Wednesday, January 14, 2026

'एस फॉर सन' ...



कहते थे बचपन में अम्मा-बाबू जी 
कि उगता है सूरज पूरब से
और डूबता पश्चिम में।
ऐसा ही था तब दिखता भी,
ऐसा ही था कुछ लगता भी।

फिर आयी बारी अपने पढ़ने की,

स्कूल गए .. 'एस फॉर सन' पढ़ा भी।

पता चला कुछ फिर आगे भी कि 

सूरज तो है स्थिर जगह पर अपनी,

परिक्रमा तो लगाती है पृथ्वी ही।


आगे फिर बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि 

बदलता तो है जगह अपना सूरज भी। 

वो भी .. साल भर में बारह-बारह बार जी।

कहते हैं पंडित या खगोलशास्त्री 

और हम सभी भी जिसे संक्रांति।


फिर दुनिया के ज्ञानियों से ज्ञान मिला

कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन ही।

अपने व सगे ही क्यों भला .. साथ तो तन भी 

छोड़ ही तो जाता है हमारा .. कभी-ना-कभी।

लगा फिर तो बौना .. बदल जाना यकायक तेरा .. बस यूँ ही ...

6 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द शनिवार 31 जनवरी , 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी ! .. सादर नमन सह आभार आपका .. हमारी बतकही को अपने मंच पर स्थान देने के लिए ...🙏

      Delete
  2. सत्य उकेरती रचना - खूब

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी ! .. सादर नमन संग आभार आपका ...

      Delete
  3. Replies
    1. जी ! .. सादर नमन संग आभार आपका ...

      Delete