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Monday, August 16, 2021

जलुआ नहीं जी, जलवे ...

झेल कर रोज़ाना सालों भर,
धौंस अक़्सर पुरुषों की कभी,
निकाला करती थीं महिलाएं,
शायद .. आज भी कहीं-कहीं,
मन की भड़ास, होकर बिंदास,
अंदर दबी कुंठाएँ, अवसाद भी, 
और कभी कभार मन की कसक।
अपने गले फाड़ती, कुछ पैरोडी गाती,
कुछ सुरी, कुछ बेसुरी,
ढोलक-चम्मच की थाप पर, 
गा-गा कर पुरुषों वाली माँ-बहन की,
ऐसी-तैसी करने वाली गालियाँ बेधड़क।
वर पक्ष की महिलाएं, वधू पक्ष के लिए,
शुभ तिलक के शुभ अवसर पर,
या फिर वर पक्ष के लिए, वधू पक्ष की महिलाएं,
बारातियों को सुना-सुना कर, उनके भोज जीमने तक।
भद्द पीटती थी, फिर तो सभी बारातियों की,
माँ, बहन, मौसी, चाची, फुआ, भाभी की,
करके सभी की ऐसी की तैसी मटक-मटक .. बस यूँ ही ... 

अबलाएं बन जाया करती थीं सबलाएं, 
एक रात के लिए कभी बारातियों के,
जाते ही वर पक्ष के घर से,
डोमकच या कहीं-कहीं जलुआ के बहाने ;
'कॉकटेल'-सी बन जातीं थी फिर तो ..
स्वच्छंदता और उन्मुक्तता की यकायक।
मिटा कर भेदभाव सारे ...
नौकरानी और मालकिनी की,
बन जाती थीं कुछ औरतें पहन कर, 
लुंगी, धोती-कुर्ता या फुलपैंट-बुशर्ट पुरुष वेश में ..  
कोई दारोग़ा, कोई डाकू,
कोई लैला, कोई मजनूं,,
कोई प्रसूता, कोई 'दगडर* बाबू',
कोई चुड़ैल, कोई ओझा-औघड़ ज्ञानी।
होती थीं फिर कुछ-कुछ ज्ञान की बातें,
दी जाती थी कभी-कभी .. खेल-खेल में,
कई यौन शिक्षा भी संग हास-परिहास के, 
कभी होती थीं पुरुषों वाली 
उन्मुक्त अश्लीलता भी बन कर मजाक .. बस यूँ ही ... 

पड़ती नहीं अब आवश्यकता
शायद रोज़ाना घुट-घुट कर,
अवसाद इन्हें मिटाने की ;
क्योंकि महिलाएं हों या लड़कियाँ,
हर दिन ही तो अब पहनती हैं,
पोशाक पुरुषों वाले ये कहीं-कहीं,
बड़े शहरों, नगरों या महानगरों में बिंदास।
बकती हैं पुरुषों वाली गालियाँ भी,
खुलेआम धूम्रपान, मद्यपान जैसी मौज़,
करती हैं अधिकतर .. 
पुरुषों वाली ही, हो बेलौस।
औरतें वर पक्ष की होतीं भी तो नहीं,
घर पर अब बारात जाने वाली रात,
बल्कि चौक-चौराहे, सड़कों जैसे,
सार्वजनिक स्थलों पर, 
आतिशबाज़ी और बारातियों के बीच,
बैंड बाजे की फ़िल्मी धुन पर, 
बिखेरे जाते हैं अब तो
डोमकच या जलुआ नहीं जी, जलवे कड़क .. बस यूँ ही ...


【 * = दगडर = डॉक्टर ( एक आँचलिक सम्बोधन ). 】.










 



Saturday, November 30, 2019

शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?

अक़्सर देखता हूँ शहर में हमारे
"लगन" वाली रातों के .. प्रायः हर बारात में
आतिशबाजियों के साथ-साथ में
उड़ती हैं धज्जियाँ चार-चार क़ानूनों की कैसे
एक ही साथ समक्ष अपने सभ्य समाज के ...
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

उम्र भर की कमाई लुटाता कहीं मार कर मन
कुछ करते मन से भी दो नम्बरी कमा कर धन
पर कन्या का पिता फिर भी करता करबद्ध नमन
और रोता है "दहेज़ निषेध अधिनियम,1961"
कहीं बंद क़ानूनों की किताबों में सुबक कर
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

भौंडी नागिन नाच .. भौंडे ऑर्केस्ट्रा के गाने
"डेसीबेल" से बेख़बर लाउडस्पीकर .. बैंड-बाजे
जिस राह से गुजरते करते शोर-शराबे
आग .. धुएँ .. शोर .. बिखेरते जलते पटाखे
संग-संग  "ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000" और
"वायु अधिनियम, 1981" को सरेआम जलाते
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

टूटता है क़ानून चौथा जब टूटती हैं खाली
बोतलें शहर "पटना"में हमारे जो है
राजधानी भी राज्य बिहार की
कहते हैं लोग कि शायद है लागू यहाँ
"बिहार शराबबंदी क़ानून,2016" अभी भी
दिख जाते हैं लड़खड़ाते बाराती फिर भी
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...

परम्पराएं हैं शायद सदियों से बनाई पुरखों की
कहते हैं सुसभ्य, सुसंस्कारी, अधिकारी भी सारे
भईया! इसको तो कर्ज़ लेकर भी निभानी पड़ेगी
होते ही हैं सभी बुद्धिजीवी भी हर बार शामिल
क़ीमती लिबासों में बन कर इनमें बाराती
टूटते क़ानूनों के साथ है सभ्यता बेबस कसमसाती
फिर भी बुद्धिजीवी शहर सारा ख़ामोश क्यों है ?
"एक असभ्य कुतर्की" बारहा ये पूछता है ...