाधिकार सुरक्षित" या "©" या फिर "स्वरचित रचना" वाला फुदना ना लटकाया हो, उसी का यह खामियाज़ा भुगत रहे हों .. बस यूँ ही ... 😧😧😧

(v) चलते-चलते ... : -
यूँ तो सर्वविदित है कि 23 अप्रैल को मनाया जाने वाला "विश्व पुस्तक दिवस" (World Book Day) को हम "विश्व पुस्तक और प्रकाशन अधिकार दिवस" (World Book & Copyright Day) या किताबों का अंतरराष्ट्रीय दिवस (International Day of Book) के नाम से भी जानते हैं ; जिसको यूनेस्को यानि "संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन" (UNESCO - United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization) द्वारा तय की गई तारीख 23 अप्रैल' 1995 को सर्वप्रथम मनाया गया था। अलग से कोई भी प्रतिलिप्यधिकार दिवस (Copyright Day) नहीं मनाया जाता है। यह "विश्व पुस्तक और प्रकाशन अधिकार दिवस" में ही समाहित होता है।
यूँ तो अपने देश में "प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957" (The Copyright Act, 1957) कानून के तहत साहित्यिक रचनाओं, नाट्य रचनाओं, संगीत रचनाओं, कलात्‍मक रचनाओं, चलचित्र रचनाओं और ध्‍वनि रिकार्डिंग से सम्बंधित निर्माणों को सुरक्षा प्रदान की जाती है .. शायद ... 
वैसे हमें और विशेष जानकारी तो नहीं इसके बारे में। यह बतकही को हम वर्तमान "दिवसों" की होड़ में गत वर्ष, 2021 में, ही 23 अप्रैल को इस 'वेब' पन्ने पर चिपकाते, पर गत वर्ष अप्रैल के पहले सप्ताह से ही कोरोनाग्रस्त होने के कारण विस्तारपूर्वक लिख भी नहीं पाए थे, तो इसीलिए चिपका भी नहीं पाए थे .. बस यूँ ही ...

