Tuesday, May 12, 2026

बतकही की खिचड़ी ...

आज परोसी गयी हमारी बतकही की खिचड़ी कितनी सुपाच्य है .. ये तो खिचड़ी के साथ-साथ आपकी पाचन शक्ति पर भी निर्भर करेगा। जिसका संज्ञान आपके द्वारा खिचड़ी ग्रहण करने के पश्चात ही हो पाएगा। 

आज की बतकही की खिचड़ी के तौर पर चार लघुकथाओं या यूँ कहें कि घटनाक्रमों का हम-आप मिलकर अवलोकन करते हैं, जो वार्तालाप शैली में हैं। शायद आप भी निम्न चार घटनाक्रमों में से किसी एक-दो या चारों से कभी-ना-कभी रूबरू हुए हों या .. नहीं भी हो सकते हैं। सम्भव हो तो आप अपने अनुभव के आधार पर .. "हाँ" या "ना" बतलाइएगा .. बस यूँ ही ...


घटनाक्रम -१ :-


" भैया ! .. आप अख़बार लेते हैं ना ? "

" हाँ.. काहे (क्यों) ? "

" कौन सा अख़बार लेते हैं ? "

" हम तो अंग्रेजी वाला 'द हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ते हैं और भाभी के लिए दैनिक जागरण लेते हैं। .. कोई बात है का (क्या) ?

" ना .. कौनो (कौन) ख़ास नहीं .. बस .. आज फिर "दैनिक जागरण" के "सप्तरंग" वाले पन्ने में मेरी एगो (एक) कविता छपी है .. वही बतलाने के लिए पूछ रहे थे। "

" उ (वह) हिंदी वाला अख़बार तो वही (उनकी पत्नी / भाभी) देखती है। .. वइसे (वैसे) .. "दैनिक जागरण" के .. 'प्रेस' में तुम्हारा कोई जान-पहचान वाला है का (क्या) जी ? "


{संदेश - लोग आपको और आपकी कला की प्रतिभा को कम आँकते हैं या फिर आपको भी अपनी ही तरह जान-पहचान या पैरवी या फिर चापलूसी की सहायता से जुगाड़ करने वाला जुगाड़ू समझते हैं।}.


घटनाक्रम - २ :-


" मामा ! .. आप 'ऑफिस' से कै (कितने) बजे लौटते हैं ? "

" जाने का तो 'फिक्स है, पर .. आने का नहीं .. "

" फिर भी .. रात में कितने बजे तक सो जाते हैं ? "

" दस-ग्यारह तो बज ही जाता है। .. काहे (क्यों) कोई काम था क्या ? "

" ना-ना .. बस .. आज रात में दस बजे 'रेडियो' पर कविता वाला हमरा (हमारा) एगो (एक) 'प्रोग्राम' आएगा। .. उसी के लिए पूछ रहे थे (हैं)। "

" अब .. आजकल 'रेडियो' कौन सुनता है जी ! .. अब कोई 'रेडियो' रखता भी तो नहीं है .. "

" नहीं मामा जी .. ऊ (वो) तो अब आपके 'स्मार्ट मोबाइल' में ही एक 'लिंक' से ही 'रेडियो' बजने लगता है। हम आपको 'लिंक' 'व्हाट्सएप' कर देते हैं। "

" ठीक है भेजना .. देखते हैं .. इ (ये) सब करने में कुछो (कुछ रुपया) .. मिलता भी है का (क्या) ? "


{संदेश - लोगों की दिलचस्पी आपकी कला, प्रतिभा या रुचि में कम होती है। साथ ही लोग दुनिया के हर पहलू को पैसे से ही तौलने के क्रम में कला को भी पैसे के आधार पर ही आँकने के आदी होते हैं।}.


