Friday, March 20, 2026

"पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !"



"पंचम वेद ..." के बाद अपने कथनानुसार आज उसकी अगली कड़ी- "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !" :-


ख़ैर .. अभी तथाकथित मसाला फ़िल्मों को पसन्द करने या देखने वालों की भीड़ को नज़रंदाज़ करते हुए उन गंभीर फ़िल्मों के दर्शकों की नज़रों से फ़िलहाल .. 17 दिसम्बर 2003 को प्रदर्शित हुई मात्र एक घंटा और तैंतीस मिनट की फ़िल्म- "मातृभूमि : अ नेशन विदाउट वुमन" देखी जाए, जो आज भी यूट्यूब पर सहज ही उपलब्ध है। 


यूँ तो इसका कथानक बानगी के तौर पर आगामी 2050 में बिहार के एक संभावित पिछड़े गाँव की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ नवजात लड़कियों को एक सामाजिक परम्परा के अंतर्गत सार्वजनिक तौर पर दूध से भरे बर्तन में डुबो कर मार दिया जाता है। 

वैसे तो इसका कथानक समस्त भारत या विश्व के उन हिस्सों का प्रतिनिधित्व करता हुआ माना जा सकता है ; जहाँ लड़कियों को जन्म से पहले ही जननी की कोख में या फिर जन्म लेने के बाद भी ऐन केन प्रकारेण मार दिया जाता है।  


उस पिछड़े गाँव में नवजात बेटी की निर्मम हत्या कर देने का यही सिलसिला दशकों अनवरत चलता रहता है .. इस आशा और अवधारणा के साथ कि .. अगली संतान बेटा होगा और उसी बेटे के हाथों से मिली मुखाग्नि से पिता को मरणोपरांत तथाकथित मोक्ष की प्राप्ति होगी या उसके भावी वंशावली की वृद्धि होगी।

परिणामस्वरूप कुछ दशकों के पश्चात लिंगानुपात असंतुलित होने से वहाँ की लड़कियों या महिलाओं की जनसंख्या शून्यता की ओर अग्रसर हो जाती है। फलस्वरूप घटती लड़कियों या महिलाओं की संख्या के कारण उस समाज में नौबत आती है .. अन्य स्थानों की ग़रीब लड़कियों को ख़रीद कर शादी करने की। जो बाद में अन्य (कु)प्रथाओं की तरह ही अंधानुकरण के लिए एक कंटीली प्रथा का रूप ले लेती है। जिसे मानवी तस्करी का ही एक रूप माना जा सकता है। 


ऐसी परिस्थितियों में उन लड़कियों के मन और मान दोनों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। वातानुकूलित सभागारों में हम चाहे लाख भाषण दे लें महिला सशक्तिकरण पर .. उसकी परिचर्चा कर लें। परन्तु लगभग डेढ़ घंटे की इस फ़िल्म का एक-एक दृश्य हमारे देश-समाज के कई हिस्सों का कटु प्रतिबिंब है। जो हर वर्ष प्रतीकात्मक रूप से रावण के पुतले को जलाए जाने पर भी समाज में व्यभिचारियों की कोई भी कमी नहीं होने की तरह ही ..  8 मार्च को 'सो कॉल्ड एलीट' समाज के बीच उसी 'एलीट' समाज के लिए मनाए जाने वाले "अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस" का पोल खोलता है।


अब केले के छिलके या किसी 'चॉकलेट' के 'रैपर' जैसे हर किसी भी फ़िल्म के उस उबाऊ हिस्से की बात करते हैं, जिससे प्रायः 99.9% दर्शकों को कोई लेना-देना नहीं होता है। जिसे पुरानी फ़िल्मों में फ़िल्म शुरू होते ही पर्दे पर दिखाए जाते थे और वर्तमान में फ़िल्म खत्म होने के समय। यानी पर्दे के पीछे और सामने जिन लोगों ने अपने संयमित और कठोर परिश्रम के योगदान दिए होते है .. उन्हीं लोगों के नाम की सूची। 

इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक मनीष झा हैं। निर्माता हैं पैट्रिक सोबलमैन और पंकज खरबंदा। छायाकार हैं वेणु गोपाल और संपादन किया है अश्मित कुंदर और शिरीष कुंदर ने।संगीतकार हैं सलीम-सुलेमान की जोड़ी। अभिनेतागण हैं- सुधीर पांडे, पीयूष मिश्रा, आदित्य श्रीवास्तव, रोहिताश्व गौड़, पंकज झा, सुशांत सिंह, दीपक बंधु, राजेश जैश, संजय कुमार, मुकेश भट्ट, विनम्र पंचारिया, श्रीवास नायडू, चित्तरंजन गिरी और एकमात्र अभिनेत्री ट्यूलिप जोशी है।


यह फ़िल्म सिनेमा घरों में औसत दर्शकों के बीच अपना जादू भले ही ना बिखेर पाई हो, परन्तु इसे 2003 में ही वेनिस फ़िल्म समारोह जैसे कई फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया था, जहाँ इस को बेहद सराहा गया था। बाद में "फिपेसकी पुरस्कार" से इसे सम्मानित भी किया गया था।

प्रसंगवश .. "फिपेसकी" (FIPRESCI = Fédération Internationale de la Presse Cinématographique, Munich, Germany = International Federation of Film Critics) पुरस्कार मुख्य रूप से कान्स, वेनिस और टोरंटो जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समीक्षक महासंघ (International Federation of Film Critics) द्वारा उत्कृष्ट फिल्मों को दिया जाने वाला एक प्रतिष्ठित सम्मान है। यह पुरस्कार किसी को व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि किसी फिल्म की सम्पूर्ण कलात्मक और रचनात्मक विशिष्टता के संदर्भ में प्रदान किया जाता है।


इस फ़िल्म के तीन दृश्यों में तो विशेष तौर से .. किसी भी संवेदनशील ही नहीं, असंवेदनशील इंसान का भी कलेजा मुँह को आ जाएगा। 

(१) फ़िल्म के आरम्भ में जब एक पिता अगली बार तथाकथित ऊपर वाले से बेटा पैदा होने की गुहार लगाता हुआ अपनी नवजात बालिका शिशु को दूध भरे एक बर्त्तन में डुबो कर सार्वजानिक रूप से मार डालता है। 

(२) फ़िल्म के मध्य में जब अपने पाँच बेटों के लिए एक अमीर पिता- रामचरण पाँच लाख में कल्कि नामक एक लड़की को उसके पिता से वस्तुतः खरीदते हैं और शादी का जामा पहना कर घर लाते हैं। 

फिर पाँचों भाई अपने-अपने लिए कल्कि के साथ रात बिताने के लिए सप्ताह की सात रातों में से पाँच रातें आपस में बाँट लेते हैं। तदोपरान्त सप्ताह के शेष बची दो रातों के लिए उन पाँचों भाइयों के पिता यानी कल्कि के ससुर ही स्वयं अपने लिए माँग कर शेष बची दो रातों के सदुपयोग (?) की उधेड़बुन को खत्म कर देते हैं। 

मतलब .. एक ख़रीदी गई लड़की- कल्कि के साथ पिता बनाम ससुर और उनके पाँचों पुत्र सप्ताह के सातों दिन हर रात सिलसिलेवार बीता कर .. कल्कि के पिता को दिया हुआ अपना पाँच लाख रुपया वसूल करते हैं। 

(३) अंत में जब गाँव भर के लोग अंतर्जातीय झगड़े में बदला लेने के लिए गौशाला में गायों के बीच गायों की तरह या उनसे भी बुरी दशा में सिकड़ी से बंधी धूलधूसरित निस्तेज कल्कि के साथ कई रात सामूहिक बलात्कार करते हैं। 

वहाँ गायों के मूत्र का छींटा उसके मुँह-बदन पर पड़ता रहता है। परन्तु अधमरी-सी कल्कि लाचार .. विवश .. अचेत लेटी रहती है। पर .. फ़िल्म का अंत .. एक छोटी-सी आशा के साथ होता है। लेकिन कैसे ? 


