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Sunday, June 6, 2021

राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-३).

अगर आपने अब तक हमारी बतकही झेलने की हिम्मत रखी है, तो अब "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-३)". के तहत अपनी बतकही आगे बढ़ाते हुए, जय संतोषी माँ फ़िल्म से जुड़ी और भी रोचक और अनूठी बातों के साथ फिल्मों के सम्मोहन वाले असर के विराट रूप की बातें करते हैं।

पहले इसके सम्मोहन की बात करते हैं। वैसे तो प्रायः फिल्मों को या इस की बातों को हम केवल मनोरंजन का साधन मात्र मानते हैं, परन्तु इसके सम्मोहन वाले असर के विराट रूप का अनुमान तब होता है .. जब हम अपनी एक नज़र दक्षिण भारतीय राजनीति के इतिहास से अब तक के पन्ने टटोलते हैं। दरअसल फिल्मों के शुरूआती दौर में तमिल कलाकारों ने बहुत सारी फिल्मों में पौराणिक कथाओं के किरदारों को निभाया था। जिस के कारण जनता के बीच उनकी छवि धार्मिक भावनाओं से भरी हुई बनती चली गयी। नतीज़न तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों की फ़ेहरिस्त में सी एन अन्नादुराई, एम करूणानिधि, एम जी रामाचंद्रन, उनकी धर्मपत्नी-जानकी रामाचंद्रन, जयराम जयललिता (अम्मा) का नाम और आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव का नाम एक के बाद एक जुड़ना, दक्षिण भारतीय जनता पर फिल्मी सम्मोहन के असर का ही एक सशक्त उदाहरण है। यूँ तो उत्तर भारत में भी फिल्मी दुनिया से अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी, जया प्रदा, जया भादुड़ी, मनोज तिवारी, स्वरा भास्कर जैसे नाम जुड़े तो जरूर, पर वो रुतबा नहीं हासिल कर पाए कि उन में से कोई मुख्यमंत्री बन सकें। दक्षिण भारतीय फ़िल्म उद्योग (South Film Industry) के चिंरजीवी और पवन कल्याण जैसे फिल्मी कलाकारों ने तो अपनी अलग नयी राजनीतिक दल तक बनाने की हिम्मत दिखायी। अभी कमल हासन और रजनीकांत भी इसी तालिका में जुड़ते दिख रहे हैं।

फिल्म के तिलिस्मी असर के बारे में तब घर के बुज़ुर्गों का कहना था कि आज हमारे बीच हर साल सावनी पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला रक्षाबन्धन का स्वरुप आज के जैसा नहीं था। तब के समय उस दिन घर पर केवल पंडित (जी) आते थे और घर के सभी सदस्यों को रक्षा कवच के नाम पर मौली सूता कलाई पर बाँध कर, प्रतिदान के रूप में आस्थावान भक्तों के सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुरूप दिए गए दक्षिणा को ले कर वापस चले जाते थे। पर बाद में बलराज साहनी और नन्दा अभिनीत छोटी बहन (1959) जैसी फिल्मों के शैलेन्द्र जी के लिखे और लता जी के गाए - "भैया मेरे, राखी के बंधन को निभाना, भैया मेरे, छोटी बहन को न भुलाना, देखो ये नाता निभाना, निभाना, भैया मेरे..." - जैसे मन को छूते गीतों से सम्मोहित (Hypnotize) होने के कारण राखी का त्योहार आज वाले स्वरूप में धीरे-धीरे बदलता चला गया। साथ ही, बहन द्वारा राखी, मिठाई और भाई द्वारा बदले में दिए जाने वाले उपहार; सब मिलाकर आज इस राखी के त्योहार ने भारत को करोड़ों का बाज़ार बना दिया है। ठीक इस वैलेंटाइन डे (Valentine's Day) की तरह जो बाहर से आकर सोशल मीडिया की सीढ़ी चढ़ते हुए, चोर दरवाज़े से हमारे देखते-देखते हमारे बीच आ कर डेरा जमा चुका है।
ये सब परिवर्त्तन बस वैसे ही होता चला गया, जैसे हमारे बुज़ुर्गों ने विदेशों से आने वाली चाय को आने का मौका दिया, तो हमारी युवा पीढ़ी ने चाऊमीन, मोमो, पिज़्ज़ा को बाहर से आने दिया। देखते-देखते ही देश में ही सिगरेट, शराब, पान, खैनी (तम्बाकू) के अलावा गुटखा का भी सेवन होने लगा। अब तो नए व्यसन- ड्रग्स (Drugs) की भी लम्बी फ़ेहरिस्त बन गई है। पर इनके आने में सिनेमा का योगदान कम रहा है .. शायद ...
फ़िल्मों का ही छोटा पर्दा वाला रूप शायद हमारे-आपके घरों में टेलीविजन का पर्दा बन कर आया हुआ है। इसलिए इसके सम्मोहन भी फिल्म जैसे ही हैं। नयी पीढ़ी को तो शायद याद या पता भी ना हो, पर आप अगर अपने जीवन के चार-पाँच दशक या उस से ज्यादा गुजार चुके हैं, तो इसका एक सशक्त प्रमाण आपको अच्छी तरह याद हो शायद कि .. लोगबाग पहली दफ़ा रामायण टी वी सीरियल आने पर नहा-धोकर, अगरबत्ती-आरती जला कर सपरिवार देखने बैठते थे। कई लोग तो सीरियल खत्म होने के बाद ही अपना मुँह जुठाते (?) थे। यहाँ तक तो सनातनी श्रद्धा का प्रभाव कुछ-कुछ समझ में आता था। पर तब के आए हुए एक समाचार के अनुसार, तब एक बीयर बार (Beer Bar) में जीन्स (Jeans) पहने बैठे हुए अरुण गोविल (राम के पात्र को जीने वाले) पर पत्थर से कुछ लोगों ने हमला किया था, कि "आप राम हैं .. तो आप शराब का सेवन नहीं कर सकते।" ये उनके अनुसार उनके राम का अपमान था। च्-च् च् .. तरस आती है उन लोगबाग के नकारात्मक सम्मोहन पर कि वह भूल गए कि वह राम का अभिनय करने वाला एक कलाकार है, सच में राम नहीं। उस कलाकार का निजी जीवन भी है और वह हमारी तरह ही एक इंसान ही है, ना कि तथाकथित भगवान (राम) .. शायद ...
ये कह कर हम कोई पक्षधर नहीं हैं शराब पीने के। वैसे तो मद्यपान और धूम्रपान, दोनों ही बुरी लतें हैं। सेहत के लिए नुकसानदेह भी। प्रसंगवश ये भी बक ही दें कि कभी 'चेन स्मोकर' (Chain Smoker) रहे अरुण गोविल को राम के अभिनय करने के दरम्यान लोगों के गुस्साने पर सिगरेट की लत छोड़नी पड़ी थी, जो बाद में हमेशा के लिए छुट गई थी/है। यह है फिल्मों की फैंटेसी (Fantasy) भरी अजीबोग़रीब दुनिया.. शायद ...
फ़िल्म (Film) देखने के लिए सिनेमा हॉल (Cinema Hall) तक जाना तो होता ही था और उसकी अनुभूति भी किसी टूरिस्ट प्लेस (Tourist Place) घुमने जाने से कम नहीं होती थी। उस दौर में हमारे जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के लिए शैम्पू आज की तरह भारतीय बाज़ार में सहज उपलब्ध नहीं होता था, तो मेहा मेडिक्योर कम्पनी (Meha Medicure , Solan, Himachal Pradesh) के पीले रंग के रैपर (Wrapper) में लाल-कत्थई रंग के मशहूर स्वास्तिक शिकाकाई नामक सिर (बाल) और देह, दोनों को चमकाने के लिए, उपलब्ध 'टू इन वन' (2 in 1) साबुन से धुले हुए सिर के हवा में लहराते हुए बाल पर बारम्बार

