आनंद बख़्शी जी के शब्दों को लता जी व उदित जी के युगल स्वरों में अपने संगीत से सजा कर "फ़िल्म दिल तो पागल है" के लिए उत्तम सिंह जी ने हमारे समक्ष एक रूमानी गीत की शक़्ल में परोसा था .. जो आज भी ना जाने कितने प्रेमियों को अपनी प्रेमिकाओं के समक्ष चुहलबाजी करने का अवसर प्रदान करता है .. शायद ...
उस गाने का बोल है - "भोली सी सूरत आँखों में मस्ती आय हाय ~~~"
आज की बतकही से पहले ये गाना ही सुन लेते हैं .. है ना !
यहाँ एक ग़ौर करने वाली बात ये है कि .. आध्यात्मिक या रूहानी सूफ़ी गीतों को जिस तरह फ़िल्मी दुनिया में रुमानियत का पर्याय बना कर पेश किया जाता रहा है और .. अगर इसके विपरीत उपरोक्त रूमानी गाने को प्रेमिका या लड़की की जगह प्रकृति से जोड़ कर सुना जाए तो .. तो .. आप दोबारा सुनिए और .. आनन्द लीजिए .. प्रकृति का .. बस यूँ ही ...
लब्बोलुआब ये है कि आज की बतकही के शीर्षक वाली "आय हाय" तो .. इस गाने से ही ली गयी है और अब .. "बिच्छू की चाय" वाली बात .. आगे आज की बतकही में ...
गंगा .. तथाकथित आस्तिकों के लिए एक तरफ़ तो माँ हैं .. तो स्वाभाविक है, कि वह पूजनीय भी हैं और उनके लिए पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव की जटाओं व राजा भगीरथ से सम्बन्धित भी हैं ; परन्तु दूसरी तरफ़ .. उन्हीं की धाराओ में वो सभी तथाकथित आस्तिक अपने-अपने शहर की नाली- नालाओं के माध्यम से अपने अनगिनत त्याज्य अपशिष्ट या अवांछित पदार्थों के साथ-साथ .. अपशिष्ट पूजन सामग्रियाँ तथा तथाकथित देवी- देवताओं की छोटी- बड़ी, नयी- पुरानी मूर्तियाँ .. गंगा-आरती के समय तथाकथित आस्था के नाम पर अज्ञानतावश या जानबूझकर एक दोने में कुछ फूल व मिलावटी तेल या मिलावटी घी के दीये और साथ ही अपने मृत जनों के दाह संस्कार के उपरांत अवशेष रूपी राख को भी अर्पित- समर्पित करते रहते हैं .. शायद ...
वहीं दूसरी ओर .. नास्तिकों के लिए गंगा केवल और केवल एक नदी है , जिसका आविर्भाव हिमालय की पर्वत शृंखलाओं की बर्फ़ के पिघलने और अन्य कई अलग-अलग स्रोतों वाली कई पहाड़ी सहायक नदियों के संगम से हुआ है। जिसे स्वच्छ रखना वे लोग मानव- धर्म भी मानते हैं। वे लोग नदी को नदी, सूर्य को सूर्य और बरगद- पीपल को भी वृक्ष ही मानते हैं तथा इन सभी के भगवानीकरण करने का और तथाकथित भगवान के मानवीकरण करने का पाखंड कतई नहीं करते हैं .. शायद ...
ठीक वैसे ही .. अपने आस्तिक परिजनों के साथ एक नास्तिक भी अगर किसी तथाकथित तीर्थयात्रा में शामिल होता है ; तो उसे उस यात्रा .. क्षमा करें .. तीर्थयात्रा के दौरान प्रभु दर्शन से प्राप्त होने वाले पुण्य की कामनाओं से इतर .. विराट प्रकृति के गर्भाशय से जन्मे सौंदर्य जनित सुकून का रसास्वादन कुछ विशिष्ट रूप से आह्लादित करता है .. शायद ...
सर्वविदित है, कि अन्य धर्म- संप्रदाय के लोगों की तरह हिन्दुओं के भी समस्त विश्व में अवस्थित कई तीर्थस्थलों के साथ ही भारत में विशेष धार्मिक मान्यताओं वाले चार धामों - बद्रीनाथ (उत्तराखंड), द्वारकापुरी (गुजरात), जगन्नाथ पुरी (उड़ीसा) तथा रामेश्वरम (तमिलनाडु) के साथ-साथ उत्तराखंड राज्य में भी अवस्थित चार धामों - यमुनोत्री (उत्तरकाशी), गंगोत्री (उत्तरकाशी), केदारनाथ (रुद्रप्रयाग) एवं बद्रीनाथ (चमोली) की भी महत्ता हैं। हालांकि .. विशेष बात ये है कि बद्रीनाथ धाम का नाम दोनों ही श्रेणियों में विराजमान है।
तो .. आइये .. उत्तराखंड के चार धामों की तीर्थयात्रा से जुड़ी आंशिक बातों को .. एक तथाकथित नास्तिक की दृष्टि से कुछेक अंकों की सचित्र बतकही में विस्तार से झेलते हैं। जिसके तहत आज हम अतिगुणकारी पहाड़ी जड़ी-बूटी (?) की भी बात करेंगे .. बस यूँ ही ...
