Wednesday, January 14, 2026

'एस फॉर सन' ...



कहते थे बचपन में अम्मा-बाबू जी 
कि उगता है सूरज पूरब से
और डूबता पश्चिम में।
ऐसा ही था तब दिखता भी,
ऐसा ही था कुछ लगता भी।

फिर आयी बारी अपने पढ़ने की,

स्कूल गए .. 'एस फॉर सन' पढ़ा भी।

पता चला कुछ फिर आगे भी कि 

सूरज तो है स्थिर जगह पर अपनी,

परिक्रमा तो लगाती है पृथ्वी ही।


आगे फिर बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि 

बदलता तो है जगह अपना सूरज भी। 

वो भी .. साल भर में बारह-बारह बार जी।

कहते हैं पंडित या खगोलशास्त्री 

और हम सभी भी जिसे संक्रांति।


फिर दुनिया के ज्ञानियों से ज्ञान मिला

कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन ही।

अपने व सगे ही क्यों भला .. साथ तो तन भी 

छोड़ ही तो जाता है हमारा .. कभी-ना-कभी।

लगा फिर तो बौना .. बदल जाना यकायक तेरा .. बस यूँ ही ...

Sunday, January 11, 2026

जगराता ...


सुबह लगभग सवा पाँच बजे पटना के गाँधी मैदान में सुबह की सैर के लिए हर आयु वर्ग के लोगों के आने-जाने से पनपी चहल-पहल में से ही एक व्यक्ति .. लगभग पैंतीस वर्षीय पवन पर .. मोटा-मोटी साठ वर्षीय सिद्धार्थ जी की नज़र पड़ते ही ...

सिद्धार्थ जी - " सुप्रभातम् पवन बेटा "

पवन - " सुप्रभातम् 'अँकल' जी " 

वैसे तो पवन और सिद्धार्थ जी आपस में ना तो पड़ोसी हैं, ना सगे-सम्बन्धी हैं, ना ही स्वजातीय और ना ही एक ही नौकरी-पेशे में हैं। परन्तु .. दोनों ही लोगों का परिवार बिहार राज्य के अंगिका भाषी भागलपुर जिला के पीरपैंती गाँव का ही रहने वाला है। 

दरअसल .. कहीं पर भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से व्याप्त क्षेत्रवादिता के माहौल में जब एक ही स्थान के दो निवासी अन्य स्थानों पर प्रवास या पर्यटन के दौरान संयोगवश मिलते हैं तो .. उनकी आपस में घनिष्ठता प्रायः बढ़ ही जाती है। चाहे वह स्थान विशेष अपने शहर ही में कहीं जाने पर .. मुहल्ला, 'सोसाईटी', या गाँव के सन्दर्भ में हो या यही क्षेत्रवादिता अपने शहर या गाँव से देश के भीतर कहीं भी जाने पर जिला, शहर, गाँव या राज्य के सन्दर्भ में हो या फिर देश से बाहर विदेशों में कहीं भी जाने पर अपने देश के सन्दर्भ में हो .. वो वहाँ चाहे सैलानी के रूप में हों या प्रवासी के रूप में हों .. ऐसी परिस्थितियों में समान भाषा-भाषी का होना भी सम्बन्ध को जोड़ने में गोंद-सा असर करता हैं .. शायद ...

सिद्धार्थ जी - " पवन बेटा .. आज तुम अकेले आये हो सुबह की सैर करने .. तुम्हारे पापा और तुम्हारी वो .. छुटकी बिटिया नहीं आयी .. वो .. क्या नाम है उसका .. ? "

पवन - " समीक्षा "

सिद्धार्थ जी - " अरे हाँ, हाँ .. समीक्षा .. उम्र की वज़ह से .. कभी-कभी .. छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे नाम तक भी याद ही नहीं रह पाते .. हाँ तो .. आज वो .. समीक्षा बिटिया भी नहीं आयी ? .. "

पवन - " 'अँकल' कल पड़ोस के एक घर में सुबह से ही पूजा-पाठ शुरू हुआ और .. सारी रात 'जगराता' होता रहा .. बड़े- बड़े 'डी जे-स्पीकर' पर सुबह से लेकर सारी रात भर फ़िल्मी गाने की 'पैरोडी' वाले भजनों की और वाद्य यंत्रों की तेज़ कानफोड़ू आवाज़ों से घर की खिड़की के काँच और रसोई की 'कटलरी' व 'कप-प्लेट' तक खड़खड़ाते रहे .. "

