बीते हुए कल .. 9 मई को .. पश्चिम बंगाल में बंगाली पंचांग के अनुसार वैशाख के पच्चीसवें दिन "कविगुरु" रविन्द्र नाथ टैगोर की 165वीं जयंती के शुभ अवसर पर वहाँ की सुसंस्कृत एवं कला से सराबोर तथा हर्षोल्लास जनित आँसू-सिक्त आम जनता के समक्ष वहाँ के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच नयी विजयी सरकार के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के हम सभी साक्षी बने हैं। प्रतीत हो रहा है, कि वर्षों बाद पश्चिम बंगाल की आम जनता किसी मज़हब विशेष की हिंसक एवं क्रूर मानसिकता के दमन के चंगुल से छूट कर सुकून की साँसें ले रही है।
एक स्वतंत्र देश होने के बावजूद भारत के किसी राज्य में इतनी वीभत्स परिस्थितियों को वर्षों झेलना .. ये कश्मीरी पंडितों के परिवारों की तरह ही वही लोग बेहतर समझ सकते हैं, जिनकी हथेलियाँ गर्म तवे पर पड़ने के बाद उस पर टीस से भरे फफोले पड़े हों। ख़ैर .. समाचार चैनलों के अनुसार पश्चिम बंगाल में एक हिंदू विरोधी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के समापन के साथ ही वहाँ नवीन सत्ता का सूर्योदय हो गया है .. शायद ...
अब .. आज .. 10 मई की बात .. हालांकि हम किसी भी दिवस विशेष के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि एक औपचारिक दिवस की जगह किसी भी दिवस विशेष के सारगर्भित महत्वपूर्ण विषय या उद्देश्य को मन से हमारी दिनचर्या में समाहित करने में विश्वास रखते हैं। फिर भी .. आज 10 मई को समस्त विश्व में "विश्व मातृ दिवस" मनाया जा रहा है।
उपलब्ध इतिहास के अनुसार पहला आधिकारिक मातृ दिवस समारोह 10 मई, 1908 को संयुक्त राज्य अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया के एक कुशल व कर्मठ कार्यकर्ता एना मारिया जार्विस द्वारा वहाँ के ऐतिहासिक शहर ग्राफ्टन के एंड्रयूज मेथोडिस्ट एपिस्कोपल नामक चर्च में आयोजित किया गया था।
दरअसल इतिहास की मानें, तो उन दिनों वहाँ गृहयुद्ध का दौर चल रहा था। जिसमें जिन युवा लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, उन सभी की माँ और अपनी कर्मठ समाजसेविका दिवंगत माँ एन रीव्स जारविस के लिए एना मारिया जार्विस ने 1908 के 10 मई को मातृ दिवस समारोह मना कर उन सभी के प्रति श्रद्धा प्रकट की थी। चूंकि एना मारिया जार्विस की माँ एन रीव्स जारविस का देहांत 9 मई 1905 को हुआ था, अतः उनके द्वारा संभवतः मई महीने के ही 10 तारीख को मातृ दिवस समारोह के लिए चुना गया होगा।
1914 में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन द्वारा वर्ष 1908 के 10 मई के दिन पड़ने वाले माह के दूसरे रविवार को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष के मई माह के दूसरे रविवार को ही 'मदर्स डे' के रूप में मनाने की घोषणा के पश्चात विश्व भर में उसी दिन "विश्व मातृ दिवस" (World Mother's Day) के रूप में मनाया जाता है।
यह एक संयोगमात्र ही है, कि वर्ष 1908 में 10 मई को जब "मातृ दिवस" मनाया गया था, तो उस दिन भी वर्तमान वर्ष 2026 की तरह ही मई माह का दूसरा रविवार 10 मई को ही था। परन्तु वह वर्ष अधिवर्ष (Leap Year) था, पर वर्तमान वर्ष 2026 अधिवर्ष नहीं है।
वैसे भी .. माँ का अस्तित्व तो तभी सम्भव है, जब मातृत्व सुरक्षित हो। .. है ना ? इसीलिए सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की प्रबल समर्थक रहीं बा उर्फ़ कस्तूरबा गाँधी के जन्मदिन यानी 11 अप्रैल को वर्ष 2003 से हमारे देश में माँ और मातृत्व की सुरक्षा के सम्मान व प्रतीकात्मक महत्व के रूप में "राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस" मनाने की परम्परा चली आ रही है।