Sunday, January 30, 2022

खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-२

"खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-१" वाली बतकही भरे वार्तालाप के लिए अपने-अपने क़ीमती समय को बर्बाद करते हुए अपनी-अपनी मगज़पच्ची कर के "खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-२" के लिए अगर आज आप पुनः उपस्थित हैं, तो आपकी धैर्यता को इस बतकही के बकबकाने वाले की ओर से साष्टांग दंडवत प्रणाम है .. बस यूँ ही ...
पिछले भाग में किये गए वादे के अनुसार आज खुरपी की शादी करवानी है अब तो .. है ना ? तथाकथित खरमास भी वैसे तो अब ख़त्म हो ही गया है। वादा तो जरूर निभायी जायेगी, परन्तु फ़िलहाल उससे पहले किसी अनुष्ठान में तोड़े या फोड़े गए नारियल की तरह ही एक सौगंध, शपथ या क़सम तोड़नी पड़ जाएगी हमको तो .. शायद ...
दरअसल उस दिन खुरपी ने मुझे अपनी क़सम का हवाला देते हुए हम इंसानों की एक-दो और भी ख़ास बातें या ख़ासियत बतलायी थी। पर साथ ही वह सकुचाते हुए बोली भी थी, कि "आपको मेरी सौगंध है, कि ये बातें आप किसी भी इंसान को मत बोलना। वर्ना सब मेरे खिलाफ मोर्चा खोल देंगे।" - फिर मुस्कुराती हुई कहने लगी - "वैसे तो शपथ या वादा तोड़ना तो आप इंसानों की फ़ितरत में शामिल है। वो या तो अपनों से आपस में ली/की गयी हो या फिर देश के तथाकथित कर्णधारों द्वारा पद ग्रहण करने के समय शपथ ली गयी हो। आप सभी तो इन्हें तोड़ने में पूरी तरह से माहिर हो। तनिक सोचो .. अगर ये सारी शपथें ना टूटे तो .. अपना राष्ट्र या देश भी टुकड़े में कभी ना टूटें। ख़ैर ! .. फिर भी आपको बोल रही हूँ .."
"ना, ना, हम किसी को नहीं बोलेंगे .. यक़ीन रखिए।" - हमने आश्वासन देने की कोशिश की।
"चलिए मान लेते हैं, पर हमको पता है कि आप मानोगे नहीं। ख़ैर ! अपनी फ़ितरत हमें पता है और आपकी आप जानो।" - एक व्यंग्यात्मक मुस्कान की चमक के साथ आगे बोल पड़ी थी - "दरअसल वैसे भी यह तो गणतंत्र दिवस वाला महीना है।"
"अरे ! गणतंत्र तो सालों भर के लिए होता है। फिर ये इसका वाला महीना मतलब ?" - हमने अपनी उत्सुकता के साथ ही, थोड़ी नाराजगी भी दिखलाते हुए बोला था।
"पर ऐसे होता नहीं है ना भाई। सालों भर तो देश के संविधान से परे कई उलजलूल हरक़तें होती रहती हैं आप इंसानों की। और तो और, जिन्होंने कभी संविधान के एक अनुच्छेद को भी नहीं पढ़ी हो, वो लोग भी इस जनवरी महीने की 26 तारीख़ से कई दिन पहले और कई दिन बाद तक कई-कई भाषाओं में एक-दूसरे को शुभकामनाओं की 'कॉपी & पेस्ट' कर-कर के भेजते रहते हैं। वैसे तो कहते हैं कि शायद आप इंसानों का ये संविधान भी 'कॉपी & पेस्ट' कर के ही बना हुआ है।"
"हाँ .. ऐसा ही है .. शायद ... " - हम कुछ झेंप महसूस करने लगे थे।
"आप लोग बस कहीं पर भी झंडे फ़हरा कर, चाहे दोपहिए या चार पहिए गाड़ियों पर, ठेले पर या फिर जुड़े में, कलाई में, परिधानों में तिरंगा रंग की ऐसी की तैसी कर देते हो। झंडा फहराना और जलेबियाँ खाना भर ही आप इंसानों का गणतंत्र दिवस रह गया है शायद .. है ना !?"
"हो सकता है महारानी, आप जो कह रही हैं, उनमें सत्यता भी हो। पर हम कुछ कह या कर नहीं सकते। हमको तो इन्हीं इंसानों के साथ जीना है। वर्ना ये लोग मुझे अपनी जाति-धर्म से बेदख़ल कर देंगें और आपको पता ही है कि हमारे इंसानी समाज में बिना जाति-धर्म वाले इंसान को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। उसको इंसान माना ही नहीं जाता। उसे नास्तिक की संज्ञा देकर नाश दिया जाता है .. शायद ..." - हमने अपनी मजबूरी बतलाने की कोशिश की।