हाथ फिराते हुए, घर के हैंगर (Hanger) में लटके या लॉन्ड्री (Laundry) के तह लगे कपड़ों में से चुनकर सबसे अच्छा वाला क्रिच लगा पोशाक पहन कर .. किसी समारोह में जाने के जैसा ही बन-ठन कर अभिभावक के साथ सपरिवार सिनेमा हॉल तक सिनेमा/फ़िल्म देखने के लिए जाया जाता था। तब मैटिनी शो (Matinee Show) यानी तीन बजे अपराह्न से छः बजे शाम तक वाली शो लोगों की पसंदीदा शो हुआ करती थी। कभी-कभार गर्मी के मौसम में ईवनिंग शो (Evening Show/शाम छः बजे से रात के नौ बजे तक) भी जाया जाता था। सिनेमा हॉल के टिकट काउंटर (Ticket Counter) पर टिकट उपलब्ध होने के अनुसार चार-पाँच रूपए की डी सी (DC - DressCircle) या तीन-चार रूपये की बी सी (BC - Balcony Class) या फिर दो-ढाई रुपए की स्पेशल क्लास (Special Class) की सीट (Seat) पर बैठ कर फ़िल्म देखी जाती थी। एक-डेढ़ रुपए वाली फ्रंट क्लास (Front Class या General Class) में तो पर्दे पर नायक-नायिका का मुँह टेढ़ा-सा और बड़ा नज़र आता था। उनमें प्रायः निम्न मध्यमवर्गीय लोग देखा करते थे। कभी-कभार धार्मिक या देशभक्ति फिल्मों को राज्य-सरकार द्वारा कर-मुक्त कर देने पर या बाद में बने स्थायी नियम के तहत विद्यार्थी रियायत दर (Student Concession Rate) पर, फिल्म देखने में कुछ अलग ही आनन्द मिलता था। 

पूरे साल भर में दो या तीन फ़िल्मों को देखने का मौका मिल जाता था तो बहुत होता था। स्कूल (School) में जो भी सहपाठी अपने अभिभावक के साथ किसी विगत छुट्टी के दिन फ़िल्म देख कर स्कूल आता था, तो उसके चेहरे पर एक अलग तरह की मुस्कान टपक रही होती थी। उस दिन जलपान की छुट्टी (Tiffin Time) में सारे खेल स्थगित कर के हम सारे सहपाठी मित्रगण उसको घेर के बैठ जाते थे और वह सिनेमा देख कर आया हुआ मित्र मानो किसी लोकप्रिय कुशल आर. जे. (रेडियो जॉकी/Radio Jockey) की तरह पूरी फ़िल्म का बखान कर देता था। हम सब भी रेडियो पर आकाशवाणी द्वारा विविध-भारती कार्यक्रम के तहत प्रसारित होने वाले हवामहल जैसे मनोरंजक नाटक की तरह सुन कर खुश हुआ करते थे। अगली बार कोई दूसरा छात्र या दूसरी छात्रा, वही सिनेमा देख कर आते तो वह अपने तरीके से सुनाता/सुनाती और पहले वाले की कमियों को गिनाता/गिनाती कि पहला वाला तो फलां-फलां सीन (Scene) या डॉयलॉग (Dialogue) के बारे में तो बतलाना ही भूल गया था। तब चॉकलेट-टॉफी के साथ उपहारस्वरूप मिलने वाले या अलग से बिकने वाले फ़िल्मी कलाकारों के तरह-तरह के पोस्टर और स्टीकर जमा करने का भी एक अलग ही शग़ल था।

दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा (Board Exam.) पास (Pass) हो जाने के बाद नदिया के पार या सावन को आने दो जैसी फ़िल्मों को दोस्तों के साथ देखने की अनुमति मिलने लगी थी। वैसे भी तब राजश्री प्रोडक्शन की फ़िल्में रूमानी होने के बावज़ूद भी पारिवारिक मानी जाती थीं। ऐसा इस लिए कह रहा हूँ क्योंकि रुमानियत को पाप मानते थे तब या आज भी अनेक जगहों पर। तभी तो 'ऑनर किलिंग' (Honour Killing) का मामला आज भी हमारे कई समाज में सिर उठाए खड़ा है। है कि नहीं ? .. ओमपुरी-स्मिता पाटिल की आक्रोश फिल्म से कला फिल्मों (Art Movies) का चस्का लगा था, जो आज तक बरकरार है।
तब कुछ लोगों में फ़िल्म आने के पहले दिन ही पहला शो को देखने का या एक फ़िल्म को कई बार देखने का एक शग़ल होता था। सिनेमा की टिकटें ब्लैक (गैरकानूनी तरीके से उचित मूल्य से ज्यादा क़ीमत पर क्रय-विक्रय) में बेचीं और ख़रीदी भी जाती थी। बचपन में जीवन का यह पहला अनुभव था, क़ानून और प्रशासन की आँखों के सामने होने वाली किसी कालाबाजारी की। संभ्रांत समाज में ऐसे लोगों की छवि अच्छी नहीं होती थी।
तब का सिनेमा हॉल आज के 'मल्टीप्लेक्स' (Multiplex) की तरह 'पुश बैक' (Push back) कुर्सी से सुसज्जित पुश बैक कुर्सी की तरह ही मखमली, आरामदायक और भव्य ना होकर; किसी कोल्ड स्टॉरेज (Cold Storage) की इमारत की तरह होता था। तब ना तो हॉल में ए सी (AC) होता था, बल्कि हॉल के दीवारों व छत पर लगे बड़े-बड़े पंखे चलते रहते थे। ना ही आज की तरह स्टीरियोफोनिक डॉल्बी साउंड सिस्टम (Stereophonic Dolby Sound System) थे। पर हाँ, ईस्टमैन कलर (Eastman Color) वाली रंगीन फिल्में बाद में आने लगी थीं।
आज के मल्टीप्लेक्स की तरह तब मंहगे पॉपकॉर्न (Popcorn) या समोसे जैसे मंहगे स्नैक्स (Snax) भी नहीं मिला करते थे। बल्कि लोग दस पैसे के टनटन भाजा (मतलब नमकीन मिक्सचर (Mixture)) या चवन्नी (पच्चीस पैसे) के समोसे खा कर, दो रुपए के 


दो सौ मिलीलीटर वाली बोतल में डीप फ्रीजर (Deep Freezer) वाला ठंडा कोका-कोला (Coca-Cola) या फैंटा (Fanta) पीकर आह्लादित हो जाते थे। साथ ही अंत में हॉल से निकलते वक्त बाहर ही बिक रहे दस पैसे की उसी फ़िल्म के गाने की किताब खरीद कर और वो किताब हाथ में लेकर, हम लोग जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों को रिक्शा पर बैठ कर घर लौटते हुए मुहल्ले में प्रवेश करने पर किसी खेल में जीते गए शील्ड (Shield) को लेकर लौटने का एहसास होता था। चेहरे पर एक मुस्कान लिए घर लौटते समय लगता था, मानो किसी पर्यटन स्थल का दौरा कर के लौट रहें हैं। चूँकि मनोरंजन (?) के लिए आज की तरह कई-कई टीवी चैनलों, सीरियलों या यूट्यूब की बाढ़ या यूँ कहें कि सुनामी-सी नहीं थी उस ज़माने में; तो साल-छः महीने में देखी गई एक फ़िल्म कई-कई दिनों तक दिमाग में तारी रहती थी और एक दिलचस्प चर्चा का विषय बना रहता था।

