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Friday, January 29, 2021

चँदोवा ...

किसी का रूढ़िवादी होना भी कई बार हमें गुदगुदा जाता है । ठीक उस 'डिटर्जेंट पाउडर' विशेष के विज्ञापन - " कुछ दाग़-धब्बे अच्छे होते हैं " - की तरह .. शायद ...

यूँ तो ये बात बेकार की बतकही लग रही होगी , पर फ़र्ज़ कीजिये अगर .. हमारी पत्नी या प्रेमिका या फिर हमारा पति या प्रेमी रूढ़िवादी हो और .. हम कभी अपने रूमानी मनोवेग में अपनी तर्जनी भर की तूलिका से प्यार भरी एक मासूम-सी थपकी का रूमानी रंग उनके एक गाल के कैनवास पर आहिस्ता से स्पर्श भर करा दें ; मतलब - उनके एक तरफ के गाल, दायाँ या बायाँ में से अपनी सुविधानुसार कोई भी एक , को छू भर दें और चिढ़ाते हुए दौड़ कर उन से दूर भाग जायें ; फिर ... वो ठुनक-ठुनक कर हमारे पीछे-पीछे पीछा करते हुए बचपन के "छुआ-छुईं" वाले खेल की तरह तब तक दौड़ लगाती/लगाते रहें , जब तक कि हमारी हथेली को ज़बरन पकड़ कर हमारी उँगलियों भर से ही सही अपने दूसरे तरफ वाले गाल को स्पर्श न करवा लें ; ताकि वे अपनी रूढ़िवादी तथाकथित मान्यता/सोच के कारण दुबली/दुबले न हो जाएं कहीं .. तो .. इस तरह इस प्रकार की रूमानी हँसी-ठिठोली में हमारा मन भला गुदगुदायेगा या नहीं ? अगर " नहीं " तब तो उपर्युक्त बतकही आपके लिए वैसे भी बेमानी है और अगर " हाँ " तो बतकही आगे बढ़ाते हैं ...

अब अगर आप इस तरह की रूढ़िवादी मान्यता पर यक़ीन नहीं करते/करती हैं , तब तो कोई बात ही नहीं, पर .. अगर करते/करती हैं तो .. आपके इस यक़ीन के फलस्वरूप यक़ीनन आपके पति/प्रेमी/पत्नी/प्रेमिका को ऐसे किसी अवसर पर कभी-न-कभी ऐसी गुदगुदाहट की अनुभूति अवश्य हुई होगी या फिर ऐसी गुदगुदाहट का मौका बचपन में भी भाई-बहन की आपसी चुहलबाजियों के दरम्यान आया हुआ हो सकता है .. शायद ...

बहुत हो गई बेकार की बतकही .. अब कुछ वर्त्तमान के यथार्थ की बात कर लेते हैं। ये तो सर्वविदित है कि इन दिनों उत्तर भारत ठंड , शीतलहर , बर्फ़ और कोहरे के श्रृंगार से सुसज्जित है। यहाँ गंगा के दक्षिणी तट पर बसे बिहार की राजधानी पटना में बर्फ़बारी के आनन्द का सौभाग्य तो नहीं है, पर .. बर्फ़ीली शीतलहर और कोहरे की परतें जरूर चढ़ी हुई है। यही कोहरे आज की निम्नांकित चंद पंक्तियों वाले इस " चँदोवा ... " को मन के रास्ते वेब-पृष्ठ पर पसरने की वज़ह भी बने हैं .. शायद ... जिस वज़ह को भी आप सभी से साझा करना मुनासिब लगा मुझे .. बस यूँ ही ...

चँदोवा ...

पौष की

बर्फ़ीली

चाँदनी 

रात में

आलिंगनबद्ध 

होने के लिए

जानाँ ...


भला 

आज 

क्यों 

किसी

झुरमुट की 

ओट को 

तलाशना ,


है जब 

सब 

ओर

यहाँ

क़ुदरती

कोहरे का 

चँदोवा तना ...


तो फिर ..

देर किस

बात की

भला , 

बस .. आओ ना ,

आ भी जाओ ना ..

जानाँ ...






Friday, June 19, 2020

बाइफोकल* सोच ...

