Sunday, August 8, 2021

ज़ालिम लोशन है ना !!! ...

ओलम्पिक में स्वर्ण पदक लाते ही, लाने वाले (नीरज चोपड़ा) की वाहवाही करते हुए कोई भी नहीं थक रहा। रजत पदक या कांस्य पदक लाने वालों (या वालियों) के साथ भी कमोबेश ऐसा ही किया जा रहा है। सब अपनी-अपनी औक़ात के मुताबिक़, अपने-अपने तरीके से 'सोशल मीडिया' के 'वेब पन्ने' को भर रहे हैं। परन्तु सबसे अचरज की बात तो ये है, कि जो इंसान बिना आरक्षण के सेना में सूबेदार के पद को ग्रहण किया और बिना आरक्षण वाले लाभ के ही, अपनी योग्यता के बलबूते टोक्यो के मैदान वाले ओलम्पिक से स्वर्ण पदक ले कर अपने स्वदेश का नाम रौशन किया ; उस जैसे व्यक्ति को, देश के भविष्य की चिन्ता किए बग़ैर, अपने वोट बैंक के लिए रेवड़ी की तरह आरक्षण को बाँटने वाले और देश के स्वास्थ्य की बजाय, अपने स्वार्थ के लिए लंगर की तरह मुफ़्त में आरक्षण को भकोसने वाले लोग भी बधाई देने में तनिक भी शरमाते हुए नहीं दिखे .. उन्हें अपनी करनी पर किसी भी तरह की ग्लानि या मलाल के एहसास का कतरा मात्र भी नहीं। आपने इस बात को/पर ग़ौर किया क्या ??? ख़ैर ! .. छोड़िए भी इन बातों को .. बस ! .. जैसे चलता है , चलने दीजिए .. अब हम इन से परे रुख़ कर लेते हैं, आज की मूल बतकही की तरफ .. बस यूँ ही ...

अक़्सर बड़े-बड़े बुद्धिजीवी सुधीजनों और साहित्यकारों की बातें पढ़-सुन कर हम जैसे स्वान्तः सुखाय लिखने वाले नौसिखुए लोगों को भी यदाकदा  कुछ-कुछ सीखें मिलती रहती हैं .. बस यूँ ही ...

अपनी ही औलाद 'टॉपर' ... :-
पर कुछ-कुछ बातें अटकती भी हैं, अंटती ही नहीं हमारे भेजे में, लाख अटकलें लगा लें हम। मसलन - समाज में किये गए तथाकथित सवर्णों और पिछड़ी जातियों की तरह ही, बहुतेरे बुद्धिजीवी ब्लॉगर (माफ़ कीजियेगा - चिट्ठाकार लोग) "ब्लॉग" और "फ़ेसबुक" को भी दो अलग-अलग वर्गों में बाँट कर देखते है। साथ ही, हमने अक़्सर तथाकथित उन जैसे चिट्ठाकारों को उपरोक्त "अल्पसंख्यक" वाली ख़ुशफ़हमी में  देखा-पढ़ा-सुना है, कि वह अपने आप को तुलनात्मक कुछ उच्च श्रेणी का महसूस कर अपनी गर्दन अकड़ाते थकते नहीं हैं। जबकि "ब्लॉग" और "फ़ेसबुक", दोनों ही विभिन्न उपग्रहों के रहमोकरम पर चलने वाले और विदेशों से उधार लिए गए सोशल मीडिया के शुद्ध वैज्ञानिक वेब पन्ने हैं। वैसे भी इन दोनों के अलावा, अन्य और भी कई सोशल मीडिया के मंचें भी, ना तो किसी तथाकथित विश्वकर्मा भगवान के निर्माण के हिस्सा हैं और ना ही तथाकथित हनुमान जी द्वारा लायी गयी संजीवनी बूटी की तरह लाए गए हैं ; बल्कि विश्वस्तरीय वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम के ये परिणाम है। वैसे तो स्वदेश - प्रेम एक अच्छी बात है, लेकिन हमें इतना भी अँधा प्रेम नहीं होना चाहिए, कि केवल अपनी ही औलाद 'टॉपर' दिखे और मुहल्ले या शहर भर की फिसड्डी .. शायद ...
यूँ तो .. तुलना की जाए, तो "फ़ेसबुक" कई सारे मामलों में "ब्लॉग" से ज्यादा ही सुगम और सरल है। इसी कारणवश इसके उपभोक्ता भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा हैं, तो वहाँ भीड़ भी ज्यादा है। अगर हम "फ़ेसबुक" को भी धैर्यपूर्वक खंगालेंगे, तो वहाँ भी साहित्य की कई-कई प्रसिद्ध हस्तियाँ हमको मिल जायेंगीं ; जो हम (?) और आप जैसों से कई गुणा बेहतर भी हैं। वहीं दूसरी ओर 'ब्लॉग' पर भी आपको मुझ जैसे टुच्चे विचरते नज़र आ ही जाते हैं, जो तथाकथित सभ्य, सज्जन साहित्यकार या चिट्ठाकार लोगों की श्रेणी में कतई नहीं आते हैं .. बस यूँ ही ...
वैसे भी "ब्लॉग" और "फ़ेसबुक" के वर्ग विभाजन की हमको कोई ठोस वजह नज़र नहीं आती है। हो सकता है .. शायद ये मेरी अज्ञानता हो। हमें तो लगता है , कि ITC की मँहगी बिकने वाली कॉपी- Classmate या JYOTI PAPER INDUSTRIES की Jyoti कॉपी पर रामायण या हनुमान चालीसा लिखी जाए या फिर किसी साधारण कागज पर; तो तीनों परिस्थितियों में, किसी आस्तिक हिंदू की नज़र में, धार्मिक दृष्टिकोण से तो वह समान ही महत्व रखेगा ना !? फिर .. अगर देखा जाए, तो ऑस्कर अवार्ड प्राप्त फ़िल्मों के लिए कोई अलग सिनेमा हॉल भी तो नहीं होता है। वो सारी फ़िल्में भी तो लगती हैं, उसी मल्टीप्लेक्स में, जहाँ "शोले" जैसी चलताऊ या "जय संतोषी माँ जैसी भ्रामक फ़िल्में चलती हैं।  हाँ ... उनमें जाने वाले दर्शकों के वर्ग अपनी-अपनी दिलचस्पी के अनुसार जाते हैं। फ़िल्में निम्न या उच्च हो सकती हैं, पर सिनेमा हॉल से उसके अच्छी या बुरी होने की बात तय नहीं हो सकती है। उसी तरह, रचनाएँ अच्छी या बुरी हो सकती हैं, पर उसको पोस्ट किए जाने वाले वेब पन्ने, "ब्लॉग" या "फ़ेसबुक" होने के कारण, अच्छे हैं या कि बुरे हैं, उच्च हैं या निम्न हैं, ये कदापि तय नहीं किए जा सकते .. शायद ...

