Friday, August 30, 2019

चन्द पंक्तियाँ - (१४) - बस यूँ ही ...

(1)* नंगे अहसास
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हर अहसासों को
शब्दों का पोशाक
पहनाया जाए
ये जरुरी तो नहीं ...

कुछ नंगे अहसास
जो तन्हाई में
बस 'बुदबुदाए'
भी तो जाते हैं ...

(2)* रंगीन कतरनों में
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दर्जियों के
दुकानों से
रोज़ सुबह
बुहार कर
बिखेरे गए
सड़कों पर
बेकार
रंगीन
कतरनों में ...
अक्सर
ढूँढ़ता हूँ
पंख कतरे
अधूरे
बिखेरे
रंगीन
सारे सपने अपने ...

(3)* ज़ीने-सी
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आजकल एक
"ज़ीने"-सी
"जीने"
लगे हैं
शायद हम ...

अक़्सर तुम्हारे
अहसासों में
कभी 'उतर'
आता हूँ मैं ...

कभी 'चढ़'
आती हो
मुस्कुराती हुई
ख़्यालों में
मेरे तुम ...

Thursday, August 29, 2019

चन्द पंक्तियाँ - (१३) - बस यूँ ही ...

(1)#  कुछ रिश्ते होते हैं ...
 
कुछ रिश्ते होते हैं
माथे से उतार कर
बाथरूम की दीवारों पर
चिपकाई गई लावारिस
बिंदी की तरह

या कभी-कभी
तीज-त्योहारों या
शादी-उत्सवों के बाद
लॉकरों में सहेजे
कीमती गहनों की तरह

या फिर कभी
चेहरे या शरीर के
किसी अंग पर टंके हुए
ताउम्र मूक तिल या
मस्से की तरह

पर कुछ रिश्ते
बहते हैं धमनियों में
लहू की तरह
धड़कते है हृदय में
धड़कन की तरह
घुलते हैं साँसों में
नमी की तरह
मचलते हैं आँखों में
ख्वाबों की तरह
होते हैं ये रिश्ते टिकाऊ
जो होते है बेवजह ...
है ना !?...



(2)#  मन का भूगोल

भूगोल का ज्ञान -
पृथ्वी का एक भाग थल
तो तीन भाग जल
यानि इसके एक-चौथाई भाग जमीन
और तीन-चौथाई भाग है जलमग्न ...
मतलब जल के भीतर की दुनिया
अदृश्य पर बड़ी-सी ...

ठीक मानव तन की दुनिया
और मन की दुनिया की तरह ...
 तन की दुनिया दृश्य ... पर छोटी ...
दूसरी ओर मन की दुनिया अदृश्य ...
पर अथाह, अगम्य, अनन्त, विशाल
बड़ी ... बहुत बड़ी .... बहुत-बहुत बड़ी ...


है कि नहीं !!!?...

Wednesday, August 28, 2019

चन्द पंक्तियाँ - (१२) - बस यूँ ही ...

(१)* कपूर-बट्टियाँ

यथार्थ की पूजन-तश्तरी में
पड़ी कई टुकड़ों में बँटी
धवल .. निश्चल ..
निःस्पन्दित .. बेबस ..
तुम्हारे तन की कपूर-बट्टियाँ

अनायास भावनाओं की
बहती बयार संग बहती हुई
तुम्हारे मन की कपूरी-सुगन्ध
पल-पल .. निर्बाध .. निर्विध्न ..
घुलती रहती है हर पल ..
निर्विरोध .. निरन्तर ..
मेरे मन की साँसों तक

हो अनवरत सिलसिले जैसे
तुम्हारे तन की कपूर-बट्टियों के
मन की कपूरी-सुगन्ध में
होकर तिल-तिल तब्दील
मेरे मन की साँसों में घुल कर
सम्पूर्ण विलीन हो जाने तक ...

(2)*अक़्सर परिंदे-सी

हर पल ...
मेरे सोचों में
सजी तुम
उतर ही आती हो
अक़्सर परिंदे-सी
पर पसारे
मेरे मन के
रोशनदान से
मेरे कमरे के
उपेक्षित पड़े मेज़ पर
बिखरे कागज़ों पर

और ...
लोग हैं कि ..
बस यूँ ही ...
उलझ जाते हैं
कविताओं के
भाव और बिम्ब में

और तुम ...!!
सच-सच बतलाओ ना !
तुम्हें तो इस बात का
एहसास  है ना !??? ...