घटनाक्रम - ३ :-


" ए चच्चा (चाचा) ! .. आप फिलिम-उलिम (फ़िल्म) देखते हैं ? "

" ना .. काहे  (क्यों) .. कौनो (कौन) बात है का (क्या) ? "

" ना चच्चा .. बात का रहेगा चच्चा .. कल्हे (कल) जे (जो) एगो (एक) फिलिमवा (फ़िल्म) 'रिलीज' हुआ (हुई) है ना .. "

" हमरा (हमको) का (क्या) पता जी ? "

" हाँ .. हुआ है ना ! .. ओकर (उसका) नाम है- 'जूली वेड्स जॉनी' "

" हाँ .. तअ (तो) ? .. लगता है कि .. पोस्टरवा (पोस्टर) तो देखे हैं कहीं पर सटल (सटा हुआ) .. "

" तअ (तो) ओकरा (उस) में हमरा (हमारा) भी एक ठो (एक) 'रोल' (रॉल) है चच्चा। "

" मने (मतलब) ? "

" उसमें हम भी काम किए हैं। "

" ओ ! .. इ (ये) सब नाटक-नौटंकी आ (और) फिलिम-उलिम (फ़िल्म) जो करते हो .. ओकरा (उसको) करे (करने) में .. पाईयो (पारिश्रमिक के तौर पर पैसा) भेंटाता (मिलता) है का (क्या) ? .. केतना (कितना) पाई (पैसा) भेंटाता (मिलता) है ? "


{संदेश - लोग आपकी रुचि या अभिरुचि से मिली कलात्मक उपलब्धियों को कम और .. उसके बदले मिलने वाली पारिश्रमिक को ज़्यादा महत्व देते हैं। उन उपलब्धियों का भी पैसे के आधार पर ही मूल्यांकन करते हैं।}.


घटनाक्रम - ४:-


" 'अंकल' .. 'गुड मॉर्निंग' .. "

" 'मॉर्निंग-मॉर्निंग' .. और सब .. ठीक है ना ? और .. क्या चल रहा है आजकल ? "

" बस .. 'कम्पीटीशन' की तैयारी चल रही है। "

" अब तो 'एज' भी हो रहा है जी तुम्हारा तो .. ध्यान दो। "

" जी .. वो तो दे ही रहे हैं 'अंकल' .. बस .. हर बार .. दो-चार 'नम्बर' से चूक जाते हैं। वैसे आप .. "एमेजॉन-किंडर" के बारे में जानते हैं ? "

" "एमेजॉन-किंडर" ? .. ना जी .. इसका तो नाम ही पहली बार सुन रहे हैं तुम्हारे मुँह से। "

" ये एक 'एप्प' है 'अंकल' .. उसी 'एप्प' पर मेरी एक 'ई-बुक नोवेल' 'पब्लिश' हुई है। आप भी एक बार देखिएगा ना .. "

" अब ये 'ई-बुक' कौन सी बला है ? "

" 'अंकल' वो .. किताबों के 'डिजिटल' संस्करण को 'ई-बुक' कहते हैं। "

" ओ~~~ .. अच्छा ! .. जैसे .. तुम लोगों की 'जेनेरेशन' बिना कल-पुर्जे के इस्तेमाल किए हुए ही 'इंजीनियर' बन जाता है। है ना ? "

" मतलब ? "

" अरे .. वही .. जिसको तुमलोग 'सॉफ्टवेयर इंजीनियर' बोलते हो। " - कुछ-कुछ व्यंग्यात्मक लहज़े में बोलते-बोलते 'अंकल' की अट्टहास वातावरण को बोझिल कर जाती है।


{संदेश - पुरानी पीढ़ी प्रायः अपने आप को समझदार और अपने बाद की भावी पीढ़ी को मूर्ख व कमतर समझती है। साथ ही .. प्रायः आपके परिवार या आस-पड़ोस के आम लोगों में कलात्मक सृजन करने का तो दूर .. कला अवलोकन करने तक का शऊर अधिकांशतः नहीं होता है।}.