दाल-भात सान कर ... :-
वैसे भी तो, "ब्लॉग" तो एक साधन मात्र ही है, हमारी अपनी-अपनी अभिव्यक्ति या प्रस्तुति का ; जहाँ समस्त विश्व में, अन्य और भी कई -कई विषयों पर "ब्लॉग" बनी पड़ी हुई हैं। कुछेक लोगों के तो खुद ही के, कई-कई तरह के विषयों पर भी अलग-अलग कई "ब्लॉगें" हैं। इस बात पर भी कुछेक लोग अपनी गर्दन अकड़ाते नज़र आते हैं। मुझ जैसे अल्पज्ञानियों के तो केवल और केवल एक ही "ब्लॉग" है - "बंजारा बस्ती के बाशिंदे" के नाम से। पर इनमें कोई हेटी जैसी बात नहीं मानी जानी चाहिए। ये भी केवल या मात्र, अपनी-अपनी पसंद की बात है। कोई भात और दाल अलग-अलग खा ले या कोई एक साथ सान कर खा ले, बात बस पसंद की है ; परन्तु इन दोनों ही परिस्थितिओं में किसी एक की भी हेटी की बात नहीं होनी चाहिए। प्रसंगवश .. एक मजे की बात है, कि हम उत्तर भारतीय लोग, दक्षिण भारतीय व्यंजन- इडली-सांभर को अलग-अलग खाते हैं, जब कि वहीं दक्षिण के लोग, हम उत्तर भारतीयों की तरह दाल-भात सान कर खाने जैसा ही , इसे एक साथ सान कर खाते हैं। बस .. तरीक़ा अपना-अपना, पसंद अपनी-अपनी .. फिर अपने कई "ब्लॉगों" के होने पर अपनी गर्दन क्यों अकड़ानी भला !?

गंगू हलवाई के लड्डू ... :-
यूँ तो अक़्सर कुछ सज्जन सुधिजन किसी भी क्षेत्र या विषय विशेष में स्वयं को "सबसे पुराना" विशेषण से विभूषित कर के भी अपनी गर्दन अकड़ाते पाए जाते हैं। पर किसी भी क्षेत्र में पुराना होना, अत्यधिक अनुभवी होने की "प्रमाणिकता नहीं भी" हो सकती है और बाद में आए, एकदम से नए की श्रेणी में होना, अल्पज्ञानी होने की "वजह भी नहीं" हो सकती है .. शायद ... मसलन - किसी मुहल्ले के किसी पुराने गंगू हलवाई के लड्डू ना जाने कब, हल्दीराम के 'ब्रांडेड' लड्डू के सामने फ़ीके पड़ गए ; ये बात उस गंगू हलवाई को भी पता ही नहीं ; क्योंकि उसे अपनी कढ़ाई में पिघलते-जलते "नेपाली डालडे" से उठते धुएँ में, सब कुछ धुंधला ही नज़र आता है .. शायद ...