                    ■ खंडन/अस्वीकरण (Disclaimer) ■ :-
●इस कहानी के किसी भी पात्र या घटना का किसी भी सच्ची घटना या किसी भी व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह काल्पनिक है। अगर सच में ऐसा होता भी है, तो यह एक संयोगमात्र होगा। इसके लिए इसे लिखने वाला जिम्मेवार नहीं होगा या है।
और हाँ ... यहाँ किसी भी पुरुष या नारी पात्र/पात्रा की चर्चा की जा रही है, वह ना तो किसी व्यष्टि विशेष को इंगित कर रहा है और ना ही किसी समष्टि को, बल्कि कुछ ख़ास तरह के इंसान की कल्पना कर उसकी विवेचना कर रही है।●
                                   ★●●●★●●●★

                                ◆ बाइफोकल* सोच ◆
आज की इस कहानी की एक पात्रा हैं- डॉ रेवा घोष, जो अपने ब्लॉग और फ़ेसबुक पर अक़्सर प्रकृति के अपने सूक्ष्म अवलोकन वाले शब्दचित्र से सुसज्जित अपनी रचनाओं को प्रकाशित करती रहती हैं। बल्कि यह कहना यथोचित होगा कि उनको या उनकी रचना को चाहने वाले उनकी अनमोल रचना की बेसब्री से प्रतीक्षा करते रहते हैं। इसके अलावा स्वयं की नज़रों में स्वघोषित या फिर सचमुच की विरहिणी, चाहे कारण जो भी रहा हो, और अपने घर-समाज में अपने मन ही मन में या सच में उपेक्षित महसूस करने वाली महिलाओं के मन की कसक भरी शिकायतों को तुष्ट करती उनकी कई रचनाएँ- गज़लें, अतुकान्त कविताएँ, कहानियाँ,  उनकी पहचान बन चुकी हैं। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर घटने वाली कई सकारात्मक या नकारात्मक घटनाओं पर भी आशु-कवयित्री का दायित्व निभाना उन्हें बखूबी आता है या यूँ कह सकते हैं कि ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं की मानो उनको सुबह-शाम प्रतीक्षा रहती हो। इधर किसी भी शाम घटना घटी, अगले दिन सुबह उन्होंने रचना रच दी या इधर किसी सुबह घटना घटी और उसी दिन शाम में रचना बन कर तैयार। अब अपनी-अपनी प्रतिभा है। कहते हैं ना कि -
"कशीदाकारी वालों को तो बस होड़ है, कशीदाकारी करने की।
अब कफ़न हो या कि कुर्ता कोई,बस जरूरत है एक कपड़े की।"
कई प्रतियोगिताओं की प्रतिभागी बनना भी उनकी प्रतिभा का एक अंग है।

अनेक बार तो अपनी रचना के पोस्ट करने के साथ-साथ, कई बार तो दो या चार पँक्तियों के साथ भी, एक बड़ी-सी अदा भरी मुस्कान में सराबोर अपनी तस्वीर या सेल्फ़ी भी चिपका देती हैं। ऐसे में उस पोस्ट पर आई प्रतिक्रियायों या उछले स्माइलीयों के लिए ये तय कर पाना मुश्किल होता है कि वो सारी प्रतिक्रियाएँ और स्माइलियाँ उनकी उन चंद पँक्तियों के लिए आई हैं या उनकी मनमोहक तस्वीर के लिए। वैसे इनके अनगिनत प्रशंसक हर आयु वर्ग के लोग हैं, पुरुष भी और नारी भी। उनकी पोस्ट की गई रचना के विषय के अनुसार ही प्रतिक्रिया देने वाले प्रशंसक भी आते हैं- सामाजिक या राजनीतिक प्रसंगों वाली रचना पर इने-गिने, पर रूमानी पर तो मानो खुले में रखे गुड़ के ढेले के इर्द-गिर्द भिनभिनाती अनगिनत मक्खियाँ।