अब आज की मूल बतकही .. सर्वविदित है कि .. परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है, तो यह .. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हर जगह बहुत ही शिद्दत से लागू भी होता है। इसी नियम के तहत हम सभी हमारे नब्बे के दशक तक .. बीते दिनों वाली अपनों की चिठ्ठियों की सुगन्धों से इतर .. आज 'व्हाट्सएप्प' की रंगीनियों में मशगूल हो चुके हैं।
ठीक वैसे ही .. परिवर्तन के इस नियम के तहत कागज़ी किताबों के पृष्ठों को उसकी सरसराहट वाली आवाज़ के साथ पलटने की जगह इन दिनों 'डिजिटल' पुस्तकों व पत्रिकाओं को अपने 'मोबाइल' या 'लैपटॉप' व 'डेस्कटॉप' के चमकते 'स्क्रीन' पर बेआवाज़ ही 'स्क्रॉल' करके हम सभी पढ़ रहे हैं।
हमारे पुरखों का गौरवान्वित प्रमाणिक इतिहास बतलाता है, कि पहले मौखिक वेद-पुराणों की थाती, फिर पत्थरों पर ब्रह्मलीपि, तदोपरान्त ताड़ पत्र पर उकेरी गयी ग्रंथों की पांडुलिपि, फिर कल तक काग़ज़ी किताबें थीं या आज हैं भी, फिर .. वर्तमान में 'डिजिटल' पुस्तकें। आज ये सब हैं और .. हो सकता है, कि कल हम हों या ना हों .. पर भावी पीढ़ी इससे भी इतर कुछ देख पाएगी .. पढ़ पाएगी .. शायद ...
लब्बोलुआब ये है कि हम सभी कंडे की लेखनी से लेकर 'कंप्यूटर' तक की यात्रा के साक्षी रहे हैं।
अब आगे .. आज की बतकही में हमलोग आज ऐसी ही आठ माह की एक नवजात 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" के बारे में जानने का प्रयास करते हैं। जिसके सम्पादक श्री नितेश मोहन वर्मा एवं सह सम्पादक श्री शिव कुमार शर्मा हैं।
"प्रतिज्ञान" का 'वेब साइट लिंक' :- 👇
www.pratigyan.com
गत वर्ष सितम्बर 2025 में इस 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" का पहला अंक अमेज़न (Amazon) के किंडल (Kindle) पर उपलब्ध हुआ था। "किंडल (Kindle)" अमेज़न द्वारा विकसित एक 'इलेक्ट्रॉनिक ई-रीडर डिवाइस' है, जिस पर उपलब्ध किताबें, पत्रिकाएं इत्यादि हम अपनी सुविधानुसार यथोचित शुल्क 'ऑनलाइन' भुगतान करके पढ़ सकते हैं।
अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle) का 'लिंक' :- 👇
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आपकी स्वरचित व अप्रकाशित रचना "प्रतिज्ञान" के सम्पादन दल द्वारा यदि चयनित की जाएगी, तो इसके आगामी अंकों में सम्भवतः प्रकाशित की जाएगी। संज्ञान रहे कि यहाँ ना तो आपकी रचना को प्रकाशित करने के लिए आप से कोई शुल्क लिया जाता है और ना ही किसी भी प्रकार के पारिश्रमिक का आपको भुगतान भी किया जाता है। यदि आप भी संस्कृत के श्लोक-अंश- "स्वान्तः सुखाय" के शब्दार्थ या भावार्थ में निष्ठापूर्वक विश्वास रखते हैं, तो निजी स्वान्तः सुखाय के लिए वहाँ अपनी रचनाओं को भेज सकते हैं।
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हमने भी इनके 'इंस्टाग्राम' से 'ईमेल आईडी' लेकर अपनी एक बतकही (अतुकान्त कविता) 'ईमेल' की थी। जो चयनित होने के पश्चात अप्रैल माह में "प्रतिज्ञान" के अधुनातन आठवें अंक- "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" नामक विशेषांक में विशेषांक के विषय से इतर मेरे द्वारा प्रेषित बतकही छपी है। जिसका शीर्षक है- "खुरचा हुआ चाँद"।
आज "विश्व मातृ दिवस" के उपलक्ष्य में "प्रतिज्ञान" के उस विशेषांक "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" को पढ़ने के लिए आपको "अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle)" के 'एप' तक जाना चाहिए .. शायद ...










