Friday, April 17, 2026

"पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !"


"पंचम वेद ...", "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !", और "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !" के बाद आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (४)_ 'प्रोपेगैंडा' !", परन्तु दो भागों में - "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" एवं "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !"। 

चूंकि इस बार का आलेख अति लम्बा होता चला गया है, तो "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" अगले अंक में एवं .. आज केवल "पंचम वेद ... (४-अ)_ 'प्रोपेगैंडा' !" .. आप सभी की नज़रों एवं निगहबानी के लिए  :-

क्योंकि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " ...


प्रोपेगैंडा ( Propaganda ) और वर्तमान :-

अभी हाल ही में देखे-सुने गए समाचार के अनुसार महाराष्ट्र के नासिक में TCS जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में एक समुदाय विशेष के कर्मचारियों द्वारा हिन्दू महिला कर्मचारियों को साजिशन प्रेम जाल में उलझा कर या 'इन्क्रीमेंट' व 'प्रमोशन' का लालच देकर लव जिहाद, धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न जैसी कुकर्मों को गत चार वर्षों से अंजाम दिया जा रहा था। 

साथ ही .. आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती में उसी समुदाय विशेष के मात्र 19 साल के छोकरे द्वारा, जो AIMIM नामक राजनीतिक दल से भी जुड़ा है, हालांकि ये आलेख लिखे जाने तक .. अब तक उसे दल से निलम्बित किया जा चुका है, साजिशन लगभग 180 हिन्दू युवतियों व नाबालिग लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाकर उनका यौन शोषण किया जा रहा था और उनका अश्लील वीडियो बनाकर भयादोहन (Blackmail) भी किया जा रहा था। 

अब इन कुत्सित व भयावह घटी घटनाओं के दस-बीस साल बाद अगर इन सच्ची घटनाओं पर फ़िल्में बनेंगी, तब भी उन फ़िल्मों को हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी समाज के कुछ आवश्यकता से अधिक बुद्धिमान लोग 'प्रोपेगैंडा' कहने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे .. शायद ...

यूँ तो भिन्न-भिन्न मतों के लोग हर कालखंड में रहते आए हैं, तो स्वाभाविक है कि वर्तमान में भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे ही। मत भिन्नता के लिए विषय तो कुछ भी हो सकता है। जैसे .. इन दिनों फंतासी से परे और देश-समाज को आईना दिखलाती सच्ची घटनाओं पर आधारित कुछ फ़िल्में प्रदर्शित हुईं हैं, तो कुछ लोगों के लिए सच्ची घटनाओं पर आधारित ये फ़िल्में उन घटनाओं का एक अंश मात्र भर ही है ; जबकि वास्तविकता इससे भी ज़्यादा भयावह थी या .. है। वहीं .. कई लोगों के लिए ये फ़िल्में एक 'प्रोपेगैंडा' मात्र है, जो वर्तमान सरकार को खुश करने के लिए और एक समुदाय विशेष को बदनाम करने के लिए बनायीं गईं हैं .. शायद ...

जब कि उन फ़िल्मों को बनाने के लिए प्रेरित करने वाली सच्ची भयावह घटनाओं का सही-सही अनुमान उन्हीं परिवारों को है, जिनकी हथेलियाँ उन पाशविक दुर्घटनाओं रूपी गर्म तवे पर पड़ी हैं। सामने से केवल देख कर तवे के तापमान का अनुमान नहीं लगाया जा सकता .. है ना ? 

इस बार तीन साल पहले प्रदर्शित हुई जिस फ़िल्म की चर्चा करनी है, उससे पहले चौंतीस साल पूर्व 1992 में दिल दहलाने वाली जिस सच्ची घटना पर वह फ़िल्म आधारित थी, उस घटना की हमें ताक-झाँक करनी होगी। परन्तु इससे भी बेहतर होगा, उससे भी पहले आठ सौ चौंतीस साल पुराने 1192 के इतिहास के पन्नों को टटोलना। फिर तो चौंतीस साल और आठ सौ चौंतीस साल पूर्व की घटनाओं को दोहराने के बाद इस फ़िल्म को बनाने की वज़ह हमें पूर्णतः ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ जाएगी। तभी उस फ़िल्म के लिए भी तथाकथित 'प्रोपेगैंडा' वाला फैलाया गया भ्रम दूर हो पाएगा .. शायद ...


