Thursday, January 8, 2026

बूँदों का बतंगड़ ...


देखा है मैने एक सपना,
या कि .. की है एक कल्पना, 
कि हो .. पास हमारे झरने का ग़ुलगपाड़ा, 
चेहरे पे हों हमारे बूँदों का बतंगड़।
हों दूर तक पर्वत-श्रृंखलाएं 
ओढ़े हुए चीड़ के बीहड़।
हो वहाँ चाय की एक झोपड़ी,
जिसमें सुलगती-सी हो चीड़ की लकड़ी।
धुआँ-धुआँ-सी आग में जिसकी 
कुछ सेंकती, कुछ उबालती,
भुट्टे कुछेक एक मासूम-सी लड़की।



और छिलकों पे भुट्टों के परोसती

हम जैसे सैलानी अपने ग्राहकों को

नर्म-गर्म सिंके-उबले भुट्टे के संग 

नमक-नींबू-मिर्ची की चटक जुगलबंदी।

अपने दोनों हाथों में लिए तुम भुट्टे

एक में सिंके और दूसरे में उबले हुए।

सिंका हुआ स्वयं खाती-चबाती-गुनगुनाती

और उबला हुआ मुझे खिलाती-पुचकारती,

अपने-अपने स्वाद के अनुसार और वहीं 

गुड़ वाली गर्मागर्म कड़क चाय से भरे 

भाप उगलते हों दो अदद कुल्हड़।

और .. 

वहीं पर .. 

नर्म-नर्म बुग्याल पर

हो आग़ोश में एक-दूजे की बैठी 

हम दोनों की एक अदद जोड़ी।

और हों .. 

हम दोनों के दोनों ही अल्हड़।

लिपटते, चिपटते, खुल्लम-खुल्ला,

हो जैसे प्यार हमारा 

मानो ..  बस्स ! .. 

खुला खेल फर्रुखाबादी ..बस यूँ ही ...







Monday, January 5, 2026

'इत्यादि' का इत्यादि ...





क्या ...

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

गोरों के लिए काले पानी वाली तेज़ाबी आँधी हूँ मैं ?

या ..

आज़ादी के नाम पे हुए उस बँटवारे की बर्बादी हूँ मैं ?

या ..

कर्ज़दार विवश आत्महंता किसान की त्रासदी हूँ मैं ?

या ..

आत्महंता किसान के अनाथ परिवार की आधि हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

भ्रष्टाचारी का ख़ाकी या सज़ायाफ़्ता की खादी हूँ मैं ?

या ..

बढ़ती ज्यामितीय आकार से वतन की आबादी हूँ मैं ?

या ..

विकास की आड़ में कुदरती आपदा की मुनादी हूँ मैं ?

या ..

धर्मनिरपेक्ष होकर भी आरक्षण भोगी जातिवादी हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

निःसहाय, परवश बलात्कृत की झीनी आपत्ति हूँ मैं ?

या ..

राजा-महाराजाओं के अंतःपुर, हरम की व्युत्पत्ति हूँ मैं ?

या ..

एक प्रेम-निशानी परन्तु समाज की अवैध संतति हूँ मैं ?

या ..

व्यभिचारी नरों की जननी, कोठेवाली की उपाधि हूँ मैं ?


क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

अंधपरंपराओं को रीति-रिवाज मानने का आदी हूँ मैं ?

या ..

पृथ्वी का वर्तमान भर या पूरे ब्रह्माण्ड का आदि हूँ मैं ?

या ..

हूँ जीवन रेखा से बँधा नश्वर शरीर भर या अनादि हूँ मैं ?

या ..

वीर्य-बूँद से भस्म तक का राही, आज मांस-पिंडी हूँ मैं ?

बिहारी था कभी, राज्य बँट जाने से अब झारखंडी हूँ मैं ?

Saturday, January 3, 2026

विह्वल कुतिया
























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Thursday, December 11, 2025

आखि़र में है लिखा नाम उस फ़ेहरिस्त के ...