पर इसके लिए हमें जाना होगा "माना" .. दरअसल उपरोक्त बद्रीनाथ नामक हिंदू तीर्थस्थल से लगभग तीन किमी की दूरी पर अलकनंदा नदी एवं सरस्वती नदी के संगम पर उत्तराखण्ड के चमोली जिले में ही भूगोलवेत्ताओं के अनुसार समुद्र तल से मोटा- मोटी (अनुमानतः) लगभग बत्तीस सौ मीटर यानी लगभग साढ़े दस हज़ार फ़ीट ऊपर एक गाँव अवस्थित है - माना / माणा (Mana)।
अगर हम इस गाँव के नाम से जुड़ी किंवदंती को अपनी आँखें मूँदे मान लें, तो उस किंवदंती के अनुसार तथाकथित शिव भगवान के माणिक शाह नामक एक परम भक्त व्यापारी के नाम से इस गाँव का नाम माणा रखा गया है। लोगों के बीच एक ऐसी भी मान्यता है कि माणा जाने वाला हर व्यक्ति, विशेषकर तथाकथित भक्तगण, माणिक शाह की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव द्वारा मिले वरदान के फलस्वरूप अमीर हो जाता है .. शायद ...
चीन के क़ब्ज़े वाले तिब्बत की सीमा से लगे माना दर्रा से लगभग पच्चीस- छ्ब्बीस किमी पहले यह माणा गाँव आज भारत का पहला गाँव है ; जिसे लगभग दो- तीन वर्ष पहले तक भारत का आख़िरी गाँव बोला जाता था ; परन्तु अपने देश के वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा इसका विशेषण "आख़िरी" से "पहला" में परिवर्तित कर दिया गया है। जिसके फलस्वरूप "सीमा सड़क संगठन" (Border Roads Organization - BRO) के सौजन्य से इस गाँव की शुरुआत में "भारत का प्रथम गाँव माणा" लिखा हुआ एक बड़ा-सा 'बोर्ड' टँगा हुआ दिखता है।
जो भी लोग दोनों श्रेणियों के चार धामों की यात्रा के तहत या केवल और केवल बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा के लिए आते हैं, तो वो लोग यहाँ भी अवश्य ही पधारते हैं। आस्तिकों के लिए तो यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं - भीम पुल, व्यास गुफा, गणेश गुफा, सरस्वती धाम और केशव प्रयाग यानी अलकनंदा नदी व सरस्वती नदी के संगम जैसे पौराणिक कथाओं से जोड़े गए तथाकथित कई तीर्थस्थल ; पर .. नास्तिकों के लिए तो होती हैं मन को लुभाती .. केवल और केवल .. प्राकृतिक सौन्दर्य से लबरेज़ नैसर्गिक दृश्यावली .. शायद ...
आस्तिक परिजनों के साथ-साथ हम भी औपचारिक रूप से उपरोक्त तथाकथित धार्मिक- पौराणिक स्थलों के तथाकथित "दर्शन" करने के पश्चात जगह- जगह उन्हीं बाज़ारों की दुकानों में बीस-बीस रुपए के बदले बिक रहे 'ग्रीन टी' के और "केदार कड़वी" के भी छोटे- छोटे 'पैकेट्स' हमने ख़रीद लिए थे। हालांकि वहाँ की दुकानों में हाथों से ऊन द्वारा बुने हुए विभिन्न प्रकार के गर्म परिधानों का भी अपना एक अनूठा आकर्षण दिखा।
लगभग सभी दुकानदार (ज़्यादातर दुकानदारीन) अपनी शारीरिक बनावट, मुखमंडल व वेशभूषा से तिब्बती लोग ही लग रहे थे। शायद भयवश पलायन करके यहाँ आकर बसे या बसाए गए विस्थापित तिब्बती। वैसे भी उत्तराखंड में देहरादून सहित कई क्षेत्रों में विस्थापित तिब्बतियों के ठिकाने और .. स्वाभाविक है, कि उनकी जनसंख्या भी ठीक-ठाक ही कह सकते है। वैसे तो माणा में वेशभूषा व नाक-नक्श के आधार पर हम कह सकते हैं कि कुछेक दक्षिण भारतीय परिवार भी वहाँ बसे हुए हैं।
अब उपरोक्त धार्मिक- पौराणिक स्थलों की परिचर्चा किसी भावी अंक में .. फ़िलहाल तो हम चाय विशेष की "चुस्की" लेते हैं। उपरोक्त माणा के स्थानीय बाज़ारों में अवलोकन करते हुए .. तभी "भारत का प्रथम गाँव माणा" के तर्ज़ पर ही "भारत की पहली चाय की दुकान" वाले 'बोर्ड' लगे .. कई सारी दुकानों पर दृष्टि पड़ती है।
कहीं तो .. अभी भी पुरानी सोच के मुताबिक़ "भारत की आख़िरी चाय की दुकान" वाली तख़्ती भी दिखती है। मानो जैसे .. आज एलईडी के युग में भी हम अपनी पुरानी परम्पराओं का निर्वाह करते हुए दीए जलाते ही नहीं, वरन् दीयों की संख्या की होड़ करके 'गिनीज़ बुक' में अपना नाम दर्ज़ करवाने की बात बड़े ही गर्व के साथ कहते हैं .. शायद ...
