Thursday, March 7, 2024

पुंश्चली .. (३५) .. (साप्ताहिक धारावाहिक)

प्रत्येक वृहष्पतिवार को यहाँ साझा होने वाली साप्ताहिक धारावाहिक बतकही- "पुंश्चली .. (१)" से "पुंश्चली .. (३४)" तक के बाद पुनः प्रस्तुत है, आपके समक्ष "पुंश्चली .. (३५) .. (साप्ताहिक धारावाहिक)" .. बस यूँ ही ...  :-

गतांक का आख़िरी अनुच्छेद :-

माखन चच्चा - " कैसे मुँह में कुछ जाएगा बेटा, जब मुँह का निवाला आँखों के सामने ही गलत दोष मढ़ कर छीना जा रहा हो .. "

अब रेशमा और मन्टू के साथ-साथ माखन पासवान भी बेवकूफ़ होटल की ओर जा रहे हैं। इनके यहाँ से जाने के साथ-साथ यहाँ की उपस्थित भीड़ भी छंटने लगी है।

गतांक के आगे :-

रेशमा होटल में प्रवेश करते हुए अपनी टोली को प्रतिक्षारत देख रही है। एक नज़र अपनी टोली पर डालने के बाद अब 'वाश बेसिन' की ओर इशारा करते हुए माखन चच्चा को हाथ धोने के लिए बोल रही है। साथ में स्वयं और मन्टू भी, दोनों उसी ओर क़दम बढ़ा चले हैं। तीनों अपने-अपने हाथ धोकर रेशमा की टोली की ओर जा रहे हैं, जहाँ पहले से ही उसकी टोली अपने-अपने हाथों की साफ़-सफ़ाई करके रेशमा की बाट जोह रही थी।

रेशमा - " तुम लोगों को खा लेना चाहिए था ना .. "

हेमा - " ऐसे कैसे खा लेते आपके बिना .. गुरु के बिना भी भला .. "

रेशमा - " अच्छा-अच्छा ! .. अब तो आ गयी ना मैं .. अभी जल्दी-जल्दी खा लो .. जिसको भी जो कुछ खाना है। "

रमा - " ये भी कोई बात हुई .. साथ खाने आये हैं तो सब मिलकर एक साथ एक-सा खाना खायेंगे हमलोग .."

रेशमा - " ये भी सही है, पर .. अब आज आगे अगला 'नर्सिंग होम' जाने का 'प्रोग्राम' 'कैंसिल' .."

सुषमा - " वो क्यों भला ? "

हेमा - " गुरु हैं हमारी .. कुछ भी फ़रमान जारी कर सकती हैं। हमको मानना ही होगा। है कि नहीं ? .."

रमा - " फ़रमान तक तो ठीक है .. बस्स ! .. कोई फ़तवा ना जारी करें .. " 

हेमा और रमा की चुटकी भरी बात पर रेशमा की पूरी टोली हँस पड़ी है। सिवाय रेशमा के .. मन्टू के और स्वाभाविक तौर पर माखन पासवान के।

सुषमा - " और .. आप वापस आकर बतायीं भी नहीं कि .. उधर चिल्ल-पों किस बात की मची हुई थी। कोई दुर्घटना घटी है क्या ? .. और ये सुबह-सुबह माखन चच्चा आपको कहाँ मिल गए ? "

रेशमा - " वही तो बतलाने वाली थी तुमलोगों को .. पर अभी तुमलोगो को तो हँसी सूझ रही है ? देखो ! .. माखन चच्चा को .. तुम लोगों को उनका दुःख नहीं दिख रहा क्या ? .. "

सुषमा - " वो तो हम पूछे ही अभी आपसे इनके बारे में .. "

रेशमा - " इनके एकलौते बेटे का जो 'केस' चल रहा था ना .. "

हेमा - " हाँ- हाँ .. तो क्या हुआ ? "

रेशमा - " आज उसी का फ़ैसला आने वाला है और .. हो सकता है, कि .. "

माखन पासवान - " हम वहीं पर जा रहे हैं बेटा .. अब हम्मर (हमारा) मंगड़ा जेल की गाड़ी में आने ही वाला होगा .."

मन्टू - " आप सुबह से हलकान हो रहे हैं बिना खाए-पिए .. बिना मुँह जुठाए हुए आप को नहीं जाने देंगे अभी .. "

माखन - " पर अभी कुछ भी मुँह में डालने का मन नहीं कर रहा है बेटा .. "

रेशमा - " अच्छा .. पहले बैठिए तो सही .. अभी वहाँ समय लगेगा .. तब तक आप हम लोगों के साथ खा लीजिए .. अगर खायेंगे नहीं तो अपने मंगड़ा के लिए कैसे लड़िएगा आप ? .."