अब जय संतोषी माँ फिल्म की अपरम्पार महिमा की और भी बातें दुहरा लेनी चाहिए। उस फिल्म को दिखाने वाले सिनेमा घर-रूपक के मालिक ने हॉल के बाहर प्रांगण में ही बजाप्ता एक अस्थायी मन्दिर का निर्माण करवा कर सन्तोषी माता की एक विशाल मूर्ति की स्थापना करवा दी थी। शो के दरम्यान धोती और जनेऊ से सुसज्जित हुए एक तिलकधारी और तोंदधारी भी, पंडी (पंडित) जी वहाँ लगातार तैनात रहते थे। विशेषकर हर शो के शुरू होने के समय वह आरती करते और लोगों का चढ़ावा दोनों हाथों से बटोरते। बल्कि इस बटोरने के लिए दो-चार और लोग भी बहाल थे पंडी जी के सहयोग में, जो तथाकथित आस्थावान भक्तगणों के हाथों से अगरबत्ती, नारियल, फूल-माला, चुनरी-साड़ी, मुख्य रूप से प्रसादस्वरूप गुड़-चने के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की मिठाईयों के डिब्बे तथाकथित भक्तिभाव से ले-ले कर जमा करते थे।
वैसे धर्म-ग्रंथों में इन देवी की चर्चा कहीं है भी या नहीं, पता नहीं ; पर इनकी व्रत-कथा के आधार पर फिल्मकार ने फ़िल्म में इनको चूहे की सवारी करने वाले और हाथी के सिर वाले तथाकथित गणेश भगवान की बेटी बतलाया था। सिनेमा हॉल वाले मन्दिर के सामने महिलाओं और पुरुषों की अलग-अलग लम्बी-लम्बी कतारें लगी रहती थी। लोग आरती लेकर (?) और पंडी जी (?) से टीका लगवा कर ही सिनेमा देखने के लिए हॉल में प्रवेश करते थे। तीन साल से कुछ ज़्यादा ही बिहार की राजधानी पटना शहर के एक ही हॉल- रूपक में टिकी रही थी ये फ़िल्म। तब लोगों का अनुमान था कि इसके मालिक ने टिकट से ज्यादा तो चढ़ावे से कमाया होगा। वैसे इसके व्रत-कथा की पुस्तिका और कई आकारों में तस्वीरें छापने वाली प्रेसों ने भी खूब कमाया। जैसे टी वी सीरियल रामायण आने के बाद बाज़ारों के तथाकथित राम (तस्वीरों) में अरुण गोविल नज़र आने लगे थे/हैं, वैसे ही इस फ़िल्म के बाद संतोषी माता की तस्वीरों में अनिता गुहा नज़र आने लगी थीं।
कुछ जानकारों से पता चलता था कि अगले दिन उस अस्थायी मन्दिर की वही सारी एकत्रित पूजन सामग्रियाँ आसपास कुकुरमुत्ते की तरह नयी खुली हुई पूजन-सामग्री की उन्हीं दुकानों में कुछ कीमत कम कर के पुनः बेचने के लिए भेज दी जाती थी; जहाँ से भक्तगण इसको खरीद कर एक दिन पहले चढ़ावा चढ़ाते थे। जैसे .. अक़्सर ब्राह्मण लोग श्राद्ध के तहत दान में मिले तकिया-तोशक, कम्बल-दरी, बर्त्तन, खटिया-चौकी इत्यादि पुनः उन्हीं दुकानों को बेच देते हैं तथा हम और हमारा (अंध)आस्थावान समाज इस मुग़ालते में रहता है, कि पंडी जी इसका उपयोग/उपभोग करेंगे तो .. हमारे मृत परिजन के अगले जन्म लेने तक इसका तथाकथित सुख तथाकथित स्वर्ग में आसानी से मिलता रहेगा .. शायद ... 
तब तो मुहल्ले-शहर के हर तीसरे-चौथे हिन्दू घर में शुक्रवार को इनकी पूजा कर के उपवास रखने वाली महिलाएं मिल ही जाती थीं, जो सोलह शुक्रवार के बाद इस व्रत-कथा का उद्यापन करती थीं। उद्यापन के दिन शाम में आस-पड़ोस से पाँच, सात, नौ या ग्यारह की विषम संख्या में बच्चों को प्रसादस्वरूप शुद्ध शाकाहारी भोजन के रूप में खीर, पूड़ी, चना-आलू की सब्जी के अलावा कुछ मिठाइयाँ भी घर में बैठा कर बहुत ही आदरपूर्वक और श्रद्धापूर्वक खिलायी जाती थी। प्रत्येक शुक्रवार की तरह चना-गुड़ वाला प्रसाद भी मिलता था। साथ में एक-दो रूपये नक़द भी मिलते थे दक्षिणास्वरूप। बस, शर्त ये होती थी कि उस दिन कुछ भी खट्टा नहीं खाना होता था, वर्ना उस बच्चे को उस उद्यापन के भोज से वंचित रह जाना पड़ता था। क्योंकि मान्यताओं के अनुसार उस व्रत में खट्टा खाना पूर्णतः वर्जित था। खट्टा खा कर प्रसाद खाने से अनिष्ट होने का तथाकथित भय रहता था। पढ़ने का ज्ञान होने के बावज़ूद भी सत्यनारायण स्वामी की कथा को किसी पंडित(ब्राह्मण) से ही पढ़वाने जैसी कोई पाबन्दी इस व्रत-कथा में नहीं होती थी। इसी कारण से व्रत के दौरान प्रत्येक शुक्रवार को एक दिन में आस-पड़ोस के दो-तीन घरों में कथा पढ़ने के लिए बुलावा आने पर जाना पड़ता था। ऐसे में उद्यापन के दिन खिलाते समय कथावाचक पर विशेष ध्यान दिया भी जाता था।
आसपास किसी को किसी भी समस्या का हल चाहिए होता था, तो सब कहते- "सन्तोषी माता है ना ! बस .. सोलह शुक्रवार कर लो .. और मिल जाएगा समस्या का समाधान .. बस यूँ ही ... चुटकी बजा के हो जाएगा।" परन्तु कई व्रत करने वाली महिलाओं को विधवा होते भी देखा, अन्य और भी कई कारणों से उनके घर को उजड़ते देखा, उनके बच्चों को कई बार फेल होते देखा, मुक़दमा हारते हुए देखा, बीमार होते हुए देखा। वैसे तो आज हमारे समाज में वो सोलह शुक्रवार वाला परिदृश्य इतिहास बन चुका है। नयी पीढ़ी को तो इसके बारे में कोई भान या अनुमान भी ना हो .. शायद ...
ख़ैर ! .. बहुत हो गई फिल्मों और भाषाओं की बतकही .. अब "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-४)." में बकैती करते हैं, विस्तार से राजा आपका और तड़ीपार की .. बस यूँ ही ...


(तब तक आगामी सावनी पूर्णिमा की फैंटेसी (फंतासी) में अभी से खोने के लिए नीचे वाले गाने की लिंक को छेड़ भर दीजिए .. बस यूँ ही ...).



Saturday, June 5, 2021

राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-२).

अब आज "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-२)." की तख़्ती पर फ़िल्मों के बहाने अंजानी भाषाओं के अंजाने शब्दों के साथ-साथ अपनी कई आपबितियों की भी बतकही को आगे पसारने की कोशिश करते हैं।

हाँ .. तो .. "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-१)."  के तहत अन्त में बात हो रही थी- सन् 1993 ईस्वी में फ़िल्म ग़ुलामी की तरह ही संयोगवश मिथुन चक्रवर्ती की ही एक और फ़िल्म आने के बाद फिर से एक अंजान शब्द से पल्ले पड़ने की। वह शब्द था, उस फ़िल्म का नाम- "तड़ीपार"। दरअसल .. यूँ तो बचपन में शैतानी से किसी के सिर पर चपत लगाने के लिए स्थानीय बोली में तड़ी मारना शब्द तो सुना था। पर तड़ीपार का शाब्दिक अर्थ बाद में जानकारों से जान पाया कि इसका अर्थ होता है- निर्वासन यानी देश निकाला। मतलब किसी दोषी को उसके किसी गैरकानूनी कृत्य के लिए या फिर किसी विशेष संक्रमण से संक्रमित किसी रोगी को बलपूर्वक कुछ नियत समय के लिए या हमेशा-हमेशा के लिए घर, गाँव, मुहल्ले, शहर या देश से बलपूर्वक निकाल देना।