आठ सौ चौंतीस साल पहले 1192 में :-

उपलब्ध इतिहास के अनुसार एक ईरानी- मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ तथाकथित हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ बारहवीं शताब्दी के अंत में लगभग 1192-93 के आसपास मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत में लाहौर होते हुए अजयमेरू आया था और मुहम्मद ग़ोरी द्वारा अजयमेरू को जीतने से पहले तत्कालीन प्रशासनिक एवं राजनीतिक केन्द्र अजयमेरू के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए मुहम्मद ग़ोरी के कहने पर अपने शार्गिदों के साथ बस गया था। वही अजयमेरू बाद में शायद मुस्लिमों द्वारा अपभ्रंश हो कर अजमेर हो गया होगा।

अजयमेरू में पृथ्वीराज चौहान के दादा जी- अर्णोराज यानी आना जी चौहान द्वारा एक ऐतिहासिक कृत्रिम झील- आना सागर झील और विष्णु के तथाकथित तीसरे अवतार- वराह का मन्दिर भी बनवाया गया था। इतिहास के अनुसार .. जहाँ मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय को क़त्ल करते थे और मंदिर परिसर में ही बैठकर गोमांस खाते भी थे। उनकी मंशा मंदिरों को अपवित्र कर के हिंदुओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की थी। 

दरअसल सूफी संत का पैरहन ओढ़ कर प्रेम, शान्ति और मानवता के संदेशों को फैलाने के नाम पर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ़ हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ उन दिनों इस्लामिक जिहाद को विस्तार दे रहा था। जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत की विसात बिछाने का काम बख़ूबी किया जा रहा था। धर्मांतरण और साम्राज्यवाद के लिए क्रूरता की सारी हदें पार की गयीं थीं। 

धर्मांतरण के लिए राजी नहीं होने पर इन्हीं सूफ़ी-संतों के फ़रमान पर तथाकथित बहत्तर हूरों की चाह में तथाकथित शरिया क़ानून, ग़ज़वा-ए-हिंद और जिहाद की आड़ में उनके शागिर्दों ने हज़ारों-लाखों पुरुषों का कत्लेआम किया और महिलाओं-लड़कियों को जबरन अपनी हवस की आग में झोंक दिया था। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर मोइनुद्दीन हसन चिश्ती और उसके तमाम शागिर्द हिंदू विरोधी, गौ हत्यारे और मन्दिर-मूर्ति भंजक थे।

इतिहास के गर्त में ऐसे दसों उदाहरण हैं औलिया-फ़कीरों के जो अपने तमाम शागिर्दों के साथ भारत के कई हिस्सों में मुस्लिम आक्रांताओं के साथ इस्लामिक जिहाद को बढ़ावा देने, तथाकथित काफ़िरों के धर्मांतरण करने और इस्लाम का प्रचार करके उसे स्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए थे।

हालांकि उपलब्ध इतिहास की मानें तो पैगम्बर मोहम्मद के तथाकथित आदेशानुसार मोइनुद्दीन हसन चिश्ती ने जीवन के आख़िरी वर्षों में दो शादियाँ की थी। इतिहास के कई पन्नों में तो कुछ शागिर्दों द्वारा उसे हिंदू लड़कियों-महिलाओं को उपहार स्वरूप पेश किए जाने का भी ज़िक्र मिलता है।

