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Friday, May 8, 2026

एहसासों की धूप ...

हमारे जीवन के दो मूल मंत्र सर्वविदित हैं, कि .. (१) परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है .. और (२) जीवन में जो भी घटित होता है, हमारी भावी अच्छाई के लिए ही होता है। मैं तो मेरे जीवन में इन दोनों ही मूल मंत्रों को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।

अब यदि इस परिवर्तनशील दुनिया एवं जीवन में हर दिन, हर पल खुशियों से भरा होना असम्भव है ; तो हमारे जीवनकाल में भी कष्टकारी क्षणों को कभी-ना-कभी आना तय है। ऐसे में मेरा मानना होता है, कि प्रकृति ने शायद उन कष्टकारी क्षणों में भी हमारी कोई भावी भलाई तय कर रखी होगी। इस तरह .. इस सोच से कुछ हो या ना हो, पर मन में सकारात्मकता कूट-कूट कर भरी रहती है।


हमारे दुःख-कष्ट भरे दिनों में भले ही हमें क्षणिक मानसिक, शारीरिक या आर्थिक उलझनों से गुजरना पड़े भी तो .. वो सारे के सारे क्षण हमें एक अनमोल पाठ अवश्य पढ़ा कर जाते हैं, कि हमारे आसपास के सगों की भीड़ में भी सच्चीमुच्ची कौन अपना व कौन पराया है या औपचारिक रिश्तों की भीड़ में भी एक-दो कौन सगा-सा है। 


इस तरह हम अपने अच्छे दिनों में जिन रिश्तों को अपने मन से लगाए बैठे होते हैं, वही रिश्ते बुरे दिनों में केवल औपचारिकता की खानापूर्ति भर निकलते हैं। ऐसे में उन औपचारिक रिश्तों की छद्म अपनापन की पोल की धज्जी उड़ जाती है और औपचारिक रिश्तों के मकड़जाल से हमें छुटकारा मिल पाता है।


हमारे बुरे वक्त ही हमारे सम्बन्धों के 'लिटमस पेपर' होते हैं, जो सामने वाले की औपचारिक सहानुभूति के छलावे और सच्ची समानुभूति की सहायता व आत्मीयता वाले अन्तरों को पारदर्शी बना देते हैं .. शायद ...


आपको आपके अब तक के जीवनकाल में कभी उपरोक्त अनुभूति हुई है क्या ? मुझे तो अपने जीवनकाल में ऐसा मुख्यतः दो बार अनुभव हुआ है। एक बार जब 2021 के कोरोनाकाल में लगभग ढाई माह तक स्वयं-पृथकवास (Self-Isolation) में रहकर मौत का निवाला बनते-बनते रह गया था। दूसरी बार गत दिसम्बर माह 2025 में एक भीषण दुर्घटना के तहत गंभीर चोटिल होने के बाद अस्पताल और अस्पताल के शल्य चिकित्सा कक्ष (Operation Theatre) के बिस्तर से लेकर घर के बिस्तर तक के सफ़र को तय करते हुए पाँच माह बाद भी अभी तक पूर्णतः स्वस्थ होने के लिए प्रतीक्षारत रहते हुए .. बस यूँ ही ...


ख़ैर ! .. आगे .. आज की बतकही के तहत २१ मई २०२६, मंगलवार को प्रसार भारती के तहत आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित होने वाले साहित्यिकी कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग तेरह मिनट के काव्य पाठ में हमारी सात बतकहियों (कविताओं) को आप सुन सकते हैं। जिनमें स्नेह, प्रेम और श्रद्धा में लिपटे रिश्तों के कई स्वरूपों को चंद शब्द-चित्रों में सजाने का प्रयास भर किया है हमने। हमारी आज की बतकही का शीर्षक- "एहसासों की धूप ..." भी इन्हीं बतकहियों में से किसी एक का वाक्यांश है .. बस यूँ ही ...


आप भी अपनी रचनाओं को लेकर सम्भवतः अपने-अपने शहर में अवस्थित प्रसार भारती के आकाशवाणी या दूरदर्शन केन्द्र जाते ही होंगे। अगर अभी तक नहीं गए हैं, तो परिपक्व रचनाकारों के अलावा .. विशेषतौर पर जो नवोदित(ता) रचनाकार हैं, उन्हें भी अपनी रचनाओं को लेकर वहाँ जाना ही चाहिए और सम्बन्धित विभाग के अधिकारी से मिल कर वहाँ अपना नाम पंजीकृत करवा लेना चाहिए। 



एक बार किसी भी शहर के प्रसार भारती के कार्यालय में आपका नाम पंजीकृत हो जाने पर वह पंजीकरण समस्त भारतवर्ष के प्रसार भारती के लिए मान्य होता है। फिर तो आप अपनी स्वरचित व अप्रकाशित चयनित रचना (कविता, कहानी, आलेख) को वहाँ के तयशुदा कार्यक्रम के लिए पढ़ सकते हैं। आपकी चयनित रचना की 'रिकॉर्डिंग' के बाद उसका प्रसारण किया जाएगा। उस प्रसारण के कुछ दिनों बाद इसके बदले सरकार द्वारा तय प्रसारण शुल्क (Fee of Broadcasting) के तौर पर कुछ धनराशि भी आपके बैंक खाता (Bank Account)  में स्वतः आ जाएगी।



तो .. आइए .. फ़िलहाल .. आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित होने वाले तेरह मिनट के उपरोक्त काव्य पाठ को निम्न 'यूट्यूब' पर सुनते हैं .. बस यूँ ही ... 👇👇👇