अब अपने अनुभव के आधार पर आप .. "हाँ" या "ना" बतलाना मत भूलिएगा, ताकि ये समझ आए कि उपरोक्त घटनाक्रमों का भुक्तभोगी केवल उपरोक्त चारों पात्र ही हैं या ..  और अन्य भी .. आप सभी में से किसी के साथ भी ऐसा हुआ है या होता है ? .. बस यूँ ही ...

Sunday, May 10, 2026

प्रतिज्ञान : "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" ...



बीते हुए कल .. 9 मई को .. पश्चिम बंगाल में बंगाली पंचांग के अनुसार वैशाख के पच्चीसवें दिन "कविगुरु" रविन्द्र नाथ टैगोर की 165वीं जयंती के शुभ अवसर पर वहाँ की सुसंस्कृत एवं कला से सराबोर तथा हर्षोल्लास जनित आँसू-सिक्त आम जनता के समक्ष वहाँ के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच नयी विजयी सरकार के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के हम सभी साक्षी बने हैं। प्रतीत हो रहा है, कि वर्षों बाद पश्चिम बंगाल की आम जनता किसी मज़हब विशेष की हिंसक एवं क्रूर मानसिकता के दमन के चंगुल से छूट कर सुकून की साँसें ले रही है। 

एक स्वतंत्र देश होने के बावजूद भारत के किसी राज्य में इतनी वीभत्स परिस्थितियों को वर्षों झेलना .. ये कश्मीरी पंडितों के परिवारों की तरह ही वही लोग बेहतर समझ सकते हैं, जिनकी हथेलियाँ गर्म तवे पर पड़ने के बाद उस पर टीस से भरे फफोले पड़े हों। ख़ैर .. समाचार चैनलों के अनुसार पश्चिम बंगाल में एक हिंदू विरोधी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के समापन के साथ ही वहाँ नवीन सत्ता का सूर्योदय हो गया है .. शायद ...


अब .. आज .. 10 मई की बात .. हालांकि हम किसी भी दिवस विशेष के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि एक औपचारिक दिवस की जगह किसी भी दिवस विशेष के सारगर्भित महत्वपूर्ण विषय या उद्देश्य को मन से हमारी दिनचर्या में समाहित करने में विश्वास रखते हैं। फिर भी .. आज 10 मई को समस्त विश्व में "विश्व मातृ दिवस" मनाया जा रहा है। 

उपलब्ध इतिहास के अनुसार पहला आधिकारिक मातृ दिवस समारोह 10 मई, 1908 को संयुक्त राज्य अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया के एक कुशल व कर्मठ कार्यकर्ता एना मारिया जार्विस द्वारा वहाँ के ऐतिहासिक शहर ग्राफ्टन के एंड्रयूज मेथोडिस्ट एपिस्कोपल नामक चर्च में आयोजित किया गया था। 

दरअसल इतिहास की मानें, तो उन दिनों वहाँ गृहयुद्ध का दौर चल रहा था। जिसमें जिन युवा लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, उन सभी की माँ और अपनी कर्मठ समाजसेविका दिवंगत माँ एन रीव्स जारविस के लिए एना मारिया जार्विस ने 1908 के 10 मई को मातृ दिवस समारोह मना कर उन सभी के प्रति श्रद्धा प्रकट की थी। चूंकि एना मारिया जार्विस की माँ एन रीव्स जारविस का देहांत 9 मई 1905 को हुआ था, अतः उनके द्वारा संभवतः मई महीने के ही 10 तारीख को मातृ दिवस समारोह के लिए चुना गया होगा।

1914 में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन द्वारा वर्ष 1908 के 10 मई के दिन पड़ने वाले माह के दूसरे रविवार को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष के मई माह के दूसरे रविवार को ही 'मदर्स डे' के रूप में मनाने की घोषणा के पश्चात विश्व भर में उसी दिन "विश्व मातृ दिवस" (World Mother's Day) के रूप में मनाया जाता है।

