Friday, August 30, 2019

चन्द पंक्तियाँ - (१४) - बस यूँ ही ...

(1)* नंगे अहसास
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हर अहसासों को
शब्दों का पोशाक
पहनाया जाए
ये जरुरी तो नहीं ...

कुछ नंगे अहसास
जो तन्हाई में
बस 'बुदबुदाए'
भी तो जाते हैं ...

(2)* रंगीन कतरनों में
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दर्जियों के
दुकानों से
रोज़ सुबह
बुहार कर
बिखेरे गए
सड़कों पर
बेकार
रंगीन
कतरनों में ...
अक्सर
ढूँढ़ता हूँ
पंख कतरे
अधूरे
बिखेरे
रंगीन
सारे सपने अपने ...

(3)* ज़ीने-सी
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आजकल एक
"ज़ीने"-सी
"जीने"
लगे हैं
शायद हम ...

अक़्सर तुम्हारे
अहसासों में
कभी 'उतर'
आता हूँ मैं ...

कभी 'चढ़'
आती हो
मुस्कुराती हुई
ख़्यालों में
मेरे तुम ...

6 comments:

  1. कुछ नंगे अहसास
    जो तन्हाई में
    बस 'बुदबुदाए'
    भी तो जाते हैं ...

    बहुत खूब भाई साहब ।
    पर बंजारों को ऐसे एहसास कभी याद नहीं रखने चाहिए

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    1. आपका मेरे पोस्ट तक आने के लिए आभार। पर आप ऐसा क्यों कह रहे कि याद नहीं रखने चाहिए !?
      आप पिछले कुछ दिनों पहले मेरे किसी पोस्ट पर एक प्रश्न चिपका कर , फिर हटा दिए। और भी कई पोस्टों या ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया देख रहा हूँ मैं इन दिनों।
      आप एक दुःखी आत्मा प्रतीत हो रहे है।
      आप से एक ब्लॉगर के नाते आज बात भी फ़ोन पर करना चाहा तो आप wrong number बोल कर काट दिए। फिर मेरा नंबर आपने reject call में डाल दिए।
      आप अपने किसी करीबी या रिश्तेदार से बात कर अपने सारे समस्याओं का निदान कर लीजिए या फिर किसी Psychiatrist से मिलिए।
      ज्यादा दिनों तक दुःखी रहेंगे तो बीमार पड़ जाएंगे आप। ख्याल रखिए अपना।

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  2. बेहद उम्दा प्रस्तुति

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