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Saturday, March 6, 2021

मन में ठौर / कतरनें ...

कई बार अगर हमारे जीवन में सम्पूर्णता, परिपूर्णता या संतृप्ति ना हो तो प्रायः हम कतरनों के सहारे भी जी ही लेते हैं .. मसलन- कई बार या अक़्सर हम अपने वर्त्तमान की अँगीठी की ताप को दरकिनार कर, उस से परे जीवन के अपने चंद अनमोल बीते लम्हों की यादों की कतरनों के बने लिहाफ़ के सहारे ऊष्मीय सुकून पाने की कोशिश करते हैं .. नहीं क्या !? ...

यूँ तो दर्जियों को प्रायः हर सुबह अपनी दुकान के बाहर बेकाम की कतरनों को बुहार कर फेंकते हुए ही देखा है, परन्तु कुछ ज़रूरतमंदों को या फिर हुनरमंदों को उसे बटोर-बीन कर सहेजते हुए भी देखा है अक़्सर ...

इन कतरनों से कोई ज़रूरतमंद अपने लिए या तो सुजनी बना लेता है या तकिया या फिर लिहाफ़ यानि रज़ाई बना कर ख़ुद को चैन, सुकून की नींद देता है या तो फिर .. कोई हुनरमंद इन से बनावटी व सजावटी फूल, गुड्डा-गुड़िया या फिर सुन्दर-सा, प्यारा-सा, मनलुभावन कोलाज (Kolaj Wall Hangings या Wall Piece) बना कर घर की शोभा बढ़ा देता है या किसी का दिल जीत लेने की कोशिश करता है, भले ही वो घर की दीवार ही क्यों ना हो .. शायद ...

अजी साहिब/साहिबा ! हमारी प्रकृति भी कतरनों से अछूती कहाँ है भला ! .. तभी तो काले-सफ़ेद बादलों की कतरनों से स्वयं को सजाना बख़ूबी जानती है ये प्रकृति .. है ना !? पूरी की पूरी धरती तालाब, झील, नदी, साग़र के रूप में पानी की कतरनों से अंटी पड़ी है। पहाड़, जंगल, खेत, ये सब-के -सब कतरन ही तो हैं क़ुदरत के .. या यूँ कहें की सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही सूरज, चाँद-तारे, ग्रह-उपग्रह जैसे विशाल ठोस पिंडों की कतरन भर ही तो हैं .. शायद ...

ख़ैर ! बहुत हो गई आज की बतकही और साल-दर-साल स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यपुस्तकों के आरम्भ वाली पढ़ी गयी भूमिका के तर्ज़ पर बतकही या बतोलाबाजी वाली भूमिका .. बस यूँ ही ...

अब आज की चंद पंक्तियों की बात कर लेते हैं .. आज के इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) युग में ये कहना बेमानी होगा कि मैं अपनी कलम की स्याही से फ़ुर्सत में लिखी डायरी के कागज़ी पन्नों से या पुरानी फ़ाइलों से कुछ भी लेकर आया हूँ। दरअसल आज की चंद पंक्तियाँ हमने अपने इधर-उधर यानि अपने ही इंस्टाग्राम (Instagram), यौरकोट (Yourquote) और फेसबुक (Facebook) जैसे सोशल मीडिया (Social Media) से या फिर गुमनाम पड़े अपने कीप नोट्स (Keep Notes) जैसे एप्प (App. यानि Application) के वेब-पन्नों (Web Page) से कतरनों के रूप में यहाँ पर चिपका कर एक कोलाज बनाने की एक कोशिश भर की है .. बस यूँ ही ...