अभी-अभी आज ही रविवारीय सुबह हमने,

उठायी है एक पर्ची 'स्टडी टेबल' से अपनी।

लिखीं हैं जिस पर एक लम्बी-सी फ़ेहरिस्त,

जाग कर देर रात तक कल मेरी धर्मपत्नी।


माह भर के रसद सामग्रियों के साथ-साथ,

तेल-मसाले, साबुन-मंजन जैसी चीज़ें भी।

सुबह जागने से रात सोने तक महीने भर में

इस्तेमाल करने वाले सामान सभी के सभी।


अरहर दाल दो किलो, एक किलो मूंग दाल,

झींगोरा दो किलो, चावल पाव भर बासमती।

हल्दी पाउडर, कसूरी मेथी, 'मिलेट्स' दलिया,

साबुत धनिया ढाई सौ ग्राम, सौ ग्राम मेथी भी।


बेसन व गुड़ एक-एक किलो, खांड पाव भर,

रसोईघर में है जो चीनी और मैदे पर पाबन्दी !

'कोल्ड क्रीम', 'हेयर डाई', भीमसेनी कपूर और

साथ में 'बटर पेपर', 'नैपकिन पेपर' तक भी।


अंत में फ़ेहरिस्त के लिखा दिखा एक और नाम,

लिखावट है जिसकी बदली, पर है तो पहचानी।

दरअसल ये लिखावट है एक सरकारी स्कूल में

पढ़ने वाली तेरह वर्षीया हमारी प्यारी बिटिया की।


मित्रवत् व्यवहार ने ही हमारे बना पाया है जिसे 

इतना बिंदास कि वह कह सके हर बातें मुझसे भी,

हर महीने .. अपने मुश्किलों से भरे चार दिनों की 

पीड़ाओं और उस ... 'सैनिटरी नैपकिन' की भी।


हाँ .. हाँ .. आपने सही सुना .. आखि़र में है लिखा

नाम उस फ़ेहरिस्त के .. 'सैनिटरी नैपकिन' का भी।

लंद-फंद-देवानंद जग भर के करके आप शरमाते नहीं,

समक्ष बेटियों के 'पैगें' तो बनाते हैं, बढ़ाइए पींगे भी .. बस यूँ ही ...


Thursday, December 4, 2025

'सायरन' वाली गाड़ी

आज तड़के सुबह सक्सेना जी के पड़ोस में रहने वाले पैंसठ वर्षीय वर्मा जी स्वर्ग सिधार गए हैं। तभी से ही मुहल्ले भर में उनके घर से लगातार ज़ोर-ज़ोर से रोने-बिलखने की आवाज़ें आ रही हैं। 

हम इंसानों की ये एक अजीबोग़रीब विडंबना है कि .. हम विभिन्न धामों की तीर्थयात्राएँ कर-कर के अपने लिए मरणोपरांत तथाकथित स्वर्ग या जन्नत की कामना करते हुए मन्नतें माँगते तो ज़रूर हैं .. परन्तु हम मरना भी नहीं चाहते हैं। जबकि हमारे जन्म के साथ ही हमारे साथ मौत की भी एक चिट चिपकी हुई होती है .. जिसको हम सभी ताउम्र नज़रंदाज़ करते रहते हैं। पर वह चिट हमारी तमाम अवहेलनाओं के बावजूद हमें समय-समय पर ताकीद भी करती रहती है और एक दिन .. वही चिट चट से हमारी ज़िन्दगी चट कर जाती है .. शायद ...

फ़िलहाल मृतक वर्मा जी के घर जाने के बाद वहाँ के मातमी माहौल में काफ़ी देर तक बिना दाना-पानी के रहने का अंदेशा है सक्सेना जी और उनके परिवार को भी। 

दरअसल उनके परिवार में सक्सेना जी मधुमेह से पीड़ित हैं तो .. ज़्यादा देर तक वह खाली पेट नहीं रह सकते हैं। साथ ही श्रीमती सक्सेना आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त और कफ जैसे तीन जैविक दोषों में से वात दोष से कुछ ज़्यादा ही परेशान रहती हैं। गैस की दवाईयों के सेवन के बाद भी दिन-रात विभिन्न प्रकार की ज़ोरदार आवाज़ों वाली ध्वनि प्रदूषण करती रहती हैं। यानी .. अब .. सरल व आम बोलचाल की या ठेठ भाषा में कहें तो .. वह दिन-रात पादती रहती हैं या डकारती रहती हैं। ऐसे में .. वह भी अधिक देर तक भूखे पेट नहीं रह सकती हैं।

