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Sunday, September 1, 2019

सबक़ (एक कविता).

अपने घर ...  एक कमरे के
किसी कोने में उपेक्षित-सा पड़ा
अपने स्कूल के दिनों का
जर्जर-सा शब्दकोश
अपने सात वर्षीय बेटे के लिए
मढ़वाने पँहुचा था एक शाम
एक जिल्दसाज की दुकान

देखा वहाँ पुस्तकों की ढेर में
सफ़ेद से मटमैले हो चुके
बेहद पुराने-से
मढ़ने के लिए रखे हुए
साथ-साथ ... रामायण और कुरान

फेरता कम्पकंपाता हाथ
पूरी तन्मयता के साथ
वही बूढ़ा जिल्दसाज
जिन पर था लगा रहा
तूतिया मिली हरी गाढ़ी
लेई एक-समान

अनायास कहा मैंने -
" ज़िल्दसाज़ चचाजान !
काश ! दे पाती सबक़
आपकी ये छोटी-सी दुकान
उन दंगाईयों की भीड़ को
जो बाँट कर इंसान
बनाते हैं ... हिन्दू और मुसलमान ...




{ ना तो मैं कोई स्थापित रचनाकार हूँ, ना ही साहित्य या व्याकरण का दंभी ज्ञाता या पुरोधा हूँ। बस "शौकिया" लिखता हूँ। अतः आप सभी से अनुरोध है कि मेरी रचना की अशुद्धियाँ , मसलन - वर्तनी, लिंग, नुक़्ता, अनुस्वार में कोई भूल रह जाए तो ... '"उसे क़ुदरत द्वारा "स्टीफन विलियम हॉकिंग" को रचते समय की गई भूल की तरह स्वीकार कर लीजिये। शब्दों की भावना पढ़िए , उसकी अपंगता की खिल्ली मत उड़ाइए।"" } ...