वैसे यूँ तो धर्म-सम्प्रदाय, जाति-उपजाति, नस्ल-रंगभेद, देश-राज्य, शहर-गाँव, मुहल्ले-कॉलोनी, गली-सोसायटी (Society/Apartment) के आधार पर बँटे हम इंसानों की तरह हमने अल्लाह, गॉड (God), भगवान को बाँट रखा है। हम बँटवारे के नाम पर यहाँ भी नहीं थमे या थके, बल्कि भगवानों को भी कई टुकड़ों में बाँट रखा है। मसलन- फलां चौक वाले हनुमान जी, फलां बाज़ार वाले शंकर जी, फलां थान (स्थान) की देवी जी, वग़ैरह-वग़ैरह ... वैसे ही चंद बुद्धिजीवियों ने ब्लॉग, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और यौरकोट जैसे सोशल मीडिया वाले चारों या और भी कई उपलब्ध मंचों को भी निम्न-ऊँच जैसी श्रेणियों में बाँट रखा है .. शायद ... पर हम ऐसा नहीं मानते .. ये मेरा मानना भर है .. हो सकता है गलत भी/ही हो ... पर हम ने तो हमेशा इन सब का अन्तर मिटाना चाहा है, ठीक इंसानों के बीच बने अन्तर मिट जाने वाले सपनों की तरह .. शायद ... 

(१)

बदन पर अपने 

लाद कर ब्रांडों* को,

गर्दन अपनी अकड़ाने वालों, 

देखी है बहुत हमने तेरी क़वायद ...


बदन के तुम्हारे  

अकड़ने से पहले ही 

ब्रांडेड कफ़न बाज़ारों में कहीं 

आ ना जाए तेरे भी .. शायद ...

(*ब्रांडों - Brands.)


(२)

बैठेंगे कब तक तथाकथित राम और कृष्ण के भरोसे, 

भला कब तक समाज और सरकार को भी हम कोसें, 

मिलकर हम सब आओ संवेदनशील समाज की सोचें,  

सोचें ही क्यों केवल , आओ ! हर बुराई को टोकें, रोकें .. बस यूँ ही 


(३)

हिदायतें जब तक नसीहतों-सी लगे तो ठीक, पर ..

जब लगने लगे पाबन्दियाँ, तो नागवार गुजरती है।

सुकून देती तो हैं ज़माने में, गलबहियाँ बहुत जानाँ,

पर दम जो घुटने लग जाए, तो गुनाहगार ठहरती है।


(४)

साहिब ! नाचना-गाना बुरा होता है नहीं।

पुरख़े कहते हैं ... हैं तो यूँ ये भी कला ही।

कम-से-कम ... ये है मुफ़्तख़ोरी तो नहीं।

और वैसे भी तो है कला जहाँ होती नहीं,

प्रायः पनपता तो है वहाँ आतंकवाद ही .. शायद ...

(लोगबाग द्वारा कलाकार को "नचनिया-बजनिया वाला/वाली" या "नाटक-नौटंकी वाला/वाली" सम्बोधित कर के हेय दृष्टिकोण से आँकने के सन्दर्भ में।)


(५)

नीति के संग नीयत भी हमारी ,

नियत करती है नियति हमारी .. शायद ...


(६)

होड़ में बनाने के हम सफलता के फर्नीचर ,

करते गए सार्थकता के वन को दर-ब-दर .. शायद ...


(७)

पतझड़ हो या फिर आए वसंत

है साथ हमारा अनवरत-अनंत .. शायद ...


(८)

छोटे-से जीवन की 

कुछ छोटी-छोटी यादें ,

कुछ लम्हें छोटे-छोटे ...


ताउम्र आते हैं 

जब कभी भी याद 

मन को हैं गुदगुदाते .. बस यूँ ही ...


(९)

यहाँ काले कोयले की कालिमा भी है

और सेमल-पलाश की लालिमा भी है .. शायद ...

(झारखंड राज्य के धनबाद जिला के सन्दर्भ में)


(१०)

बौराया है मन मेरा, मानो नाचे वन में मोर,

अमराई में जब से यहाँ महक रहा है बौर।

भटक रहा था मन मेरा बनजारा चहुँओर,

पाया ठिकाना, पाकर वह तेरे मन में ठौर।

हर पल एहसास तेरा, मन खींचे तेरी ओर,

तन्हाई में अक्सर किया, ऐसा ही मैंने गौर .. बस यूँ ही ...