अमूमन यूँ तो इंसान लिखता तो वही होगा, जो या तो वो स्वयं जीता है या आस-पास किसी पात्र या घटना को देख-सुन कर महसूस करता है या फिर इतिहास, पाठ्यक्रम या अन्य किताबों में या समाज से पढ़ा, सुना, या देखा होता है। पर प्रायः पाठकगण, विशेष कर पुरुष पाठक, महिला रचनाकार की रचनाओं के आधार पर तदनुसार समाजसेविका, क्रांतिकारिणी, विरहिणी या रूमानी जैसी उस रचनाकार की छवि बना लेते हैं अपने मन-मस्तिष्क में। मसलन- विरहिणी वाली रचनाओं से उन्हें ये अनुमान लगाने में तनिक भी देरी नहीं लगती कि - लगता है कि रचनाकार का वैवाहिक जीवन असंतुलित है। उसकी महादेवी वर्मा या मीराबाई से तुलना करना शुरू कर दिया जाता है और रूमानी रचना लिखती हो तो अमृता प्रीतम से। ये सारी बातें पुरुष रचनाकार के साथ भी लागू होती हैं, परन्तु चूँकि आज इस कहानी की पात्रा महिला रचनाकार हैं ; इसीलिए महिला रचनाकार की ही चर्चा कर रहा हूँ।

कई दफ़ा विरहिणी, वेबा (युवा) या बदचलन औरत को एक खास पुरुष-वर्ग कटी पतंग की तरह आँकते हैं, जिसकी बस किसी भावनात्मक डोर का एक छोर भर अपनी किसी एक ऊँगली के पकड़ में आ जाने की प्रतीक्षा में रहते हैं और ..  फिर तो पूरी पतंग और उस की पूरी बागडोर उनके हाथ में होती है।

वैसे भी किशोरावस्था में समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के अंतर्गत यह पढ़ाया गया था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य की इच्छाएं अनन्त होती हैं। ये भी सुना था कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। अब दोनों को ही चरितार्थ करती हुई बातें .. कई बार मन को भटका जाती हैं। नतीज़न .. जो पास में होता है और पूरे परिवार को संभाल रहा होता है ; मसलन- किसान, सैनिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, पदाधिकारी, टीचर, ठीकेदार, व्यापारी, इत्यादि ब्रांड वाले इंसानों में से कोई एक .. वो संवेदनशील रचनाकार को ख़ुद का शोषक और ख़ुद के प्रति रूखा व्यवहार करने वाला लगने लग जाता है और उन से परे सोशल मिडिया का कोई गज़लकार, कवि, कहानीकार, लेखक, विचारक या गायक मार्का इंसान मन को खींचने, लुभाने और भाने लग जाता है। एक आदर्श-पुरुष नज़र आने लग जाता है। अपना शुभचिंतक, सहयोगी के साथ-साथ वह संवेदी और मित्रवत् नज़र आने लगता है।

वैसे तो मीराबाई या आधुनिक मीरा कही जाने वाली महादेवी वर्मा या अमृता प्रीतम के लगभग सर्वविदित निजी जीवन के अनुसार विरह या रूमानियत से सराबोर उनकी रचनाएँ उतनी हैरान नहीं करतीं, जितनी वर्तमान आधुनिक मीराओं और अमृता प्रीतमाओं की। अपनी एक विशुद्ध खुशहाल वैवाहिक और पारिवारिक जीवन के बावज़ूद भी अगर कोई रूमानी रचना लिखता/लिखती हों तो, वो तो सम्भव और स्वाभाविक हो ही सकता है ; परन्तु किसी प्रेरणा से प्रेरित होकर विरह-गीत लिखता/लिखती हो तो उनकी कल्पना-शक्ति को दाद देना तो बनता ही है। क्योंकि किसी खुशहाल वैवाहिक और पारिवारिक जीवन से भी विरह उपजना एक प्रतिभा या कलाकौशल ही हो सकता है।

                          खैर ! ... चूँकि आज की इस कहानी की पात्रा- डॉ रेवा घोष जी मुख्य हैं ही नहीं, बल्कि मुख्य हैं एक पात्र- प्रो. धनेश वर्णवाल ; इसीलिए अब रेवा जी की ज्यादा चर्चा करना उचित नहीं है।
तो अब बातें करते हैं इस कहानी के मुख्य पात्र की .. प्रो. धनेश वर्णवाल जी एक प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी से हिन्दी के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। एक अच्छे रचनाकार, समीक्षक, विचारक और समाज सुधारक भी हैं। ऐसा सब उनके अपने ब्लॉग में खुद से उल्लेख की गईं बातों से पता चलता है।