सिद्धार्थ जी - " ओह ! .. तो ? .. "

पवन - " तो क्या अँकल .. हम सभी लोग शोर की वज़ह से नहीं सो पाए सारी रात .. "

सिद्धार्थ जी - (गुस्सा व चिंतित भाव के साथ) " वो तो स्वाभाविक है बेटा .. यही तो है .. किसी भी धर्म का अपभ्रंश स्वरूप और रीति-रिवाज़ के मुखौटों में हमारे बुद्धिजीवियों के समाज की अंधपरंपराओं की विडम्बना .. लोगों ने मानसिक व आध्यात्मिक जागरण को अपभ्रंश स्वरूप में परिवर्तित कर के .. रात भर जाग कर और लोगों को भी जगा कर तथाकथित पूजा के नाम पर शोर मचाने को ही जागरण या जगराता मान लिया है। "

पवन - " आप तो जानते ही हैं .. पापा दिल के मरीज़ हैं .. उनकी कल शाम से ही तबियत ख़राब है और इन दिनों समीक्षा की 'एग्जाम' भी चल रही है .. वह भी कल ना तो ढंग से पढ़ पायी और ना ही सो पायी .. 'मिसेज़' भी सुबह से .. "

सिद्धार्थ जी - " .. च् .. च् .. "

पवन - " हम भी तो अभी 'मॉर्निंग वॉक' के लिए नहीं आए हैं  'अँकल' जी। बल्कि .. आदतन केवल 'स्ट्रीट डॉग्स' को सुबह-सुबह रोटी खिलाने यहाँ आ गए हैं .. हमारा भी शरीर सुस्त लग रहा है .. "

सिद्धार्थ जी - " च् .. ख़ैर ! .. चलो .. आज मेरी भी सुबह की सैर 'कैंसिल' .. चलो .. चल कर तुम्हारे घर .. पहले तुम्हारे पापा की ख़ैर- ख़बर लेते हैं। "

अब दोनों लोग, सिद्धार्थ जी और पवन, गाँधी मैदान के पश्चिमी 'गेट' से निकल कर छज्जूबाग की तरफ़ पवन के घर की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। 

जाते-जाते उन्हें गाँधी मैदान के पश्चिमोत्तर छोर पर तथाकथित महात्मा गाँधी की मूर्ति के चबूतरे के पास कुछ लोगों की झुण्ड बैठी दिखाई दे रही है। वो लोग वहाँ ज़ोर-ज़ोर से बजाए जा रहे करताल और ढोलक की शोर से प्रतियोगिता करते हुए गला फाड़-फाड़ कर हनुमान चालीसा गा रहे हैं। उन सभी की मिलीजुली आवाज़ उन दोनों को विचलीत कर रही है - " जै जै हनुमान गोसाईं .. " - और केवल उन दोनों को ही नहीं वरन् गाँधी मैदान में सभी शांतिप्रिय टहलने वाले लोगों को भी और बैठ कर योग या ध्यान लगाने वाले लोगों के साथ-साथ सुबह-सवेरे पक्षियों के कलरव को भी। 

अब सिद्धार्थ जी अन्यमनस्क-सा पवन से पूछ रहे हैं कि - " लगता है कि आज मंगल (मंगलवार) है .. है ना ? "

" ... महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी ... "





Thursday, January 8, 2026

बूँदों का बतंगड़ ...


देखा है मैने एक सपना,
या कि .. की है एक कल्पना, 
कि हो .. पास हमारे झरने का ग़ुलगपाड़ा, 
चेहरे पे हों हमारे बूँदों का बतंगड़।
हों दूर तक पर्वत-श्रृंखलाएं 
ओढ़े हुए चीड़ के बीहड़।
हो वहाँ चाय की एक झोपड़ी,
जिसमें सुलगती-सी हो चीड़ की लकड़ी।
धुआँ-धुआँ-सी आग में जिसकी 
कुछ सेंकती, कुछ उबालती,
भुट्टे कुछेक एक मासूम-सी लड़की।



और छिलकों पे भुट्टों के परोसती

हम जैसे सैलानी अपने ग्राहकों को

नर्म-गर्म सिंके-उबले भुट्टे के संग 

नमक-नींबू-मिर्ची की चटक जुगलबंदी।

अपने दोनों हाथों में लिए तुम भुट्टे

एक में सिंके और दूसरे में उबले हुए।

सिंका हुआ स्वयं खाती-चबाती-गुनगुनाती

और उबला हुआ मुझे खिलाती-पुचकारती,

अपने-अपने स्वाद के अनुसार और वहीं 

गुड़ वाली गर्मागर्म कड़क चाय से भरे 

भाप उगलते हों दो अदद कुल्हड़।

और .. 