(११)

सिन्दूरी सुबह, बासंती बयार ...

सुगंध, एहसास, मन बेकरार .. बस यूँ ही ...


(१२)

मन तो है आज भी नन्हा, मासूम-सा बच्चा,

बचपन के उसी मोड़ पर है आज भी खड़ा,

अपने बचकाना सवाल पर आज भी अड़ा

कि उनका जुम्मा, हमारा मंगल क्यों है बड़ा.. शायद ...


【 #basyunhi #stupid #banjaarabastikevashinde #baklolkabakwas #bakchondharchacha 】








Tuesday, June 23, 2020

बाथरूम की दीवार पर ...

आपको याद हो शायद .. 22 मई' 2020 को अपनी एक पुरानी रचना - "मिले फ़ुर्सत कभी तो ..." और उसकी प्रस्तुति का वीडियो भी मैं ने अपने इसी ब्लॉग - "बंजारा बस्ती के बाशिंदे" पर साझा किया था, जिसमें विस्तार से "ओपन मिक या ओपन माइक ( Open Mic/Mike )" के अपने अनुभवों को विस्तार देने की कोशिश भर की थी।
उन्हीं ओपन मिक के मंचों में से एक ओपन मिक के मंच का एक एप्प भी है- योरकोट एप्प (YourQuote App) - जो स्व-अभिव्यक्ति का एक ऐसा मंच है जिस पर हम अपनी परफ़ॉरमेंस (प्रदर्शन/प्रस्तुति) की ऑनलाइन ऑडियो और विडियो बनाकर साझा कर सकते हैं .. लगभग यूट्यूब की तरह।
यह मंच या सुविधा हर्ष स्नेहांशु और आशीष सिंह नामक दो IIT,Delhi के पूर्व युवा छात्रों द्वारा 01मई' 2017 को  Yourquote Solutions Private Limited नामक आरम्भ की गई एक भारतीय स्टार्टअप (Startups) और गैर सरकारी संस्थान (Non-Govt. Company) के अंतर्गत काम करती है। हमारे लिए गर्व की बात है कि यह एक भारतीय एप्प है, जिसका मुख्यालय दक्षिणी दिल्ली में है।
ऑनलाइन के अलावा ये संस्थान रचनाकारों को समय-समय पर लगभग हर शहरों में ऑफलाइन मंच भी उपलब्ध कराती है, जहाँ रचनाकार अपनी रचना की प्रस्तुति देते हैं, और उस प्रस्तुति का वीडियो तैयार कर अपने एप्प पर डाल (upload) कर उसे प्रसारित भी करती है।
इसी मंच के तहत पटना में भी यदाकदा ओपन मिक होता रहता है। इसी के तहत 16.12.18 को पटना में होने वाले "YourQuote Open Mic" में मैंने अपनी एक रचना और कुछ चंद पंक्तियाँ भी पढ़ी थी, जिसे उनके द्वारा 05.02.19 को उनके एप्प पर डाला गया था। वैसे उस दिन की पढ़ी गई रचना युवाओं को लक्ष्य कर के लिखा गया था और जो कई चरणों में लिखे को जोड़ कर पूर्ण किया गया है, जिसका लिखित रूप और वीडियो, दोनों रूप में मैं अभी साझा कर रहा हूँ।
साथ ही कुछ चंद पंक्तियाँ भी जो प्रायः मंच-संचालन के लिए या बस यूँ ही ... भी लिखता रहता हूँ। इनमें से कुछ चंद पंक्तियाँ तो आज साझा किये गए वीडियो वाली प्रस्तुति में भी पढ़ा हूँ। तो आइये पहले शुरू करते हैं कुछ नयी-पुरानी चंद पंक्तियों से ... फिर आज की रचना/विचार- "तुम्हारे होठों पर" शब्दों में और फिर उसका वीडियो 
भी ...

