Friday, May 8, 2020

बेचारी भटकती है बारहा ...



सारा दिन संजीदा लाख रहे मोहतरमा संजीदगी के पैरहन में
मीन-सी ख़्वाहिशें मन की, शाम के साये में मचलती है बारहा

निगहबानी परिंदे की है मिली इन दिनों जिस भी शख़्स को
ख़ुश्बू से ही सिंझते माँस की, उसकी लार टपकती है बारहा

सोते हैं चैन की नींद होटलों में जूठन भरी प्लेटें छोड़ने वाले
खलिहानों के रखवालों की पेड़ों पे बेबसी लटकती है बारहा

मुन्ने के बाप का नाम स्कूल-फॉर्म में लिखवाए भी भला क्या
धंधे में बेबस माँ बेचारी हर रात हमबिस्तर बदलती है बारहा

पा ही जाते हैं मंज़िल दिन-रात साथ सफ़र करते मुसाफ़िर
पर यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ रेल बेचारी भटकती है बारहा

आवारापन की खुज़ली चिपकाए बदन पर हमारे शहर की
हरेक शख़्सियत संजीदगी के लिबास में टहलती है बारहा
                           
                               

Thursday, May 7, 2020

मेरे हस्ताक्षर में ...

हाशिए
पर पड़ी
ज़िन्दगी
उपेक्षित
कब होती
है भला !?
बोलो ना ...
सखी ..

संपूर्ण
पन्ने का
मूल्यांक
और
मूल्यांकन व
अवलोकन को
सत्यापित
करते
हस्ताक्षर
ये सभी तो
होते हैं
हाशिए पर ही ...

फिर .....
हाशिए
पर पड़ी
ज़िन्दगी
उपेक्षित
हो सकती है
कैसे भला ?
बोलो ना ...
सखी ..

मैं हूँ भी
या नहीं
हाशिए पर
तुम्हारे
जीवन के
पन्नों के

किन्तु
कागज़ी
पन्नों के
हाशिए पर
चमकता है
बार-बार
अनवरत
गूंथा हुआ
तुम्हारा नाम
मेरे नाम
के साथ
आज भी
मेरे हस्ताक्षर में ...

हाँ ..
आज भी
हाँ ...
सखी ..
आज भी ...



Tuesday, May 5, 2020

गुलाबी सोना ...

आज हम लोग "कतरनों और कचरे से कृतियाँ - हस्तशिल्प - (भाग-1,2,3.)" के सफर को Lockdown-3.0 की अवधि में आगे बढ़ाते हुए..
कतरनों और कचरे से कृतियाँ - हस्तशिल्प - (भाग-4,5,6.) की ओर  चलते हैं .. और एक बार फिर से मन में दुहराते हैं कि ..
1)
आओ आज कतरनों से कविताएं रचते हैं 
और मिलकर कचरों से कहानियाँ गढ़ते हैं।
2)
नज़रें हो अगर तूलिका तो ... कतरनों में कविताएं और ...
कचरों में कहानियाँ तलाशने की आदत-सी हो ही जाती है ।



                                   बस यूँ ही ...
#Lock Down के बहाने - #Handicraft/हस्तशिल्प - (४).

यूँ तो Social Media पर " पेड़ बचाओ " की पैरवी करने वाले कई लोग एक-एक पौधे को 10-10, 15-15 लोगों द्वारा पकड़ कर वृक्षारोपण का स्वांग करने वाली Selfie चिपकाने/चमकाने में अकड़ महसूस करते दिखते हैं। जबकि उनके शयन-कक्ष, अतिथि-कक्ष और डाइनिंग-स्पेस में लकड़ी के बेशकीमती फ़र्नीचर उनकी दिखावटी विचारधारा को मुँह चिढ़ाती विराजमान दिख जाती है।
खैर ! मुखौटे वाले चेहरों और चरित्रों का क्या करना भला ! फ़िलहाल हम तो Lockdown के लम्हों में इन प्रायः फ़र्नीचर बनने के दौरान बढ़ई द्वारा लकड़ी को चिकना बनाने के लिए रंदा से छिले गए छीलन से सुन्दर सा फूल वाला Wall Hanging बनाते हैं।
बस अलग-अलग पेड़ों की अलग रंगों की लकड़ी के कुछ जमा किए गए छीलन, पुराने डब्बे से कार्डबोर्ड, हरसिंगार का सूखा बीज, पिस्ता का छिल्का, गेंहूँ के पौधे का डंठल, सूखा नेनुआ का बीज के संयोजन और फेवीकोल & कैंची के सहयोग से बन गया .. कमरे की दीवार की शोभा बढ़ाता एक प्यारा-सा (?) Wall Hanging ...☺😊☺...
           