इसीलिए सक्सेना जी के परिवार के चारों सदस्यों ने .. वह, उनकी धर्मपत्नी, उनका बेटा और उसकी पत्नी यानी सक्सेना जी की बहू ने भी किसी तरह ज़ल्दी-ज़ल्दी में रात की बची हुई बासी रोटी पर 'जैम' और कल सुबह के बचे हुए 'ब्रेड' के कुछ 'स्लाइस' पर 'फ्रीज' में रखे हुए 'बटर' को लगा कर अपना-अपना मुँह जूठा लिया है। 

'इंडक्शन' पर ही आनन-फानन में चाय भी बना ली गयी है। क्योंकि लोकलाज और समाज के रीति-रिवाज़ों का भी .. औपचारिक ही सही .. पर निर्वाह तो करना ही पड़ता है। लोगबाग कहते हैं,  कि पड़ोस में किसी का मृत शरीर पड़ा हो, तो अपने घर में भी चूल्हा नहीं जलाया जाता है .. भले ही वह चूल्हा .. गैस वाला ही हो। 

वैसे भी .. अगर ताज़ा नाश्ता 'इंडक्शन' पर ही बनाया भी जाता तो .. कड़ाही-छोलनी की छनर-मनर की या 'प्रेशर कुकर' की सीटी की आवाज़ या फिर कुछ छौंके जाने पर तेल-मसाले के गंध के साथ-साथ छनन-छन्न की आवाज़ से अगल-बगल में पोल खुल जाने पर वर्षों तक जगहँसाई का भी डर बना रहता है।

खैर ! .. सक्सेना जी और उनके परिवार के सभी सदस्य अभी अपने घर पर ही जल्दी-जल्दी नाश्ता-पानी करने के बाद एक आम मध्यम वर्गीय परिवार की तरह ही नाश्ते के पश्चात चाय पीने की परम्परा को निभाते हुए .. अब मृत वर्मा जी के घर जा कर उनके शोक संतप्त परिजनों को सांत्वना देने वाली औपचारिकता निभाने की तैयारी कर रहे हैं।  

चाय की चुस्की लेते हुए अचानक सक्सेना जी भावुक होकर अपने इकलौते बेटे-बहू को सम्बोधित करके एक जागरूक नागरिक की तरह कहते हैं, कि - " देखो बेटा .. हम मरेंगे ना .. तो हमको विद्युत दाह गृह में ही जलाना .. नौ मन लकड़ी मत खरीदना .. क्योंकि उसके लिए पेड़ों को काटे जाते हैं और .. उन सब कटाव के परिणामस्वरूप हमारे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। "

प्रतिक्रिया स्वरूप श्रीमती सक्सेना जी तमक और छोह के मिश्रित भाव के साथ अपने धर्मपति को सम्बोधित करके बोल पड़ती हैं, कि - " का (क्या) भोरे-भोरे (सुबह-सुबह) अपने मुँह से फ़ालतू बात बोल रहे हैं जी ! .. मरे आपका दुश्मन .. "

तभी यकायक मुहल्ले में प्रवेश करती हुई 'सायरन' वाली एक गाड़ी की आवाज़ से सक्सेना जी के घर के सभी लोग चौंक जाते हैं। वैसे भी अपने देश में आपातकालीन वाहनों की ख़ास 'सायरन' की आवाज़ हमेशा आम आदमी के दिल की धड़कन बढ़ा ही देती है .. चाहे वह ख़ाकी वर्दी वाले किसी आला अफ़सर या परिवहन विभाग के उच्च अधिकारी की गाड़ी के 'सायरन' की आवाज़ हो या अग्निशामक ('फायर ब्रिगेड' यानी दमकल) गाड़ियों की हो या फिर किसी 'एम्बुलेंस' की हो।

अभी उत्सुकतावश सक्सेना जी और उनके अन्य तीनों परिजन बाहर की ओर झाँके तो .. देखते हैं कि .. उस 'सायरन' बजाती हुई गाड़ी पर 'एम्बुलेंस' या कुछ और लिखे होने की जगह "दधीचि देहदान समिति, बिहार" लिखी हुई है।