इस्लामिक विचारकों और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा सदियों उपरोक्त होने वाले क्रूर हिंसात्मक उत्पीड़न की वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर सदियों से प्रेम, शान्ति, मानवता और भाईचारे के मिथक रूप में प्रस्तुत करने के क्रम में .. मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के मरणोपरांत अजमेर में बने उसके अजमेर शरीफ़ नामक दरगाह को एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में पेश किया गया। जहाँ आज भी कई हिन्दू लोग भी तथाकथित चादर चढ़ाने जाते रहते हैं। रही-सही कसर पूरी करते हुए बम्बईया फ़िल्मों द्वारा इस स्थल को शिरडी और साईं बाबा की तरह ही ख़ूब महिमामंडित करने का भी ये दुष्परिणाम है।

एक और भी महत्वपूर्ण कारण और स्रोत भी रहा है उपरोक्त महिमामंडन का, क्योंकि .. सर्वविदित है कि स्वतंत्रता के पूर्व उच्च विद्यालय सहित उसके नीचे और ऊपर की कक्षाओं के लिए भी इतिहास के पाठ्यक्रमों को औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रेरित होकर बनाए गए थे, जिनमें ब्रितानी शासन को सभ्य बनाने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया था। उसी प्रकार स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्र भारत में भी जब, अब तक की सबसे लंबी अवधि 11 वर्षों तक बने रहने वाले, शिक्षा मंत्री- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा तत्कालीन सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की धर्म निरपेक्षता के नाम पर पक्षपाती नीति की आड़ लेकर हिंदू विरोधी मुग़ल काल को आक्रांताओं के काल की जगह उस काल के आक्रांताओं को नायकों की तरह इतिहास के पाठ्यक्रम में दम भर महिमामंडित किया गया था।

हालांकि उसी समुदाय से इंसानियत को ही अपना धर्म- मज़हब मानने वाले भी कई लोग हुए हैं और आज हैं भी। परन्तु उन सभी की जनसंख्या "ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन" वाले मुहावरे को भी चरितार्थ करने लायक नहीं हैं .. शायद ...

ऐसे लोगों में से प्रसिद्ध लोगों में स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल ग़फ्फार ख़ान, शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान, विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम, लालोन फ़कीर, गायक मोहम्मद रफ़ी, रचनाकार निदा फ़ाज़ली, लेखक सह पत्रकार व विचारक तारिक़ फ़तह, लेखिका इस्मत चुगताई व तस्लीमा नसरीन, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफ़ज़ई के नाम स्वतःस्फूर्त मस्तिष्क में आ जाते हैं। इनके अलावा उस समुदाय के वो सभी सच्चे सैनिक लोग जो देश के लिए जीते हैं एवं देश के लिए ही कभी-कभी शहीद भी हो जाते हैं और वो सभी कलाकार या आमजन भी, जो .. साजिशन या जबरन किए जाने वाले धर्म परिवर्तन व यौन शोषण को हराम मानते  हैं और ग़ज़वा-ए-हिंद जैसे दुष्टता व मक्कारी भरे सपने भी नहीं देखा करते हैं .. शायद ...


चौंतीस साल पहले 1992 में :-

1959 में अजमेर के जयपुर रोड में मीर शाह अली कॉलोनी में दस एकड़ में महिलाओं की शिक्षा के लिए डॉ हाजी मोहम्मद दाऊद शरीफ द्वारा स्थापित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्वायत्त शिक्षण संस्थान है- सोफिया गर्ल्स कॉलेज, जिसे अब तक NAAC (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा 'A+' ग्रेड मिल चुका है। हालांकि इस ग्रेड के बिना मिले भी .. 1992 में भी यह लड़कियों के लिए उस शहर का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान था।

पुनः उस एक 'पॉपुलर डायलॉग' - " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त " के आधार पर .. अब शेष बातें ज़ल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (४-ब)_ 'प्रोपेगैंडा' !" के साथ .. जिसमें होगी .. 1992 में घटी चौंतीस साल पहले की दुर्घटना और उस पर आधारित बनी फ़िल्म की बातें .. बस यूँ ही ...

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