वहीं पर .. 

नर्म-नर्म बुग्याल पर

हो आग़ोश में एक-दूजे की बैठी 

हम दोनों की एक अदद जोड़ी।

और हों .. 

हम दोनों के दोनों ही अल्हड़।

लिपटते, चिपटते, खुल्लम-खुल्ला,

हो जैसे प्यार हमारा 

मानो ..  बस्स ! .. 

खुला खेल फर्रुखाबादी ..बस यूँ ही ...







Monday, January 5, 2026

'इत्यादि' का इत्यादि ...





क्या ...

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

गोरों के लिए काले पानी वाली तेज़ाबी आँधी हूँ मैं ?

या ..

आज़ादी के नाम पे हुए उस बँटवारे की बर्बादी हूँ मैं ?

या ..

कर्ज़दार विवश आत्महंता किसान की त्रासदी हूँ मैं ?

या ..

आत्महंता किसान के अनाथ परिवार की आधि हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

भ्रष्टाचारी का ख़ाकी या सज़ायाफ़्ता की खादी हूँ मैं ?

या ..

बढ़ती ज्यामितीय आकार से वतन की आबादी हूँ मैं ?

या ..

विकास की आड़ में कुदरती आपदा की मुनादी हूँ मैं ?

या ..

धर्मनिरपेक्ष होकर भी आरक्षण भोगी जातिवादी हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

निःसहाय, परवश बलात्कृत की झीनी आपत्ति हूँ मैं ?

या ..

राजा-महाराजाओं के अंतःपुर, हरम की व्युत्पत्ति हूँ मैं ?

या ..

एक प्रेम-निशानी परन्तु समाज की अवैध संतति हूँ मैं ?

या ..

व्यभिचारी नरों की जननी, कोठेवाली की उपाधि हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

अंधपरंपराओं को रीति-रिवाज मानने का आदी हूँ मैं ?

या ..

पृथ्वी का वर्तमान भर या पूरे ब्रह्माण्ड का आदि हूँ मैं ?

या ..

हूँ जीवन रेखा से बँधा नश्वर शरीर भर या अनादि हूँ मैं ?

या ..

वीर्य-बूँद से भस्म तक का राही, आज मांस-पिंडी हूँ मैं ?

बिहारी था कभी, राज्य बँट जाने से अब झारखंडी हूँ मैं ?

Saturday, January 3, 2026

विह्वल कुतिया
























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Thursday, December 11, 2025

आखि़र में है लिखा नाम उस फ़ेहरिस्त के ...


अभी-अभी आज ही रविवारीय सुबह हमने,

उठायी है एक पर्ची 'स्टडी टेबल' से अपनी।

लिखीं हैं जिस पर एक लम्बी-सी फ़ेहरिस्त,

जाग कर देर रात तक कल मेरी धर्मपत्नी।


माह भर के रसद सामग्रियों के साथ-साथ,

तेल-मसाले, साबुन-मंजन जैसी चीज़ें भी।

सुबह जागने से रात सोने तक महीने भर में

इस्तेमाल करने वाले सामान सभी के सभी।


अरहर दाल दो किलो, एक किलो मूंग दाल,

झींगोरा दो किलो, चावल पाव भर बासमती।

हल्दी पाउडर, कसूरी मेथी, 'मिलेट्स' दलिया,

साबुत धनिया ढाई सौ ग्राम, सौ ग्राम मेथी भी।


बेसन व गुड़ एक-एक किलो, खांड पाव भर,

रसोईघर में है जो चीनी और मैदे पर पाबन्दी !