एक शाम वे अपनी साहित्यकार मित्र-मंडली के साथ शहर के एक नामी क्लब में बीता कर अपने आदतानुसार मुँह में पान चबाते हुए और कुछ अस्पष्ट गुनगुनाते हुए घर लौटते हैं। उन्हें घर में धर्मपत्नी और इकलौती बेटी, जो मेडिकल की सेकंड इयर की छात्रा है और इन दिनों कोरोना के कारण घोषित लॉकडाउन होने की वजह से कॉलेज व हॉस्टल बन्द होने के कारण घर पर ही है, दोनों रोज की तरह उनके साथ ही यानि तीनों के एक साथ डिनर करने के लिए उनकी प्रतीक्षा करती मिलती हैं।
थोड़ी ही देर में वे रोज की तरह फ़्रेश होकर डाइनिंग टेबल के पास आ गए हैं। रसोईघर से धर्मपत्नी और बेटी भी गर्मागर्म खाने से भरे कैस्सरॉल और खाने के लिए अन्य बर्त्तनों को लेकर हाज़िर हो गईं हैं। आज प्रोफेसर साहब का मनपसंद व्यंजन- अँकुरित गोटा मूँग का मसालेदार पराठा और बैंगन का रायता डाइनिंग टेबल पर सबके लिए परोसा गया है।
प्रायः किसी भी शाम का खाना या नाश्ता उन से पूछ कर और उनकी पसंद का ही बनाया जाता है। शायद यह भी पुरूष-प्रधान समाज की ही देन हो। आज शाम भी क्लब जाते वक्त वे अभी रात वाले मेनू के बारे में अपनी धर्मपत्नी के पूछने पर बतला कर गए थे।