                                       
                                         
                                


                                    बस यूँ ही ...
#Lock Down के बहाने - #Handicraft/हस्तशिल्प -( ५ ).

22 मार्च को 14 घन्टे की जनता-कर्फ्यू , फिर दो दिनों तक कुछ जिलों में लगे लॉकडाउन के बाद 21 दिनों के लिए सम्पूर्ण देश के लिए घोषित लॉकडाउन यानी आज 14 अप्रैल तक .. उस के बाद पुनः आज 19 दिनों यानी 3 मई तक के लॉकडाउन की घोषणा ... आइए .. समय का सदुपयोग करते हुए और अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा भरते हुए कुछ विस्तार देते हैं .. हस्तशिल्प को ... हस्तशिल्प कला को ...
पर नया कुछ करने से पहले आज लगभग 29 - 30 ( 1989 - 1990 ) साल पुरानी अपनी एक एकल हस्तशिल्प प्रदर्शनी के लिए बनायी हुई कई हस्तशिल्पों में से कुछ अवशेष बचीखुची पुरानी यादों पर पड़ी गर्द की परतों को हटाने का जी चाहा .. वैसे भी यादों को सहेजना किसे नही अच्छा लगता .. ख़ासकर जब यादें सकारात्मक हों, तब तो विशेषरूप से ... शायद ..
उस जमाने के रील वाले कैमरे की नेगेटिव से स्टूडियो के लैब में बने कार्डबोर्ड पर बने फोटो में से आज उस दिन का एक यादगार फोटो भी संयोगवश मिला .. जिनमें तीन-चार कोलाज़ ( Collage Art/ एक विधा ) के साथ-साथ टाइल्स ( Tiles Art ), एल्युमीनियम सीट ( Metal Art ), गेहूँ के डंठल ( Grass Art ), बालू ( Sand Art ),  टूटी चूड़ियों ( Bangle Art ),  सोला वुड ( Sola wood Art ), थर्मोकोल ( Thermocol Art ) इत्यादि से बने कुछ हस्तशिल्प पुरानी यादों को ताजा कराते .. मुस्कुराते हुए सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित कर गए ...
और आपको !? ... फिर मिलते हैं अगली बार किसी नए हस्तशिल्प के साथ ... इस लॉकडाउन की अवधि में ...☺
               
                             
                  टूटे-बेकार टाइल्स के टुकड़ों से बनाई हुई कृति
                                         
               गेहूँ के डंठल से बनी हुई कृति - सरस्वती
                एल्युमीनियम के चादर से 3D कृति - डॉ राजेंद्र प्रसाद

          गंगा के सफेद और सोन के सुनहले बालू से बनी कृति
                   एकल हस्तशिल्प प्रदर्शनी - 1989-90 में.

                                      बस यूँ ही ...
#Lock Down के बहाने - #Handicraft/हस्तशिल्प - (६).

