Friday, April 3, 2026

हाथीपैला का शरबत ...


इस फूल को सिक्किम में
हाथीपैला कहा जाता है, जिसकी पंखुड़ियाँ लगभग एक छिले हुए केले के पाँच खण्डों में बँटे छिलके की तरह होती हैं। यह फूल मधुर और सुगन्धित होने के कारण चमगादड़ इन की तरफ़ काफी आकर्षित होते हैं। ये फूल हरसिंगार या महुआ के फूल की तरह ही खिलने के बाद केवल एक रात के बाद झर कर ज़मीन पर बिछ जाते हैं। इस फूल के खिलने का मौसम लगभग वसंत ऋतु होता है यानी .. लगभग मार्च से जून तक।   



इसके पेड़ के पत्ते की अत्यधिक लम्बाई-चौड़ाई के कारण इसे Dinner Plate Tree यानी खाने की थाली वाला पेड़ भी कहा जाता है। इस फूल को पश्चिम बंगाल में रोसु कुंडा, English में Bayur Tree बोलते हैं और इसका Scientific नाम है- टेरोस्पर्मम एसरीफोलियम (Pterospermum acerifolium) परन्तु हिंदी भाषी क्षेत्र में इसे ही कनक चंपा, मुचकुंद या पद्म पुष्प कहा जाता है।



यह वृक्ष अपने देश भारत के कुछ तटीय राज्यों के साथ ही म्यांमार में भी पाया जाता है। म्यांमार .. जिसे 1989 से पहले बर्मा कहा जाता था और 1937 के पहले यह भारत का ही हिस्सा था।  

इसके पत्ते और छाल चेचक व खुजली की दवा बनाने में उपयोग किए जाते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो खांसी, वात-पित्त दोष, त्वचा संबंधी विकारों व बवासीर के उपचार में इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग किया जाता है। परन्तु आज हम आधुनिक रासायनिक दवाओं के सामने इन प्राकृतिक उपहारों को अनदेखा करते जा रहे हैं .. शायद ...

इसके वृक्ष की लाल रंग की लकड़ी से तख्ते, बक्से या दराज आदि बनाये जाते हैं।

संस्कृत में एक प्राचीन श्लोक के अनुसार -

मुचकुन्दः क्षत्रवृक्षचित्रकः प्रतिविष्णुः।

मुचकुन्दः शिरःपीड़ापित्तस्रविषानाशनः।

अर्थात् -

मुचकुंद, क्षत्रवृक्ष, चित्रक और प्रतिविष्णु इसके पर्यायवाची हैं। यह सिरदर्द, पित्त दोष, रक्तस्राव संबंधी विकारों को दूर करता है और विष प्रभाव (Toxic effects) के उपचार में भी सहायक होता है।


आयुर्वेद के अनुसार कनक चंपा के फूलों के शरबत में औषधीय गुण भरपूर होता है। जो शरीर के ठंडक और श्वसन संबंधी विकारों में राहत प्रदान करता है। साथ ही पित्त नियंत्रण और सूजन कम करने का काम करता है। इसके शरबत का सेवन बुखार, सिरदर्द और पाचन सम्बन्धी समस्याओं में भी बहुत ही लाभप्रद है। 



अब शरबत बनाने के लिए .. सबसे पहले तो अपने आसपास इसके वृक्ष की तलाश कीजिए। चूंकि इसके फूलों के खिलने का मौसम लगभग मार्च से जून तक होता है। तो इन दिनों अगर इसके फूलों से भरा वृक्ष दिख जाए .. और वृक्ष से फूल तोड़ा गया हो तो बिना धोए अन्यथा अगर टपके हुए फूलों को ज़मीन से उठाया गया हो, तो हल्का-सा धोकर आठ-दस फूलों को किसी शाम में ही एक बर्त्तन में फूल डूबने भर पानी में डालकर रात भर के लिए छोड़ दीजिए। 

फिर सुबह-सुबह उसे छान कर स्वादानुसार मधु या गुड़ मिला कर या फिर अगर आप मधुमेह से पीड़ित हैं, तो बिना शक्कर के भी पी सकते हैं। औषधीय प्रभाव के साथ-साथ इसकी भीनी-भीनी सुगन्ध से आपको तरोताज़गी मिलेगी और मानसिक तृप्ति भी।
वैसे सालों भर इस फूल का शरबत पीने के लिए इसके फूलों का सुखौता बना कर रखा जा सकता है। अगर आपके मुहल्ले, गाँव-शहर में इसका वृक्ष नहीं भी है, तो उदास होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि .. कई Online Market Platforms पर इसका सुखौता क्रय-विक्रय के लिए उपलब्ध है।

अब अगर आपकी रुचि ऐसे अनमोल प्राकृतिक उपहारों के बारे में जानने और चखने में है, तो आशा है कि आपको इसका शरबत अच्छा लगेगा .. शायद ...


अब .. मैं तो चला .. भीनी-भीनी सुगन्ध से सराबोर और औषधीय गुणों से सम्पन्न
हाथीपैला यानी मुचकुंद के फूलों का शरबत पीने के लिए .. बस यूँ ही ...







2 comments:

  1. कुछ अलग सा
    वंदन

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    1. जी ! .. सादर नमन संग हार्दिक आभार आपका ...

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