सभी यानि तीनों हँसी-ख़ुशी चटखारे ले-ले कर खा रहे हैं। बीच-बीच में वे आज शाम की अपनी मित्र-मण्डली के बीच हुई कुछ चुटीली बातें, बेटी अपने हॉस्टल की कुछ खुशनुमा पुरानी बीती बातें व यादें और धर्मपत्नी दोपहर में अपने मायके से भाभी और बहनों से मोबाइल फोन पर हुई आपसी बातचीत का ब्यौरा आपस में एक-दूसरे को साझा कर हँस-मुस्कुरा रहे हैं। तभी उनकी बेटी उनसे चहकते हुए कहती है - "पापा! आज तो मिरेकल** हो गया।"
मुस्कुराते हुए प्रोफेसर साहब बेटी और धर्मपत्नी की ओर अचरज से ताकते हुए बोले - "ऐसा क्या हो गया बेटा!"। वे जब भी खुश होते हैं या ज्यादा लाड़ जताना होता है तो वे अपनी बेटी को बचपन से ही बेटा ही बुलाते आए हैं।
"जानते हैं? .. आज मम्मी ने पहली बार एक कविता लिखी है।"
"अच्छा! .. क्या लिखा है, जरा हम भी तो सुनें।"
"एक मिनट .. सुनाती हूँ।" फौरन अपना खाना रोक कर पास ही सेंटर टेबल पर पड़ी एक रफ कॉपी लाकर कविता सुनाने लगती है। -
"ताउम्र भटकती रही
तेरी तलाश में कि
कभी तो आ जाओ तुम प्रिय 
बन कर अवलंबन मेरा।
प्रतीक्षा करती रही
एक प्यास लिए कि
तुम आओगे ही 
बन कर आलम्बन मेरा।"
प्रोफेसर साहब का मुखमुद्रा अचानक गम्भीर हो जाता है। आवाज़ में अचानक से तल्ख़ी समा जाती है। -"रखो अभी। खाना खाओ शांति से।" सभी ख़ामोशी से खाने लगते हैं।
भोजनोपरांत सोने के लिए अपने बेडरूम में जाने के पहले भी बेटी पापा-मम्मी के बेडरूम में ही जाकर पूछती है - "पापा! अब पूरी कविता सुनाऊँ ?"
"नहीं सुननी ऐसी फ़ालतू और घटिया कविता।"
"क्यों? ऐसा क्या लिख दिया मम्मी ने भला?"
"क्या लिख दिया मतलब? कुछ भी लिख देगी? मैं मर गया हूँ क्या ? या खाना-खर्चा ठीक से नहीं चलाता? आयँ ? बोलो। जो इस बुढ़ापा में अब वो कोई अवलंबन-आलम्बन ढूँढ़ती फिरे और मैं ..."
"पापा, ये तो बस यूँ ही .. वो .. इधर-उधर पढ़ कर बस लिखने की कोशिश भर कर रही थी कि .. शायद आप उनकी सराहना करेंगे। पर आप हैं कि ..."
"इसका क्या मतलब है, कुछ भी लिखते फिरेगी। लोग क्या सोचेंगे। बोलो ...?"
"पापा! वो रेवा आँटी .. डॉ रेवा घोष .. आपकी और मेरी फेसबुक के कॉमन फ्रेंड लिस्ट में हैं। आपके और भी कई मित्र लोग हैं जो मेरे उस कॉमन फ्रेंड लिस्ट में हैं। उन सब की रचनाओं पर आपकी टिप्पणियाँ मेरी नज़रों से गुजरती रहती हैं। उस दिन तो आप उन शादीशुदा रेवा आँटी की विरहिणी-रूप वाली रचना पर तो प्यार लुटा रहे थे। आशीष और सांत्वना दे रहे थे। उनकी उस रचना के बारे में कोई कह रहा था- "विकल नारी मन के भावों का सुंदर शब्दांकन", तो कोई-  "मन के भाव ... दिल को छूते" ... प्रतिक्रिया दे रहा था, वग़ैरह-वग़ैरह। आप भी ऐसा ही कुछ लिख आए थे। जब रेवा आँटी शादीशुदा होकर ऐसा लिखने पर वाहवाही पा सकती है, विरहिणी बन सकती है, रूमानी लिख सकती है और आपकी नज़र में एक उम्दा रचनाकार हो सकती है तो मम्मी क्यों नहीं? बोलिए ना पापा .. मम्मी क्यों नहीं?"
प्रोफेसर साहब अपने वातानुकूलित शयन कक्ष में भी अपने माथे पर अनायास पसीने की बूँदें महसूस करने लगे हैं।
"और हाँ .. उस दिन मम्मी रसोईघर में वो पुराने फ़िल्म का एक गाना गुनगुना रही थी कि - "लो आ गई उनकी याद, वो नहीं आए" , तो आपका मूड ऑफ हो गया था कि इस बुढ़ापे में मम्मी को किसकी याद आ रही है भला। है ना ? .. बोले तो थे आप मज़ाक के लहज़े में मुस्कुराते हुए पर आपके चेहरे की तल्ख़ी छुप नहीं पाई थी। दरअसल आपका चेहरा भी मेरी तरह पारदर्शी है। .. और एक दिन रात में रेवा आँटी ने फेसबुक पर "आ जाओ तड़पते हैं अरमां, अब रात गुजरने वाली है" .. वाले गाने का वीडियो साझा किया तो आप फ़ौरन उसी वक्त देर रात में ही प्रतिक्रिया दे आए - "वाह! रेवा जी!, बेहद दर्द भरा नग़मा, पुरानी यादें ताज़ा हो गई " .. वाह! .. पापा वाह! ... "
" खैर! ... मैं चली सोने अपने कमरे में, रात काफी हो गई है .. गुड नाईट !"  ... उसी वक्त मम्मी की ओर भी मुख़ातिब होकर- "गुड नाईट मम्मी!" कहती हुई उनकी लाडली बेटी अपने कमरे में सोने चली जाती है।
प्रोफेसर साहब और उनकी धर्मपत्नी एक ही किंग साइज़ दीवान के दोनों छोर पर एक दूसरे के विपरीत दिशा में करवट लेकर गहरी नींद की प्रतीक्षा में सोने का उपक्रम करने लगते हैं।

                                  ★●●●★●●●★

◆【 * = (1) बाइफोकल (Bifocal) = जरादूरदृष्टि (Presbyopia), यानि जिस दृष्टि दोष में निकट दृष्टि दोष और दूर दृष्टि दोष दोनों दोष होता है ; जिसमें मनुष्य क्रमशः दूर की वस्तु तथा नजदीक की वस्तु को स्पष्ट नहीं देख पाता है, को दूर करने के लिए बाइफोकल (Bifocal) लेंस का व्यवहार किया जाता है। जिसमें दो तरह के लेंस- अवतल और उत्तल, एक ही चश्मे में ऊपर-नीचे लगे रहते है।
एक ही चश्मे में बाइफोकल लेंस के दो तरह के लेंस होने के कारण, एक ही आदमी के अलग-अलग सामने वाले के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाने के संदर्भ में "बाइफोकल सोच" शब्द एक बिम्ब के रूप में प्रयोग करने का प्रयास भर किया गया है।
(2) ** = मिरेकल (Miracle) = चमत्कार। 】◆




Sunday, February 16, 2020

स्लीवलेस से झाँकती ...