समान्य विज्ञान का वर्त्तमान पुरोधा - गूगल बाबा के अनुसार विश्व में सोना उत्पादन में भारत 10वें स्थान पर है, परन्तु खपत की दृष्टिकोण से पहले स्थान पर है, ख़ासकर गहने के रूप में खपत के मामले में। कहते हैं कि विश्व के सोना-उत्पादन का लगभग 50% सोना इस से गहना बनाने के काम में आता है।
सर्वविदित है कि सोना का शुद्धतम रूप काफी लचीला होने के कारण उसमें अन्य धातु मिलाकर ही गहना तैयार किया जाता है। अलग-अलग धातु अलग-अलग मात्रा/प्रतिशत में मिलाकर गुलाबी, पीला, पीला-हरा, पीला-गुलाबी, सफ़ेद जैसे कई रंगों के सोने के गहने बनाए जाते हैं। वैसे तो भारत में 22 कैरेट सोने के गहने को ही सही माना जाता है और ज्यादा उपयोग में लाया जाता है। बशर्ते वह हॉल मार्क वाला हो या सुनार ईमानदार हो। पर भारत के बाहर 18 कैरेट के और सफेद सोने (White Gold) के बने गहनों को ज्यादा पहना जाता है। एक और रोचक बात ... भारत में सोने के गहने पहनने और सहेजने के अनुपात अजीबोग़रीब है। शायद ... पहनने से ज्यादा सहेजने को प्राथमिकता दी जाती है।
जब सोना एक क़ीमती धातु है तो उसको विशेष रूप से सहेजना भी लाज़िमी है और रंगीन भी है तो फिर उसे रंगीन-चमकदार डब्बे में रखा जाए तो बात ही कुछ और होगी। कहते हैं ना ...सोने पे सुहागा।
इस तरह के बक्से या डब्बे को धड़ल्ले से हिन्दीभाषी लोग भी हिन्दी में ज्वेलरी-बॉक्स (Jewellery Box) या ऑर्नामेंट-बॉक्स (Ornament Box) कहते हैं। किन्हीं मातृभाषा प्रेमी और संस्कृति प्रेमी को विदेशी भाषा से परहेज़ हो और अगर विशुद्ध हिन्दी की बात करें तो इसे शायद आभूषण-मंजूषा कहा जा सकता है। है ना !?...
                  तो आइए बनाते हैं Lockdown-2.0 की अवधि में - आभूषण-मंजूषा ... जिसके लिए लेते हैं .. कुछ गत्ते, रुई, वेल्वेट/मखमली कपड़ों (Velvet Clothes) के टुकड़े, विभिन्न प्रकार के कुछ सजावटी कलई किए हुए शीशे, तरह-तरह के कुछ रंगीन गोटे, कैंची, स्केल, सुई-धागा, फेविकॉल और obviously मिले हुए Lockdown के घर में बिताने वाले समय  ... बस हो गया तैयार आभूषण-मंजूषा यानि Ornament Box. इसी तरह बना सकते हैं कई आकारों में Bangle Box.
चूँकि Lockdown -1.0 की घोषणा किसी पूर्व सूचना के अचानक ही की गई थी, तो बनाने के सारे पर्याप्त सामान पहले से उपलब्ध नहीं कर पाया था। अतः जो भी वर्षों पुराने सहेजे सामान समयाभाव में बस यूँ ही किसी कोने में पड़े थे उन्हीं से कुछ आधे-अधूरे Jewellery Box बन कर तैयार हैं , जिसे Lockdown खुलने के बाद पूरा करने की कोशिश रहेगी। इनमें एक Ornament Box पूर्णरूपेण तैयार है।
Lockdown तक ये हस्तशिल्प का सिलसिला जारी है ... वैसे .. आपको चाहिए क्या !? .. ये आभूषण-मंजूषा ...
           
                             
                                 
                               








हस्तशिल्प का ये सफ़र बस यूँ ही ... चलता रहे ... एक आशा - एक उम्मीद ...

Sunday, May 3, 2020

शोहरत की चाह में

                                (१)

समय और समाज को ही है जब तय करना जिसे
ख़ातिर उसके तू भला क्यों है इतना मतवाला ?
है होना धूमिल आज नहीं तो कल-परसों जिसे
काल और सभ्यता की परतों का बन कर निवाला

हो आतुर व्याकुल मन उस शोहरत की चाह में
क्यों पल-पल खंडित करता है अंतर्मन की शाला ?
हो मदांध शोहरत में ऐसे साहित्यकार बन बैठे
समानुभूति को भूल कर सहानुभूति रचने वाला ?

                                    (२)

किसी सुबह हाथ में चाय की प्याली, जम्हाई, सामने फैला अख़बार
या फिर किसी शाम वातानुकूलित कमरे में बैठा पूरा परिवार
उधर सामने चलते चालू टी वी के पर्दे पर चीख़ता पत्रकार
कहीं मॉब-लीचिंग में मारा गया कभी एक-दो, कभी तीन-चार
कभी तेज़ाब से नहाया कोई मासूम चेहरा तो कभी तन तो
कभी किसी अबला के सामूहिक बलात्कार का समाचार
इधर पास डायनिंग टेबल पर सजा कॉन्टिनेंटल डिनर
रोज की तरह ही भर पेट खाकर लेते हुए डकार
बीच-बीच में "च्-च्-च्" करता संवेदनशील बनता पूरा परिवार
अपलक निहारते हुए उस रात का चित्कार भरा समाचार