"दाद" लेने की "खुजली" बनाम ज़ालिम लोशन है ना !!! ... :-
अक़्सर हम जैसे नौसिखुए लोग, दिग्गज़ों से सुनते-पढ़ते हैं, कि तथाकथित कुछ अलग-सी, "सर्वाधिकार सुरक्षित"  या "Copyright Reserve" वाली विशिष्ट, 'ब्रांडेड', ब्लॉग की दुनिया में एक दूसरे की पीठ खुजलाने जैसी कोई प्रथा या रीति-रिवाज़ भी है .. शायद ...  अब ये कोई लोकोक्ति हो या मुहावरा, जो भी हो, पर वैसे भी पूरे बदन की खुजली को तो हम भी खुद ही खुजा लेते हैं, सिवाय अपनी पीठ के। वहाँ की खुजली के लिए धर्मपत्नी की मदद यदाकदा जरूर लेनी पड़ती  है। पर आज कल तो एक खुजाने वाली लम्बी कलम जैसी "खुजली स्टिक" भी स्थानीय बाजार में या 'ऑनलाइन' पर भी उपलब्ध हैं, जिसे हम खरीद लाये हैं। अब तो वो भी निर्भरता खत्म। अपने माननीय प्रधानमंत्री जी भी तो बार-बार  कहते हैं, कि स्वावलंबी बनो, आत्मनिर्भर बनो .. तो हम भी बनने की कोशिश भर कर रहे हैं .. बस यूँ ही ...
ऐसी बातों की चर्चा, जब भी, जहाँ कहीं भी, होती है तो ... ऐसे में सन् 1929 ईस्वी में स्थापित इंदौर की 'ओरिएंटल केमिकल वर्क्स' नामक कम्पनी की एक आयुर्वेदिक उत्पाद - "ज़ालिम लोशन" के विज्ञापन के एक संवाद अनायास याद हो आते है, कि "क्या शरमा रहा है ? दाद, खाज, खुजली है। सबको होती है। हमें भी होती है।" मतलब ये है, कि "दाद" लेने की "खुजली" सभी को होती है। पर ऐसे में हमें खुजलाना क्यों भला ! अपने पास "खुज़ली स्टिक" अगर ना भी हो तो कोई चिन्ता की बात नहीं है साहिब !! .. वो भी ज़ालिम लोशन के रहते !! .. अरे बाबा ! .. बाज़ार में या 'ऑनलाइन' पर भी तो साहिब .. ज़ालिम लोशन है ना !!! .. बस यूँ ही ...

कॉपीराइट - © - वाली C की तरह :-
अब इस आपसी खुजाने और खुजलाने या यूँ कहें कि ... खीझने-खिजलाने के लिए भी हम सभी ही जिम्मेवार हैं। हम अपने आप को अलग 'टाइप' के ब्लॉगर वाले साहित्यकार मान कर, स्वयं को एक अलग तरह के अजूबा प्राणी माने बैठे हैं और स्वयं को तुर्रम ख़ाँ बनाए हुए, हम अपनी चारों ओर कॉपीराइट - © - वाली C की तरह, एक गोल घेराबंदी बनाए फिर रहे हैं। इसी कारण से इसकी पहुँच आम पाठक / उपभोक्ता तक नहीं है। सभी के सभी अपनी-अपनी गर्दन अकड़ाए नामी हलवाई (मैं जाति विशेष की नहीं, बल्कि मिठाई निर्माता-सह-विक्रेता- हलवाई की बात कर रहा हूँ) बने हुए हैं और ... शायद हैं भी। फिर एक हलवाई के, दूसरे हलवाई की मिठाई चखने वाली बात हो जाती है। इसे तो आम पाठकगण / उपभोक्ता तक पहुँचाना ही होगा ना ! .. शायद ...

