Saturday, July 24, 2021

'मॉडर्न आर्ट'-सी ...

शहर की 
सरकारी
या निजी
पर लावारिस,
कई-कई
दीवारों के
'कैनवासों' पर,
कतारों में
उग आए
कंडों पर
अक़्सर ..
कंडे थापती,
मटमैली 
लिबास में,
बसाती
गीले 
गोबर के 
बास से,
उन 
औरतों की
उकेरी गयी,
किसी कुशल
शिल्पी की
'मॉडर्न आर्ट'-सी,
पाँचों ही
उँगलियों की
गहरी छाप-से ...

उग आए
हैं मानों ..
भँवर तुहारे 
दोनों ही
गालों पर,
मेरे होठों की
छाप से
उगे हुए,
आवेग में
ली गयीं
हमारी 
गहरी 
चुंबनों से
और ..
उम्र के साथ
उग आयी 
हैं शिकन भी, 
सालों बाद
माथे पर 
तुम्हारे,
हमारे 
प्यार की
तहरीर बन कर,
बिंदी को 
तब तुम्हारी,
बेशुमार 
चूमने से .. बस यूँ ही ...




Wednesday, July 21, 2021

वो हो जाने दूँ ? ...

विधाता ! , तू कहे अगर तो, चंद सवाल तुझसे पूछूँ ,
या फिर .. बस यूँ ही ... जो होता है , वो हो जाने दूँ ?

देकर एक बार कभी, किसी को तू जीवनदान,
लेता है साल-दर-साल क्यों भला हमारे प्राण?
हर बार, बारम्बार कटती तो हैं यूँ हमारी गर्दनें ,
फिर सामने तेरे क्यों झुकती हैं इनकी ये गर्दनें?

विधाता ! , तू कहे अगर तो, चंद सवाल तुझसे पूछूँ ,
या फिर .. बस यूँ ही ... जो होता है , वो हो जाने दूँ ?

शरीयत, हदीस, कलमे बंदों ने या बनायी तूने,
करते हैं 'कलमा इस्तिग़फ़ार' पढ़-पढ़ के तो ये
बंदे तेरे सारे, गुनाह कई , कितनी साफ़गोई से
समझूँ तुझे विधाता है या फिर कोई कसाई रे?

विधाता ! , तू कहे अगर तो, चंद सवाल तुझसे पूछूँ ,
या फिर .. बस यूँ ही ... जो होता है , वो हो जाने दूँ ?

सुना है, सुन लेता है तू इनके बुदबुदाए कलमे,
पर मेरी चीखों की पारी में बन जाते हो बहरे।
बख़्श दो विधाता ! कभी तो हमारी भी जानें, 
वर्षों बहुत चबायी हैं तूने नर्म-गर्म हमारी रानें।

विधाता ! , तू कहे अगर तो, चंद सवाल तुझसे पूछूँ ,
या फिर .. बस यूँ ही ... जो होता है , वो हो जाने दूँ ?

सुना है कि तू तो सारे जग का है परवरदिगार,
फिर जीने का मेरा भी है क्यों नहीं अख़्तियार?
सच में ! मेरी लाशें, मेरे बहते लहू, तुझे ये सारे,
कर जाते हैं खुश? तू भला कैसा परवरदिगार?

विधाता ! , तू कहे अगर तो, चंद सवाल तुझसे पूछूँ ,
या फिर .. बस यूँ ही ... जो होता है , वो हो जाने दूँ ?

यूँ तो जो तेरे गढ़े मामूली इंसान हैं ये, जो ख़ातिर 
जीभ-सेहत की और ख़ातिरदारी में कभी अपने 
मेहमानों की, निरीहों को ही नहीं कर रहे हलाल,
निगल कर धरती को भी तेरी ये कर रहे कंगाल।
तू तो विधाता, क्यों नहीं फिर इन्हें सका संभाल?

विधाता ! , तू कहे अगर तो, चंद सवाल तुझसे पूछूँ ,
या फिर .. बस यूँ ही ... जो होता है , वो हो जाने दूँ ?

बुझती नहीं क्या प्यास तुम्हारी, लहू पी पीकर भी?
बता ना जरा, तेरी लाद बड़ी है या तेरी प्यास बड़ी?
मिटी नहीं भूख, खाकर बोटियाँ मसालेदार हमारी?
डकार भी ले, पेट भरे ना भरे, मुँह भी थकता नहीं?
सुना कभी लहू पीने की आवाज़ भी तो गट-गट की।

विधाता ! , तू कहे अगर तो, चंद सवाल तुझसे पूछूँ ,
या फिर .. बस यूँ ही ... जो होता है , वो हो जाने दूँ ?


चलते-चलते :- क्षमा साहिबा ! .. क्षमा साहिबान ! .. माफ़ी कद्रदान !!!
                     जाते-जाते .. एक भूल हो रही .. हम भूल ही गए कि .. 
                     देना है आप सभी को तो, आज हमें मुबारकबाद भी ..
                     वर्ना हम धर्म-निरपेक्ष नहीं कहलायेंगें .. और ...   
                     सभ्य समाज से तड़ीपार भी कर दिए जायेंगे, तो ...
                     फिर ईद-उल-अज़हा मुबारक हो भाई जान ! .. 
                     ईद-उल-जुहा मुबारक हो आपा जान ! .. बस यूँ ही ...
                     

                     एक त्रासदी ...
                     ज़िबह करो या मारो झटका,
                      कटता है हर हाल में बकरा।