बिग एफ़ एम् 92.7 पर सोम से शुक्र तक
बस यूँ ही देर रात सोते वक्त आँखें मूंदें 
9 से 11 जब तुम पास ही बिस्तर पर लेटे
खोई रहती हो कानों में ब्लू-टूथ लगाए हुए
"यादों का इडियट बॉक्स विद नीलेश मिश्रा" में
उसकी रुमानियत भरी कहानियों में कम और ...
कुछ थोड़ा ज्यादा ही उसकी खनकती आवाज़ों में
उस वक्त तुम्हारे इस स्टुपिड की उंगलियाँ रहती हैं
खोई-खोई खुले-बिखरे पर घने बालों में तुम्हारे
साथ में सोंधाती रहती है शैम्पू मिले सुगंध से मेरी साँसें...

अक़्सर फ़ुर्सत के पलों में अपने मोबाइल से
यू-ट्यूब में ढूंढ-ढूंढ कर निकालती हो
जब कभी कुमार विश्वास की कविताओं वाली
कई सारी वीडियो एक के बाद एक
पर उसकी कविताओं से थोड़ी कम
और मनमोहक अदाओं से ज्यादा जब-जब
चमक उठती हैं तुम्हारी शोख़ी भरी निगाहें
उस वक्त तलाशता रहता है तुम्हारा यह स्टुपिड
ख़ुद को उन चमक भरी तुम्हारी निगाहों में
टटोलते हुए तुम्हारे बचपन में तुमको लगाए गए
चेचक के टीके की दाग़ वाली स्लीवलेस से झाँकती तुम्हारी बाँहें...

निहारती हो सोशल मिडिया में जब-जब चिपके हुए
कई मनमोहक स्टेटस वाले चन्द चॉकलेटी चेहरे  
उन्हीं की दो-चार पंक्तियों पर जबरन चिपकायी हुई 
या कुछ उम्रदराज़ पर ... मनचले शायरों की रूमानी शायरी
कुछ अपने मनपसन्द ग़ज़लकारों की ग़ज़लें
या फिर ठहरती हो पढ़ने कुछ पोस्ट भी अतुकान्त रचनाओं वाले
मिले फ़ुर्सत के पलों में मानो गुम हो उनमेंं डूब-सी जाती हो ..
मन ही मन मुदित हो मंद-मंद मुस्कुराती हो
अपनी गुदगुदाती प्रतिक्रियाएं और लाल दिल वाली स्माइली
उछालने की ख़ातिर मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियाँ दौड़ाती हो
उस वक्त बस डूब-सा जाता है ये तुम्हारा स्टुपिड
तुम्हारे चेहरे की रुमानियत भरी झील की गहराइयों में ...




Sunday, October 20, 2019

होठों के 'क्रेटर' से ...

मन के मेरे सूक्ष्म रंध्रों ...
कुछ दरके दरारों ...
बना जिनसे मनःस्थली भावशून्य रिक्त ..
कुछ सगे-सम्बन्धों से कोई कोना तिक्त
जहाँ-जहाँ जब-जब अनायास
अचानक करता तुम्हारा प्रेम-जल सिक्त
और ... करता स्पर्श
कभी वेग से .. कभी हौले-हौले ...
मन बीच मेरे दबे हुए
कुछ भावनाओं के गर्म लावे
कुछ चाहत के गैस और
साथ चाहे-अनचाहे
अवचेतन मन के अवसाद के राख
तब-तब ये सारे के सारे
हो जाना चाहते हैं बस .. बस ...
बाहर छिटक कर जाने-अन्जाने
आच्छादित तुम्हारे वजूद पर
होठों के 'क्रेटर' से
चरमोत्कर्ष की ज्वालामुखी बन कर ...