यह एक संयोगमात्र ही है, कि वर्ष 1908 में 10 मई को जब "मातृ दिवस" मनाया गया था, तो उस दिन भी वर्तमान वर्ष 2026 की तरह ही मई माह का दूसरा रविवार 10 मई को ही था। परन्तु वह वर्ष अधिवर्ष (Leap Year) था, पर वर्तमान वर्ष 2026 अधिवर्ष नहीं है।


वैसे भी .. माँ का अस्तित्व तो तभी सम्भव है, जब मातृत्व सुरक्षित हो। .. है ना ? इसीलिए सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की प्रबल समर्थक रहीं बा उर्फ़ कस्तूरबा गाँधी के जन्मदिन यानी 11 अप्रैल को वर्ष 2003 से हमारे देश में माँ और मातृत्व की सुरक्षा के सम्मान व प्रतीकात्मक महत्व के रूप में "राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस" मनाने की परम्परा चली आ रही है। 


अब आज की मूल बतकही .. सर्वविदित है कि .. परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है, तो यह .. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हर जगह बहुत ही शिद्दत से लागू भी होता है। इसी नियम के तहत हम सभी हमारे नब्बे के दशक तक .. बीते दिनों वाली अपनों की चिठ्ठियों की सुगन्धों से इतर .. आज 'व्हाट्सएप्प' की रंगीनियों में मशगूल हो चुके हैं। 

ठीक वैसे ही .. परिवर्तन के इस नियम के तहत कागज़ी किताबों के पृष्ठों को उसकी सरसराहट वाली आवाज़ के साथ पलटने की जगह इन दिनों 'डिजिटल' पुस्तकों व पत्रिकाओं को अपने 'मोबाइल' या 'लैपटॉप' व 'डेस्कटॉप' के चमकते 'स्क्रीन' पर बेआवाज़ ही 'स्क्रॉल' करके हम सभी पढ़ रहे हैं। 

हमारे पुरखों का गौरवान्वित प्रमाणिक इतिहास बतलाता है, कि पहले मौखिक वेद-पुराणों की थाती, फिर पत्थरों पर ब्रह्मलीपि, तदोपरान्त ताड़ पत्र पर उकेरी गयी ग्रंथों की पांडुलिपि, फिर कल तक काग़ज़ी किताबें थीं या आज हैं भी, फिर .. वर्तमान में 'डिजिटल' पुस्तकें। आज ये सब हैं और .. हो सकता है, कि कल हम हों या ना हों .. पर भावी पीढ़ी इससे भी इतर कुछ देख पाएगी .. पढ़ पाएगी .. शायद ...

लब्बोलुआब ये है कि हम सभी कंडे की लेखनी से लेकर 'कंप्यूटर' तक की यात्रा के साक्षी रहे हैं।


अब आगे .. आज की बतकही में हमलोग आज ऐसी ही आठ माह की एक नवजात 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" के बारे में जानने का प्रयास करते हैं। जिसके सम्पादक श्री नितेश मोहन वर्मा एवं सह सम्पादक श्री शिव कुमार शर्मा हैं।


"प्रतिज्ञान" का 'वेब साइट लिंक' :- 👇

www.pratigyan.com


गत वर्ष सितम्बर 2025 में इस 'डिजिटल' मासिक पत्रिका- "प्रतिज्ञान" का पहला अंक अमेज़न (Amazon) के किंडल (Kindle) पर उपलब्ध हुआ था। "किंडल (Kindle)"  अमेज़न द्वारा विकसित एक 'इलेक्ट्रॉनिक ई-रीडर डिवाइस' है, जिस पर उपलब्ध किताबें, पत्रिकाएं इत्यादि हम अपनी सुविधानुसार यथोचित शुल्क 'ऑनलाइन' भुगतान करके पढ़ सकते हैं। 


अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle) का 'लिंक' :-  👇

https://read.amazon.com/kindle-library



गत माह अप्रैल 2026 में इसका आठवाँ अंक आया है। जनवरी 2026 के इसके पाँचवें अंक को छोड़कर .. सितम्बर 2025 के पहले अंक से लेकर अप्रैल 2026 तक के आठवें अंक तक की प्रतियाँ किंडल (Kindle) पर उपलब्ध है। दरअसल "प्रतिज्ञान" के सह सम्पादक श्री शिव कुमार शर्मा के अनुसार इसके जनवरी का पाँचवाँ अंक कागज़ी पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है और हर वर्ष केवल जनवरी माह का अंक ही साल में एक बार कागज़ी पुस्तक के स्वरूप में ही प्रकाशित किया जाएगा।



इसी कागज़ी पुस्तक के स्वरूप वाले पाँचवें अंक- "प्रतिज्ञान वार्षिक संचयन - 2026" की एक प्रति इसके सह सम्पादक- श्री शिव कुमार शर्मा द्वारा मेरे लिए 'स्पीड पोस्ट' करने पर अभी हाल ही में मुझे प्राप्त हुआ है।




आप सभी पाठकों के बीच जो भी रचनाकार हैं, चाहे आप दक्ष व परिपक्व रचनाकार हों या नवोदित(ता) रचनाकार हों, आप सभी अपनी रचनाओं को "प्रतिज्ञान" तक भेजने के लिए निम्नलिखित दोनों 'ईमेल आईडी' पर 'ईमेल' कर सकते हैं।

"प्रतिज्ञान" के दोनों 'ईमेल आईडी' :- 👇

contact@pratigyan.com

hello@pratigyan.com


आपकी स्वरचित व अप्रकाशित रचना "प्रतिज्ञान" के सम्पादन दल द्वारा यदि चयनित की जाएगी, तो इसके आगामी अंकों में सम्भवतः प्रकाशित की जाएगी। संज्ञान रहे कि यहाँ ना तो आपकी रचना को प्रकाशित करने के लिए आप से कोई शुल्क लिया जाता है और ना ही किसी भी प्रकार के पारिश्रमिक का आपको भुगतान भी किया जाता है। यदि आप भी संस्कृत के श्लोक-अंश- "स्वान्तः सुखाय" के शब्दार्थ या भावार्थ में निष्ठापूर्वक विश्वास रखते हैं, तो निजी स्वान्तः सुखाय के लिए वहाँ अपनी रचनाओं को भेज सकते हैं।


"प्रतिज्ञान" का 'इंस्टाग्राम लिंक' :- 👇

https://www.instagram.com/pratigyanprakashan?igsh=YXJpYWoyajQ5Ymdp


हमने भी इनके 'इंस्टाग्राम' से 'ईमेल आईडी' लेकर अपनी एक बतकही (अतुकान्त कविता) 'ईमेल' की थी। जो चयनित होने के पश्चात अप्रैल माह में "प्रतिज्ञान" के अधुनातन आठवें अंक- "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" नामक विशेषांक में विशेषांक के विषय से इतर मेरे द्वारा प्रेषित बतकही छपी है। जिसका शीर्षक है- "खुरचा हुआ चाँद"। 

आज "विश्व मातृ दिवस" के उपलक्ष्य में "प्रतिज्ञान" के उस विशेषांक "मातृत्व - पूर्णता या बोझ" को पढ़ने के लिए आपको "अमेज़न-किंडल (Amazon-Kindle)" के 'एप' तक जाना चाहिए .. शायद ...




शीघ्र ही "प्रतिज्ञान" द्वारा "अनकही" नामक एक 'डिजिटल' काव्य संग्रह भी प्रकाशित होने वाला है, जिसमें हमारी दो बतकहियों (अतुकान्त कविताओं) के भी प्रकाशित होने की संभावना है .. बस यूँ ही ...