पौराणिक कथाओं में दधीचि ऋषि और उनके अस्थि दान के बारे में पढ़ने-सुनने के कारण दधीचि शब्द से तो सक्सेना जी परिचित हैं। परन्तु यह देहदान शब्द पढ़ कर सक्सेना जी चौंकते हुए जिज्ञासावश पूछ बैठते हैं कि - " अरे ! .. ई (ये) का (क्या) है हो (जी) ? "

अब तक 'सायरन' वाली गाड़ी वर्मा जी के घर के सामने जाकर रुक गयी है। तभी सक्सेना जी की नई नवेली बहू सभी की चाय पी गई जूठी प्यालियों को उठाते हुए बतलाती है कि - " पापा जी .. ये देहदान वालों की गाड़ी है। लगता है कि .. वर्मा जी 'अँकल' अपने जीते-जी इस का 'फॉर्म' भर दिए होंगे। "

सक्सेना जी एकदम से अचम्भित होकर अपनी बहू से ही पुनः पूछते हैं कि - " देहदान ? .. 'फॉर्म' ? .. हम कुछ समझे नहीं बहुरानी .. "

चाय की जूठी प्यालियों को 'किचेन' के 'सिंक' में आहिस्ता से रखते हुए उनकी बहू - " पापा जी .. इसमें समझने जैसी कोई बात ही नहीं है। अपने देश में मृत देह को दान करने के लिए एक संस्थान है। ये उसी की गाड़ी आयी है। "

सक्सेना जी - " अच्छा ! "

बहू - " हाँ पापा जी .. देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति को अपने जीते-जी इस संस्थान के एक 'फॉर्म' भर को भर कर उस पर अपने परिवार के दो सदस्यों के हस्ताक्षर के साथ-साथ अपनी स्वीकृति के लिए अपना भी हस्ताक्षर करके वहाँ जमा करना होता है। "

सक्सेना जी - " उससे क्या होता है बहुरानी ? .."

बहू - " मृत व्यक्ति के परिवार द्वारा तयशुदा समय-सीमा में इन लोगों को सूचित करने पर ये लोग मृत व्यक्ति के दिए गए पते पर आकर बहुत ही आदरपूर्वक मृत देह ले जाते हैं। मृतक के उपयोगी अंगों को बाद में कई ज़रूरतमंद लोगों को शल्य चिकित्सा द्वारा लगा कर उन्हें नया जीवन प्रदान किए जाते हैं। जैसे .. आँखें, 'लिवर', 'किडनी'.. और भी बहुत कुछ और .. और तो और .. शेष बचा हुआ कंकाल 'मेडिकल स्टूडेंटस्' की पढ़ाई के काम में आ जाता है। "

सक्सेना जी अचरज के साथ - " अच्छा ! "

बहू - " और नहीं तो क्या ! .. जिन्हें अपने देश में परम्परा के नाम पर हम सभी मृत देह के साथ हर दिन हज़ारों की संख्या में .. बस यूँ ही .. जला या दफ़ना देते हैं पापा जी। "

सक्सेना जी -" हाँ बहू .. सही ही कह रही हो तुम तो .. "

बहू - " पापा जी .. देहदान ना भी किया जाए तो .. कम-से-कम नेत्रदान से तो पूरे विश्व भर के अंधापन को मिटाया जा सकता है। हालांकि.. ये सब कुछ .. सरल-सुलभ है। अगर हम लोग पूर्वजों की परम्पराओं के साथ-साथ वर्तमान पीढ़ी की सोचों की भी क़द्र करनी सीख जाएँ पापा जी। हो सकता है कि .. वो सारी परम्पराएँ तब के संदर्भ में उचित रही होंगी। वैसे भी .. नया ज्ञान साझा करने में क्या ही बुराई हो सकती है भला ! "

तभी उनका बेटा नाराजगी जताते हुए अपनी धर्मपत्नी को लगभग झिड़कते हुए कहता है, कि - " क्या बके जा रही हो जी तुम सुबह-सुबह .. पापा ने तो तुमसे भी ज़्यादा दुनिया देखी हुई है ना ? "