जो अच्छी जलेबियाँ तलता हो ... :-
कई लोग अपने पोस्ट/रचना पर आने वाली प्रतिक्रियाओं की संख्या को लेकर चिंतित देखे-सुने जाते हैं। गुहार लगाते हुए भी। हाय तौबा मचाए हुए भी। ऐसे लोगों को गीता के ज्ञानों में से एक ज्ञान - "केवल कर्म करना ही मनुष्य के वश में है, कर्मफल नहीं। इसलिए तुम कर्मफल की आशक्ति में ना फंसो तथा अपने कर्म का त्याग भी ना करो।" - को स्मरण कर लेना चाहिए .. शायद ...
कई लोग तो अपनी पोस्ट/रचना को आकर पढ़ने की गुहार लगाते या न्योता देते भी दिख जाते हैं अक़्सर। इनको देख-सुन कर बड़े-बड़े मंचों पर श्रोतागण से ताली की गुहार लगाते नामी गिरामी हस्तियों की याद अनायास ही आ जाती है। अगर बात क्रिया-प्रतिक्रिया के आने, ना आने की है, तो इस से ब्लॉग के अच्छे या बुरे दिन, अच्छी रचना या बुरी रचना या फिर अच्छे साहित्यकार या बुरे साहित्यकार की कसौटी नहीं तय की जा सकती .. शायद ...
अब हमारे जैसे टुच्चे लोग भी तो, एक कुशल पाठक ना कभी थे, ना हैं और शायद भविष्य में भी ना बन सकेंगे। अच्छे पाठक यानी पढ़ने वाले होते, तो आज हम भी कोई घूसखोर सरकारी पदाधिकारी ना होते क्या !?  इसी अपनी कमी के कारण हम भी कई पोस्टों या मंचों पर प्रतिक्रिया में कम दफ़ा ही जाते हैं या प्रायः नहीं ही जा पाते हैं, हमारे जैसे लोग। अब जरूरी तो नहीं कि एक अच्छा हलवाई (मैं जाति विशेष की नहीं, बल्कि मिठाई निर्माता-सह-विक्रेता- हलवाई की बात कर रहा हूँ), जो अच्छी जलेबियाँ तलता हो, तो उसको पचाने की भी वह मादा रखता ही हो, है कि नहीं ?
.. और बिना पढ़े ही, दो शब्दों वाली औपचारिक प्रतिक्रिया दी भी तो नहीं जाती, हमारे जैसे लोगों से। वैसे भी प्रायः हमारे जैसे लोग अपनी बातों को लाग-लपेट की चाशनी में पगाने की चेष्टा भी कतई नहीं करते; जो मन ने महसूस किया, उसे बक देते हैं। दिल पर कोई बोझ नहीं रखते। सोचते हैं कि पहले से ही मधुमेह रोगी हैं, अगर मन के बोझ से दिल की बीमारी लग गयी, तो नीम और कड़ैले के कॉकटेल-सी हालात हो जाएगी फिर। फिर तो .. ऐसे में बिना चाशनी में पगी बातें अच्छी भी हों, तो कुछ-कुछ कानाफूसी जनित, एक पूर्वअनुमानित छवि के कारण कुछ लोगों को बातें बुरी भी लग जाती है .. बस यूँ ही ...
बिना पढ़े दी गयी प्रतिक्रिया राह चलते किसी मन्दिर के सामने सड़क से गुजरते हुए ही औपचारिक सिर झुका कर कुछ बुदबुदाने जैसी ही प्रतीत होगी .. शायद ... इसके उलट, रचना/पोस्ट को पढ़ कर भी द्वेषवश (यदि समयाभाव हो तो चलेगा), अगर किसी ने प्रतिक्रिया नहीं दी हो, तो वह किसी निमंत्रित सुअवसर पर भोज खाकर, रिवाज के विपरीत, बिना न्योता (अपने या सामने वाली की हैसियत के मुताबिक़ रुपयों वाला लिफाफा) दिए निकल भागने वाला भगोड़ा (या भगोड़ी) इंसान माना जा सकता है, जो कि गलत है .. शायद ...

अपनी दुकान की मक्खी ... :-
कई पुराने ब्लॉगर लोगों को, अपने पुराने ब्लॉगर होने का और अपने ब्लॉग पर अतीत में सौ-सौ प्रतिक्रियाएँ आने का एक तरफ गर्व है, तो दूसरी तरफ इन दिनों प्रतिक्रियाएँ नहीं आने का यदाकदा मलाल होते भी देखा-सुना जाता है। हो सकता है, कि उस दौरान उन जैसे दिग्गज लोग ही इक्के-दुक्के ब्लॉगर होंगे, तब अन्य लिखने वाले लोग उनके पाठक-पाठिका बने, एक उपभोक्ता बने हुए होंगे। वही लोग शायद उन से प्रेरित हो कर अब अपनी-अपनी दुकानें खोले बैठ गए होंगे और सभी अपनी-अपनी दुकान की मक्खियों को भगाने में लगे होंगें .. इसी से प्रतिक्रियाएँ घट गई होंगीं ..शायद ... 