'कोल्ड क्रीम', 'हेयर डाई', भीमसेनी कपूर और

साथ में 'बटर पेपर', 'नैपकिन पेपर' तक भी।


अंत में फ़ेहरिस्त के लिखा दिखा एक और नाम,

लिखावट है जिसकी बदली, पर है तो पहचानी।

दरअसल ये लिखावट है एक सरकारी स्कूल में

पढ़ने वाली तेरह वर्षीया हमारी प्यारी बिटिया की।


मित्रवत् व्यवहार ने ही हमारे बना पाया है जिसे 

इतना बिंदास कि वह कह सके हर बातें मुझसे भी,

हर महीने .. अपने मुश्किलों से भरे चार दिनों की 

पीड़ाओं और उस ... 'सैनिटरी नैपकिन' की भी।


हाँ .. हाँ .. आपने सही सुना .. आखि़र में है लिखा

नाम उस फ़ेहरिस्त के .. 'सैनिटरी नैपकिन' का भी।

लंद-फंद-देवानंद जग भर के करके आप शरमाते नहीं,

समक्ष बेटियों के 'पैगें' तो बनाते हैं, बढ़ाइए पींगे भी .. बस यूँ ही ...


Thursday, December 4, 2025

'सायरन' वाली गाड़ी

आज तड़के सुबह सक्सेना जी के पड़ोस में रहने वाले पैंसठ वर्षीय वर्मा जी स्वर्ग सिधार गए हैं। तभी से ही मुहल्ले भर में उनके घर से लगातार ज़ोर-ज़ोर से रोने-बिलखने की आवाज़ें आ रही हैं। 

हम इंसानों की ये एक अजीबोग़रीब विडंबना है कि .. हम विभिन्न धामों की तीर्थयात्राएँ कर-कर के अपने लिए मरणोपरांत तथाकथित स्वर्ग या जन्नत की कामना करते हुए मन्नतें माँगते तो ज़रूर हैं .. परन्तु हम मरना भी नहीं चाहते हैं। जबकि हमारे जन्म के साथ ही हमारे साथ मौत की भी एक चिट चिपकी हुई होती है .. जिसको हम सभी ताउम्र नज़रंदाज़ करते रहते हैं। पर वह चिट हमारी तमाम अवहेलनाओं के बावजूद हमें समय-समय पर ताकीद भी करती रहती है और एक दिन .. वही चिट चट से हमारी ज़िन्दगी चट कर जाती है .. शायद ...

फ़िलहाल मृतक वर्मा जी के घर जाने के बाद वहाँ के मातमी माहौल में काफ़ी देर तक बिना दाना-पानी के रहने का अंदेशा है सक्सेना जी और उनके परिवार को भी। 

दरअसल उनके परिवार में सक्सेना जी मधुमेह से पीड़ित हैं तो .. ज़्यादा देर तक वह खाली पेट नहीं रह सकते हैं। साथ ही श्रीमती सक्सेना आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त और कफ जैसे तीन जैविक दोषों में से वात दोष से कुछ ज़्यादा ही परेशान रहती हैं। गैस की दवाईयों के सेवन के बाद भी दिन-रात विभिन्न प्रकार की ज़ोरदार आवाज़ों वाली ध्वनि प्रदूषण करती रहती हैं। यानी .. अब .. सरल व आम बोलचाल की या ठेठ भाषा में कहें तो .. वह दिन-रात पादती रहती हैं या डकारती रहती हैं। ऐसे में .. वह भी अधिक देर तक भूखे पेट नहीं रह सकती हैं।

इसीलिए सक्सेना जी के परिवार के चारों सदस्यों ने .. वह, उनकी धर्मपत्नी, उनका बेटा और उसकी पत्नी यानी सक्सेना जी की बहू ने भी किसी तरह ज़ल्दी-ज़ल्दी में रात की बची हुई बासी रोटी पर 'जैम' और कल सुबह के बचे हुए 'ब्रेड' के कुछ 'स्लाइस' पर 'फ्रीज' में रखे हुए 'बटर' को लगा कर अपना-अपना मुँह जूठा लिया है। 

'इंडक्शन' पर ही आनन-फानन में चाय भी बना ली गयी है। क्योंकि लोकलाज और समाज के रीति-रिवाज़ों का भी .. औपचारिक ही सही .. पर निर्वाह तो करना ही पड़ता है। लोगबाग कहते हैं,  कि पड़ोस में किसी का मृत शरीर पड़ा हो, तो अपने घर में भी चूल्हा नहीं जलाया जाता है .. भले ही वह चूल्हा .. गैस वाला ही हो। 