ख़ैर ! .. अभी दीये को दरकिनार करके .. अपनी बतकही को चाय पर ही केन्द्रित करते हैं। तो .. कई सारी चाय की दुकानों को देख-देख कर .. अब ऐसे में चाय की लत ना भी हो, तो पीने की उत्कंठा जाग ही जाती है। वैसे भी चाय हमारे देश में अंग्रेज़ों द्वारा लाए जाने के पश्चात शायद इकलौता धर्मनिरपेक्ष पेय पदार्थ का पर्याय है। जिससे तथाकथित आस्तिक व नास्तिक दोनों ही अपनी जिह्वा और मन .. दोनों को तृप्त करके तात्कालिक स्फूर्ति की अनुभूति प्राप्त करते हैं। और हाँ .. वो लोग भी नहीं चूकते हैं इसकी चुस्की लेने में , जिनको अँग्रेजी बोलने में तो मानसिक ग़ुलामी नज़र आती है, परन्तु .. अँग्रेजों द्वारा लायी गयी चाय की चुस्की में नहीं .. शायद ...
ख़ैर ! .. अभी आम चाय पुराण त्याग कर माणा वाली भारत की पहली चाय दुकानों में से किसी एक दुकान से पी गयी चाय की बात करते हैं। तो .. बिना चीनी और दूध की चाय पीने वाला .. मुझ जैसा इंसान भी वहाँ की 'ग्रीन टी' खरीद कर स्वाद चखा। उसका एक अलग ही स्वाद था .. मानो उसमें अदरक के साथ-साथ अजवाइन भी मिलायी गयी हो। पूछे जाने पर दुकान में चाय बनाने वाली भी चाय में अजवाइन मिले होने के लिए हाँ में हाँ मिलायी। जबकि उसकी बात में सत्यता नहीं थी। शायद वह भाषा के कारण मेरे सवाल को समझ ही नहीं पायी होगी .. शायद ...
दरअसल माणा के बाज़ार से हमारे द्वारा खरीदी गयी 'ग्रीन टी' की 'पैकेट्स' और वहाँ वाली भारत की प्रथम चाय की दुकान से पी गयी 'ग्रीन टी' .. दोनों ही 'ग्रीन टी' थी ही नहीं .. वह तो उस से भी बढ़ कर .. अतिगुणकारी एक अलग ही बिच्छू की चाय थी / है .. शायद ...
अब तो .. आज बस इतना ही .. उस बिच्छू की चाय और बद्रीनाथ व माणा से जुड़ी आँखों देखी अन्य बतकही "बिच्छू की चाय .. आय हाय !-२" में .. बस यूँ ही ...
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 29 मार्च 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteजी ! सादर नमन संग आभार आपका .. अपने मंच पर मेरी बतकही को मौका देने के लिए .. बस यूँ ही ...
Deleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 30 मार्च 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteजी ! सादर नमन संग आभार आपका .. अपने मंच पर मेरी बतकही को मौका देने के लिए .. बस यूँ ही ...
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बिच्छु की चाय ....आय हाय ! अतीव सुंदर और चाय की तलब जगाती । साथ में जो सुरम्य जीवंत चित्र सजे है मन को मोह लेने वाले है । हमें आगे के अंक का इंतजार रहेगा ..
ReplyDeleteअत्यंत रोचक यात्रा विवरण और सुंदर मनमोहक चित्र, प्रकृति माँ की तरह हमारा पोषण भी करती है, और उसमें रची-बसी सत्यता, चैतन्यताऔर सुंदरता को ही ईश्वर कहते हैं
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