चलते - चलते .. बस यूँ ही ...
यूँ तो उपग्रहों पर टिकी, इंटरनेट के सहारे मुफ़्त में मिले इस विदेशी ब्लॉग के वेब पन्ने पर स्थापित अपने मंच पर गर्व नहीं, कुछेक घमंड करने वाले लोग अगर .. किसी मोबाइल की तरह एक तय क़ीमत अदा कर के "पैक" भरवाने के बाद, ब्लॉग वाले मंच चला रहे होते या किसी किराए के कमरे में मंच चला रहे होते या फिर बाज़ार से कॉपी खरीद कर लिख रहे होते तो भी, तो पता नहीं, निजी होने का और भी कितना दावा करते .. शायद ...
कुछ लोग तो सोशल मीडिया पर, सार्वजनिक पोस्ट किए गए अपने किसी पोस्ट विशेष पर, चाहे वह ब्लॉग की हो या फिर फेसबुक की, उनके अनुसार किसी की अनचाही की गई  प्रतिक्रिया करने वाले को कहीं और जाकर "उल्टी (वमन)" करने की नसीहत तक दे डालते हैं। वो भूल जाते हैं, कि यह सार्वजनिक (अगर 'लॉक' ना की गयी हो तो) और मुफ़्त के विदेशी वेब पन्ने भर हैं, कोई उनकी निजी जागीर नहीं .. शायद ...
किसी दिन तथाकथित विश्वकर्मा भगवान अगर अपनी लम्बी सफ़ेद दाढ़ी जोर से खुजलाये, तो .. सब की खुज़ली .. बस यूँ ही ... मिनटों में मिट जानी है, क्योंकि अगर उनकी दाढ़ी की खुज़ली को खुजलाने की हलचल से, सारे के सारे मानव निर्मित वैज्ञानिक उपग्रह धरती पर गिर कर धराशायी हो गए, तो .. ना तो इंटरनेट होगा और ना ही ये सारे रेवड़ी की तरह बँटने वाले आरक्षण की तरह सहज उपलब्ध सोशल मीडिया वाले भाँति - भाँति के वेब पन्ने .. शायद ...



Saturday, August 7, 2021

एक अदद .. सुलभ शौचालय ...

काश !!! ... किसी ..
शैक्षणिक कार्यशाला के तहत 
बुलायी जाती एक बैठक और
फ़ौरन गठित कर एक समिति  
बुद्धिजीवियों की, लेने के लिए
मार्गदर्शन उनसे किसी विशेष,
बदलाव परियोजना के बारे में,
ताकि .. 'MBBS कोर्स' में ...
पढ़ाई जाती चार सालों तक 
हनुमान चालीसा विस्तार से 
और किसी महावीर मंदिर में 
एक वर्षीय 'इंटर्नशिप' के तहत,
'जूनियर डॉक्टरों' से फिर ..
गवाए जाते हनुमान चालीसा ..
झाल, ढोल, मंजीरे के साथ,
बैठा के ताकि .. सार्थक हो जाती 
उनकी पढ़ाई और सार्थक हो पाता
पावन हनुमान चालीसा भी ...
"नासै रोग हरै सब पीरा, 
 जपत निरंतर हनुमत बीरा।"

ताकि .. पढ़ाई जाती भूगोल की कक्षा में,
शेषनाग के बारे में विस्तार से, 
टिकी है पृथ्वी फन पर जिनके।
पढ़ायी जाती तहत इतिहास के 
रामायण और महाभारत जैसी
सारी पावन पौराणिक कथाएँ।
पाँच वर्षीय 'आर्किटेक्ट' के 
'कोर्स' में भी की जाती व्याख्या 
विस्तार से प्रभु विश्वकर्मा जी की  - 
"बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी। 
प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च
विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति।" 
और गवाए जाते सभी से दीक्षांत समारोह में 
मंच पर कतारबद्ध समवेत स्वर में -
"ऊँ आधार शक्तपे नम:। ऊँ कूमयि नम:।
ऊँ अनन्तम नम:। ऊँ पृथिव्यै नम:।
ॐ श्री सृष्टतनया सर्वसिद्धया विश्वकर्माया नमो नमः।"
'पिरियोडिक टेबल' रसायन विज्ञान वाली, 
उतरवा कर हरेक स्कूल-कॉलेज की दीवारों से, 
लटकायी जाती ज्योतिष विद्या वाली कुण्डलियाँ।

ताकि .. कर दी जाती फिर तो न्यूटन, 
आर्कमीडिज्, गैलीलियो, डार्विन,
जैसों की ऐसी की तैसी ..
और हाँ .. कणाद, आर्यभट, वाग्भट ..
इन सब की भी ऐसी की तैसी।
दोहा, चालीसा, व्रत कथाएँ ही
गूँजा करती कक्षाओं में हर कहीं।
'PCM'* या 'PCB'* को, 
राय से सभी की, की जाती 
'BVM'* से विस्थापित भी कभी।
बैठक विसर्जित होने से पहले,
सभी के उठ के चलते-चलते,
मन्दिरों में प्रभु के भोग-समय,
भोग-कक्ष संग कई दफ़ा, 
कई जगह शयन-समय, शयन-कक्ष की 
तरह ही क्यों ना भक्तों के भोगों को 
जम कर जीमने वाले भगवानों के लिए भी,
स्वच्छ भारत अभियान के तहत,
मंदिरों में भी आधुनिकतम एक अदद ..
सुलभ शौचालय बनवाने का भी निर्णय लिया जाता .. बस यूँ ही ...


【 * - PCM = Physics, Chemistry, Mathematics.
    • - PCB = Physics, Chemistry, Biology.
    • - BVM = Bramha, Vishnu, Mahesh. (ब्रह्मा,           विष्णु,महेश) 】.    











                      

Friday, August 6, 2021

ससुरी ज़िन्दगी का ...

(१)
निगाहें ठहरी हुईं ...