अंजान शब्दों की बातें करते-करते बीच-बीच में कुछ फ़िल्मी बातें भी होती रहें तो हमारा मनोरंजन होता रहता है। है कि नहीं ? ... दरअसल सत्तर-अस्सी के दशक तक हमारे कई समाज में, जिनमें एक हमारा समाज भी था, गाने में प्रयुक्त शब्द या फ़िल्म के नाम वाले शब्द का अर्थ एकदम से घर में या शिक्षक से पूछना या उसकी चर्चा करना, अनुशासनहीनता मानी जाती थी। तब फ़िल्में देख पाना भी आज की तरह इतना सहज़-सुलभ और आसान नहीं था। जितना कि आज .. स्मार्ट फ़ोन (Smart Phone) के स्क्रीन (Screen) पर उंगलियाँ दौड़ाने-फिसलाने भर से पलक झपकते ही स्क्रीन पर मनपसंद फ़िल्मों के गाने या कई सारी पूरी की पूरी फ़िल्में ही/भी हमारी इंद्रियों को फ़ौरन तृप्त करने में लग जाती हैं। उस दौर में तो अभिभावक की मर्ज़ी से फ़िल्म देखने की अनुमति मिलती थी, जो बच्चों या किशोरों के लिए अभिभावकों की नज़र में उचित होती थी। अधिकांशतः तो उन लोगों के साथ ही जाना होता था।
और फ़िल्में भी कैसी-कैसी ? .. बिहार (तत्कालीन बिहार = वर्तमान बिहार + वर्तमान झाड़खण्ड) की राजधानी पटना के सिनेमाई पर्दे पर दोबारा-तिबारा आयी हुई पुरानी श्वेत-श्याम फ़िल्में- दो बीघा जमीन, जिस देश में गंगा बहती है, मुग़ल-ए-आज़म, दोस्ती या फिर रंगीन फ़िल्में- वक्त (पुरानी), मदर इंडिया, हाथी मेरे साथी, आराधना, एक फूल दो माली, जानवर और इंसान, रानी और लाल परी, हक़ीकत (पुरानी), आँखें (पुरानी), अमन, अनुराग, अँगूर, खट्टा-मिट्ठा, गोलमाल (पुरानी), रोटी कपड़ा और मकान, शोर, जय संतोषी माँ जैसी फ़िल्में ही दिखलाने के लिए ले जाया जाता था।

इसके अलावा जब एक ही फ़िल्म, एक ही सिनेमा हॉल में तीन-तीन साल तक अपने चारों या पाँचों शो (Show) के साथ टिकी रह जाती थी, तो लोकप्रियता के कारण शोले जैसी फ़िल्म पटना के एलफिंस्टन (Elphinstone) सिनेमा हॉल में देखने के लिए मिल जाती थी। छुटपन में शोले हो या जिस देश में गंगा बहती है, इन फिल्मों के डाकूओं द्वारा की जाने वाली गोलीबारी या मारधाड़ वाले दृश्यों के आने पर हॉल ही में कुर्सी के नीचे डर कर रोते हुए छुप जाने वाली बात पर, आज ख़ासकर तब स्वयं पर हँसी आती है, जब कभी भी आज दो-तीन साल के बच्चों को भी मोबाइल पर गेम (Game) खेलते हुए आराम से 'ठायँ-ठायँ', 'ढ-ढ-ढ-ढ' कर के बन्दूक चलाते हुए देखता हूँ।

उन दिनों राजकपूर जी की मेरा नाम जोकर नामक फ़िल्म सामान्य से तुलनात्मक ज़्यादा लम्बी अवधि की फ़िल्म होने के कारण इसके होने वाले दो मध्यांतरों (Intervals) का भी एक अलग रोमांच और कौतूहल था, जिस कारणवश मेरा नाम जोकर को भी पटना के अशोक सिनेमा हॉल में देखने का अवसर मिल पाया था। पद्म विभूषण व साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एक प्रसिद्ध लेखक- आर॰ के॰ नारायण के उपन्यास पर आधारित फ़िल्म होने के कारण गाइड फ़िल्म को भी देखने का अवसर मिला था। तब "काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल" या फिर "ओ मेरे हमराही ! मेरी बाँह थामे चलना" जैसे गीतों का भावार्थ कम ही समझ में आता था। बस यह लगता था कि नायक-नायिका अभी खुश हैं, इसी कारण से दोनों ख़ुशी में गा रहे हैं-  "गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंज़िल, हाय ~~, कहीं बीते ना ये रातें, कहीं बीते ना ये दिन, .. गाता रहे मेरा दिल ..~~ ..."
सन् 1972 ई. में आयी मनोज कुमार की शोर फ़िल्म संयोग से पटना के तत्कालीन आधुनिकतम तकनीक से सुसज्जित अप्सरा नामक नए सिनेमा हॉल में आयी थी। यह पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान के दक्षिण की ओर, एक्सिबिशन रोड के उत्तरी छोर पर अवस्थित था। "था" इस लिए बोल रहा हूँ, क्योंकि वर्तमान में मल्टीप्लेक्स युग आने के कारण यह पटना के और भी कई पुराने गोदामनुमा सिनेमा हॉलों की तरह वर्षों से बन्द पड़ा है। अप्सरा सिनेमा हॉल के उद्घाटन के दिन वाले शोर फ़िल्म के इकलौते शो का निमंत्रण-सह-प्रवेश पत्र मेरे अभिभावक को भी मिला था। हमलोग गए भी शोर फ़िल्म, वो भी नए हॉल में पहला दिन, देखने के लिए। मध्यांतर (Interval) में समोसा-कचौड़ी और मिठाई से भरा एक-एक स्नैक्स-बॉक्स (Snax Box) भी सभी निमन्त्रित दर्शकगण को हॉल के मालिक की ओर से बाँटा गया। छः वर्ष की उम्र में तो अपनी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। मानो खुशियों का खज़ाना मिल गया था।

