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Wednesday, April 1, 2026

"जै जै जै हनुमान गोसाईं" ...


बीते कल यानी 31 मार्च को हिंदी पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के त्रयोदशी को हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी जैन धर्मावलंबियों द्वारा जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती मनायी गयी है और .. आने वाले कल यानी .. 02 अप्रैल को हिंदी पंचांग के अनुसार इसी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन हिन्दू लोग अपनी मान्यता के अनुसार हनुमान जयंती मनाने वाले हैं।


इन दो दिनों के अन्तर में मनाए जाने वाले इन दोनों उत्सवों के संदर्भ में मेरे नासमझ बचपन में बहुत ही ऊहापोह होता था, कि अभी परसों ही महावीर जयंती मनाई गई है और आज फिर हनुमान जयंती ? भला ये क्या बला है ? और .. मेरा ऊहापोह भी कोई निरर्थक नहीं था। उसकी वजह थी, कि .. सभी लोग हनुमान को महावीर नाम से भी बुलाते हैं।


वैसे तो अभिभावक द्वारा मेरे उस नासमझ ऊहापोह को खत्म करने का प्रयास किया गया था। परन्तु तदोपरान्त विद्यालय में पढ़ाई के दौरान विशेष रूप से हम महावीर को जान पाए। पर .. सच्चाई तो ये है, कि हम उन महान विभूतियों को जान ही नहीं पाते हैं .. केवल पढ़ पाते हैं .. शायद ...


आज भी तीर्थंकर महावीर की सोचों से हम कोसों दूर हैं। जिनका दिया मूलमंत्र है - अहिंसा परमो धर्मः यानी जियो और जीने दो। अहिंसा, आत्म-नियंत्रण और करुणा उनके संदेश हैं। उनके अनुसार सत्य की राह पर चलना, अपरिग्रह यानी इच्छाओं पर नियंत्रण और वर्तमान में जीना ही हमें मनुष्य की श्रेणी में रखता है।

अगर तीर्थंकर महावीर की बहुमूल्य बातों को हम मन से मानें तो मांसाहार हम सभी को त्याग देना चाहिए,


क्योंकि मांसाहारी बाज़ार से कच्चा मांसाहार भोजन (?) को .. हमारी रसोई और रसोई से हमारी थाली और हमारी थाली से हमारे निवाले और पेट तक पहुँचने के पहले .. अत्यधिक पीड़ाओं से होकर गुज़रना पड़ता है .. शायद ...


आइए .. अभी तो .. हनुमान जयंती के लिए वेद, भेद और खेद के फुँदने वाली बंदनवार से अपने मन-मन्दिर को सजाने का प्रयास भर करते हैं .. बस यूँ ही ...


"जै जै जै हनुमान गोसाईं" ...

वेद, वेद, वेद, वेद,

थे ज्ञाता चारों वेदों के 

हम- हमारे पुरखे कभी,

पड़ावों से फिर 

गुज़रते हुए पुराणों के,

ना जाने कब वाल्मीकि रामायण, 

वेदव्यास महाभारत से होते हुए, 

आकर हम फिर अटक गए 

तुलसीदास रचित रामचरितमानस के 

हनुमान चालीसा पे।


हैं रेल-पेल भी फिर ना जाने 

कितनी कथाओं की, 

आरतियों की, व्रतों की,

मन्दिरों की, मूर्तियों की, 

पर सर्वोपरि बन,

सर्वत्र है छाया आज 

"जै जै जै हनुमान गोसाईं"

पर रहे ना हम सब अब भाई-भाई,

क्योंकि ..

हो गया है मानव-मानव में ..


भेद, भेद, भेद, भेद,

लिंग भेद, 

वर्ण भेद, वर्ग भेद, 

जाति भेद, उपजाति भेद, 

धर्म भेद, 

सम्प्रदाय भेद, उपसम्प्रदाय भेद, 

भाषा भेद, बोली भेद, 

क्षेत्र भेद, नस्ल भेद 

और .. 

ना जाने कितने-कितने भेद।


खेद, खेद, खेद, खेद,

पर है हमें खेद कि ..

इतने भेदों के पश्चात भी 

लेते हैं हम अपनी साँसें 

उन हवाओं में,

हैं घुली जिनमें 

निःश्वासें भी ..

हर वर्ग के इंसानों के ही नहीं

बल्कि .. 

कुत्ते और सूअरों जैसे पशुओं के .. शायद ...