है किसी रेत-घड़ी-सी 
.. बस यूँ ही ...
ज़िन्दगी हम सब की,
.. शायद ...
दो काँच के कक्षें जिसकी, 
हो मानो जीवन-मृत्यु जैसे, 
जुड़े संकीर्ण गर्दन से, एक साँस की।

टिकी हो नज़रें जो गर हमारी 
ऊपरी कक्ष पर तो हर पल ही ..
कुछ खोती-सी है ज़िन्दगी
और .. निचली कक्ष पर हों 
निगाहें ठहरी हुईं जो अपनी
तो .. हर क्षण कुछ पाती-सी 
है ये .. हमारी ज़िन्दगी।

हमारी नज़रों, निग़ाहों, 
नज़रियों, नीयतों के
कण-कण से ही हर क्षण
तय हो रही है ये ..
हर पल सरकती-सी,
कुछ-कुछ भुरभुरी-सी ..
पिंडी हमारी ज़िन्दगी की .. बस यूँ ही ...


(२) 
ससुरी ज़िन्दगी का ...

आ ही जाता है हर बार,
हर पल तो .. बस यूँ ही ...
एक लज़ीज़ स्वाद .. 
ससुरी ज़िन्दगी का। 

हो अगर जो बीच में
बचा एक कतरा भी
आपसी विश्वास का।

हाँ .. एक विश्वास .. हो जैसे ..
बीच हमारे ठहरा हुआ,
ठीक ... 'टोस्टों' के बीच 
पिघलते "अमूल" मक्खन की,
वर्षों से कायम,
गुणवत्ता-सा .. शायद ...


(३)
पल में पड़ाव ...

खोती ही तो 
जा रही है, 
पल-पल, 
पलों में ज़िन्दगी।

ना जाने पल भर में,
किस पल में ..
ज़िन्दगी के सफ़र के 
किस पड़ाव पर
ठहर सी जाए ज़िन्दगी।

कोई अंजाना पड़ाव,
या एक अंजाना ठहराव ही
कब मंजिल बन जाए।
यूँ ..  ना जाने कब, किस 
पल में ये पड़ाव आ जाए ?
और .. इस सफ़र का मुसाफ़िर 
बस .. .. .. वहीं ठहर-सा जाए .. बस यूँ ही ... 




Thursday, August 5, 2021

वो .. एक मर्दानी औरत ...

लम्बे, घने .. अपने बालों-सी
लम्बी, काली, घनेरी अपनी 
ज़िन्दगी से हैं अक़्सर चुनती;
रेंगती, सरकती हुई अपनी ही
पीड़ाओं की सुरसुराहट भी, 
ठीक .. बालों की जुओं-सी .. 
सबों के बीच भी .. शायद ... 
वो .. एक अकेली औरत .. बस यूँ ही ... 

मिल भी जाएं जो ख़ुशी कभी
तो .. देर तक टिकती भी नहीं,
जबकि पड़ती भी है चुकानी भले ही,
एक अदद उसकी तो उसे क़ीमत भी।
क्षणिक हो .. या फिर ..
औपचारिक ही सही,
पर होती है गुदगुदाती ख़ुशी-सी, 
बदले में कुछ अदा कर के भले ही, 
बेमन से चाहे या 
ख़ुशी-ख़ुशी ही सही,
ठीक .. वापस मिले हुए 
जूतों की ख़ुशी-सी, 
जूता छुपाई वाली रस्म जैसी .. बस यूँ ही ...

ज़िन्दगी में भला जीत कर भी,
चलती है जीते जी कब उसकी ?
भूले से भी जो अगर कभी,
अपने सुहाग से पहले ही
ढूँढ़ भी ले जो वो पहले कहीं,
दूधिया पानी में डूबी-खोई ..
वो एक विशेष अँगूठी ...
अँगूठी ढूँढ़ने वाली रस्म वाली .. बस यूँ ही ...

कहलाती तो है यूँ अर्द्धांगिनी,
पर इसके हिस्से .. सात फेरों में भी 
होती हैं आधे से कम .. 
केवल तीन फेरों में ही आगे की पारी।
मतलब - यहाँ भी बेईमानी, मनमानी।
फेरे में जीवन के फिर .. फिर भी, 
सात फेरों के बाद होती हैं वो ही घिरी।
हैं चटकते जब सातों वचन सात फेरों के,
अक़्सर .. होकर बदतर .. किसी काँच से भी।
मसलन - गयी नहीं गर अब तक आदतें जो, 
सारी बुरी हमारी तो ..  हैं मानो जैसे .. 
उड़ रहीं सरेआम धज्जियाँ 
छठे फेरे के छठे वचन की .. बस यूँ ही ...

सातवें वचन को तो हम ही हैं रोज तोड़ते,
जब-जब हम अपनी  बतकही* की 
दुनिया में हैं विचरते, विचार करते;
तब-तब तो हम तन्हां ही तो अपनी 
बतकही के साथ ही तो .. हैं
केवल रहते और .. जाने-अंजाने 
आ ही तो जाती हैं फिर, पति-पत्नी के 
संबंधों के बीच में ये  बतकही सारी .. बस यूँ ही ...