तत्क्षण श्रीमती सक्सेना भी अपने बेटा के हाँ में हाँ मिलाते हुए बोल पड़ती हैं कि - " आउर (और) नहीं तो का (क्या) जी ! "

तभी बहू अपने पति को सम्बोधित करते हुए नम्रता के साथ बोलती है कि -   " हम कब भला पापा जी के अनुभव और उनकी समझदारी से असहमत हैं जी। हम तो केवल ये बतलाना चाह रहे हैं कि .. समय के साथ हमारे पकवानों व परिधानों में होने वाले परिवर्तनों के साथ-साथ हमारी परम्पराओं में भी यथोचित परिवर्तन होनी ही चाहिए। "

सक्सेना जी - " बहू ठीक ही कह रही है बेटा .. चलो .. अभी जल्दी से वर्मा जी के घर चलो। नहीं तो उ (वो) गाड़ी उनको लेकर चली जायेगी .. और हाँ .. चलो .. ज़रा उनलोगों से देहदान के 'फारम' ('फॉर्म) भरने की प्रक्रिया के बारे में भी हमको अपने लिए भी समझना है। "

अब सक्सेना जी के परिवार के चारों सदस्य देहदान की एक नूतन व सकारात्मक विचारधारा लिए हुए अपने पड़ोसी वर्मा जी के शोकाकुल परिवार से मिलने उनके घर की ओर पैदल ही प्रस्थान कर रहे हैं।

Friday, November 28, 2025

है आतुर चरित्रहीन मुझ-सा .. बस यूँ ही ...

हम सभी अपनी-अपनी आपाधापी भरी ज़िन्दगी में एक-दूसरे को अक्सर कहते मिलते हैं, कि - " यार ! वक्त ही नहीं मिल पाता। " किन्तु हमारा सारा वक्त तो हमारे पास ही होता है; जोकि सबको समान रूप से ही मिलता है। पर वक्त कब, कहाँ, कैसे और किसको देना है, ये प्रायः तय होता है .. हमारी चाहतों या प्राथमिकताओं के आधार पर .. शायद ...

अगर हम और आप अपनी इन्हीं आपाधापी भरी ज़िन्दगी में से केवल 15 मिनट का समय चुरा पाए;  तो फिर .. हम और आप मिलकर बतकही करेंगे। अपनों के बारे में, अपनापन के बारे में, स्नेह, श्रद्धा और प्रेम के बारे में, अनाम रिश्तों के बारे में, मन के आरोही-अवरोही विज्ञान के बारे में, उत्तराखंड के पहाड़, बर्फ़ और बादलों के साथ-साथ प्रेम-प्रस्तुति में पत्थरों की अहम भूमिका के बारे में।

आपको बस, केवल आपके अपने चहेते Smart मोबाइल फ़ोन में Google के Search Option में

"AIR Dehradun" को Type करनी है। 
जिसके परिणामस्वरूप आए कई Options में से पहले वाले Option को ही Click करते ही 

Screen पर ये AIR Dehradun वाला Page आ जाएगा।

 बस उस Page के Video वाले Sign पर उंगली से दबाते ही

आपका आधुनिक Radio cum Transistor चालू ...

इस तरह आप मानो यकायक किसी Time Machine की तरह मोबाइल के आधुनिक युग से रेडियो-ट्रांजिस्टर के पुरातन युग में प्रवेश कर जायेंगे।

तो बस्स ! .. आइए ! .. 30 नवम्बर, दिन - रविवार को रात 8 बजे AIR यानी All India Radio, Dehradun से होने वाले 15 मिनट के एक यादगार प्रसारण (Broadcasting) को सुनने का यथासंभव प्रयास करते हैं।

वैसे भी .. 30 नवम्बर को हिंदी पंचांग के अनुसार रात के 9 बज कर 29 मिनट तक रेवती नक्षत्र के शुक्ल पक्ष की दशमी है और हिंदी पंचांग के अनुसार ही रात के 8 बजे तक तथाकथित राहु काल की भी समाप्ति हो चुकी होगी। 

तो फिर .. तैयार हो जाइए .. मीन राशि वाले रेवती नक्षत्र के शुक्ल पक्ष की चाँदनी रात की बरसती चाँदनी में भींगते हुए .. रिश्तों की, प्यार की और गोलार्द्ध चाँद की भी बतकही सुनने के लिए और सुनकर महसूसने के लिए .. बस यूँ ही ...