चंद पंक्तियाँ ...
#
तमाम उम्र मैं हैरान, परेशान, कभी हलकान-सा, तो कभी, कहीं लहूलुहान बना रहा
मानो मुसलमानों के हाथों की गीता, तो कभी हिन्दूओं के हाथों का क़ुरआन बना रहा

#
अफ़वाह फैलायी है, गोरेपन के क्रीम वालों ने
वर्ना काला नमक, .. नमकीन होता नहीं क्या ?

#
मुखौटों का जंगल, डर लगता है आजकल
मिलते हैं हर बार, बस ... चेहरे बदल-बदल

#
बन्जारे हैं हम, वीराने में भी बस्ती तलाश लेते हैं
नजरों से आप दूर रहें, ख़्यालों में तो पास होते हैं

#
आज कुछ अभिमान-सा होने लगा है शायद
चलो .. अभी जरा श्मशान तक टहल आते हैं

#
रिहाई क्या ख़ाक हुई सनम, है ये भी तो एक सजा
कतर कर पर, कहती हो परिंदे को ... जा! उड़ जा।

#
कई खेमों में बँट गए, धर्मग्रंथों को पढ़ते-पढ़ते, हमारे शहर के लोग
पत्थर दिल हो गए हैं, पत्थर को पूजते-पूजते, हमारे शहर के लोग

                                   ●●●★●●●


अब आज की रचना/विचार शब्दों में .. इस रचना को पढ़ने के पहले अगर हमें रेशम के कीड़े का जीवन-चक्र का पता हो तो कुछ बातें ज्यादा छू पाएंगी। वैसे बच्चों या युवाओं को तो उनको उनके पाठ्यक्रम से मालूम है ही और आपको भी याद होना ही चाहिए और अगर ..नहीं तो अपने बाल या युवा संतान से एक बार जान लीजिए .. लार्वा, प्यूपा, कोकून, शहतूत, रेशम का कीड़ा वग़ैरह .. फिर आगे बढ़िए और ... अंत में वीडियो भी देखना मत भूलिए .. बस यूँ ही ...

तुम्हारे होठों पर ..
तुम्हारे होठों पर ..
जिह्वा पर ..
पिघले थे ..
फैले थे .. कभी मेरे होंठ
पिघलते आइसक्रीम के तरह।
फैली थी मेरी बाँहें
शहतूत की शाखाओं की मानिंद
और फिरीं थीं ..
सरकी थीं ..
तुम्हारी उंगलियाँ और ..
होंठ भी जिन पर
आहिस्ता-आहिस्ता
रेशम के लार्वा की तरह ...

ज़िन्दगी की अपनी
तमाम उलझनें
अनसुलझे सवाल ..
सुलझाया ..
समझाया ..
करती थीं तुम
करके इस्तेमाल मुझे
बीजगणितीय सूत्रों* की तरह।

वैसे .. आई तो थी तुम ..
ज़िन्दगी में मेरी
सुबह का ताज़ा
अख़बार बन कर
फिर अचानक .. यकायक ..
छोड़ा क्यों मुझे ..
बीते कल के
बासी अख़बार के तरह।
जिसे सजाया था
कभी तुमने माथे पर
अपनी लगायी बिंदी की तरह ...
फिर क्यों अचानक .. यकायक ..
चिपका दिया
बाथरूम की दीवार पर
लावारिस बेकार की तरह।

बोलो ना ! ...
बोलती क्यों नहीं ? ..
कहीं तुम ..
लार्वा से कोकून तो नहीं बन गई ? ...

( * - बीजगणितीय सूत्रों = Algebraic Formulas. )

अब जब अपना इतना क़ीमती समय दिया ही है आपने मुझे तो .. थोड़ा वक्त इस वीडियो को भी दे दीजिए ना .. प्लीज .. बस यूँ ही ...