चलती भी है या कभी चल भी गयी
जो .. जाने-अंजाने, भूले से भी,
अगर किसी घर-परिवार में उसकी,  
तो कहते हैं उसे सारे मुहल्ले वाले,
सगे-सम्बन्धी या जान-पहचान वाले भी,
कि है  वो .. एक मर्दानी औरत .. बस यूँ ही ... 

【 बतकही - अपनी रचना (?) .. अपनी सोच। 】*




Tuesday, August 3, 2021

नीयत संग नज़रिया ...

आज अपनी बतकही - "नीयत संग नज़रिया ..." के पहले एक छोटी-सी बात ... अक़्सर हमारे सभ्य समाज में टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को देखने के आधार पर, उसे देखने वाले उन दर्शकों की मानसिकता या उनके वर्ग का वर्गीकरण भी हम लोग झट से तय कर लेते हैं .. शायद ...
मसलन - 'स्टार स्पोर्ट्स चैनल' देखने वाले युवा या वयस्कों को समाज में सभ्य माना जाता है। पर हर बार इस मुखौटेधारी समाज में, यह सच नहीं होता है। वहीं लोगबाग 'फैशन चैनल' देखने वाले युवा या प्रौढ़ वर्ग को बड़े ही व्यंग्यात्मक ढंग से देख कर मुस्कुराते हैं .. शायद ...
मानो .. उनकी मुस्कान बोल रही हो कि .."बच्चू, तुम भी चरित्रहीन ही हो, जो ये सब ... " अभी तो लोग तपाक से वर्तमान में चर्चित .. "कुंद्रा" नामक उपनाम का हवाला देकर और भी हिक़ारत भरी नज़रों से देख कर मुस्कुराते हैं; पर इस बार भी इस मुखौटेधारी समाज में, यह सच नहीं होता है .. शायद ...
अब जरूरी तो नहीं कि रामायण  पढ़ने वाला या टीवी पर उसे 'सीरियल' की शक़्ल में देखने वाला हर इंसान राम ही हो और महाभारत  देखने वाला कोई इंसान कौरव ही हो .. शायद नहीं .. बस यूँ ही ...

नीयत संग नज़रिया ...

'टीवी' के पर्दे पे,
साथ चाय की चुस्की के,
'स्टार स्पोर्ट्स चैनल' पर
'स्लीवलेस स्पोर्ट टी-शर्ट' के 
साथ-साथ 'मिनी स्कर्ट' में
'बैडमिंटन' खेलती गाहे-बगाहे,
"पुसर्ला वेंकट सिंधु",
या "साइना नेहवाल" 
या फिर "कैरोलिना मारिन" के
और कभी 'शॉ‌र्ट्स' में "एश्ले बार्टी"
या 'स्कॉर्ट्स' में खेलती
"कैरोलिना प्लीस्कोवा" जैसी
'विम्बलडन' प्रतियोगियों के, 
शायद .. केवल खेल ही हैं दिखते, 
संग-संग 'शॉट्स', 'स्ट्रोक', 'शटल' या 
'टेनिस बॉल' या फिर 'स्कोर बोर्ड' के।
ना कि .. तर-बतर पसीने से
अर्द्धनग्न उघड़े अंग उनके।
हो अगर .. सही नीयत संग
नज़रिया हम सभी के .. शायद ...

उलट मगर इसके, 
'फैशन चैनल' पर 'टीवी' के,
अक़्सर .. 'कैट वॉक' करती 
'रैंप' पे या फिर दिखने वाली
मदमायी भंगिमाओं में
'मॉडल्स' सह 'कैलेंडर गर्ल्स' - 
"नटालिया कौर" या
"नरगिस फाखरी" या फिर ..
"एयशा मैरी" के 
अर्द्धनग्न बदन उघड़े, 
कभी गीले, तो कभी सूखे, 
उनके बदन के बदले,
परिदृश्य में दिखती हैं हमें
प्रायः झीलों, सागरों, पहाड़ों,  
वनों, फूलों-लताओं, पौधे-पेड़ों 
इत्यादि वाली प्राकृतिक सौन्दर्य की
या नायाब वास्तुकला के नमूने वाली
कई सारी छटाएँ मनभावन।
हो अगर .. सही नीयत संग
नज़रिया हम सभी के .. शायद ...




Monday, August 2, 2021

चंचल चटोरिन ...

ऐ ज़िन्दगी !
मेरी जानाँ ज़िन्दगी !!
जान-ए-जानाँ ज़िन्दगी !!!