देख जिसे पनपती संवेदना, तभी संग जागते साहित्यकार
भोजनोपरांत फिर उन समाचार वाली लाशों से भी भारी-भरकम
सहेजना कई शब्दों का चंद लम्हों में मन ही मन अम्बार
कर के कुछ सोच-विचार, गढ़ना छंदों का सुविधानुसार श्रृंगार
मिला कर जिसमें अपनी तथाकथित संवेदना की लार
साहित्यकार करते हैं फिर शोहरत की चाह में एक कॉकटेल तैयार
फिर वेव-पृष्ठों पर सोशल मिडिया के करते ही प्रेषित-प्रचार
लग जाता है शोहरत जैसा ही कई लाइक-कमेंट का अम्बार

ना , ना, बिदकना मत मेरी बातों से साहित्यकार
वैसे तो क़ुदरत ना करे कभी ऐसा हो पर फिर भी ...
फ़र्ज़ करो मॉब लिंचिंग हो जाए आपकी या आपके रिश्तेदार की
या किसी दिन सामूहिक बलात्कार अपने ही किसी परिवार की
तब भी आप क्या रच पाओगे कोई रचना संवेदना भरी ?
आप क्या तब भी कोई पोस्ट करोगे सोशल मिडिया पर रोष भरी ?
नहीं .. शायद नहीं साहित्यकार ... तब होगी आपकी आँखें भरी
है शोहरत की चाह ये या संवेदनशीलता आपकी .. पता नहीं
साहित्यकार एक बार महसूस कीजिए समानुभूति भी कभी
सहानुभूति तो अक़्सर रखते हैं हम गली के कुत्तों से भी ...
है ना साहित्यकार ....???...







Friday, May 1, 2020

मजदूरिन दिवस

आज शोर है .. बहुत साहिब .. है ना ?
शायद .. आज मज़दूर दिवस है .. है ना ?
बैंक बंद .. बड़े-बड़े संस्थान बन्द
फैक्टरियाँ भी हैं बंद ... है ना ?
वैसे तो हैं बन्द ढेरों काम कई दिनों से
लॉकडाउन के कारण भी .. है ना ?

पर लगता है अब तक उतरी नहीं तुम्हारी
एक अप्रैल की अप्रैल-फूल वाली ख़ुमारी
तभी तो आज आप एक मई को भी
चटका रहे नसें साहिब हम सब की
मना रहे कई दिनों से लॉकडाउन में जब कि
बैठे ठाले मज़दूर दिवस हम मज़दूर सभी .. है ना ?

और हाँ ... मनाओगे कब भला साहिब
पुरुष-प्रधान समाज में आप सभी
मिल कर एक बार मजदूरिन दिवस भी
रोज़ चूल्हे की भट्ठी में खुद को जो झोंक रही
ढो रही बोझ आज के दिन भी अपने कोख़ की
पाल रही जिनमें तुम्हारी अगली पीढ़ी की कड़ी
एक बार तो सोचो उनके बारे में भी सही
मनाओगे ना साहिब मजदूरिन दिवस भी? ... है ना ?






Thursday, April 30, 2020

मेरी ख़ातिर गाओ ना पापा ...



● (अ) ख़ासकर गर्मी की छुट्टियों की दुपहरी में :-
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Storytelling यानी हिन्दी में जिसे कहानीकारी कहते हैं। हाँ , यही कहते हैं इस विधा को। जिसमें Storyteller अर्थात कहानीकार अपनी बात प्रभावी तरीके से कहता है।
कहानीकारी आज की युवा पीढ़ी के लिए ओपन मिक (Open Mic ) के मंच से रूबरू या यूट्यूब के माध्यम से इंटरनेट के माध्यम से अपने दर्शकों को कोई भी कहानी, घटना, संस्मरण या आपबीती संवेदनशील और जीवंत तरीके से कहने के लिए या यूँ कहें कि श्रोता या दर्शक के दिल में उतरने के लिए एक सशक्त माध्यम है।
कहानीकारी या Storytelling संज्ञा भले ही नयी युवा पीढ़ी को नयी लग रही हो पर बात पुरानी है। मोबाइल और टी वी के आने से पहले तक के बाल या युवा पीढ़ी के लिए अपने-अपने बुजुर्गों द्वारा रातों में या छुट्टी के दिनों में ख़ासकर गर्मी की छुट्टियों की दुपहरी में भावपूर्ण सुनाई गई राजा-रानी की कहानियाँ या जातककथाएं कहानीकारी ही तो थी। जिसमें कई दफ़ा हम डरते भी थे, रोते भी थे, हँसते-हँसते लोटपोट भी होते थे। किसी चलचित्र की तरह कहानी का पात्र और घटनाएँ आँखों के सामने से गुजरती हुई महसूस होती थी।
हिन्दी विकिपीडिया के अनुसार कहानीकारी (Storytelling) कहानियाँ बनाने व सुनाने की समाजिक व सांस्कृतिक क्रिया होती है। हर संस्कृति की अपनी कहानियाँ होती हैं, जिन्हें मनोरंजन, शिक्षा, संस्कृति के संरक्षण और नैतिक सिद्धांतों के प्रसार के लिये सुनाया जाता है। कहानियों और कहानिकारी में कथानक, पात्रों, घटनाओं और दृष्टिकोणों को बुनकर प्रस्तुत किया जाता है।