इसमें सोने पर सुहागा वाली एक और बात ये हुई थी कि इस फिल्म में ख़ान बादशाह के क़िरदार को निभाने वाले प्रेमनाथ जी उस दिन अपनी इंडियन एयरलाइन्स (Indian Airlines) की  फ्लाइट/उड़ान (Flight) में किसी तकनीकी कारण से बिलम्ब होने के कारण उस अप्सरा सिनेमा हॉल के पास के ही इंडिया होटल (India Hotel) में ठहराए गए थे। तब पटना का यह आलीशान (Posh)  होटल हुआ करता था। उस समय तो गाँधी मैदान में बीचोबीच खड़ा हो कर चारों ओर नज़रें घुमाने पर इकलौती सबसे ऊँची बिल्डिंग (Building) आरबीआई (RBI - Reserve Bank of India) की बिल्डिंग ही नज़र आती थी। पर आज तो चारों ओर के ज्ञान भवन और उसके प्रांगण में अवस्थित बापू सभागार व सभ्यता द्वार, श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल, ट्विन टॉवर-बिज़नेस सेंटर्स (Twin Tower-Business Centres), पाँच सितारा मौर्या होटल, दो-दो गगनचुम्बी बिस्कोमान भवन, जिनमें से एक के ऊपर एक रिवॉल्विंग रेस्टुरेन्ट (Revolving Resturant)- पिंड बालूची (Pind Balluchi), एलफिंस्टन (Elphinstone) और मोना सिनेमा के मल्टीप्लेक्स (Multiplex) वाली बिल्डिंग के समक्ष आरबीआई की बिल्डिंग तो मानो 'गुलिवर्स ट्रेवल्स' (Gulliver's Travels) के उस 'गुलिवर' के सामने 'लिलिपुट' की तरह प्रतीत होती है।

हाँ तो .. बातों-बातों में अप्सरा सिनेमा हॉल, शोर फिल्म और प्रेमनाथ जी की बातें कहीं और भटक गई। ख़ैर ! ... जब प्रेमनाथ जी को यह पता चला कि उनकी फ़िल्म शोर से ही यहाँ किसी नए हॉल का उद्घाटन हो रहा है तो, वह मध्यांतर में आकर अपनी अदा और आवाज़ के साथ हँसते हुए सभी को सम्बोधित किए थे। तब पटना की आबादी आज के पटना की तरह, गंगा नदी पर उत्तरी बिहार को पटना से जोड़ने वाले पुल- गाँधी सेतु को 1980 में चालू होने के बाद, घनी-बढ़ी आबादी वाली नहीं हुआ करती थी। तब भी और आज भी फ़िल्मी कलाकारों को देखना, उन से मिलना, हाथ मिलाना, ऑटोग्राफ (Autograph) लेना, अब तो सेल्फ़ी (Selfie) लेना भी एक सनक (Craze) तो है ही ना .. शायद ...

साहित्य की कोख़ से ही जन्मी फ़िल्में भी साहित्य की तरह ही किसी भी कोमल मन पर सहज़ ही अपनी गहरी छाप छोड़ जाती हैं। बचपन में देखी गई फ़िल्म- वक्त (बलराज साहनी वाली) का असर कुछ ऐसा पड़ा था बालमन पर; कि आज तक .. किसी भी बात पर रत्ती भर भी घमंड मन में पनपना चाहता भी है, तो वक्त फ़िल्म में "ऐ मेरी ज़ोहरा-ज़बीं तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हंसीं और मैं जवाँ .. तुझपे क़ुरबान मेरी जान, मेरी जान" ... वाले गाने के बाद वो अचानक आया क़ुदरती क़हर- भूकम्प की याद ताजा हो जाती है। इस फ़िल्म ने तभी से छुटपन में ही प्रकृति या समय से सहम कर जीना समझा दिया था। आज भी किसी भी बात पर गर्दन अकड़ाने की हिम्मत या नौबत नहीं आती है और ताउम्र आएगी भी नहीं या आनी भी नहीं चाहिए  .. शायद ...

और हाँ ... फ़िल्म जय संतोषी माँ फ़िल्म की तो कुछ अलग ही महिमा देखी गई थी। देश भर में हिन्दी भाषी अन्य राज्यों के शहरों-गाँवों का तो नहीं पता, पर बिहार की राजधानी पटना के रूपक सिनेमा हॉल का तो पता है, कि पर्दे पर जब-जब फ़िल्मी अवतार के रूप में तथाकथित संतोषी माता परंपरागत सिनेमाई "ढन-ढनाक" वाली आवाज़ (संगीत) के साथ अवतरित होतीं थीं .. अपनी दुखियारी भक्तिन की विपदा की घड़ी में उसके दुःख भरे गाने- "मदद करो हे संतोषी माता ~~~" की समाप्ति पर; तब-तब दर्शकगण में से अधिकांश लोगों द्वारा उनकी अपनी हैसियत और श्रद्धा के मुताबिक सिनेमा हॉल में पर्दे की तरफ, मतलब फ़िल्मी संतोषी माँ की तरफ, तत्कालीन प्रचलन वाले पाँच, दस, बीस, पच्चीस (चवन्नी), पचास (अठन्नी) पैसे या एक रुपए के सिक्के, फूल-माले उछाले जाते थे। कई बार पीछे से या ऊपर के डी सी, बी सी (DC, BC) क्लास (class) के दर्शकों द्वारा उछाले गए सिक्के अपनी रफ़्तार वाले संवेग से आगे बैठे हुए कई दर्शकों के कान या सिर चोटिल कर देते थे। लगभग प्रत्येक शो के बाद सिक्के हॉल में इतना ज़्यादा जमा हो जाते थे कि हर शो के बाद सारे सिक्के बुहार कर सिनेमा हॉल के कर्मचारियों द्वारा बोरे में भरे जाते थे। जिस कारण से हर अगला शो आधे घन्टे-पैंतालीस मिनट देर से ही शुरू हो पाता था।