चंचल चटोरिन 
किसी एक
बच्ची की तरह
कर जाती है,
यूँ तो तू चट 
चटपट,
मासूम बचपन 
और ..
मादक जवानी,
मानो किसी 
'क्रीम बिस्कुट' की 
करारी, कुरकुरी, 
दोनों परतों-सी।

और फिर .. 
आहिस्ता ...
आहिस्ता ....
चाटती है तू
ले लेकर
चटकारे,
लपलपाती, लोलुप
जीभ से अपने,
गुलगुले .. 
शेष बचे बुढ़ापे के 
'क्रीम' की मिठास,
मचलती हुई-सी,
होकर बिंदास .. बस यूँ ही ...



Tuesday, July 27, 2021

बंद है मधुशाला ...

ऐ जमूरे !!
             हाँ .. उस्ताद !!!  
                                      
खेल-मदारी तो हुआ बहुत रे जमूरे,
आज ले लें हम क्यों ना कुछ संज्ञान ...

साहिबान !
               क़द्रदान !!
                              सावधान !!!
                         
होता था मतलब कभी शिकंजी का-
- तरावट, पर भला अब किसे पता !?
है बच्चा-बच्चा भी अब तो जानता,
होता है ठंडा मतलब 'कोका-कोला'।

आदत पड़ी कोसने की घोटालों को,
पर फूलती हैं जी, रोटियाँ तो हमारी,
रसोई में आज भी इसकी आँच पर।
बता ना ! है भला ये कैसा घोटाला?

यूँ चुभती तो हैं अक़्सर उन्हें भी जी,
धूल से भरी पड़ी वो तमाम किताबें,
छोड़ देते हैं पर निज सेहत के लिए,
धूल से 'एलर्जी' का वे देकर हवाला।

कभी दौलत, तो कभी शोहरत, तो ..
तौल कर कभी पद के भी तराजू पर,
है इंसानों के वजूद को तो तवज्जोह
देने का यहाँ, युगों पुराना सिलसिला।

स्वतः ही हो अनुवांशिक उपनाम से,
उगे जाति-उपजाति, धर्म-पंथ जिनके,
हैं खुद ही वो एक नमूना पूर्वाग्रही के,
कहें दूजों को जो, है ये गड़बड़झाला।

होता आस्वादन खारापन का जीभ को
उनकी, रिसे हैं जिनकी आँखों से आँसू।
लड़खड़ाते भी देखे हैं उनके ही कदम,
पड़ता है अक़्सर जिनके पाँव में छाला।

यूँ हैं आडंबरें, बाधाएं, विडंबनाएं घुली,
हर दिन, हर ओर, हर बार ही जीवन में।
निकले लाख दिवाला, दीवाली मनाने में
पर, हम भी हैं मतवाला, तू भी मतवाला।

जरूरी तो नहीं साहिब! अर्द्धनग्नता औ'
रंगीन रासायनिक सौन्दर्य प्रसाधनें कई।
ना हो यक़ीन जो, तो  एक बार निहारिए,
श्वेत-श्याम 'पोस्टर' में बाला .. मधुबाला।

हुक्मरान का हुंकार - "बनाने से कानून *
कुछ नहीं होगा", सही, तभी तो राज्य में,
मिलती क़बाड़ में खाली बोतलें, जब कि
मद्यपान निषेध है यहाँ, बंद है मधुशाला।

सड़ने ही दूँ दाँतों को मीठी गोलियों से,
या करूँ पेश कड़वे पानी चिरायते के?
तू कहे तो कुछ बतकही कर लें हम या ..
जड़ लें मुँह पर अपने फिर एक ताला? .. बस यूँ ही ...

ऐ जमूरे !!
             हाँ .. उस्ताद !!!  
                                      
खेल-मदारी तो हुआ बहुत रे जमूरे,
आज ले लें हम क्यों ना कुछ संज्ञान ...

साहिबान !
               क़द्रदान !!
                              सावधान !!!

* - एक राज्य विशेष के योग्य मुख्यमंत्री महोदय ने बढ़ती आबादी से पनपे हालात की नज़ाकत समझते हुए, अपने राज्य में परिवार नियोजन की बात कही, तो दूसरे राज्य विशेष के योग्य (?) मुख्यमंत्री महोदय जी ने जुमला उछाला कि "खाली क़ानून बनाने से कुछ नहीं होगा।"
ऐसा इन ज़ुमले वाले योग्य (?) महोदय के द्वारा कहा जाना फबता भी है, कोई फबती नहीं कस रहे हैं महोदय, क्योंकि इनके राज्य में तो वर्षों से "बच्चन जी" (मधुशाला) कानूनन निषेध हैं, पर कबाड़ी के पास खाली बोतलों की भरमार है .. शायद ...
हालांकि बात भी तो कुछ हद तक सही ही/भी है कि जब तक लोगबाग की मानसिकता नहीं बदलेगी, केवल क़ानून से कुछ नहीं होना है। "दहेज निषेध अधिनियम, 1961" जैसे क़ानून बना कर हमने क्या उखाड़ लिया भला ? और भी ऐसे सैकड़ों कानूनें है यहाँ  .. बस यूँ ही ... 】