● (ब) सारे मर्द भोंकार पार कर रोने लगते हैं :-
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वैसे तो एक-दो और भी सदियों पुराने सशक्त उदाहरण हैं इस कहानीकारी के। वैसे इसे कहानीकारी कहने से शायद किसी की धार्मिक भावना आहत हो। तो इसको कहानीकारी जैसी कह सकते हैं। प्राचीनकाल में मनीषीजन अपने भक्तसमूह या भक्तवृंद को श्लोकों के माध्यम से मुँहजुबानी कथा के तौर पर ही तो सुनाया करते होंगे शायद।
पर शामे गरीबा तो इसका जीता-जागता उदाहरण है।
चूँकि हमारे पापा 90 के दशक में लगभग आठ वर्षों तक बिहार के सीवान जिला के हुसेनगंज प्रखंड में बिहार सरकार के मुलाज़िम थे, तो प्रायः छुट्टियों में वहाँ जाने और वहाँ की जिन्दगानी से रूबरू होने का मौका भी मिलता था। वहाँ के कुछ मूल निवासी तथाकथित शिया मुसलमानों से गहरी दोस्ती हो गई थी, तो हम दोनों एक दूसरे के त्योहारों और पारिवारिक या सामूहिक आयोजनों में बिंदास पारिवारिक सदस्य की तरह एक दूसरे के घर आते-जाते थे। तब आज की तरह कोई भेद-भाव नहीं होता था हमारे बीच। वैसे तो इंशा अल्लाह आज भी नहीं है। वहीं मुझे शामे गरीबा में शरीक होने का मौका मिला था।
मोहर्रम के समय कर्बला में ताजिया दफन करने के बाद शिया आबादी वाले इलाकों में शामें गरीबा की मजलिस आयोजित की जाती है। इस दौरान लोग बिना फर्शे अजा बिछाए खाक पर बैठ कर खिराजे अकीदत पेश करते हैं। मजलिस के दौरान चिराग गुल कर दिए जाते हैं। इस दौरान करबला का वाकया सुनाया जाता है। 
इन की मान्यता के अनुसार दस मोहर्रम को इमाम हुसैन को उनके 71 साथियों के साथ यजीदी फौज ने शहीद कर दिया और उसके बाद यजीदी फौज ने ख्यामे हुसैनी में आग लगा दी, जिससे ख्यामे हुसैनी के बच्चे सहम गए तथा यजीदी फौज ने इमाम हुसैन की बहन व नवासी ए रसूल जनाबे जैनब व अन्य औरतों की चादरें छीन लीं तथा शाहदते इमाम हुसैन के बाद यजीदी फौज ने इमाम हुसैन के छः  माह के बेटे हजरत अली असगर की कब्र खोदकर हजरत अली असगर के तन व सिर जुदा कर दिया तथा इमाम हुसैन की चार साल की बेटी जनाबे सकीना के गौहर छीन लिए थे।
शामे गरीबा की मजलिस में शाहदते इमाम हुसैन व असीरा ने कर्बला का बयान सुनकर अजादारों की आँखें नम हो जाती हैं। इसे सुनकर  उपस्थित जनसमूह विशेषकर सारे मर्द भोंकार पार कर रोने लगते हैं।
                                     तात्पर्य यह है कि कर्बला की शहादत को इतनी शिद्दत से कही जाती है कि सुनने वाला उस दृश्य में डूब कर ग़मगीन हो कर रोने लगता है। तो ये है ताकत कहानीकारी की।
                                    

