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Friday, August 30, 2019

चन्द पंक्तियाँ - (१४) - बस यूँ ही ...

(1)* नंगे अहसास
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हर अहसासों को
शब्दों का पोशाक
पहनाया जाए
ये जरुरी तो नहीं ...

कुछ नंगे अहसास
जो तन्हाई में
बस 'बुदबुदाए'
भी तो जाते हैं ...

(2)* रंगीन कतरनों में
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दर्जियों के
दुकानों से
रोज़ सुबह
बुहार कर
बिखेरे गए
सड़कों पर
बेकार
रंगीन
कतरनों में ...
अक्सर
ढूँढ़ता हूँ
पंख कतरे
अधूरे
बिखेरे
रंगीन
सारे सपने अपने ...

(3)* ज़ीने-सी
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आजकल एक
"ज़ीने"-सी
"जीने"
लगे हैं
शायद हम ...

अक़्सर तुम्हारे
अहसासों में
कभी 'उतर'
आता हूँ मैं ...

कभी 'चढ़'
आती हो
मुस्कुराती हुई
ख़्यालों में
मेरे तुम ...