 वैसे तो प्रायः फिल्मों को या इस की बातों को हम केवल मनोरंजन का साधन मात्र मानते हैं, परन्तु इसके सम्मोहन के असर के विराट रूप का अनुमान तो तब होता है .. जब हम अपनी एक नज़र ...... फ़िलहाल तो हम अपनी आँखों को थोड़ा विश्राम दे लें आज अभी और फिर कल मिलते हैं "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-३)". के तहत जय संतोषी माँ फ़िल्म से जुड़ी और भी रोचक और अनूठी बातों को लेकर। साथ ही फिल्मों के सम्मोहन वाले असर के विराट रूप की बातों के साथ .. बस यूँ ही ...

(तब तक अगर आपके पास समय हो तो गाइड फ़िल्म के इस लोकप्रिय और सदाबहार गाने से अपने मन के तार को छेड़ने के लिए इस की साझा की गई लिंक को छेड़ने की बस ज़हमत भर कीजिए ... .. बस यूँ ही ...)





Thursday, June 3, 2021

राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-१).

कुछ-कुछ ऊहापोह-सा है कि ... आज हम अपनी बतकही शुरू कहाँ से शुरू करें ? ... वैसे अगर हम वर्तमान परिवेश की बातें करें, तो ऐसे में परिहास का मि. इंडिया (Mr. India- एक फ़िल्म का नाम) हो जाना यानी मि. इंडिया की तरह अदृश्य हो जाना स्वाभाविक ही है .. शायद ...। क्योंकि जब आज का परिवेश परेशानियों के दौर से गुजर रहा हो, तो ऐसे में परिहास का गुजारा हो भी तो भला क्योंकर ? ..  ख़ैर ! .. बातों-बातों में फ़िल्म मि. इंडिया के ज़िक्र होने से ये ख़्याल आ रहा है कि क्यों ना .. मनोरंजन के साधनों में से एक साधन - फ़िल्मों की ही कुछ फ़िल्मी बातें कर ली जाएं। शायद .. आज के इस तनावग्रस्त अवसाद भरे क्षणों को कुछ राहत ही मिल पाए .. बस यूँ ही ...

आपने कभी भी किसी गाने के ऐसे मुखड़े को सुना या गाया-गुनगुनाया है क्या ? -

"जो हाल है मस्ती में, कौन है रंजिश, बेहाल बेचारा दिल है" -

शायद .. आपका जवाब "ना" हो और .. अगर आपका जवाब सच्ची-मुच्ची "ना" है, तो आप बिलकुल सही हैं। क्योंकि लगभग अपनी किशोरावस्था के बाद जब सन् 1985 ई. में "गुलामी" नाम की फ़िल्म अपने शहर के सिनेमा हॉल में आयी थी, तो उसके जिस गीत का मुखड़ा हम टीनएज (Teenage) के आख़िरी पड़ाव यानी उन्नीसवें साल में किसी तरह टो-टा कर (अनुमान लगा कर) गुनगुनाने या गाने की भूल भरी कोशिश कर रहे थे .. उस के बारे में बहुत सालों के बीत जाने के बाद जानकारों से जान पाया कि दरसअल उस गीत का मुखड़ा फ़ारसी भाषा में लिखा गया है और अंतरा हिन्दी में। उस लोकप्रिय गीत का वह फ़ारसी मुखड़ा कुछ यूँ है :-

"ज़े-हाल-ए-मिस्कीं, मकुन-ब-रन्जिश, बहाल-ए-हिज्र बेचारा दिल है" 

जिसका हिन्दी मतलब भी उन्हीं जानकारों से ही कुछ यूँ ज्ञात हुआ था कि :-

"मुझे रंजिश से भरी इन निगाहों से ना देखो क्योंकि मेरा बेचारा दिल जुदाई के मारे यूँ ही बेहाल है।"