● (स) मेरे सामने खड़ी मेरी बेटी मुझ से कह रही है :-
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हमने भी एक प्रयास किया है कहानीकारी की एक स्क्रिप्ट लिखने की और कहने/पढ़ने/अभिनीत करने की भी। इसे लिखते वक्त मैं स्वयं को उस बेटी का पिता महसूस कर रहा था। लिखते वक्त लग रहा था कि मेंरे सामने खड़ी मेरी बेटी मुझ से कह रही है ये सारी बातें। वही सारी बातें स्क्रिप्ट में उतर कर आई है। ना जाने क्यों आँखें बार-बार नम हो जा रही थीं हमारी।
                           गत वर्ष 07.04.2019 को एक Open Mic में युवाओं के बीच इसे पढ़ा भी था। जिसे उन लोगों ने यूट्यूब पर उपलोड भी किया था। इस कहानी/घटना में एक बेटी अपने ग़मगीन, ख़ामोश .. मौन पापा से अपनी बात कह रही है। पापा के मौन की वजह और बेटी की बातें या मनुहार का कारण आपको इस की स्क्रिप्ट से या वीडियो से पता चल जाएगा। इसके स्क्रिप्ट के साथ वो वीडियो भी संलग्न है आप लोगों के लिए।


● (द) मैं चीख़ती तो .. आप आते ना पापा? .. आते ना पापा?..
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 ( कहानीकारी का मूल स्क्रिप्ट :-)
" पापा ! .. आज फिर से एक बार मेरी ख़ातिर गाओ ना पापा। जो मेरे बचपन में अक़्सर मेरे लिए गाया करते थे आप - ' मेरे घर आई एक नन्हीं परी ... ' ... आप .. ख़ामोश क्यों हो पापा ? आपकी लाडली परी के पर क़तर दिए गए हैं इसीलिए ? बोलो ना पापा ! 
याद है पापा, जब पहली बार अपने कपड़े पर ख़ून के धब्बे देख कर कितनी डर गई थी मैं। कितनी घबरायी हुई स्कूल से घर आई थी मैं। पर जब माँ ने समझाया कि बेटा ! ये तुम्हारे बच्ची से बड़ा हो जाने का संकेत है। भगवान ने हम औरतों को ही तो ये अनमोल तोहफ़ा दिया है। हम मानव नस्ल की रचयिता हैं। हम पीढ़ी दर पीढ़ी की रचना करते हैं बेटी। तब मैं बहुत गर्व महसूस कर रही थी। आप कुछ बोल नहीं रहे थे। केवल मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। मैं कितना शरमा रही थी तब आप से। है ना पापा? रोज़ प्यार से आपके गले लगने वाली आपकी लाडली आपके सामने आने से भी क़तरा रही थी।
पर उस दिन तो ... उन चारों ने मिल कर नंगा ही कर दिया था पापा। पूरी तरह नंगा। मैं कितना शरमायी थी पापा। "

" याद है एक बार मेरी ऊँगली कट गई थी। ख़ून बह रहा था और मैं जोर-जोर से रो रही थी। आप दौड़े-दौड़े आनन-फानन में गलती से Dettol की शीशी ले आये थे मेरे पास ... मैं और भी जोर से रोने लगी थी। फिर आपको अपनी भूल की एहसास हुई थी और आप दुबारा जाकर Savlon की बोतल ले कर आये थे, क्योंकि आपको पता था पापा कि Dettol से आपकी लाडली बिटिया को बहुत जलन होती है। पर घर में तो रखना पड़ता है ना। कारण .. माँ को इसकी महक पसंद है।
पर उस दिन तो ना Dettol था और ना Savlon .. सिर्फ़ .. ख़ून .. दर्द .. और मैं ... मैं किस तरह झेल रही थी पापा ...। पर .. उन चारों को कोई एहसास नहीं था मेरे दर्द का। होता भी भला कैसे ? वे चारों भी तो उसी समाज की पैदाइश थे ना पापा, जहाँ बलि और क़ुर्बानी के नाम पर मासूमों का ख़ून बहाया जाता है। उस बलि और क़ुर्बानी के वक्त उन्हें उन निरीह मासूम पशुओं की चीख कहाँ सुनाई देती है भला? उनकी मौत और ख़ून पर जश्न मनाते हैं ये समाज वाले। मैं तो कम से कम ज़िन्दा हूँ ना पापा .. पर कतरी परी की तरह ही सही .. पर ज़िन्दा हूँ ना पापा? गाओ ना पापा -' मेरे घर आई एक नन्हीं परी .... ' "