ये और .. और भी बहुत कुछ जानने के लिए .. अगर आपको गम्भीर फ़िल्में देखनी पसन्द हो, तो .. समय मिलने पर .. यूट्यूब पर इसे एक बार अवश्य देखिए .. "मातृभूमि : अ नेशन विदाउट वुमन" .. मात्र एक घंटा और तैंतीस मिनट .. आपकी आत्मा काँप जाएगी .. शायद ...

आपने ये 'पॉपुलर डायलॉग' तो सुना ही होगा कि .. " 'पिक्चर' अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। ", तो .. शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (३)_आक्रोश !" के साथ .. बस यूँ ही ... 

( फ़िल्म का 'यूट्यूब लिंक' नीचे है 👇)

https://youtu.be/mieCGBr5tCU?si=ZF-72ZZcJKPIK1Rc




https://youtu.be/mieCGBr5tCU?si=ZF-72ZZcJKPIK1Rc
(Link of Film 👆).

Wednesday, March 18, 2026

पंचम वेद ...


हमारे समाज में कुछेक या यूँ कहें कि .. अधिकतर घर-परिवारों में आज भी नाटक व नाटककारों को "नाटक-नौटंकी" तथा नृत्य व गीत-संगीत एवं नर्तकों-नर्तकियों व गायकों-वादकों को "नचनिया- बजनिया" या "तबलची" या फिर "ऑर्केस्ट्रा वाला" बोल कर उपेक्षित नज़रों से देखा जाता है। 

इन्हीं तरह के अधिकतर घर-परिवारों की अवधारणा कमोबेश कुछ हद तक लेखन क्षेत्र के लिए .. लेखक-लेखिका व कवि-कवयित्री के लिए भी नकारात्मक ही देखने के लिए मिलती है .. विशेष रूप से पुरुष प्रधान समाज में रचनाकार महिलाओं के लिए।

इसी धरती का एक वर्ग विशेष प्राणी (?) तो उपरोक्त पावन कृत्यों को हराम और ग़ुनाह मानते हुए उन्हें एक सिरे से नकार देता है। परन्तु अन्य शेष लोग भी .. विशेषतौर पर सनातनी धर्मभीरू-धर्मपरायण लोग भी अगर .. इन सबको उपेक्षित दृष्टिकोण से देखते हैं, तो अचरज होता है। 


जबकि हिंदू मान्यताओं के अनुसार भरत मुनि का मानना था, कि अतिप्राचीन चारों वेदों में से ऋग्वेद से संवाद, सामवेद से गीत-संगीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से लिये गए रस के समन्वय से ही नाटक का जन्म हुआ है। उस कालखंड में लेखन माध्यम के अभाव में मौखिक रूप से ही इन चारों वेदों के ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम नाटक ही होने के कारण .. भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नाटक को पंचम वेद कह कर प्रतिष्ठा प्रदान की है।


भारतीय वेद-पुराणों के आधार पर ब्रह्मा को नाट्यवेद का रचयिता माना जाता है, जबकि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर नाटक सदियों से क्रमवार विकसित होता आने वाला कला का एक स्वरूप है। जिसकी .. आदिम युगीन मानव द्वारा हर्षोल्लास के अवसरों पर सामूहिक बेतरतीब थिरकन से लेकर लयबद्ध सामूहिक नृत्य तक की यात्रा और फिर नौटंकी, रासलीला व रामलीला से लेकर आधुनिक नाटक तक की यात्रा भी चार्ल्स डार्विन के जैव-विकास सिद्धांत की तरह ही क्रमवार तय हुई होगी .. शायद ...


