Thursday, June 20, 2019

नमक - स्वादानुसार ....

औरतें चौकों में खाना सिंझाती
मात दे जाती हैं अक़्सर ....
सर्कस में रस्सी पर संतुलन बना कर
चलने वाले कलाकार को भी
 जब .... डालती हैं वे हर शाम
खाने में संतुलित नमक और
गुंथते आटे में संतुलित पानी

जब कभी पकाती हैं कोई व्यंजन
पढ़ कर कोई एक व्यंजन -विधि
किसी पत्रिका में या फिर
किसी पाक-कला की किताब
ख़ुश करने के लिए किसी अपने को

तो ... पढ़ती हैं जब अक़्सर किसी भी
व्यंजन के लिए दिए गए
सामग्रीयों का एक निश्चित माप
मसलन ... बेसन - 150 ग्राम,
प्याज - चार मंझोले माप के( कतरे हुए),
लहसुन - चार कली, हरी मिर्ची - 4 या 5..
इत्यादि - इत्यादि ... वगैरह - वगैरह ....
पर रहता है लिखा प्रायः हर बार
नमक - "स्वादानुसार" और ....
विधि अनुसार हो जाता है
किसी प्रिय के लिए सुस्वादु व्यंजन तैयार

फिर परोसा जाता है मन में लिए ये आस
कि व्यंजन के प्रिय के जीभ पर तैरते ही
तैरेंगे हवा में उसके लिए प्रिय के मुँह से
प्रसंशा के दो-चार बोल ... जो ...
सारे दिन के थकान को बदल देगी पल में
"आह से अहा" तक वाले 'मूव' के
बाजारीकरण करते क़ीमती
विज्ञापन की तरह

पर मन में एक सवाल भी कौंधता है समानान्तर
शायद बार-बार या अक़्सर ...
कि ... व्यंजन- सामग्रियों की मानिंद होती
भले हर चीज़ नापी-तौली जीवन में ...
मसलन ....नक़द दहेज़ की रक़म - 20 लाख
गहना - 20 तोले, एक अदद कार - आयातित,
250 बारातियों का पांचसितारा होटल में स्वागत
ना एक कम ... ना एक ज्यादा...
चुटकी भर सिन्दूर, फेरे - सात ....
इत्यादि- इत्यादि ... वगैरह - वगैरह...

पर ...... !!!!....????......
काश !  "उनका" प्यार मिल पाता
जीवन भर अपनी "इच्छानुसार"
जैसे व्यंजन में नमक ... "स्वादानुसार" .....

साक्षात स्रष्टा

एक शाम कारगिल चौक के पास
कुम्हार के आवाँ के मानिंद पेट फुलाए
संभवतः संभ्रांत गर्भवती एक औरत ...
साक्षात स्रष्टा , सृष्टि को सिंझाती
अपने कोख में पकाती, अंदरुनी ताप से तपाती
मानव नस्ल की कड़ी, एक रचयिता थी जाती
लगभग अपनी तीन वर्षीया बेटी की
नाजुक उँगलियों से लिपटी अपनी तर्जनी लिए हुए
इस बेटी को जनने के लिए स्वयं को दोषी मानती
इस आस में  कि शायद अबकी बार खुश कर पाएं
अपने ससुराल वालों को कोख से बेटा जन कर
बेटा यानि तथाकथित कूल-ख़ानदान का चिराग
खानदान को आगे बढ़ाने वाला - एक मोक्षदाता
फिलहाल स्वयं को दोषी मानने वाली
ससुराल वालों द्वारा दोषी ठहरायी जाने वाली
वो तो बस इतना भर जानती है कि
कोख के अंधियारे की तरह ही अँधेरी एक रात को
इस सृजन की वजह, बस इतना ही और शायद ही
उसे मालूम हो एक्स और वाई गुणसूत्रों के बारे में
काश ! ये एक्स व वाई भी ए, बी, सी, डी की तरह
जान पाती वह संभ्रांत गर्भवती औरत।

खैर ! अभी वह औरत अपने पेट के उभार को
दुपट्टे से, दाएँ से, बाएं से, सामने से, पीछे से
असफल किन्तु भरसक प्रयास करती छुपाने की
सड़क पर छितराये छिछोरों की, छोरों की और
टपोरियों की, मनचलों की, कुछ सज्जन पुरुषो की
एक्स-रे वाली बेधती नजरों से
पर कहाँ छुप पाता है भला !?
एक्स-रे तो एक्स-रे ठहरा, है ना ज़नाब !?
अन्दर की ठठरियों की तस्वीर खींच लेता है ये
ये तो फिर भी तन का उभार है ... जिसे टटोलते हैं
अक्सर टपोरी इन्हीं एक्स-रे वाली बेंधती नज़रों से
और कुछ सज्जन भी, अन्तर केवल इतना कि
टपोरी बेहया की तरह अपनी पूरी गर्दन घुमाते हैं
360 डिग्री तक आवश्यकतानुसार और ये  तथाकथित सज्जन
180 डिग्री तक हीं अपनी आँखों की पुतलियों को घुमाकर
चला लेते है काम
डर जो है कि - ' लोग क्या कहेंगें '।