" याद है ना पापा .. एक रात पढ़ते वक्त मेरे study table पर छत्त से छिपकली टपक पड़ी थी। मैं कितनी जोर से चीख़ी थी। याद है ना पापा ? आप दूसरे कमरे से शायद अपना favorite T.V. show .. रजत अंकल वाली 'आप की अदालत' .. वो भी अपने favorite artist पंकज कपूर की अदालत छोड़ कर दौड़े-दौड़े आये थे और मिनटों मुझे गले से लगाए रखे थे। ताकि उस वक्त मेरा डर और heart beat दोनों कम हो।
पर उस दिन .. उस दिन तो चीख भी नहीं पाई थी पापा। उन चारों ने पूरी तरह जकड़ रखा था। एक ने मेरे दोनों हाथ .. एक ने दोनों पैर .. एक ने जोर से मुँह दबा रखा था और एक ........... बहुत दर्द हो रहा था पापा .... चारों ने बारी-बारी से आपस में अपने जगह बदले और मैं ... चारों बार तड़पी .. बस तड़पी पापा ... चीख भी नहीं पा रही थी पापा। मेरी हालत का अंदाजा नहीं लगा सकते आप .. उस से अच्छा माँ के गर्भ में ही मुझे मार देते पापा।
मैं चीख़ती तो .. आप आते ना पापा? .. आते ना पापा?.. आप .. आप आते ना पापा? मैं चीख़ती .. आप आ जाते .. फिर मैं बच जाती ना पापा .. आँ ?
आप ठीक ही कहते हैं - ये भगवान नहीं होता। "

" माँ !! अब आप भी मान लो पापा की बात कि भगवान नहीं होता है। भगवान या अल्लाह केवल इंसान के बनाए धर्मग्रथों और मंदिर-मस्जिदों में होता है। फिल्मों और टी वी सीरियलों में होता है। अगर सच में होता तो मुझे बचा लेता ना माँ उन वहशी दरिंदों से? बचा लेता ना ? "

" है ना पापा ? बोलो ना पापा। गाओ ना पापा .. प्लीज .. एक बार .. बस एक बार .. अपनी पर कटी परी के लिए - ' मेरे घर आई एक नन्हीं परी, एक नन्हीं परी .. एक नन्हीं परी ...' "                       
********************************************** आप इसे पढ़िए या देखिये या दोनों ही कीजिए। पर बतलाना मत भूलियेगा कि इस वीडियो ने आपकी आँखों को नम किया या नहीं ... 🤔🤔🤔

◆ वीडियो ( Video ) ◆ :-



Tuesday, April 28, 2020

कतरनों और कचरे से कृतियाँ - हस्तशिल्प - (भाग-1,2,3.)

1)
आओ आज कतरनों से कविताएं रचते हैं 
और मिलकर कचरों से कहानियाँ गढ़ते हैं।
2)
नज़रें हो अगर तूलिका तो ... कतरनों में कविताएं और ...
कचरों में कहानियाँ तलाशने की आदत-सी हो ही जाती है ।

(1) बस यूँ ही ...
#Lock Down के बहाने - #Handicraft/हस्तशिल्प - (१).

School & College के जमाने वाले हस्तशिल्प/ Handicraft की अभिरुचि को Lock Down के बाद एक नया पुनर्जीवन मिला है।
ठीक वैसे ही जैसे लेखन को 2018 ( 52 वर्ष के उम्र में ) से युवाओं के साथ Openmic के सहारे और 2019 में ब्लॉग के सहारे पुनर्जीवन मिला । साथ ही युवाओं के साथ ही यूट्यूब फ़िल्म निर्माण से मंचन/अभिनय को पुनर्जीवन मिला है।
वर्षों से जमा किए गए कबाड़ ( धर्मपत्नी की भाषा में ) जिसे हालांकि धर्मपत्नी ही संभाल कर रखती जाती है, उसी की मदद से निकलवाया और धूल की परतों को हटाया। दो -तीन दिन तो वैसे उसी में निकल गए।
                                         फ़ालतू की बेजान चीजें मसलन - फ़िलहाल तो इस Wall Hanging की बात करें तो ... इस के लिए - नए undergarments के खाली डब्बे से गत्ते, पिस्ते के छिलके, आडू/सतालू का बीज, गेहूँ की बाली, पुराना मौली सूत व बद्धि( जो मिलने पर पहनता तो नहीं, पर ऐसे मौकों के लिए जमा कर लेता हूँ ) , खीरनी (फल) का बीज, Velvet Paper, Fevicol, कैची, ब्रश और obviously ... Lock Down का क़ीमती समय ...☺☺☺
वैसे कैसा लग रहा ... अब आप lock down में बोर होने का रोना 😢😢😢 मत रोइएगा ...😊






(2) बस यूँ ही ...
#Lock Down के बहाने - #Handicraft/हस्तशिल्प - (२).