फ़िलहाल .. चलते-चलते एक ताजातरीन बतकही भी : - 


है आतुर चरित्रहीन मुझ-सा .. बस यूँ ही ...


आए हैं आप शायद 

दिखलाने आईना मुझे

इस भरी महफ़िल में,

पर दिखेगा केवल

मुखौटा भर मेरा,

जान नहीं पायेंगे आप

बात जो है अभी मेरे दिल में।

देखना जो हो अगर कभी 

मुखौटे से बाहर मुझे और

मन को भी मेरे दिगम्बर रूप में,

दिगम्बर स्वरूप में, तो यक़ीन मानिए ..

आप आ जाइए कभी 

रात के अँधियारे में या 

फिर मेरी तन्हाई में कभी।

घूरिए फिर दूर से मेरे

मुखौटाविहीन दिगम्बर मन को

किसी सीसीटीवी कैमरे के जैसे।


थूकेंगे तब तो आप अवश्य मुँह पर मेरे,

जैसे थूका था कभी "बसंती" ने

"शोले" में "गब्बर" के मुँह पर

और हँस भी दें शायद आप

"वेलकम" वाले " 'गैंगस्टर'- उदय शेट्टी " बने

नाना पाटेकर की तरह

और बोलने भी लगें आप शायद ..

" मिर्ज़ापुर " के " लाला " वाले 

उस किरदार के संवाद, 

किसी 'मीम' के माफ़िक़ मुँह पर ही मेरे, 

कि .. " बड़े हरामी हो बेटा ! "

निःसंदेह .. आप थूकना मुँह पर मेरे,

हँसना भी मुझ पर ज़ोर से और ..

ठहराना हरामी भी मुझे, पर .. ज़रा ठहरिए .. 

क्योंकि कह रहा हूँ मैं अभी आपसे,

एक अन्य 'मीम' की तरह ही ..

कि .. " अभी रुको ज़रा ! " ..  " पिक्चर अभी बाकी है। "


क्योंकि .. कीजिएगा ये सब तभी,

साथ मेरे आप सभी .. किया ही नहीं हो जब 

जीवन में अपने आपने कभी एक बार भी ...

हस्तमैथुन .. हस्तमैथुन यानी 'मैस्टर्बेशन' ,

'मैस्टर्बेशन' तो .. समझते ही होंगे आप ? 

और शायद ... किया भी होगा 

आपने कभी ना कभी ? 

और हाँ .. वासनायुक्त होकर उस दरम्यान,

अपने किसी एक या कई-कई 'क्रशों' को 

कर-कर के बिंबित अंतर्मन में,

अपनी आँखें मूंदे बिस्तर पर अपने,

ना किया हो आपने नग्न,

"वीनस" या "डोरीफोरस" के जैसे ..

कई-कई दिगम्बर अवतारों में।

तब तो .. बेशक .. आएँ आप यहाँ ..

हर तरह से दण्डित होने के लिए ..

है आतुर चरित्रहीन मुझ-सा .. बस यूँ ही ...

          

गैंगस्टर = Gangster 

मीम = Meme

मैस्टर्बेशन = Masturbation

क्रश = Crush

वीनस = Venus de Milo

डोरीफोरस = Doryphoros




{ चित्र (मूर्ति) सौजन्य से - सालारजंग संग्रहालय, हैदराबाद. }

{ Pic (Statue) Courtesy - Salar Jung Museum, Hyderabad. }

Tuesday, November 25, 2025

बित्ते भर का छोकरा ...


