Showing posts with label दोहरी ज़िन्दगी. Show all posts
Showing posts with label दोहरी ज़िन्दगी. Show all posts

Wednesday, July 8, 2020

जानती हो सुधा ...

● सुबह का वक्त .. डायनिंग टेबल पर आमने-सामने श्रीवास्तव जी (♂) और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती श्रीवास्तव (♀)  ..  दोनों ही आज के ताज़े अख़बार के पन्नों और कॉफ़ी के कपों के साथ ..

♂ "कितनी बार कहा है कि मेरी कॉफ़ी में शुगर फ्री मत डाला करो।"

♀ "तो क्या, चीनी डाल दूँ? ताकि शुगर हाई हो जाए। ऐसे ही बिना मीठा खाए तो दो-ढ़ाई सौ से ऊपर रहता है शुगर आपका।"

♂ "अरे यार, तुम से सुबह-सुबह बहस कौन करे। कितनी बार कहा है कि मेरी कॉफ़ी में दोनों ही मत डाला करो। ना चीनी, ना शुगर फ्री और दूध भी नहीं .. मुझे ब्लैक कॉफ़ी पसंद है।"

♀ "छोड़ दीजिए उसको। लाइए कप .. दूसरा बना कर लाते हैं आपके लिए .. ब्लैक कॉफ़ी।"

♂ "रहने दो। छोड़ दो। अभी इसे ही पीने दो। आगे फिर कभी बनाना तो ध्यान रखना। अब ये बन गया तो, बर्बाद थोड़े ही न होगा। जाओ, अपना काम करो। "

♀ "आपकी पत्नी हूँ। इस तरह मुझे झिड़कना आपको शोभा देता है क्या ? बोलिए ! .. सुबह-सुबह इतने चिड़चिड़े क्यों हो रहे हैं आप ? रात में नींद पूरी नहीं हुई क्या ? या बी.पी. बढ़ी हुई है। जाकर लैब में चेक करवा लीजिए एक बार। या फिर रात में कोई बुरा सपना देख लिया है आपने, जो अभी तक मूड खराब है आपका।"

♂ "हाँ , ऐसा ही समझ लो।"

♀ "बिना सपना जाने, कैसे समझ लो भला, बोलिए ! .. बोलिए न .. ऐसा क्या सपना देख लिया है आपने। सुबह से आज मेरी दायीं आँख भी निगोड़ी लगातार फड़क रही है। राम जाने .. कोई अपशकुन न हो जाए .. "

♂ "अब सुबह-सुबह तुम भी क्या फिर कोई दकियानूसी बातें ले कर बैठ गई हो।"

♀ "फिर भी .. दकियानूसी ही सही .. पर बतलाइए तो सही कि कल रात क्या सपना देखे आप, जिस से अभी तक आपका मूड इतना खराब है ?"

♂ "कल सपने में देखा कि मैं मर गया हूँ और .. "

♀ "अरे-रे-रे .. मरे आपका दुश्मन .. और ? .."

♂ "और तुम कुछ माह बाद ही किसी और से शादी कर लेती हो। आपस में तुम दोनों इसी डायनिंग टेबल के पास बैठ कर चाय पीते हुए हँस-हँस कर बातें कर रही हो। वो आदमी तुम्हारी हथेली अपनी दोनों हथेली में दबा कर कह रहा था कि चलो, अच्छा हुआ ग्रहण टल गया।"

♀ "हे राम ! क्या अंट शंट देखते रहते हैं आप ? ... आयँ ?"

♂ "तुम भी तो मेरे दुनिया से चले जाने से बहुत खुश दिख रही थी।" -  (व्यंग्यात्मक और चुटीले लहज़े में).