तभी कुछ तीन-चार ... तीन या चार ....नहीं-नहीं
चार ही थे वे -' जहाँ चार यार मिल जाएँ, वहाँ रात गुजर जाए '
गाने के तर्ज़ पर चार टपोरियों की टोली
अचानक उन छिछोरों ने की फूहड़ छींटाकसी
और बेहया-से लगाए कानों को बेंधते ठहाके
साक्षात स्रष्टा ... सकपकायी-सी झेंपती औरत
असफल-सी स्वयं को स्वयं में छुपाती, समाती
ठीक आभास पाए खतरे की किसी घोंघे की तरह।

बस झकझोर-सा गया मुझे झेंपना उसका
मैं बरबस बेझिझक उनकी ओर लपका, जिनमे
था गुठखा चबाता एक सज्जन तथाकथित
जिन्हें किया संबोधित -
"भाई ! जब हम-आप पैदा हुए होंगे
धरती पर अवतरित हुए होंगे
उसके पहले भी ... माँ हमारी-आपकी
इस हाल से, हालात से गुजरी होगी
उनके भी कोख फुले होंगे
और कोई अन्य टपोरी ठहाका लगाया होगा
कोई सज्जन पुरुष शालीनता से मुस्कुराया होगा।"
उसके सारे दोस्त... तीनों ... दोस्त होने के बावजूद भी
पक्ष में मेरे बोलने लगे, वह बेशर्मी से झेंप-सा गया।

देखा अचानक उस संभ्रांत औरत की तरफ
वह साक्षात स्रष्टा झेंपती, सकपकाती, सकुचाती
अपने रास्ते कब का जा चुकी थी और ....
अब तक झेंपना उस आदमी का
ले चूका था बदला उस औरत की झेंप का
और मैं सुकून से  गाँधी-मैदान में बैठा
ये कविता लिखने लगा ... 'साक्षात स्रष्टा'....

Wednesday, June 19, 2019

विवशताएँ .. अपनी-अपनी...

आज की यह रचना/विचार हिन्दी दैनिक समाचार पत्र- दैनिक जागरण, धनबाद के समाचारों से इतर सहायक पृष्ठ पर 20 दिसम्बर, 2005 को "विवशता" शीर्षक से छपी थी, जिसमें कुछ आंशिक परिवर्त्तन करके आज "विवशताएँ .. अपनी-अपनी ..." के शीर्षक के साथ आप से साझा कर रहा हूँ। यह रचना 15 जून, 1995 को हुई अपने वैवाहिक बंधन के बाद हमने रची थी, जिनमें कुछ सच्चाई और कुछ कल्पना का घोल है या यूँ कहें कि यह कॉकटेल है।
मालूम नहीं यह बात वर्षों से ब्राह्मणों ने फैलायी है या सनातनी किताबों ने या फिर पुरुष प्रधान समाज ने कि मृतोपरांत अपने पुत्र की मुखाग्नि से मोक्ष की प्राप्ति होती है। नतीजन एक अदद बेटा यानि तथाकथित पुत्र-रत्न की प्राप्ति के चक्कर में पुत्रियों की एक कतार खड़ी करने वाले कई पिता आज भी हमारे समाज में दिख जाते हैं और जब परिवार नियोजन की मानसिकता नहीं थी प्रचलन में, तब तो यह आम बात थी। तब भी और आज भी बेटा नहीं होना कई समाज में अभिशाप माना जाता है।
फिर चुनौती भरी क़वायद शुरू होती है, अपने समाज में .. अपने देश में दहेज़ विरोधी अधिनियम के बावज़ूद बुढ़ापे के सहारा वाली जीवन भर की कमाई को उन बेटियों की शादी में दहेज़ के रक़म के अनुसार दामाद ख़ोज कर खर्च करने की और उनकी विदाई करने की। दहेज़ की रक़म की उपलब्धता के अनुसार वरीयता सरकारी नौकरी वाले वर को ही मिलता है। ऐसे में खास कर हमारे बिहार में, पहले तो ज़्यादातर .. पर आज भी कमोबेश, सरकारी नौकरी वाले दामाद नहीं मिलने को लोग अभिशाप मानते हैं।
सत्तर के दशक में जब "हम दो, हमारे दो" का नारा हमारे समाज का अभिन्न अंग बना, उसी दरम्यान ट्रेन में सफ़र करते वक्त उस की खिड़कियों से रास्ते में पड़ने वाले गाँव-शहरों की दीवारों पर गेरुए रंग से मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा एक और नारा या प्रचार-वाक्य दिखता था- "वरदान जब बन जाए अभिशाप"। तब के समय, 1985 में सूर्य अस्पताल (Surya Hospitals) की श्रृंखला के खुलने के पहले, अनचाहे गर्भ का गर्भपात इतना आसान नहीं होता था।
खैर .. फ़िलहाल हम लोग आते हैं .. आज की रचना/विचार के क़रीब .. बस यूँ ही ...