"जाने भी दीजिए इन बातों को। इंसानी बातें आप इंसान ही समझ सकते हैं। पर .. इन बातों में आप मेरी शादी की बात को अभी गोल मत कर जाइए भाई।" - बड़ी ही चतुराई से वह इठलाती हुई मुस्कुरा कर बोल गई थी।
"अरे ना, ना, वो तो करवानी ही है महारानी जी, आपकी शादी ..." - हमने झट से इंसानी आश्वासन दिया था।
"पर मेरी शादी कुछ शर्तों पर होगी, कि मैं अपनी शादी में आपको कोई भी दहेज़ नहीं देने दूंगी। भले मैं अब तक की तरह कुँवारी ही रहूँ या कुँवारी ही मर जाऊँ। वैसे भी यह गणतंत्र दिवस वाला महीना है भाई। तो देश के संविधान के साथ-साथ क़ानून का तो विशेष ख़्याल रखना ही होगा हम सब को। आप इंसान लोगों को जितना तोड़ना हो क़ानून, तोड़ते रहो भाई।" - फिर फ़ुसफ़ुसा कर बोली - "इंसानों की तरह फिजूलखर्ची भी मत करना आप मेरी शादी में। बस एक सुस्वादु .. वो क्या कहते हैं .. हाँ .. प्रीतिभोज करवा देना। और हाँ .. किसी भी आने वाले निमंत्रित मेहमान के लाए गए उपहार के ऊपर अपनी गिद्धदृष्टि कदापि मत रखना आप इंसानों की तरह। बल्कि कोई भी मेहमान उपहार लेकर नहीं आएंगे मेरे विवाह में। हमको तो उपहारस्वरूप बस .. उनके आशीष-वचन चाहिए भाई।"
"पर ये सब कैसे सम्भव है महारानी ? तब तो आप कुँवारी ही मर जाएंगी। हमारे इंसानी समाज के रीति रिवाज इन सब से भिन्न हैं जी।" - हम मायूस हो चले थे उनकी शर्तों से।
"तुम इंसानों की यही तो कमजोरी है। कुछ भी लीक से हट कर करने की सोचते ही नहीं हो। कभी भूले से सोच भी लिया तो, करते नहीं हो। पैरों को भी समय-समय पर 'पेडीक्योर' की जरुरत पड़ती है भाई, वर्ना पाँव और तलवे में जमे मैलों को भी शरीर के अंगों की तरह लिए जीना होता है भाई, है कि नहीं !? यही 'पेडीक्योर' अपने रीति रिवाजों के साथ भी आप इंसानों को भी करना चाहिए समय-समय पर।" - ज्ञान बघारने के बाद बोली - "पर जो भी हो .. मेरी शादी होगी तो, इन्हीं शर्तों पर और हाँ .. मुझे किसी सामान की तरह दान-वान मत करना आप, मुझे नहीं करवानी कोई कन्यादान-फन्यादान। मैं तो बस अपने पति की जीवनसंगिनी बनूँगी और जीवन संग-संग बिताउंगी। समझे ना भाई !?" - उसके चेहरे पर शर्म का गुलाबी रंग झलकने लगा था, मानो जब यह कभी किसी लुहार की भट्टी से निकलने के कुछ देर बाद लाल से गुलाबी बनी होगी जैसे .. शायद ...
हम मन ही मन सोच रहे थे, कि अच्छा हुआ कि हमने किसी को भी 'हैप्पी रिपब्लिक डे' नहीं 'विश' किया था या कभी करते भी नहीं  26 जनवरी को; क्योंकि हमें भी कोई हक़ ही नहीं ऐसा कहने का, जब तक कि हम किसी हनुमान चालीसा या आयत की तरह अपने देश का पूरा संविधान रट ना लें या फिर किसी व्रत कथा या क़ुरआन की तरह पढ़ ना लें। पर अब भी एक सिरदर्द तो मोल ले ही लिया, बिना दहेज़ वाला दूल्हा खोजने का इस खुरपी महारानी के लिए। आप लोगों को भी इस देश के संविधान और क़ानून की क़सम .. आप को कोई दहेज़ रहित वर का पता अगर पता चले तो, हम 'स्टुपिड' की मदद कर दीजिएगा।
ख़ैर ! चलिए .. अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं, कि आप में से शायद ही कोई भी 'ब्लॉगर' , क्षमा कीजिए , विशुद्ध हिंदी का प्रयोग करें तो .. चिट्ठाकार होंगे या होंगी, जिन्होंने अपने-अपने 'ब्लॉग' के 'वेब' पन्ने पर इन आंकड़े और 'ग्राफ' वाले निम्न चित्रों को नहीं देखा होगा या देखीं होंगी .. शायद ...




परन्तु आज खुरपी की ही चर्चा में ज्यादा समय व्यतीत हो चुका है। आपके धैर्य को पुनः नमन। आज "खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-२" में बस इतना ही। अब अगले "खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-३" में इन उपर्युक्त ग्राफ़युक्त चित्रों के बहाने "क़ैद में वर्णमाला" की बतकही करते हैं .. संभव हो तो आप आइएगा .. बस यूँ ही ...


Wednesday, January 26, 2022

खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-१.

फिर से आज एक बार कुछ बतकही, कुछ इधर की, कुछ उधर की,
ऊल-जलूल, फ़िजूल, बेफजूल, बेसिर पैर की, कहीं भी, कुछ भी     .. बस यूँ ही ...

कुछ ही दिन पहले किसी एक रविवार के दिन, (सम्भवतः इसी नौ   जनवरी को) सुबह-सुबह अपनी दिनचर्या से और सप्ताह भर बनायी गयी रविवारीय अवकाश के दिन किए जाने वाले चंद विशेष कामों की सूची से निपटने के बाद शेष बचे समय को देखते हुए, मन में ख़्याल आया कि अपने अस्थायी निवास वाले किराए के मकान में हरियाली की चाहत में रोपे गए चंद पौधों वाले प्लास्टिक के गमलों की मिट्टी की गुड़ाई-निराई भी आज कर ही ली जाए ; जो कि पिछले कई रविवार से टलती आ रही थी। कुछ तो रविवारीय अवकाश के विशेष कामों की लम्बी सूची के कारण और कुछ इन दिनों यहाँ की शीतलहर वाले मौसम के कारण भी .. शायद ...
अपने प्रिय पेय पदार्थों में से एक- 'लेमन ग्रास' युक्त बिना दूध और बिना चीनी की 'ग्रीन टी' से भरे काँच वाले गिलास को 'सिप' करता हुआ, अपने 'स्टोर रूम' में रखी खुरपी को लेने के लिए हाथ बढ़ाया, तो खुरपी एकदम से मेरे ऊपर भड़क गयी। भड़क गयी कहना शायद गलत होगा, बल्कि तुनकने के अंदाज़ में बोल पड़ी - "आज मैं काम नहीं करूँगी। नहीं करूँगी कोई भी आपकी गुड़ाई-निराई ..."
मैंने प्यार जताते हुए उस से पूछा - "क्यों भला ? क्या हो गया महारानी आज आपको ? आप भी आज रविवार मना रहीं हैं क्या ?"
दरअसल इस बार वह सच्ची में भड़क उठी - "हुँह ! आपकी तरह जब आपकी धर्मपत्नी जी एक कुशल गृहणी होने के नाते रविवार की छुट्टी नहीं मना सकती तो मैं कैसे मना सकती हूँ भला .. आयँ !? वैसे भी मत कहिए हमको महारानी।"
मैं उसके इस उत्तर से झेंपता हुआ जरुरत से ज्यादा नम्र हो गया - "क्यों ना कहूँ भला आपको महारानी ?"
अब तक वह रुआँसी हो चुकी थी - "हर बार आप लोग "हँसुए के ब्याह में खुरपी का गीत" बोल - बोल कर, हँसुए का ब्याह कराते हो और मेरा गीत गाते हो। अरे कभी हमारा भी तो ब्याह करा दो और हँसुए का गीत गा दो। मगर ऐसा करोगे नहीं आपलोग। आप इंसान लोगों को तो बस एक ही लीक पर चलने की आदत है। अरे कभी लीक से हट कर भी सोचा करो आप लोग।"
"मतलब .. आपका उलाहना है कि कभी-कभार हम आप खुरपी का ब्याह करा कर हँसुए का गीत क्यों नहीं गाते ? युगों से हर बार हँसुए का ब्याह करा कर हमलोग आपका गीत गा देते हैं। है ना ?"
"और नहीं तो क्या !!" - अब तक वह कपस-कपस कर रोने लगी थी। - "आप लोग तो बस ... तथाकथित खरमास अभी उतरेगा नहीं कि फ़ौरन अपनी और अपने लोगों की शादी-ब्याह की चर्चा चालू कर देते हो। कभी ब्याह वाली मेरी भी सनक की सोचो ना ! ..." - फिर लगभग फुसफुसाते हुए बोलने लगी - "अब ये मेरी सनक या शिकायत की बात किसी और इंसान को मत कह दिजियेगा, वर्ना वो लोग उल्टा आप से पूछेंगे कि ऐसा कौन बोला भला .. दरअसल आप इंसानों के लिए ये ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि .. 'कौन बोला या कौन बोली ?'.. पर ये महत्वपूर्ण नहीं होता कि 'क्या बोला या क्या बोली ?' "
मैं चौंक गया - "महारानी ! आपके ब्याह नहीं होने वाली नाइंसाफी से मैं पूर्णतः सहमत हूँ, परन्तु ये कौन बोला, क्या बोला वाली आपकी शिकायत का क्या मतलब ? ...  ऐसा किस आधार पर कह सकती हैं आप भला ? बोलिए !"