रेशमा और मन्टू मिलकर किसी तरह अपने माखन चच्चा को अब खाने के लिए तैयार कर लिए हैं। रेशमा से बात करके अब सुषमा 'काउंटर' पर जाकर सबके लिए सादी (शाकाहारी) थाली का 'ऑर्डर' दे रही है।

अब सबके सामने थाली आ भी गयी है। थोड़ी देर में सभी के खा लेने के बाद रेशमा स्वयं भुगतान करके सभी को लेकर कचहरी की तरफ जा रही है। 

रेशमा - " ये बलात्कार के लिए अपने देश में आज भी .. जो भी कानून और सजा है .. कम है। "

माखन पासवान - " ना बेटा .. हम्मर मंगड़ा कोई बलात्कार नहीं किया है .. "

रेशमा - " ना- ना .. ना चच्चा .. हम मंगड़ा की बात नहीं कर रहे। हमको तो पता ही है, कि वह निर्दोष है। हम तो देश-समाज की बात कर रहे है चच्चा .."

मन्टू - " किस तरह कानून और सजा कम है आज भी अपने देश में ? .. अब तो हमारे देश में दिल्ली के निर्भया कांड के बाद संविधान संशोधन करके इस ज़ुर्म के लिए कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान लाया गया है। "

रेशमा " हमारा मतलब है, कि .. आये दिन केवल महिलाओं का ही बलात्कार नहीं होता, पुरुष और किन्नर भी तो इस के शिकार होते हैं .. और तो और .. कई मानसिक विक्षिप्त लोग तो मौका मिलते ही .. मुर्दे तक का बलात्कार कर लेते हैं। "

हेमा - " छिः .. छि-छि .. दुनिया में कैसे-कैसे लोग हैं ? "

रेशमा - " और .. मजे की बात ये है कि इनके लिए अपने देश में आज भी कोई भी कानून नहीं हैं। "

रमा - " अच्छा ! "

रेशमा - " पति-पत्नी के बीच भी कभी-कभी ज़बरन बनाए गए यौन संबंध को बलात्कार माना जाना चाहिए, परन्तु इसे भी कानूनन बलात्कार नहीं माना जाता .. "

रमा - " सबसे तो आश्चर्यजनक तो लगता है, ये सोच कर कि एक शव से भला लोग किस प्रकार बलात्कार करने की सोचते भी होंगे या करने की हिम्मत करते हैं .."

रेशमा - " दरअसल ये एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसको 'नेक्रोफिलिया' कहा जाता है। इसके लिए भारत में तो नहीं पर .. ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में तो सजा वाले कानून हैं .. "

【आज बस .. इतना ही .. अब शेष बतकहियाँ .. आगामी वृहष्पतिवार को ..  "पुंश्चली .. (३६) .. (साप्ताहिक धारावाहिक)" में ... 】


Monday, March 4, 2024

पत्ते वाली मिठाई .. किसने है खाई ?

सर्वविदित है, कि .. किसी भी क्षेत्र विशेष में उसके संस्कार या उसकी संस्कृति पर उसके भौगोलिक परिवेश के साथ-साथ वैश्विक वैज्ञानिक अनुसंधानों व आविष्कारों का भी गहरा प्रभाव पड़ता आया है। 

मसलन- मरणोपरांत जिस दाह संस्कार और दफ़नाने की अलग-अलग प्रक्रियाओं को धर्म विशेष से जोड़ कर लकीर के फ़कीर बने आज भी हम अकड़ रहे हैं या यूँ कहें कि उस से जकड़े हुए हैं, तो .. एक बार अगर हम इतिहास की खिड़की से झाँक कर इन धर्म-मज़हब के उद्‌गम स्थलों का मन से अवलोकन करें, तो प्रमाणिक निष्कर्ष यही निकलेगा कि .. दफ़नाये जाने वाले संस्कार का प्रचलन उन जगहों में पनपा होगा, जहाँ ना तो दाह संस्कार के लिए लकड़ियों को प्रदान करने वाली वन संपदाएँ थीं और ना ही अवशेष स्वरूप राख़ को बहा ले जाने वाली एक भी नदी थी .. वहाँ थे तो केवल रेत ही रेत .. शायद ...

दूसरी तरफ .. दाह संस्कार के चलनसार का प्रादुर्भाव वहीं सम्भव हो पाया होगा, जहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप .. वृक्षों से मिली लकड़ियों और नदियों के जल की उपलब्धता रही होंगी। परन्तु पुरखों के कालखण्ड में तत्कालीन परिस्थितिवश पनपे प्रचलनों को हम लोगों ने आज भी अलग-अलग धर्म-मज़हब से जोड़ कर मृत शरीर के निष्पादन के लिए जलाने और दफ़नाने जैसी दो भिन्न प्रक्रियाओं को क्रमशः श्मशान और क़ब्रिस्तान जैसे दो खेमों में बाँट कर रखा है .. शायद ...

प्रसंगवश .. वैसे तो आज हमारे बीच मृत शरीर के निष्पादन का देहदान नामक एक बेहतर और बहुउपयोगी विकल्प उपलब्ध तो है ही, पर हम अगर लकीर के फ़कीर वाली ज़ंजीर की जकड़न से बाहर निकल सकेंगे, तभी तो .. इस देहदान का औचित्य समझ पायेंगे और इसे अपनाने की हिम्मत जुटा पायेंगे, वर्ना .. तथाकथित मोक्ष की अपभ्रंश धारणा से प्रेरित हो कर, उन तमाम अंधपरम्पराओं को चिपकाए हुए .. हम स्वयं भी उनसे चिपके रहेंगे और भावी पीढ़ियों को भी उनसे चिपके रहने के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी दबाव बनाते रहेंगे .. शायद ...

हालांकि हमारे संस्कार-संस्कृति की तरह हमारे खानपान के मामले में भी यही भौगोलिक प्रभाव ही प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। जैसे- पँजाबियों को रोटी-पराठे एवं बंगालियों को भात या फिर मूढ़ी या फरही जैसे चावल के अन्य उत्पाद अत्यधिक प्रिय होने की वज़ह दरसअल उनके राज्यों में खेती से क्रमशः गेहूँ और चावल के प्रचुर उत्पादन ही हैं .. शायद ...

अब बात बंगालियों की हो रही हो तो .. उनके कुछ विशेष व्यंजनों का नाम लिए बिना नहीं रहा जा रहा अभी तो, तो ..  उनके कुछेक विशेष व्यंजनों के नाम लेने भर से ही मुँह में पानी आ जाता है। मसलन- शुक्तो (एक विशेष सुस्वादु शाकाहारी सब्जी), कच्चा गोला संदेश (छेने से बना मिठाई विशेष), मिष्टी दोई (विशेष स्वाद वाला मीठा दही), भापा दोई (भाप पर पका दही का विशेष मीठा व्यंजन) व भापा माछ (भाप से पकी मछली) और .. उनमें से एक भापा माछ .. एक ऐसा मांसाहारी व्यंजन है, जो मछली को सरसों के मसाले में 'मैरीनेट' करने के बाद केले के पत्ते में लपेट कर भाप पर पकाया जाता है। यूँ तो केले के पत्ते पर खाने का भी प्रचलन बंगाल में भी है और दक्षिण भारत में भी और .. कारण वही है .. उन क्षेत्रों में केले की अत्यधिक उपज का होना, जो वहाँ के भौगोलिक परिवेश पर ही निर्भर करता है .. शायद ...

यहाँ मुख्य रूप से गौर करने वाली बात ये है, कि इस "भापा माछ" के अनोखे स्वाद में मछली व मसाले के साथ-साथ केले के पत्ते का भी विशेष योगदान रहता है, जिनमें लपेट कर इसे भाप पर पकाया जाता है। बातों-बातों में पत्ते की बात निकली ही है तो .. अब "पत्ते वाली मिठाई" की बातें करते हुए आज की मूल बतकही की शुरुआत करते हैं .. बस यूँ ही ...

आज कमोबेश समस्त धरती के वैश्वीकरण / भूमंडलीकरण हो जाने के बावज़ूद भी कई स्थान विशेष के कुछेक व्यंजनों का वैश्वीकरण नहीं हो पाया है। मसलन- केवल अरवा चावल के आटे और गुड़ से विशेषतः जाड़े के मौसम में बनाया जाने वाला "भक्का या भक्खा" गर्म पानी के भाप से तैयार होता है; जो पौष्टिक और स्वादिष्ट होने के बावज़ूद भी बिहार के कुछ पूर्वोत्तर जिले- अररिया, किशनगंज, पूर्णिया व कटिहार के साथ-साथ झारखण्ड के पाकुड़ जिला, जो पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जैसे एतिहासिक जिला से सटा हुआ है, पश्चिमोत्तर पश्चिम बंगाल और दक्षिण-पूर्वी नेपाल के कुछ सीमांचल क्षेत्रों तक ही सीमित है .. शायद ...

अब मूल बतकही के रुख़ को उत्तराखंड के दो मुख्य भागों में बँटे हुए- गढ़वाल और कुमायूँ में से एक .. कुमायूँ की ओर मोड़ते हैं। वैसे तो तीसरा भाग भी है- जौनसार। ख़ैर ! .. फ़िलहाल हम बात कर रहे हैं .. कुमायूँ की और और उस के अल्मोड़ा जिला से जुड़ी ख़ास बातों में से एक "पत्ते वाली मिठाई" की। वैसे तो उपलब्ध आंकड़े की बात करें तो .. अल्मोड़ा इस राज्य का सबसे ग़रीब जिला है, पर दूसरी तरफ इसकी तमाम प्राकृतिक संपदाएँ इसे सम्पन्न और समृद्ध भी बनाती हैं।

यहाँ उपलब्ध उन्हीं प्राकृतिक संपदाओं में से एक है- मालू की बेलें, जिसे स्थानीय लोग लता कचनार भी कहते हैं .. क्योंकि इसके पत्तों का आकार भी कचनार के पत्तों की तरह ही दोमुँहा होता है और इसका स्पर्श भी खुरदुरा होता है, पर इसका माप उससे बड़ा होता है। वर्षों से स्थानीय क्षेत्रों में इन पत्तों से बने पत्तल और दोने का इस्तेमाल होता आ रहा है। यहाँ इस की फ़ली को "टांटी" कहते हैं। जहाँ ये बेलें प्राकृतिक रूप से सहज उपलब्ध है, वहाँ इस टांटी के पकने पर आग में भून कर उसके बीजों को, जिसे "मेले" कहते हैं, खाया जाता है। इस के पत्तों का काढ़ा बुखार या 'डायरिया' के बीमारों को दिया जाता है, क्योंकि इसमें 'एन्टीबैक्टीरियल' गुण होता है। यूँ तो यह कुमायूँ के अलावा पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, सिक्किम आदि राज्यों में भी उगता तो है, पर ..  अल्मोड़ा जिला की तरह "पत्ते वाली मिठाई" नहीं मिलती है।

वैसे तो कुमाऊँ क्षेत्र में एक अन्य मिठाई .. "बाल मिठाई" भी लोकप्रिय है, जिसे भुने हुए खोवे (मावा) से बनाई जाती है और इसके हर टुकड़े की ऊपरी परत पर 'होम्योपैथिक' दवा वाली छोटी-छोटी गोलियों जैसी चीनी की गोलियों की परत चढ़ाई जाती है। सर्वविदित है, कि कुमाऊँ में गोरखों ने सन् 1790 ई से लेकर सन् 1815 ई तक लगभग 25 वर्षों तक शासन किया था और किवदंतियों के मुताबिक़ उन्हीं गोरखों द्वारा "बाल मिठाई" का पदार्पण कुमाऊँ में हुआ था। वैसे तो आज यह उत्तराखंड की राजकीय मिठाई भी हैI परन्तु "पत्ते वाली मिठाई" की तो बात .. मतलब स्वाद ही अलग है। 

यूँ तो उत्तराखंड की राजधानी- देहरादून में 'स्ट्रीट फ़ूड' के तौर पर युवाओं में विशेष लोकप्रिय और प्रसिद्ध नमकीन व्यंजनों में बन टिक्की और कतलम्बे का नाम आता है। यहाँ की 'बेकरी' के उत्पाद भी प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं। इनके अलावा वयस्कों-वृद्धों में उत्तराखंड देवभूमि वाले अपने चार धामों के लिए, तो .. युवाओं के बीच 'एडवेंचर्स गेम' के अलावा प्राकृतिक पहाड़ी सौन्दर्य के लिए भी आकर्षण का केन्द्र है। पर .. इन सबसे परे .. "पत्ते वाली मिठाई" की तो बात ही निराली है।

अब इस मिठाई के लिए भी किवदंतियों की बात छेड़ें तो .. उत्तराखंड के कई सारे लोकप्रिय और प्रसिद्ध पहाड़ी पर्यटन स्थलों की ख़ोज के साथ-साथ वहाँ बसने व उसे बसाने का श्रेय अंग्रेज़ों को देने की तरह ही .. स्थानीय वृद्धजनों के अनुसार इस "पत्ते वाली मिठाई" का श्रेय भी एक अंग्रेज को दिया जाता है।