समय पर ना आने वाले धोखेबाज़
मौनसून की तरह ही एक और धोखेबाज़ ...
समय-बेसमय बार-बार जाने वाली बिजली के
चले जाने के कारण .. एक उमसभरी शाम
टहलते हुए अपनी खुली छत्त से
एक पड़ोसी के आँगन में देखा और सुना
अपनी मज़बूरी बयां करता एक वृद्ध पिता-

" मधु बिटिया के लिए एक लड़का देखा है,
खाता-पीता घर और कामचलाऊ दरमाहा है
लड़का 'प्राइवेट कम्पनी' में विक्रय-प्रतिनिधि है
बेचता-बेचवाता शायद 'ब्रांडेड' लेमनचूस-टॉफ़ी है "

पर उधर मधु बिटिया मुँह फुलाए बैठी है
मम्मी भी चिंतामग्न नाराज-सी औंधे मुँह लेटी है
पर पिता फिर से समझाता हुआ
अपनी विवशता फिर से बयां करता हुआ -

" अब सरकारी कर्मचारी मैं कहाँ से लाऊँ !?
या बैंक के किरानी के लिए
दस- बीस लाख भला कैसे जुटाऊँ ?
बेटी ! मुझे तो पाँच-पाँच बेटियाँ ब्याहनी है
वीणा, गुड़िया को ब्याह चुका
माना अब तुम तीसरी हो
मगर अभी अन्नू  , नीतू तो बाकी है
और फिर .... ये लड़का 'प्राइवेट' नौकरी वाला
मेरी भी तो पहली पसंद नहीं
मगर क्या करें मजबूरी है
कारण .... पैसा है अल्प
सिवाय इसके और कोई नहीं विकल्प
माना सुरक्षित नहीं साथ उसके तुम्हारा भविष्य
पर कुएँ में धकेलना मेरा भी नहीं लक्ष्य
देखो ... तुम्हारी उम्र बीती जा रही है ...
तुम्हारे चेहरे पीले पड़ने के पहले
हमें तुम्हारे हाथ पीले करने हैं
पड़ोसियों को मुझसे है ज्यादा चिन्ता
उन्हें चैन की नींद देने हैं
अब परिस्थितियों से तो समझौता करना होगा
अपनी ढलती उम्र के लिए ना सही
बाकी दोनों छोटी बहनों की शादी आगे कर सकूँ
इसके लिए तो तुम्हें  'हाँ' करना होगा "

" बेटा ! बिजली आ गई। नीचे आ जाओ। " -
तभी अम्मा की पुकार सुन पड़ोस का
वार्तालाप सुनना बीच में छोड़
विचलित-सा सीढ़ी से उतरता गया मौन
सोचता रहा ... आखिर मेरी भी पहचान है क्या ?
मैं हूँ भला कौन ?
क्या अनचाहे गर्भ की तरह
कल मैं भी अपनाया जाऊँगा
गाँव-क़स्बे की दीवारों पर टंगे गर्भपात के
" वरदान जब बन जाए अभिशाप " वाले
विज्ञापन जैसा टाँगा जाऊँगा ? ...
क्योंकि मैं भी तो एक साधारण-सा
' प्राइवेट कम्पनी ' का कर्मचारी हूँ
चलो .. कम से कम बेरोजगार तो नहीं
इसलिए तथाकथित ईश्वर का आभारी हूँ ...



Tuesday, June 18, 2019

अनचाहा डी. एन. ए.

अपने कंधों पर लिए
अपने पूर्वजों के डी. एन. ए. का
अनमना-सा अनचाहा बोझ
ठीक उस मज़बूर मसीहे की तरह
जो  था मज़बूर अंतिम क्षणों में
स्वयं के कंधे पर ढोने को वो सलीब
जिस सलीब पर था टांका जाना उसे
अन्ततः समक्ष जन सैलाब के ...