सुबह के साढ़े सात बजे एक आम मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के घर में .. करीब नौ वर्षीय बिट्टू 'स्कूल' जाने की तैयारी में पीठ पर 'बैग' लादे हुए ही 'डाइनिंग टेबल' के सामने कुर्सी पर बैठा सुबह का नाश्ता कर रहा है ; ताकि अगर 'स्कूल ऑटो' का 'हॉर्न' नीचे फाटक पर बजे तो वह अपने पहले तल्ले वाले 'फ़्लैट' से दौड़ता-भागता हुआ नीचे 'ऑटो' तक शीघ्र भाग कर जा सके।

बग़ल वाली कुर्सी पर उसके पापा चाय की चुस्कियों के साथ-साथ आज के ताज़ा अख़बार की ताज़ी ख़बरों पर अपनी नज़रें दौड़ा रहे हैं। उनके बग़ल में बिट्टू की दादी माँ बैठीं सामने 'टी वी' पर " आस्था 'चैनल' " से सुबह-सवेरे प्रसारित होने वाले भक्ति के कार्यक्रमों को देख-सुन रहीं हैं। दरअसल दादी माँ स्नान करने की प्रतीक्षा में बैठी हैं , क्योंकि बिट्टू की 'मम्मी' 'बाथरूम' से नहा कर अभी निकलने ही वाली हैं .. शायद ...

शहरों में किराए के 'टूबीएचके' वाले 'फ़्लैट' में जब एक ही 'कंबाइंड लैट्रिन बाथरूम' हो .. तब तो यूँ ही 'एडजस्ट' तो करना ही पड़ता है। जिनमें होता है .. एक 'डाइनिंग हॉल' या 'डाइनिंग स्पेस' कह लीजिए, उसी के बग़ल में 'किचेन' और .. उससे सटा हुआ या सामने एक 'कंबाइंड लैट्रिन बाथरूम' का अंदर की तरफ़ खुलने वाला दरवाज़ा या कहीं- कहीं बाहर की तरफ़ भी .. शायद ...


अक्सर 'बालकॉनी' में गौरैयों, कबूतरों या पंडुकों की आवाज़ें सुनकर ख़ुश होने वाला बिट्टू .. अचानक 'बालकॉनी' से कुछ कौवों की काँव- काँव की आवाज़ें अभी अपने कानों में पड़ते ही ख़ुश होते हुए अपनी दादी से कहता है - " दादी माँ ! देखो आज कौवा भी आया है। "

दादी माँ - " हाँ रे ! .. लगता है आज अपने घर कोई ना कोई मेहमान आने वाला है .. तभी तो ये लोग इतना हल्ला कर रहे हैं। "


बिट्टू - (हँसते हुए) " नहीं दादी माँ .. कोई आने- जाने वाला नहीं है अपने घर में आज .. वो तो सामने वाले 'पार्क' के पास जो कूड़े के ढेर पड़े रहते हैं ना ! .. वहीं पर कल शाम से ही एक मरा हुआ 'स्ट्रीट डॉग' पड़ा हुआ है। उसी के 'ऑपरेशन' में ये लोग सुबह से ही लगे हुए हैं। "

दादी माँ - " राम- राम .. "

बिट्टू - " उन्हीं में से कुछ को प्यास लगी है, तो वही लोग 'बालकॉनी' में .. जो चिड़ियों के लिए बर्त्तन में मम्मी पानी रखती हैं ना ! .. वही पानी पी रहे हैं .. "


तभी फाटक पर 'स्कूल ऑटो' के 'हॉर्न' की आवाज़ सुनकर बिट्टू - " 'बाय पापा', 'बाय मम्मी', 'बाय' दादी माँ " कहता हुआ .. हड़बड़ी में प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही .. तेज़ी के साथ 'फर्स्ट फ्लोर' से नीचे की ओर सीढ़ियों को नापता हुआ भाग कर चला जाता है और उसी समय .. 'बाथरूम' खाली हो जाने पर दादी माँ नहाने के लिए 'बाथरूम' की ओर .. मन ही मन भुनभुनाती हुई प्रस्थान करती हैं, कि - " हमने सालों दुनिया देखी है और ये हम ही को समझाने चला है। अब ये बित्ते भर का छोकरा हमारी बात काटने चला है .. हँ .. ना त् .. ! "


[अब आप सभी भी यहाँ से प्रस्थान कीजिए 🙏 और जाइए .. जाकर अपने-अपने कामों को निपटाइए। दिन-रात केवल अपने-अपने 'मोबाइल' और 'सोशल मीडिया' में मत खपते रहिए 😀 .. बस यूँ ही ...]