इस फ़िल्म का यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ था; जो कि राग भैरवी पर आधारित था। जिसके संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल थे और गायिका-गायक थे लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार। जिसको फ़िल्मी पर्दे के लिए मिथुन चक्रवर्ती, अनीता राज और हुमा खान के साथ राजस्थान की पृष्ठभूमि में फ़िल्माया गया था। हुमा क़ुरैशी मत समझ लीजिएगा, क्योंकि उनका तो जन्म ही उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् 1986 ई. में हुआ था। आधिकारिक तौर पर इस लोकप्रिय गीत के गीतकार सम्पूर्ण सिंह कालरा उर्फ़ जाने-माने गुलजार साहब हैं। 
किसी गीत में इस तरह से मुखड़ा फ़ारसी में और अंतरा अन्य भाषा में रचने का एक अनूठा प्रयोग साहित्य जगत में शायद पहली बार नहीं किया था गुलज़ार साहब ने। बल्कि सदियों पहले तेरहवीं-चौदहवीं सदी (1253 - 1325) के दरम्यान ही सूफ़ी गीतों के रचयिता और एक अच्छे संगीतज्ञ अबुल हसन यमीनुद्दीन उर्फ़ अमीर ख़ुसरो जी ने, जिन्हें हिन्द का तोता और मुलुकशुअरा (राष्ट्रकवि) भी कहा गया है, फ़ारसी और ब्रज भाषा के सम्मिश्रण से एक अद्भुत और अनूठी रचना रची थी। इस पूरी रचना में पहली पंक्ति फ़ारसी में है, जबकि दूसरी पंक्ति ब्रज भाषा में .. जो आज भी एक मील का पत्थर प्रतीत होता है .. शायद ...
यूँ तो इस अनन्त ब्रह्माण्ड का एक अल्पांश भर ही है हमारी पृथ्वी .. जिस पर बसे हम इंसानों द्वारा अनुमानतः छः हजार से भी ज्यादा बोलने-लिखने वाली उपलब्ध भाषाओं को किसी भी एक व्यक्ति विशेष के लिए बोल-सुन पाना या जान-समझ पाना असम्भव ही होता होगा या यूँ कहें कि .. वास्तव में असम्भव ही है .. शायद ...
केवल एक भाषा मात्र ही क्यों .. वैसे तो विश्व भर में उपलब्ध विज्ञान या सामान्य ज्ञान के अलावा और भी विभिन्न प्रकार की कई-कई तकनीकों व ज्ञानों की जानकारी का दायरा भी इस ब्रह्माण्ड की तरह ही असीम-अनन्त जान पड़ता है। जितना भी हम जान-सीख जाएँ, पर हम अपनी गर्दन अकड़ाने के लायक नहीं बन सकते हैं कभी भी। क्योंकि हम ताउम्र अपनी अन्तिम साँस तक जितना कुछ भी जान-सीख पाते हैं ; वो सब विश्व के समस्त ज्ञान-भंडार की तुलना में नगण्य ही जान पड़ता है। सम्भवतः प्राकृतिक रूप से भी विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान को जान-समझ पाने की माद्दा हम में से किसी एक व्यक्ति विशेष के पास है भी नहीं .. शायद ...
ऐसे में .. अक़्सर जो बुद्धिजीवी लोग "मेरी भाषा - तेरी भाषा" जैसी बातें करते रहते हैं या हिन्दी-अंग्रेजी के सम्बन्ध में वैमनस्यता का राग अलापते रहते हैं या फिर जिनको आवश्यकतानुसार भी दूसरी भाषा का किया गया प्रयोग एक घुसपैठ की शक़्ल में दिखता है या दूसरी अन्य भाषओं के प्रयोग से अपनी भाषा का अस्तित्व खतरे में जान पड़ता है; उन सभी महानुभावों की सोच पर तरस खाने के लिए अमीर ख़ुसरो जी की यह रचना ही काफ़ी है  .. शायद ...

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, (फ़ारसी)
दुराये नैना बनाये बतियां | (ब्रज)
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान, (फ़ारसी)
न लेहो काहे लगाये छतियां || (ब्रज)

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
(फ़ारसी)
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां || (ब्रज)

यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं,
(फ़ारसी)
किसे 
पड़ी है जो जा सुनावे

पियारे पी को हमारी बतियां || (ब्रज)


चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान

हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह | (फ़ारसी)
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां || (ब्रज)

बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, गरीब खुसरौ |
 (फ़ारसी)
सपेट मन के, वराये राखूं
जो जाये पांव, पिया के खटियां ||
 (ब्रज)

इस रचना की शुरू की चार पँक्तियों -

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
दुराये नैना बनाये बतियां ।
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऐ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां ।।

- का अर्थ इसके जानकारों के अनुसार है :-

"आँखें फेर कर और बातें बना के मेरी बेबसी को नजरअंदाज मत करो। जुदाई की तपन से जान निकल रही है। ऐसे में तुम मुझे अपने सीने से क्यों नही लगा लेते ?"

कुछ जानकारों के अनुसार गुलज़ार साहब के मन को उस लोकप्रिय गीत के मुखड़े के लिए अमीर ख़ुसरो जी की वर्षों पुरानी इसी रचना ने कुछ हद तक या शायद बहुत हद तक अभिप्रेरित किया था।
ख़ैर ! .. इन बातों में जो भी सच्चाई हो ..  फ़िलहाल बात हो रही है फिल्मों के बहाने, अंजान भाषा या शब्दों की .. जिनके अर्थ नहीं जान पाने से उनका अर्थ और भाव नहीं जान पाते हैं हम। अपनी भाषा से इतर अन्य भाषाओं की जानकारी नहीं होने की कुछ ऐसी ही विवशता होती रहती हैं, कभी न कभी हमारे जीवन में हमारे साथ।
परन्तु उस दौर में (1998 में गूगल के आने के पहले तक) अनसुलझे सवालों को सुलझाने के लिए गूगल नामक कोई सहज-सुलभ माध्यम उपलब्ध नहीं था।  जिस से पलक झपकते ही किसी भी तरह की जानकारी प्रायः हासिल की जा सकती हो। तब तो जिस भाषा का शब्दकोश पास में नहीं होता था, तो उस भाषा के किसी भी अंजान शब्द का अर्थ जानने के लिए हमें अपने अभिभावक, शिक्षक या मुहल्ले के किसी अभिभावकस्वरुप जानकार व्यक्ति पर ही निर्भर होना पड़ता था।

एक बार एक और ऐसा ही अंजाना शब्द पल्ले पड़ा था, जिसका अर्थ पहली बार में पल्ले नहीं पड़ा था ; जब वह शब्द सुना था। वह भी तब, जबकि सन् 1993 ईस्वी में फ़िल्म ग़ुलामी की तरह ही संयोगवश मिथुन चक्रवर्ती की ही एक फ़िल्म आयी थी - " ...... " ... ख़ैर ! .. अब उस फ़िल्म और उस से जुड़े अंजाने शब्द की बातें "राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-२)." के लिए छोड़ते हैं और अगली बार मिलते हैं .. बस यूँ ही ...

(तब तक आप नीचे साझा किए गए लिंक से फ़ारसी मुखड़े वाले उस लोकप्रिय गीत से रूबरू हो लीजिए , अगर समय हो तो .. 

"ज़े-हाल-ए-मिस्कीं, मकुन-ब-रन्जिश, बहाल-ए-हिज्र बेचारा दिल है").