हाँ ... तो बात हो रही थी
हमारे पूर्वजों के डी. एन. ए. की
जो हर साल , साल-दर-साल
मनाती आई है ज़श्न आज़ादी की
पर रहता कहाँ याद इसे
भला बँटवारे का मातम
सोचिए ना जरा फ़ुर्सत से, गौर से ....कि
पूरा देश जब मन रहा होता है
जश्न - ए - आज़ादी हर साल
उस वक्त मना रहा होता है ....
बँटवारे का मातम
बस और बस ... भुक्तभोगी परिवार

फिर भला उम्मीद ही क्यों
उन डी. एन. ए. से ... कि ...
भला मनाए वे सारे मिलकर
मातम 'चमकी' के विदारक मौत की ...
बजाय मनाने के जश्न मिलकर
'मैनचेस्टर' की आभासी जीत की......


Monday, June 17, 2019

भावनाओं के ऊन

किसी पहाड़ी वादियों में
कुलाँचे मारते भेंड़ों के झुण्ड जैसी
भागमभाग वाली हमारी दिनचर्या
और उन भेंड़ों के बदन से
ज़बरन कतरे गए मुलायम
उनके बालों जैसे कतरे गए
हमारी दिनचर्या से हमारे चंद पल
जिनसे कातते हैं हम
अक़्सर भावनाओं के ऊन

फिर स्वेटर बुनने वाले
दो सलाइयों के मानिंद
हमारा-तुम्हारा मन अक़्सर
बुना करते हैं मिलकर
गरमाहट देने वाले,
मुलायम, मनमोहक,
और रंगीन सपने
ठीक ग्राफ वाले
रंगीन स्वेटर की तरह

जैसे बुना करती हैं औरतें
अपनी 'तुहीना क्रीम' से महकती
मखमली हथेलियों से अक़्सर
दायीं तर्जनी को
बार-बार उचकाती
कभी दो-चार मिल गप्पें लड़ाती
कभी गुनगुनाती अकेली
ठिठुरती रातों में बोरसी के आगे
ख़ुद को गरमाती

चार अँगुल या फिर ...
एक बित्ता भर बुनने के बाद
कभी रात में करवट बदले पीठ पर
या  सुबह-सवेरे कभी उनींदे में ही
सगे के सीने पर रख कर
नापे गए स्वेटर की तरह
अपने साझा बुने सपने को
सच करने की औकात मापते हैं या
उम्मीदों भरे अवसर भर भाँपते हैं

भले सोचों में ही अक़्सर
मिलते हैं गले दोनों
ठीक बुनती दोनों सलाइयों की तरह
और उचक-उचक कर बुनती
दायीं तर्जनी की मानिंद
दोनों की बाँहें उचक कर
और भी गझिन गिरफ़्त बनाती हैं
ऊन से स्वेटर बनाती फंदों जैसी
एक-दूसरे की चाहतों की .....





Sunday, June 16, 2019

बस आम पिता-सा

गर्भ में नौ माह तक कहाँ रखा
झेला भी तो नहीं प्रसव-पीड़ा
नसीब नहीं था दूध भी पिलाना
ना रोज-रोज साथ खेलना
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा...

ताउम्र 'सेल्स' की घुमन्तु नौकरी में
शहर-शहर भटकता रहा
फ़ुर्सत मिली कब इतनी
तुम्हें जरा भी समय दे पाता
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा...

खुद पहन 'एच.एम्.टी.'की घड़ियाँ
तुम्हे 'टाईटन रागा' पहनाया
फुटपाथी अंगरखे पहन कर
तुम्हे अक़्सर 'जॉकी' ही दिलवाया
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा...

उम्र गुजरी 'स्लीपर' में सफ़र कर
तुम्हे अक़्सर 'ए. सी.' में ही भेजा
घिसा अपना तो 'खादिम, श्रीलेदर्स' में
तुम्हें चाहा 'हश पप्पीज' खरीदवाना
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा...

'नर्सरी' की नौबत ही ना आई
बिस्तर के पास तुम्हारे छुटपन में
जो तीन बड़े-बड़े वर्णमाला, गिनती
और 'अल्फाबेट्स' के 'कैलेंडर' था लटकाया
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा...

'एल के जी' से तुम्हें नौकरी मिलने तक
कभी प्रशंसा के दो शब्द ना बोला
पर परिचितों, सगे-सम्बन्धियों को
तुम्हारी उपलब्धियाँ बारम्बार दुहराया
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा...

ख़ास नहीं ... बस आम पिता-सा
अनिश्चित वृद्ध-भविष्य की ख़ातिर
जुगाड़े हुए चन्द 'एफ डी' , 'आर. डी'
और 'एस आई पी' , तुम्हारी पढ़ाई की ख़ातिर
परिपक्व होने के पूर्व ही तुड़वाया
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा ...

अब तुम्हारा ये कहना कि
"कभी मेरे बारे में भी सोचिए जरा !!!"
या फिर ये उलाहना कि
"आप मेरे लिए अब तक किए ही क्या !?"
बिल्कुल सच कह रहे हो तुम
इसमें भला झूठ है क्या !!!!
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा ...