Thursday, April 11, 2024

पुंश्चली .. (३८) .. (साप्ताहिक धारावाहिक)


प्रत्येक वृहष्पतिवार को यहाँ साझा होने वाली साप्ताहिक धारावाहिक बतकही- "पुंश्चली .. (१)" से "पुंश्चली .. (३७)" तक के बाद पुनः प्रस्तुत है, आपके समक्ष "पुंश्चली .. (३८) .. (साप्ताहिक धारावाहिक)" .. बस यूँ ही ...  :-

गतांक का आख़िरी अनुच्छेद :-  

वैसे तो मंगड़ा को 'आईपीसी' की धारा यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत सुगिया के बलात्कार के लिए आजीवन कारावास की सजा हो सकती थी, परन्तु .. भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अनुसार उसी सुगिया की हत्या के अपराध के लिए उसे मृत्युदंड से दंडित किया गया है। अब ऐसे में माखन का अगला क़दम क्या होगा या हो सकता है .. उसे अगले भाग में देखते हैं .. बस यूँ ही ...

गतांक के आगे :-

एक नाबालिग बाला के बलात्कार और हत्या के एक अपराधी के लिए संविधान सम्मत और विधिवत् मृत्युदंड की घोषणा हो चुकी है। 

जिससे आए हुए समाचार पत्रों के सभी पत्रकारों को अपने-अपने समाचार पत्रों के भावी कल वाले मुखपृष्ठ की  'हेड लाइन' के साथ-साथ .. उनके 'कैमरा मैनों' के 'कैमरों' को भी मन भर ख़ुराक मिल गयी है; वह भी इसलिए कि अभी चुनाव का मौसम नहीं है, वर्ना .. उस मौसम में तो मुखपृष्ठ की 'हेड लाइनों' पर तो सभी विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं-मंत्रियों के मौखिक जूतमपैजार का ही एकाधिकार रहता है। 

साथ ही दूरदर्शन के विभिन्न ख़बरी 'चैनलों' से आये हुए 'प्रेस रिपोर्टरों' को भी आज तो जैसे दिन-रात अपने-अपने 'चैनलों' पर चलाते रहने के लिए 'ग्राउंड ज़ीरो' से एक 'रेडीमेड बाइट' मिल गयी है। अगर आज भी 'मोबाइल' के विभिन्न 'ऐप्पों' व 'टी वी' के कई 'चैनलों' के प्रकोपों से साप्ताहिक, पाक्षिक या फिर मासिक पत्रिकाओं की दुर्गति नहीं हुई होती तो .. कई सारी पत्रिकाओं के 'कवर पेज' पर भी आज की ये घटना अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने की मादा रखती है।

इन सभी 'रिपोर्टरों' के अलावा अधिकतर लोगबाग को तो केवल इस घटना से दो-चार दिनों तक या फिर ज्यादा से ज्यादा सप्ताह या पन्द्रह दिनों तक के लिए चर्चा का एक विषय भर मिल गया है। अगर टपोरी भाषा में कहें तो .. एक मसाला मिल गया है, जिसकी चटखारे के साथ चर्चा कर-कर के ये सभी बस अपने आप को एक पाक-साफ़ और चरित्रवान इंसान होने की स्वघोषणा करते नज़र आयेंगे। 

पर वास्तव में .. ऐसा ही कुछ .. मंगड़ा या माखन या फिर रेशमा व मन्टू के लिए भी है क्या ? या .. हो सकता है क्या ? ना .. ना-ना .. कदापि नहीं .. मंगड़ा तो वैसे भी गूँगा है .. कुछ बोल ही नहीं सकता .. केवल "उं .. आँ .." करने के ; पर माखन तो जैसे .. आख़िरी फ़ैसला आते ही .. नाउम्मीद होकर एक विद्युत बाधित शिथिल यंत्र की तरह बेजान-से हो गए हैं। अभी भी कचहरी की प्रक्रिया का आख़िरी दौर चल रहा है .. तभी रेशमा की नज़रों के सामने से अचानक-से अपनी शिथिलता त्यागते हुए .. माखन विद्युत गति से .. यूँ गए और यूँ आ गए हैं वापस .. उनके पीछे-पीछे मन्टू भी भागा और वापस भी आया है। 

अब वापस आए हुए माखन के हाथ में, भरसक छुपाने का असफल प्रयास करते हुए, एक बड़ा-सा चाकू है .. जिसे देख कर रेशमा किसी भावी अनहोनी के भय से मन्टू की ओर सवालिया निगाह से देख रही है। मन्टू के अनुसार माखन चच्चा पास वाले होटल में सलाद काट रहे कारीगर के हाथ से चाकू झपट कर ले आये हैं। 

अभी मन्टू ये सब रेशमा को बतला ही रहा है, तब तक माखन चच्चा अपने पास ही खड़े दो-चार सिपाहियों के क़ब्ज़े में हथकड़ी लगे मंगड़ा की ओर मानो अपनी समस्त संचित ऊर्जा से सिंचित होकर लपके हैं और ... कचहरी में या आसपास उपस्थित सभी गणमान्य बुद्धिजीवी लोग या फिर जनसाधारण को कुछ भी समझने से पहले और सिपाहियों के रोकते-रोकते .. उन्होंने उसी सलाद काटने वाले चाकू से ज़बरन मंगड़ा के पायजामे का नाड़ा काट दिया है .. शायद ...

ले लोट्टा !!! .. सभी सभ्य जनों के समक्ष मंगड़ा के पायजामे का नाड़ा कटते ही उसका पायजामा सर्र-से नीचे सरक गया है और वह कमर के नीचे से पूरी तरह नंगा हो गया है .. फलस्वरूप अचानक एक हड़कंप-सा मच गया है .. सभी के सभी .. जो कोई भी सामने से मंगड़ा को नंगा देख पा रहे हैं .. सभी की आँखें अचरज से फ़ैली हुई हैं .. साथ में सभी 'कैमरा मैनों' के 'कैमरे' की आँखें भी फिर से खुल गयीं हैं। कुछेक की भृकुटियाँ भी तन गयीं हैं .. अचरज व क्रोध के मिश्रित भाव लगभग सभी के चेहरे से झलक रहे हैं .. सभी की आपसी कानाफूसी वाली बुदबुदाहट से कमरे में एक अजीबोग़रीब माहौल बन गया है।

रेशमा - " अरे ! .. मन्टू भईया ! .. ये मंगड़ा तो हमारी तरह ही हिजड़ा है ! .. हाय राम ! .. "

मन्टू - " हाँ ! .. वो तो अब दिख रहा है .. फिर भला मंगड़ा कैसे बलात्कार ... "

रेशमा - " चच्चा ने तो ऐसा कभी बतलाया भी नहीं था .."

जैसे .. एक कमजोर कुतिया के भी पिल्ले को अगर कोई बड़ी चार पहिया वाली गाड़ी चोटिल कर देती है, तो वह उस गाड़ी या गाड़ी के मालिक की तुलना में कमजोर होते हुए भी प्रतिक्रियास्वरुप अपनी ताक़त भर भौंकने से नहीं चूकती है .. वैसे ही .. तभी दहाड़ मारते हुए अपनी पूरी ताक़त के साथ माखन चिल्ला-चिल्ला कर जज साहब को सामने से बोल पड़ते हैं ...

माखन पासवान - " साहिब !!! .. हमारा मंगड़ा हिजड़ा ही पैदा हुआ था और आज भी हिजड़ा ही है तो .. तो ये भला सुगिया के साथ वो सब काम कैसे कर सकता है ? .. जज साहिब ये तो उसको अपना बहन मानता था .. हर साल उससे राखी बँधवाता था .. फिर ... "

जज साहब - " फिर ये बात आज तक तुम ने 'कोर्ट' के सामने दलील देते हुए क्यों नहीं रखी थी ? "

माखन पासवान - " साहिब ! .. हमारी मज़बूरी थी .. हम तो मंगड़ा के जनम के समय ही जान गए थे कि ये हिजड़ा पैदा हुआ है। फिर भी आज तक बड़ी मुश्किल से हम और हमारी मेहरारू मिलकर सारे गाँव-घर से ये बात छुपाए रहे .. "

जज साहब - " क्यों भला ? "

माखन पासवान - " आप लोग तो पढ़े-लिखे हैं .. आप लोगों को तो दुनिया भर की जानकारी है। आप तो जानते ही हैं कि हमारे समाज में हिजड़े के साथ लोग कैसे पेश आते हैं। "

जज साहब - " आज तो ऐसी बातें नहीं हैं। आज तो इनके पक्ष में कई सारे क़ानून बनाए गए हैं .. "

माखन पासवान - " ये सब कहने की बातें हैं जज साहिब .. पर क्या सच में स्थिति बदली है ? नहीं साहिब .. नहीं .. अगर इसके जनम के समय ये बात खुल जाती तो हिजड़े लोग उठा कर इसको ले जाते अपनी टोली में शामिल करने के लिए .. जो हम दोनों .. मियाँ-बीवी को मंजूर नहीं था साहिब .. भला कैसे अपनी औलाद को अपनी आँखों से दूर जाते हुए बर्दाश्त कर पाते .. ? .."