♀ "और .. यही सब देख कर आपका मूड खराब है, है न ? सच-सच बतलाइएगा कि आप अपने मरने के सपने से दुःखी हैं या मेरी ख़ुशी से ?" (माहौल को कुछ हल्का करने के ख़्याल से चुटकी लेते हुए श्रीमती श्रीवास्तव ने श्रीवास्तव जी को छेड़ा।) "अभी कुछ ही दिन पहले तो आपने सोशल मिडिया पर अपनी एक कहानी की नायिका को ऐसे ही तो अपने पति के मरने के बाद अपने किसी पहचान वाले नायक से हाथों में हाथ डाल कर मिलते हुए और उस के मुँह से ग्रहण टलने वाली बात भी कहते हुए लिख कर दिखलाया था। लोगों ने आपकी कहानी के ऐसे सुखान्त को सराहा भी था, प्रतिक्रिया में वाह-वाह लिख कर। है न ?"

♂ "तो ... ?"

♀"तो क्या .. तो फिर आपको तो खुश होना चाहिए न, चिड़चिड़े होने की जगह .. कि .."

♂ "मतलब जो भी मन में आता है .. कुछ भी ऊटपटाँग बक देती हो .. एक बार सोचती भी नहीं कि .. "

♀ "अब इस में सोचना क्या है भला .. बोलिए न जरा .. मुझे लगा कि आपकी जिस कहानी की नायिका के अपने पति के मरने के बाद वाले कृत से सजे जिस सुखान्त (?) की जिसमें .. नायक द्वारा उस नायिका के पति के मरने को 'ग्रहण टलना' (?) बुलवाया गया .. और फिर जिसकी आपके प्रसंशक पाठकगण द्वारा इतनी भूरि भूरि प्रशंसा हो रही हो .. वह तो निश्चित रूप से कोई अच्छी ही बात होगी न ? ..  है कि नहीं ?"

♂ "जानती हो सुधा .. दरअसल हम सभी दोहरी ज़िन्दगी जीते हैं हमेशा।  समाज में किसी की बेटी-बहू के साथ बलात्कार हो तो हम फ़ौरन सहानुभूति में एक रचना पोस्ट कर देते हैं। अगर हमारी बेटी-बहू के साथ ऐसा होगा तो एक पंक्ति भी लिखने का होश होगा क्या ? नहीं न ? अगर सीमा पर कोई फौजी मरता है, फ़ौरन एक रचना हम चिपका आते हैं जा कर सोशल मिडिया पर, उसकी श्रद्धांजलि या उसके परिवार की सहानुभूति में। वही अगर हमारे घर के कोई नाते-रिश्तेदार वाले किसी फौजी की लाश का ताबूत घर आने वाला हो तो हमारे द्वारा सोशल मिडिया पर एक पंक्ति का लिखा जाना तो दूर .. सोशल मिडिया झाँकने तक का होश नहीं रहेगा। है न ?" (बोलते-बोलते श्रीवास्तव जी लगभग हाँफने लगे थे। वैसे भी वे बी. पी. के रोगी ठहरे।) "हम कई-कई काल्पनिक आदर्श नायकों-नायिकाओं से आदर्श बघरवाते रहते हैं .. पर जब अपनी बारी आती है तो .. कहते हैं न कि .. "

♀ "हाथी के खाने के दाँत और .. और दिखाने के और .."

♂ "हाँ .. और हम ये बोल कर अपनी पीठ भी थपथपाना नहीं भूलते कि .. जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि .."

♀ "हम चले किचेन में .. देर हो रही है। ये रवि .. कवि आप ही समझते रहिए। हमको इन सब से क्या लेना-देना भला।"

♂ "तुम्हारी रसोई किसी रचनाकार के रचना से कमतर है क्या .. बोलो ! .. सोचो न जरा कि .. अगर जो पेट न भरा हो तो कविता से पहले पतीला और प्लेट ही सूझेगा इंसान को .. चाहे वो कितना भी बुद्धिजीवी हो .. है न सुधा ?" ●



Friday, October 4, 2019

रामलीला है शुरू होने वाली ...