नाटक द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों में धार्मिक कहानियों को जन-जन तक सहजता से पहुँचाने के साथ-साथ .. आमजन को उन्हीं के समाज की चंद सामाजिक बुराईयों को मनोरंजक तरीके से दिखला कर उनमें सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए और कभी-कभी विशुद्ध मनोरंजन के लिए भी सदियों से होने वाला नाटक पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदियों से क्रमवार विकसित होता आया है। जात्रा जैसी लोक नाट्य शैली, डोमकच जैसी पारम्परिक नाट्य शैली, लौंडा नाच, नुक्कड़ नाटक इत्यादि भी इसी विकास यात्रा के अहम पड़ाव रहे हैं।


नाटक का वही ऐतिहासिक-पौराणिक स्वरूप आज एक बहुत बड़ा उद्योग- फ़िल्म उद्योग बन चुका है। जिसको आधुनिक युग का सर्वोच्च कलात्मक माध्यम माना जाता है, क्योंकि इनमें लेखन, अभिनय, नृत्य, गीत-संगीत, छायांकन-दृश्यांकन, 'सेट डिजाइन', प्राकृतिक दृश्यों, पोशाक परिकल्पना, सौंदर्य संयोजन, संपादन, प्रकाश-ध्वनि इत्यादि जैसी तकनीकी व रचनात्मक अनेक विधाओं का समन्वय होता है। इसीलिए दर्शकों की भावनाओं को सहजता व सुगमता से उकेरने के लिए फ़िल्मों को कला का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है।


परन्तु संभवतः कुछ फ़िल्में तथाकथित 'बॉक्स ऑफिस' पर कुछ विशेष कमाल नहीं कर पातीं यानी 'सिनेमा हॉल' के परिवर्तित विराट स्वरूप- 'मल्टीप्लेक्स' तक वैसे दर्शकों की भीड़ नहीं जुटा पातीं जो .. वहाँ रुपए खर्च करके जाते ही हैं केवल मनोरंजन करने के लिए या यूँ कहें कि .. सतही या फूहड़ मनोरंजन करने के लिए और वहाँ से वो निकलते भी हैं तो अपने मन-दिमाग़ को 'सो कॉल्ड रिफ्रेश' महसूस करते हुए। 


दूसरी तरफ़ इसी वर्ग के दर्शकगण 'नेटफ्लिक्स' और 'हॉटस्टार' जैसे कई 'ओ टी टी प्लेटफॉर्म' पर भी अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार अपने-अपने फ़ुर्सत के वक्त .. प्रायः दोपहर वाले खाली समय में या रात में सोने से पहले .. सोफे या बिस्तर पर अधलेटे-से अपने मोबाइल के 'स्क्रीन' पर 'स्क्रॉल' कर-कर के स्वाभाविक है कि मनोरंजन की तलाश करते हुए लीक से तनिक हट कर बनी .. कुछ विशेष सोचने या यूँ कहें कि चिंतन-मनन के लिए मजबूर करने वाली फ़िल्मों या 'वेब सीरीजों' को देखना तो कतई पसन्द नहीं करेंगे। 


अगर उन्हीं लोगों की सोचों वाली भाषा का प्रयोग करें तो ऐसे लोगों के लिए अच्छी 'कॉन्सेप्ट' या गंभीर 'कॉन्टेंट' वाली प्रायः 'डाक्यूमेंट्री' जैसी लगने वाली 'स्लो' और धैर्यपूर्वक देखी जाने वाली फ़िल्में या 'वेब सीरीज' .. उनके लिए सिरदर्द देने वाली या बोर करने वाली होतीं हैं। ऐसे दर्शकों को ऐसी फ़िल्में भूले से कभी-कभार देखने का मौक़ा मिलता भी है, तो .. उन्हें सिर दर्द भगाने वाले 'बाम' लगाने की या सिर दर्द भगाने वाली गोली खाने की आवश्यकता पड़ जाती है। भले ही उन फ़िल्मों को ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया हो या कई सारे 'अवॉर्ड' उन फ़िल्मों के नाम के साथ जुड़ गये हों।


ख़ैर .. अभी तथाकथित मसाला फ़िल्मों को पसन्द करने या देखने वालों की ऐसी भीड़ को नज़रंदाज़ करते हुए उन गंभीर फ़िल्मों के दर्शकों की नज़रों से फ़िलहाल .. .. ..


शेष बातें जल्द ही .. इसकी अगली कड़ी - "पंचम वेद ... (२)_अ नेशन विदाउट वुमन !" में .. बस यूँ ही ...