दुनिया में कुछ भी बेकार नहीं होता .. शायद ... । मसलन लौकी के छिलके जिसे अमूमन फेंक दिया जाता हैं, प्रायः बंगाली रसोईघर में उसकी भुजिया बना ली जाती है। फैक्ट्री में जब सोयाबीन से तेल ( रिफाइन) निकाला गया तो उस के बचे खल्ली से सोयाबीन का बड़ी बना लिया गया। यहाँ तक कि मानव-मल (इसकी चर्चा शायद घृणा उपजा रही हो) तक से खाद तैयार कर लिया जाता है, जिसे "स्वर्ण खाद"   कहते हैं। कहते हैं ना - वही कालिख, कहीं काजल तो कहीं दाग ...
                      तो आज बनाया है .. कई सालों में जमा किए हुए पके और सूखे नेनुए ( घीया ) और खिरनी ( फल ) के बीजों के संयोजन से एक Wall Hanging और उन्हीं नेनुए के तीन कंकाल और एक पुरानी टोकरी, तार, होल्डर, रंगीन नाईट बल्ब के संयोजन से एक Night Lamp भी ...
Lock Down जरा भी बोर नहीं कर रहा ... बल्कि कई सोयी अभिरुचियों को अंगड़ाई लेने का मौका मिल रहा ... लोग तो मज़बूर मज़दूरों के लिए बिना लंगर चलाए ही Social Media का Page रंग ही रहे हैं ... तब तक ... बस यूँ ही ...☺






(3) बस यूँ ही ...
#Lock Down के बहाने - #Handicraft/हस्तशिल्प - (३).

हमलोगों में से अधिकांश लोग सुबह किसी ना किसी कम्पनी के टूथपेस्ट वाले ट्यूब या पुरुष वर्ग शेविंग क्रीम के ट्यूब ( अब Tuesday, Thursday और Saturday को shaving नहीं करने वाले और उसकी अंधपरम्परा की बात नहीं करूँगा ) का इस्तेमाल करते ही करते हैं। उनमें से कुछ लोग ट्यूब दबा- दबा कर अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ते और कुछ मेरे जैसे लोग उसको कैंची से काट कर उसके सारे अंश (चाट)-पोछ कर इस्तेमाल कर जाते हैं। और ... जैसा कि मेरा मानना है कि दुनिया में कुछ भी बेकार नहीं होता .. शायद ... पर कम ही लोग उस बचे हुए ट्यूब और उसके ढक्कन को धो-पोछ व सूखा कर सम्भाल कर जमा करते रहते हैं।
हमलोग रोजमर्रे के जीवन में लहसुन-प्याज ( अब उनकी बात नहीं कर रहा जो इसके खाने या छूने को पाप समझते हैं या सावन-कार्तिक में इसका त्याग कर शुद्ध-सात्विक बन जाते हैं ) तो इस्तेमाल करते ही हैं। तो कभी-कभी धर्मपत्नी के रसोईघर से फेंके जाने वाले इन लहसुन और प्याज़ के छिलकों पर भी प्यार आ जाता है और हम उसे अपनी जमा-पूँजी के भंडारण में शामिल कर लेते हैं।
तो आइए आज बनाते हैं उन्हीं टूथपेस्ट और शेविंग क्रीम के खाली ट्यूब, प्याज-लहसुन के छिलके, साड़ी या सूट के डब्बे से काला कार्ड-बोर्ड, पिस्ते के छिलके, पके नेनुआ का बीज, कुछ काँच की नली, कुछ मोतियाँ के संयोजन से और Fevicol & कैंची के सहयोग से कुछ Wall Hangings ... वैसे कैसा बना है ...☺☺☺






हस्तशिल्प का ये सफ़र बस यूँ ही ... चलता रहेगा ... एक आशा - एक उम्मीद ...