दशहरे में इस साल भी हो रही होगी वहाँ रामलीला की तैयारी
सोचा घूम आऊँ गाँव का मेला भी साथ-साथ अबकी बारी
सबसे मिलना-जुलना भी हो जाएगा ..
थोड़ा हवा-पानी भी बदल जाएगा
जब चढ़ने गया रेल ... देखा जान-सैलाब का रेलमपेल
रेलगाड़ी की श्रेणियों - सामान्य से लेकर प्रथम श्रेणी तक - जैसी ही
है .. मानो समाज में जनसमुदाय के वर्गीकरण का खेल
साथ ही देखा कि स्टेशन के बाहर और प्लेटफार्म की दीवारें
राज्य की प्रतिनिधित्व करती लोक कलाकृत्ति से थी सुसज्जित
पर अंदर डब्बे के टॉयलेट की दीवारों पर उकेरी चित्रकारी
कर रही थी कभी उत्तेजित .. तो कभी लज्जित

अब मुख्य मुद्दे पर आ जाए बात .. तो है अच्छी
संक्षेप में कहूँ तो बस .. रामलीला है शुरू होने वाली
मैं उन दर्शकों के भीड़ का हूँ एक हिस्सा .. जहाँ हुई है ये इक्कट्ठी
मंच के पीछे नेपथ्य में चल रही है कलाकारों की तैयारी
हनुमान बना है बमबम हलवाई हथेली पर है खैनी मल रहा
राम बने रामखेलावन भईया का होंठ है बीड़ी का सुट्टा मार रहा
सीता बनी ... नहीं - नहीं बना ..
गाँव का ही गोरा-चिट्टा चिकना-सा लौंडा
रमेश ... जो है चबा रहा पुड़िया पर पुड़िया गुटखा
लक्ष्मण बना समसुद्दीन दर्जी किसी से मोबाइल पर है कह रहा -
 " शब्बो ! अब शुरू होने वाली है रामलीला .. तुम आ गई हो ना !? तुम देखोगी तो मैं अपना अभिनय अच्छा से कर पाउँगा अदा
वर्ना हो सकता है कोई डायलॉग ही भूल जाऊँगा "
रामदीन बना दशरथ अपनी घनी मूंछों पर सफ़ेद चढ़वा कर चूना
है अपने चेहरे पर बुढ़ापा का रंग दे रहा
क्योंकि क़ुदरत ने नहीं चढ़ाई है अभी उसके मूंछों या बालों पर
अपनी सच्ची और पक्की सफ़ेदी
सब के सब व्यस्त हैं .. सब के सब मस्त हैं ...
रामलीला के कलाकार भी .. जमा हुए सारे दर्शक भी ...
दर्शकों में भी कई सेवन करते हुए सिगरेट , बीड़ी या खैनी
हैसियत और लत के मुताबिक हैं दिख रहे अपनी-अपनी

मंच का पर्दा उठता है थोड़ी देर बाद ही
आगमन होता है राम का .. साथ में सीता और लक्ष्मण भी
सभी श्रद्धा से नमन करते हैं अपने-अपने सिर को झुका
उस राम के आगे .. हाँ .. हाँ .. उस राम के आगे ...
जो अभी-अभी मंच के पीछे बीड़ी का सुट्टा था मार रहा
मेरा अबोध मन तभी कुलबुलाया
और मुझे से ही तड़ से जड़ दिया एक सवाल बच्चों-सा
ना .. ना .. कौन बनेगा करोड़पति वाला नहीं
बस .. कर दिया एक सवाल बच्चों-सा
मचलता-सा पूछा - ......
" हम सभी क्या प्रत्यक्षतः -- भारतीय रेल के प्लेटफार्म की तरह
या फिर रामलीला के मंच की तरह और ...
अप्रत्यक्षतः -- मन में रेल के डब्बे के टॉयलेट पर उकेरी चित्रकारी
और रामलीला वाले मंच के नेपथ्य की तरह
अक़्सर दोहरी ज़िन्दगी नहीं जीते हैं क्या !?
एक नहीं ... कई-कई दोहरी ज़िन्दगी नहीं जीते हैं क्या !???