जज साहब - " मगर .. अगर पहले ये भेद बतला दिए होते तो 'केस' का रुख़ कुछ और होता .. "

माखन पासवान - " हम ज़ाहिल लोग .. आप पढ़े-लिखे लोगों पर बहुत भरोसा करते हैं साहिब .. हमने भी अपनी सारी जमा-पूँजी लुटा कर .. इन वक़ील साहब पर बहुत भरोसा रखे साहिब .. सोचे कि ये वक़ील साहेब हमारे मंगड़ा को बचा लेंगे, क्योंकि ..  ये तो ऐसा कुछ किया भी तो नहीं था .. "

जज साहब - " फिर .. अचानक अभी ये भेद खोलने का मतलब ? .."

माखन पासवान - " अरे साहिब ! .. हम दोनों प्राणी इसके जनम के बाद से ही कोई भी संतान की कामना नहीं किए .. समाज-पंडितों के अनुसार वंश चलाने जैसी बातों को भी दरकिनार करके .. सारा का सारा अपना प्यार-दुलार इसी पर लुटा दिए .. अब आज .. इसी मंगड़ा के फ़ाँसी लगने की नौबत आ गयी है तो .. क्या करें .. सच को सामने लाना हमारी लाचारी हो गयी है साहिब .. "

जज साहब - " तुम्हारी आज की इस बयानबाजी ने तो .. इस 'केस' की फिर से सुनवाई करने के लिए हम सभी को मज़बूर कर दिया है और .. साथ ही .. सही मायने में हिजड़ा कौन-कौन है ? .. ये एक प्रश्न-चिन्ह खड़ा कर दिया है .. "

माखन पासवान - " हिजड़ा ? .. हिजड़ा तो खाली हमारा मंगड़ा है साहिब .. है ना साहिब  ? .."

जज साहब - " नहीं माखन .. तुम्हारा मंगड़ा तो शारीरिक रूप से भले ही हिजड़ा हो सकता है, पर .. इस 'केस' में तो .. मानसिक रूप से सबसे बड़ा हिजड़ा तो .. सुगिया की लाश का 'पोस्टमार्टम रिपोर्ट' तैयार करने वाली 'डॉक्टरों' की 'टीम', इस 'केस' की तहकीकात करने वाली ख़ाकी वर्दीधारियों की 'टीम', मंगड़ा के विरुद्ध झूठी  गवाही देने वाले सारे गवाह, उसके विरुद्ध झूठे सबूत इकट्ठा करने वाले लोग, 'केस' लड़ने वाले दोनों पक्षों के वक़ील और वास्तव में उस नाबालिग सुगिया के साथ बलात्कार करने वाला बलात्कारी व उसका हत्यारा भी है .. इन सारे हिजड़ों से अपने समाज-देश को हम सभी को मिलकर मुक्त कराने की आवश्यकता है .. शायद ..."

 【आज बस .. इतना ही .. अब शेष बतकहियाँ .. आगामी वृहष्पतिवार को ..  "पुंश्चली .. (३९) .. (साप्ताहिक धारावाहिक)" में ... 】

2 comments:

  1. जीमने में देर हो गयी इस बार | समाज को बहुत सारी मुक्तियां १९४७ और ७० साल से तो मिल ही चुकी है | अबकी बार फिर से मुक्तिवाहनी सरकार के लिए १९ तारीख को मतदान अवश्य करें |

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    1. जी ! .. सुप्रभातम् सह नमन संग आभार आपका .. देर से ही सही, पर जीमने के लिए .. ठीक-ठीक .. फ़ारसी के कहावत - " देर आयद दुरस्त आयद " को चरितार्थ करते हुए :) और .. रही बात मतदान की तो .. जिस दिन से 'ऑनलाइन' मतदान जैसे तकनीक की सुविधा आ जायेगी, उसी दिन से हमारे जैसे प्रवासी मतदान-सुख पा सकेंगे .. फ़िलहाल तो आप सभी आज इस वर्ष के लोक सभा के चुनाव के प्रथम चरण के मतदाताओं को सुमति की शुभकामनाएँ .. ताकि हमारे देश में एक कल्याणकारी सरकार आ सके .. शायद ...
      ऐसे पलों में "सर्फ एक्सेल" के विज्ञापन की वो Punch Line अनायास याद आ गयी कि - "कुछ दाग़-धब्बे अच्छे होते हैं " .. तो .. आप सभी सौभाग्यशाली जन को आज की ऊँगली पर उकेरी गयी स्याही की अग्रिम मुबारक़बाद .. बस यूँ ही ...

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