वैसे भी .. अगर ताज़ा नाश्ता 'इंडक्शन' पर ही बनाया भी जाता तो .. कड़ाही-छोलनी की छनर-मनर की या 'प्रेशर कुकर' की सीटी की आवाज़ या फिर कुछ छौंके जाने पर तेल-मसाले के गंध के साथ-साथ छनन-छन्न की आवाज़ से अगल-बगल में पोल खुल जाने पर वर्षों तक जगहँसाई का भी डर बना रहता है।

खैर ! .. सक्सेना जी और उनके परिवार के सभी सदस्य अभी अपने घर पर ही जल्दी-जल्दी नाश्ता-पानी करने के बाद एक आम मध्यम वर्गीय परिवार की तरह ही नाश्ते के पश्चात चाय पीने की परम्परा को निभाते हुए .. अब मृत वर्मा जी के घर जा कर उनके शोक संतप्त परिजनों को सांत्वना देने वाली औपचारिकता निभाने की तैयारी कर रहे हैं।  

चाय की चुस्की लेते हुए अचानक सक्सेना जी भावुक होकर अपने इकलौते बेटे-बहू को सम्बोधित करके एक जागरूक नागरिक की तरह कहते हैं, कि - " देखो बेटा .. हम मरेंगे ना .. तो हमको विद्युत दाह गृह में ही जलाना .. नौ मन लकड़ी मत खरीदना .. क्योंकि उसके लिए पेड़ों को काटे जाते हैं और .. उन सब कटाव के परिणामस्वरूप हमारे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। "

प्रतिक्रिया स्वरूप श्रीमती सक्सेना जी तमक और छोह के मिश्रित भाव के साथ अपने धर्मपति को सम्बोधित करके बोल पड़ती हैं, कि - " का (क्या) भोरे-भोरे (सुबह-सुबह) अपने मुँह से फ़ालतू बात बोल रहे हैं जी ! .. मरे आपका दुश्मन .. "

तभी यकायक मुहल्ले में प्रवेश करती हुई 'सायरन' वाली एक गाड़ी की आवाज़ से सक्सेना जी के घर के सभी लोग चौंक जाते हैं। वैसे भी अपने देश में आपातकालीन वाहनों की ख़ास 'सायरन' की आवाज़ हमेशा आम आदमी के दिल की धड़कन बढ़ा ही देती है .. चाहे वह ख़ाकी वर्दी वाले किसी आला अफ़सर या परिवहन विभाग के उच्च अधिकारी की गाड़ी के 'सायरन' की आवाज़ हो या अग्निशामक ('फायर ब्रिगेड' यानी दमकल) गाड़ियों की हो या फिर किसी 'एम्बुलेंस' की हो।

अभी उत्सुकतावश सक्सेना जी और उनके अन्य तीनों परिजन बाहर की ओर झाँके तो .. देखते हैं कि .. उस 'सायरन' बजाती हुई गाड़ी पर 'एम्बुलेंस' या कुछ और लिखे होने की जगह "दधीचि देहदान समिति, बिहार" लिखी हुई है।

पौराणिक कथाओं में दधीचि ऋषि और उनके अस्थि दान के बारे में पढ़ने-सुनने के कारण दधीचि शब्द से तो सक्सेना जी परिचित हैं। परन्तु यह देहदान शब्द पढ़ कर सक्सेना जी चौंकते हुए जिज्ञासावश पूछ बैठते हैं कि - " अरे ! .. ई (ये) का (क्या) है हो (जी) ? "

अब तक 'सायरन' वाली गाड़ी वर्मा जी के घर के सामने जाकर रुक गयी है। तभी सक्सेना जी की नई नवेली बहू सभी की चाय पी गई जूठी प्यालियों को उठाते हुए बतलाती है कि - " पापा जी .. ये देहदान वालों की गाड़ी है। लगता है कि .. वर्मा जी 'अँकल' अपने जीते-जी इस का 'फॉर्म' भर दिए होंगे। "

सक्सेना जी एकदम से अचम्भित होकर अपनी बहू से ही पुनः पूछते हैं कि - " देहदान ? .. 'फॉर्म' ? .. हम कुछ समझे नहीं बहुरानी .. "