फिर जोर से ठहाका लगाती हुई मुझ से खुरपी बोल पड़ी - "आप भी ना, जान कर अंजान बनते हो। ऐसा नहीं है क्या ? ऐसा ही तो है मेरे भाई। आप तनिक मेरी अभी कही गयी बातें, किसी को कह के परख लेना। सब ध्यान नहीं देंगें, मेरी बातों पर। सोचेंगे .. अरे .. खुरपी की क्या औक़ात जो कुछ ध्यान देने योग्य गम्भीर बातें भी कर सके भला।" 
"हाँ !? ... ऐसा है क्या ?" - मैंने उसके समक्ष अचरज प्रकट किया।
"और नहीं तो क्या भाई .. अभी कई राज्यों में चुनाव का माहौल है ना ? चारों तरफ जातीय समीकरण का ताना-बाना बुना जा रहा है। अपनी -अपनी जाति वाले उम्मीदवार को अधिकांश लोग वोट देंगें। यहाँ भी तो कौन खड़ा है चुनाव में, यह ज्यादा महत्वपूर्ण बना रखा है आप इंसानों ने। पर कैसा खड़ा है, उस पर विचार नहीं करते प्रायः।" - थोड़ा दम लेती हुई फिर से बोली - "अब आप के रचनाकार बुद्धिजीवी इंसान लोगों को ही देखो ना .. अगर किसी पदाधिकारी ने, डॉक्टर की उपाधि वाले ने, किसी 'सेलिब्रिटी' ने या किसी तथाकथित 'बड़े' (वास्तव में धनवान, चाहे काले धन से ही सही) लोगों ने कुछ भी तुकबन्दियाँ कर दी, तो आप लोग 'थर्ड जेंडर' की तरह ताली पीटने लग जाते हो और ... अगर कोई अनपढ़ या मजदूर कोई गम्भीर बात भी कहे तो अनसुनी, अनदेखी कर देते हो आप लोग। वैसे होना तो ये चाहिए कि कह कौन रहा है, उतना मुख्य नहीं हो, बल्कि क्या कहा जा रहा है, उस पर ज्यादा महत्व देने की आवश्यकता है। नहीं क्या !? .. अब पियानो जैसे मंहगे वाद्य यन्त्र से निकलने वाली हर धुन सुरीली ही हो, जरूरी तो नहीं ना ? .. और बाँसुरी जैसे तुलनात्मक सस्ते वाद्य यन्त्र से हमेशा बेसुरी धुन ही निकलती हो, ऐसा भी नहीं है ना ?"
"बिलकुल नहीं।" - आज के अपने गुड़ाई-निराई वाले काम निकालने के लिए, उसे खुश करते हुए हमने अपने स्वार्थ साधने वाले इंसानी गुण से लबरेज़ उसकी बातों में हामी भर दी।
"तो .. फिर हर बार तथाकथित 'बड़े' लोगों की ही बातों को क्यों तरजीह देते हो या फिर जाति के आधार पर इंसान को क्यों अपनाते हो भला आप इंसान लोग ?" 
"हाँ, आपकी ये शिकायत भी सही है।" - हमने आगे भी उसे खुश करने का ही प्रयास किया। जो अक़्सर हम इंसान प्रायः करते हैं कि किसी को भी खुश करना है, तो उसकी हर बातों में हाँ में हाँ मिला देते हैं। चाहे वो बेसिर पैर की ही बातें क्यों ना हो।
इस बार मेरी नम्रता को देख कर वह लगभग बिदक-सी गयी - "हम थोड़े ही ना आपके तथाकथित विश्वकर्मा भगवान की मूक मूर्ति हैं, जो आपके लड्डू, माला, अगरबत्ती, अक्षत् , रोली भर से खुश हो जायेंगे। हम को तो किसी लुहार की भट्टी में तपा-तपा कर और हथौड़े से ठोंक-पीट कर बनाया गया है। हम तो ठोंक-पीट और ताप के तर्क की भाषा ही जानते हैं। आप इंसान लोग अपनी हाँ में हाँ मिलाते हुए एक ही लीक पर चलने वाली भेड़चाल और चापलूसी तो रहने ही दो अपने पास।"
हमको खुरपी की मनोदशा और उसके तेवर से तो लगा कि आज हमारा गुड़ाई-निराई वाला काम तो .. होने से रहा। परन्तु .. फ़ौरन वह मुस्कुराती हुई बोल पड़ी  - "आप इंसानों में यही तो अवगुण है, अगर तनिक तर्क कर दो तो तुनक जाते हो या यूँ कहें कि बिदक ही जाते हो। हम इंसान नहीं है भाई , चलिए आपके आज के काम में हम बिंदास हो कर आपका सहयोग करेंगे।"
मेरी तो जान में जान आयी और हमने शेष बची चाय के आख़िरी घूँट को अपने मुँह में उड़ेलते हुए, अपने रविवारीय अवकाश के शेष समय हेतु गुड़ाई-निराई की योजना को साकार करने के लिए अपने एक हाथ में चाय वाली खाली गिलास, जिसे रसोईघर में रखना था और दूसरे हाथ में खुरपी महारानी को लिए हुए, हमारी पेशकदमी गमलों की ओर हो चुकी थी।
ख़ैर ! .. बहरहाल आप जाइएगा कहीं भी नहीं, अगर जाइएगा भी तो पुनः आइएगा अवश्य "खुरपी के ब्याह बनाम क़ैद में वर्णमाला ... भाग-२" में खुरपी का ब्याह देखने। यूँ तो उम्मीद ही हम इंसानों के हर भावनात्मक दर्द की वजह है, पर फिर भी उम्मीद करता हूँ कि आप आएंगे जरूर .. शायद .. बस यूँ ही ...