दरअसल अल्मोड़ा जाने के लिए वर्तमान में तो 127 किलोमीटर की दूरी पर निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर में है और 90 किलोमीटर की दूरी पर निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। परन्तु दशकों पहले अंग्रेजों की अवधि में ये दोनों ही यतायात के साधनों के नहीं होने पर एकमात्र साधन- सड़कमार्ग द्वारा देहरादून से अल्मोड़ा जाने के दरम्यान अल्मोड़ा से कुछ पहले ही नैनीताल ज़िले में कोसी नदी और खैरना नदी के संगम पर बने खैरना पुल के पास ही खैरना नाम की एक छोटी-सी बस्ती थी और आज भी है। वहीं पर एक चट्टी-बाज़ार भी है, जहाँ लम्बी दुर्गम पहाड़ी यात्रा करके आने वाले सैलानियों को ढाबेनुमा दुकानों से चाय-अल्पाहार करके तरोताज़ा होने का अवसर तो मिलता ही है .. साथ ही अपनों के लिए सौग़ात के रूप में यहाँ की बाल मिठाई और "पत्ते वाली मिठाई" ले जाने का भी मौका मिलता है।

स्थानीय वृद्धजनों का कहना है, कि अंग्रेजों के शासनकाल में एक अंग्रेज के पर्यटन के ख़्याल से अल्मोड़ा जाने के दौरान जब खैरना में उसकी गाड़ी रुकी तो वह एक ढाबे में कुछ जलपान करने के बाद .. उसके बगल की ही मिठाई की एक छोटी-सी दुकान से एक मिठाई ख़रीद लिया, जिसे गाढ़े दूध में खोवा, कम मात्रा में चीनी, नारियल-चूर्ण के अलावा छोटी इलायची के बीजों के चूर्ण, काजू, बादाम, केसर और किशमिश डालकर तैयार की जा रही थी। उस दुकानदार ने बन रहे ताज़ा-ताज़ा मिठाई को ग़ुलाब की पंखुड़ियों से सजाकर वहाँ उस वक्त सहज उपलब्ध मालू के हरे पत्ते में लपेट कर उस अंग्रेज पर्यटक ग्राहक को सौंप दिया था। 

अब दिलचस्प बात ये हुई, कि उस अंग्रेज सज्जन को वह मिठाई इतनी अच्छी लगी, कि वे दूसरे दिन पुनः उसी दुकानदार से एक ही बार में एक किलो मिठाई खरीद कर ले गए। स्वाभाविक था कि .. मिठाई की मात्रा ज्यादा होने की वजह से दुकानदार ने उसे मालू के पत्ते की जगह गत्ते के डिब्बे में भर कर दे दिया था। उसको खाने के बाद अंग्रेज महोदय को स्वाद में अंतर महसूस हुआ। वे इसके बाद वापस उस दुकानदार के पास गए और स्वाद में कमी की शिकायत की। फिर कुछ क्षण बाद स्वयं ही उन्होंने दुकानदार से मिठाई को उसी मालू के पत्ते में लपेटकर देने की बात कही। कुछ ही देर बाद उस मालू के पत्ते में लिपटी मिठाई को खाने पर पूर्ववत स्वाद आने लगा। 

फिर क्या था .. उसी अंग्रेज पर्यटक की नेक सलाह पर वह दुकानदार उस दिन से अपनी उस मिठाई को शंक्वाकार मालू के पत्ते में लपेट कर ही बेचने लगा और उसी पत्ते वाली मिठाई को सिंगोड़ी या सिंगौड़ी कहते हैं। कहते हैं कि .. वही सिलसिला आज भी प्रचलन में तो है ही, साथ ही .. इसी शंक्वाकार मालू के पत्ते में लिपटा होना .. इसके स्वाद की वज़ह भी है व पहचान भी है। मानो किसी प्रेमी के सानिध्य में आने पर उसकी प्रेमिका का तन आलिंगनबद्ध होकर महक उठता है, वैसे ही मालू के पत्ते की बाहों में सिमट कर सिंगोड़ी के स्वाद में भी चार चाँद लग जाता है .. शायद ...

इसके बारे में सुनने-जानने के पश्चात गत पौने दो वर्षों से देहरादून में मिठाई की कई प्रसिद्ध दुकानों में तलाशने के बाद कल यहाँ के एक मिष्ठान प्रतिष्ठान में यह दृष्टीगोचर होने के बाद मुझ-सा मधुमेह पीड़ित, पर किसी स्थान विशेष के व्यंजन विशेष को चखने के लिए बरबस लालायित प्राणी, भी कैसे मन संवरण कर पाता भला ? इस मिठाई विशेष के लिए अगर .. अब तक आपके मुँह में भी लार भर आयी है, तो आप सभी सपरिवार आमंत्रित है यहाँ आने के लिए और फिर तो .. आप सभी को मालू के पत्ते वाली विशेष मिठाई की दावत हमारी ओर से .. बस यूँ ही ...