चाय की जूठी प्यालियों को 'किचेन' के 'सिंक' में आहिस्ता से रखते हुए उनकी बहू - " पापा जी .. इसमें समझने जैसी कोई बात ही नहीं है। अपने देश में मृत देह को दान करने के लिए एक संस्थान है। ये उसी की गाड़ी आयी है। "

सक्सेना जी - " अच्छा ! "

बहू - " हाँ पापा जी .. देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति को अपने जीते-जी इस संस्थान के एक 'फॉर्म' भर को भर कर उस पर अपने परिवार के दो सदस्यों के हस्ताक्षर के साथ-साथ अपनी स्वीकृति के लिए अपना भी हस्ताक्षर करके वहाँ जमा करना होता है। "

सक्सेना जी - " उससे क्या होता है बहुरानी ? .."

बहू - " मृत व्यक्ति के परिवार द्वारा तयशुदा समय-सीमा में इन लोगों को सूचित करने पर ये लोग मृत व्यक्ति के दिए गए पते पर आकर बहुत ही आदरपूर्वक मृत देह ले जाते हैं। मृतक के उपयोगी अंगों को बाद में कई ज़रूरतमंद लोगों को शल्य चिकित्सा द्वारा लगा कर उन्हें नया जीवन प्रदान किए जाते हैं। जैसे .. आँखें, 'लिवर', 'किडनी'.. और भी बहुत कुछ और .. और तो और .. शेष बचा हुआ कंकाल 'मेडिकल स्टूडेंटस्' की पढ़ाई के काम में आ जाता है। "

सक्सेना जी अचरज के साथ - " अच्छा ! "

बहू - " और नहीं तो क्या ! .. जिन्हें अपने देश में परम्परा के नाम पर हम सभी मृत देह के साथ हर दिन हज़ारों की संख्या में .. बस यूँ ही .. जला या दफ़ना देते हैं पापा जी। "

सक्सेना जी -" हाँ बहू .. सही ही कह रही हो तुम तो .. "

बहू - " पापा जी .. देहदान ना भी किया जाए तो .. कम-से-कम नेत्रदान से तो पूरे विश्व भर के अंधापन को मिटाया जा सकता है। हालांकि.. ये सब कुछ .. सरल-सुलभ है। अगर हम लोग पूर्वजों की परम्पराओं के साथ-साथ वर्तमान पीढ़ी की सोचों की भी क़द्र करनी सीख जाएँ पापा जी। हो सकता है कि .. वो सारी परम्पराएँ तब के संदर्भ में उचित रही होंगी। वैसे भी .. नया ज्ञान साझा करने में क्या ही बुराई हो सकती है भला ! "

तभी उनका बेटा नाराजगी जताते हुए अपनी धर्मपत्नी को लगभग झिड़कते हुए कहता है, कि - " क्या बके जा रही हो जी तुम सुबह-सुबह .. पापा ने तो तुमसे भी ज़्यादा दुनिया देखी हुई है ना ? "

तत्क्षण श्रीमती सक्सेना भी अपने बेटा के हाँ में हाँ मिलाते हुए बोल पड़ती हैं कि - " आउर (और) नहीं तो का (क्या) जी ! "

तभी बहू अपने पति को सम्बोधित करते हुए नम्रता के साथ बोलती है कि -   " हम कब भला पापा जी के अनुभव और उनकी समझदारी से असहमत हैं जी। हम तो केवल ये बतलाना चाह रहे हैं कि .. समय के साथ हमारे पकवानों व परिधानों में होने वाले परिवर्तनों के साथ-साथ हमारी परम्पराओं में भी यथोचित परिवर्तन होनी ही चाहिए। "

सक्सेना जी - " बहू ठीक ही कह रही है बेटा .. चलो .. अभी जल्दी से वर्मा जी के घर चलो। नहीं तो उ (वो) गाड़ी उनको लेकर चली जायेगी .. और हाँ .. चलो .. ज़रा उनलोगों से देहदान के 'फारम' ('फॉर्म) भरने की प्रक्रिया के बारे में भी हमको अपने लिए भी समझना है। "

अब सक्सेना जी के परिवार के चारों सदस्य देहदान की एक नूतन व सकारात्मक विचारधारा लिए हुए अपने पड़ोसी वर्मा जी के शोकाकुल परिवार से मिलने उनके घर की ओर पैदल ही प्रस्थान कर रहे हैं।